
भारत-माता की कल्पना भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे प्रभावशाली और साथ ही सबसे जटिल सांस्कृतिक निर्मितियों में से एक है। भारत को एक मातृरूप में देखने की यह कल्पना अचानक उत्पन्न नहीं हुई। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बंगाल के साहित्यिक और राष्ट्रवादी विमर्श में मातृभूमि की एक भावनात्मक छवि आकार लेने लगी। ‘बंगमाता’ के रूप में उभरती यह कल्पना धीरे-धीरे बंगाल की सांस्कृतिक अस्मिता से आगे बढ़कर ‘भारत-माता’ की व्यापक राष्ट्रीय छवि में रूपांतरित हुई। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का वन्दे मातरम्, जिसकी रचना 1875 के आसपास मानी जाती है और जिसे बाद में आनन्दमठ में सम्मिलित किया गया, इस प्रक्रिया का एक निर्णायक पड़ाव था। 1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की भारत माता ने इस मातृभूमि को दृश्य रूप प्रदान किया। इस क्रम में मातृभूमि केवल भूगोल नहीं रही; वह संस्कृति, शक्ति, ज्ञान, समृद्धि और आध्यात्मिकता से जुड़ी एक भावनात्मक सत्ता बनने लगी।
यहीं से एक महत्वपूर्ण परिवर्तन शुरू होता है। मातृभूमि की सांस्कृतिक कल्पना जब राजनीतिक राष्ट्रवाद की भाषा ग्रहण करती है, तब प्रतीक केवल भावनाओं को व्यक्त नहीं करते; वे यह भी निर्धारित करने लगते हैं कि राष्ट्र को किस रूप में देखा, अनुभव और प्रदर्शित किया जाए। बंगमाता से भारत-माता तक की यात्रा इसलिए केवल एक कलात्मक या साहित्यिक यात्रा नहीं है; यह भारतीय राष्ट्रवाद के निर्माण की यात्रा भी है। और इसी यात्रा में वह प्रश्न जन्म लेता है जो आज भी हमारे सामने है क्या किसी विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीक को पूरे राष्ट्र की सार्वभौमिक पहचान बनाया जा सकता है, जबकि राष्ट्र स्वयं अनेक धर्मों, भाषाओं, जातियों और सांस्कृतिक स्मृतियों से बना हो?
यहीं से वन्दे मातरम् को केवल एक गीत के रूप में पढ़ना अपर्याप्त हो जाता है। यह भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास, सांस्कृतिक पहचान, धर्मनिरपेक्षता और नागरिकता के प्रश्नों को एक साथ सामने लाता है। और आज, जब भारत अपने 80वें स्वतंत्रता दिवस की ओर बढ़ रहा है और 2025–26 के दौरान “वन्दे मातरम्” के 150 वर्ष पूरे होने का सरकारी राष्ट्रीय स्मरण चल रहा है, यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो गया है। भारत सरकार ने 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक इसके 150 वर्ष पूरे होने पर वर्षभर के राष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इसलिए इस अवसर पर प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि हम “वन्दे मातरम” गाएँ या न गाएँ। प्रश्न यह होना चाहिए जिस भारत की कल्पना “वन्दे मातरम” करती है, वर्तमान भारत उस कल्पना के सामने स्वयं को कहाँ पाता है?
वन्दे मातरम् : स्वतंत्रता का स्वर और उसकी असुविधाजनक पृष्ठभूमि
“वन्दे मातरम्” भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में असाधारण ऐतिहासिक महत्व रखता है। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया और 1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का शक्तिशाली स्वर बना। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध यह नारा और गीत दोनों रूपों में राजनीतिक प्रतिरोध से जुड़ा। नेहरू ने 1937 में स्वयं स्वीकार किया कि यह राष्ट्रीय आंदोलन और राष्ट्रीय जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था। लेकिन इतिहास का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। गीत का साहित्यिक संदर्भ आनन्दमठ है। उपन्यास में मातृभूमि की कल्पना देवी-रूपों से जुड़ती है और कथा धार्मिक-सांस्कृतिक संघर्षों की पृष्ठभूमि में विकसित होती है। यही कारण था कि 1930 के दशक में यह प्रश्न उठने लगा कि स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अत्यंत प्रिय इस गीत को एक ऐसे राष्ट्र के साझा प्रतीक के रूप में किस प्रकार प्रस्तुत किया जाए, जिसकी धार्मिक संरचना अत्यंत विविध है। 20 अक्टूबर 1937 को जवाहरलाल नेहरू ने सुभाषचन्द्र बोस को लिखे पत्र में आनन्दमठ को पढ़ने के बाद लिखा कि उसका संदर्भ मुस्लिम समुदाय को असहज कर सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी माना कि उस समय गीत के विरुद्ध चल रहा कुछ विरोध साम्प्रदायिक राजनीति से निर्मित था। कुछ ही दिनों बाद नेहरू ने कांग्रेस कार्यसमिति के निर्णय के संदर्भ में यह स्पष्ट किया कि गीत के पहले दो पदों को व्यापक रूप से स्वीकार किया जा सकता है, जबकि शेष हिस्सों की imagery, allegory और ideology विभिन्न समूहों के लिए समान रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकती। उन्होंने विशेष रूप से यह तर्क रखा कि यदि कोई विचारधारा भारत के विभिन्न समुदाय ईमानदारी से स्वीकार नहीं कर सकते, तो उसे अखिल भारतीय राष्ट्रीय गीत की अनिवार्य विचारधारा नहीं बनाया जाना चाहिए| यह इतिहास बहुत महत्वपूर्ण है। क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक-धार्मिक राष्ट्रवाद का तनाव आज का आविष्कार नहीं है। यह प्रश्न स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर भी मौजूद था।
भारत-माता : देवी, धरती या जनता?
