दोहे / डॉ. संजय आर्य


भारतीय जीवन बीमा निगम में विकास अधिकारी पद पर कार्यरत डॉ. संजय आर्य के दोहे और कविताएँ सामाजिक सरोकार वाली दर्जनों पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘नया पथ’ में उनका स्वागत!

 

आज धर्मनिरपेक्षता, होती जाती गल्प ।
बहुसंख्या के ध्वज तले, सहमे सहमे अल्प ।।

रहे कबड्डी खेलते, कृष्णा और जुनैद ।
धीरे धीरे बीच में, रोपे कोई भेद ।।

अभिलाषा उनकी दिखे, चले कारवाँ दूर ।
कोई करे सवाल भी, उन्हें नहीं मंजूर ।।

मैनेज वो करते रहे, वोट कहीं पर नोट ।
डैमेज हम होते रहे, खाए अनगिन चोट ।।

शब्द आज हकला रहे, पीड़ा ना हो व्यक्त ।
लगता है बेमोल हम, मरने को अभिशप्त ।।

दिखे नहीं शालीनता, शोर शराबा खूब ।
भक्तों का बाज़ार है, देख मेरे महबूब ।।

जब तक रीढ़विहीन थे, बहुत मिला आशीष ।
अंगड़ाई लेते मिलीं, चुनौतियां दस बीस ।।

कैसे करें बयान यह, आया ऐसा राज ।
दिखें कबूतर संकट में, छुट्टा सारे बाज ।।

क़दम क़दम पर द्वार है, रोज नया फैलाव ।
छितराना या डूबना, कीजै ठीक चुनाव ।।

पैसा पावर भूमि की, मची हर तरफ लूट ।
लाल हरा नीला धवल, सभी चाहते छूट ।।

जनता बीच दरार के, नित्य हो रहे शोध ।
अलग अलग खांचे रहें, नहीं नागरिकबोध ।।

जब अनुशासन टूटता, नदियाँ बनतीं बाढ़ ।
मचे तबाही हर तरफ, चारों तरफ़ उजाड़ ।।

कुछ तटस्थ कुछ सांय-फुस, कुछ मुखर कुछ मौन ।
कहना मुश्किल बहुत है, किस पाले में कौन ।।

परतें इतनी जाति की, कैसे फेंके नोच ।
कुछ बड़े कुछ नान्ह हैं, बहे खून में सोच ।।

खबरदार तुम एक को, मान न लेना खास ।
साझी रहीं विरासतें, साझा है इतिहास ।।

आसपास जब तक रहे, लगे नहीं अनमोल ।
आज वृक्ष जब ढह गया, सूना है भूगोल ।।

थाने में करबद्ध हो, करता न्याय गुहार ।
घुड़क घुड़ककर कर रहे, पूछताछ सरकार ।।

एक है सत्ता धर्म की, एक है सत्ता राज ।
दोनों संग गठजोड़ है, पिसता सकल समाज ।।

एक दरद गरीबी की, सहते नहीं सहाय ।
उस पर थोपी हीनता, गांठ रही उलझाय ।।

नई सदी में मिल गई, हमें एक तकनीक ।
जो चाहो होता नहीं, दिखता मगर सटीक ।।

झोला लेकर चले थे, बाबा करने क्रांति ।
भावभूमि तैयार कर, बेच रहे मुखकांति ।।

मासूमों की मौत की, निकल रही बारात
फिर कैसी जन्माष्टमी, फिर कैसी नवरात ।।

संपर्क: 9415842090 


1 thought on “दोहे / डॉ. संजय आर्य”

  1. संजय आर्य ने अपने दोहों में समय की सही पहचान दर्ज की है, यह दोहे जहां एक तरफ प्रतिरोध का वातावरण तैयार करते हैं, वहीं पर जीवन से संगत करते हुए एक नया रास्ता भी सुझाते हैं,यह दोहे यह आदमी की भी सही पहचान करते हैं,संजय जी को साधुवाद एवं नया पथ संपादक को धन्यवाद

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