भारत-माता की अवधारणा की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भावनात्मकता है और शायद उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक जटिलता भी यही है। अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की 1905 की भारत माता में मातृभूमि एक स्त्री-रूप में दिखाई देती है। उसके हाथों में पुस्तक, धान की बालियाँ, वस्त्र और माला हैं। राष्ट्र को यहाँ ज्ञान, अन्न, जीवन और आध्यात्मिकता की मातृ-छवि प्राप्त होती है। यह दृश्य भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति है। लेकिन राष्ट्र की कल्पना को देवी या मातृरूप में बदलते ही एक प्रश्न उठता है क्या यह रूपक सभी भारतीयों की समान सांस्कृतिक भाषा है? यदि भारत-माता किसी विशिष्ट धार्मिक प्रतीक-व्यवस्था में दिखाई जाती है, तो उस रूपक के साथ सहज संबंध न रखने वाले नागरिक कहाँ खड़े होंगे? यहीं धार्मिक एथ्नोसेंट्रिज़्म का प्रश्न सामने आता है। धार्मिक प्रतीक का सार्वजनिक जीवन में होना अपने-आप में एथ्नोसेंट्रिज़्म नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी एक धार्मिक-सांस्कृतिक अनुभव को पूरे राष्ट्र की स्वाभाविक और अनिवार्य पहचान मान लिया जाता है। किसी नागरिक का “वन्दे मातरम्” को स्वतंत्रता-संग्राम की स्मृति के रूप में स्वीकार करना उतना ही वैध है जितना किसी दूसरे नागरिक का उसके धार्मिक संदर्भ से असहज होना। लोकतांत्रिक राष्ट्र की शक्ति यह नहीं कि वह इन दोनों में से किसी एक को चुप करा दे। उसकी शक्ति यह है कि वह दोनों अनुभवों के सह-अस्तित्व की जगह बनाए।
1950 : गणराज्य का निर्णय और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की कसौटी
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि “जन गण मन” राष्ट्रीय गान होगा और “वन्दे मातरम्”, जिसने स्वतंत्रता-संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी, उसे समान सम्मान दिया जाएगा। यह निर्णय महज औपचारिक व्यवस्था नहीं था। यह नवगठित गणराज्य की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक समझ थी। भारत ने एक ओर वन्दे मातरम् की ऐतिहासिक राष्ट्रवादी भूमिका को नकारा नहीं; दूसरी ओर संविधान-आधारित गणराज्य ने अपनी औपचारिक राष्ट्रीय पहचान को किसी एक धार्मिक प्रतीक-व्यवस्था पर आधारित नहीं किया। यहाँ हमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संवैधानिक राष्ट्रवाद के बीच अंतर समझना होगा। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद राष्ट्र को साझा इतिहास, परंपरा, संस्कृति और प्रतीकों से परिभाषित कर सकता है। संवैधानिक राष्ट्रवाद नागरिकों की समानता, स्वतंत्रता, अधिकार और न्याय से। पहला पूछता है “हम कौन हैं?” दूसरा पूछता है “हम सबको समान रूप से नागरिक कैसे बनाएँ?” भारतीय लोकतंत्र की जटिलता इसी में है कि दोनों प्रश्न एक-दूसरे से टकराते भी हैं और संवाद भी करते हैं।
वन्दे मातरम् और आज का राजनीतिक आग्रह:
आज “वन्दे मातरम्” केवल इतिहास की वस्तु नहीं है। 150वीं वर्षगाँठ के अवसर पर इसे राष्ट्रीय स्तर पर पुनर्स्मरण, सामूहिक गायन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से वर्तमान राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन में सक्रिय रूप से लाया गया है। इसमें कोई समस्या नहीं है कि राष्ट्र अपने ऐतिहासिक प्रतीकों को याद करे। समस्या तब पैदा होती है जब स्मृति और अनिवार्यता के बीच की सीमा धुंधली होने लगे। राष्ट्रीय प्रतीक का सम्मान नागरिक स्वतंत्रता से टकराना नहीं चाहिए। देशभक्ति किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान, उसकी असहमति या उसके प्रतीकों के प्रति व्यक्तिगत संबंध को मापने का उपकरण नहीं बननी चाहिए। यदि किसी नागरिक को किसी गीत के धार्मिक रूपक से असहमति है, तो यह आवश्यक नहीं कि वह राष्ट्र से असहमत है। और यदि कोई नागरिक उस गीत में अपने स्वतंत्रता-संग्राम की स्मृति देखता है, तो उसे साम्प्रदायिक कह देना भी उतना ही सरलीकरण है। राष्ट्रीय एकता का अर्थ सांस्कृतिक एकरूपता नहीं है।
“सुजलां सुफलां” : यहाँ से गीत वर्तमान से प्रश्न करने लगता है
“वन्दे मातरम्” की सबसे प्रभावशाली बात यह है कि इसकी आरंभिक राष्ट्रीय कल्पना किसी सेना, सत्ता या राजकीय शक्ति से नहीं, बल्कि जल, फल, हवा और खेत से शुरू होती है “सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्, शस्यश्यामलां मातरम्।” यहीं से यह गीत मेरे लिए राजनीतिक आलोचना का एक दूसरा रास्ता खोलता है। क्योंकि यदि मातृभूमि सुजल है, तो वर्तमान भारत की नदियाँ हमें क्या बताती हैं? CPCB की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार 271 नदियों पर 296 प्रदूषित नदी-खंड चिन्हित किए गए। यह संख्या 2018 के 351 प्रदूषित खंडों से कम है; 149 खंड सूची से हटाए गए और 71 में जल-गुणवत्ता में सुधार दर्ज हुआ। इसलिए तस्वीर केवल विफलता की नहीं है सुधार भी हुआ है। लेकिन 296 प्रदूषित खंड यह भी बताते हैं कि समस्या समाप्त नहीं हुई। इसलिए “सुजलाम्” को आज पढ़ते हुए प्रश्न यह नहीं कि गीत झूठ बोलता है। प्रश्न यह है क्या “सुजल” हमारा वर्तमान है या अभी भी हमारा अधूरा राष्ट्रीय वादा? गंगा को माँ कहना एक सांस्कृतिक भाव है। नर्मदा को माँ कहना एक आत्मीय संबोधन है। लेकिन माँ की पूजा और माँ की देखभाल दो अलग क्रियाएँ हैं। नदी के किनारे दीप जलाना श्रद्धा हो सकती है। नदी में प्रदूषण न पहुँचाना उससे बड़ी श्रद्धा है।
पवित्र नदी और प्रदूषित नदी : आस्था का विरोधाभास
हमारे समय का एक गहरा विरोधाभास यह है कि हम प्रकृति को पवित्र कहने वाली संस्कृति में रहते हुए भी उसके साथ उपभोक्तावादी व्यवहार करते हैं। नदी देवी है,लेकिन सीवेज का भार भी उसी पर। धरती माँ है—लेकिन उसका असीमित दोहन भी। वन पवित्र हैं लेकिन उन्हें खनिज और भूमि के भंडार की तरह देखने की प्रवृत्ति भी। यहाँ समस्या केवल धर्म की नहीं है। यह आधुनिक विकास और उपभोग की भी समस्या है। नदी प्रदूषण को केवल धार्मिक अनुष्ठानों के खाते में डाल देना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। सरकारी आकलन स्वयं सीवेज, औद्योगिक प्रदूषण और अन्य प्रदूषण स्रोतों की ओर संकेत करते हैं। इसलिए आलोचना को धर्म-विरोध में बदलना भी उतना ही आसान सरलीकरण होगा। असली प्रश्न यह है क्या हमारी आस्था प्रकृति के प्रति नैतिक जिम्मेदारी पैदा कर रही है, या वह केवल अनुष्ठान तक सीमित रह गई है?
“मलयजशीतलाम्” : माँ की साँस
जिस मातृभूमि की कल्पना गीत करता है, उसकी हवा मलय पर्वत से आने वाली शीतल और सुगंधित हवा जैसी है। लेकिन 2025 के IQAir आकलन में भारत का वार्षिक औसत PM2.5 स्तर 48.9 µg/m³ दर्ज किया गया, जो WHO की वार्षिक guideline से लगभग 9.8 गुना अधिक है। यह एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय monitoring report है, सरकारी निगरानी का विकल्प नहीं; फिर भी वायु-प्रदूषण की गंभीरता का महत्वपूर्ण संकेत देती है। यहाँ “मलयजशीतलाम्” आधुनिक पर्यावरण विज्ञान का मूल पाठ नहीं है। उसे पर्यावरणीय न्याय से जोड़ना हमारा समकालीन पुनर्पाठ है।लेकिन यह पुनर्पाठ जरूरी है। क्योंकि स्वच्छ हवा केवल पर्यावरणीय सुविधा नहीं। स्वच्छ हवा नागरिक अधिकार का प्रश्न है। और प्रदूषित हवा का भार भी समाज पर समान रूप से नहीं पड़ता। जिसके पास बेहतर आवास, निजी परिवहन, स्वास्थ्य सुविधा और घर के भीतर हवा को शुद्ध करने की आर्थिक क्षमता है, वह प्रदूषण से अलग तरीके से जूझता है; खुले में काम करने वाला श्रमिक, सड़क किनारे रहने वाला परिवार या कमजोर स्वास्थ्य वाला बच्चा उसी हवा को अधिक कठोरता से झेलता है। इसलिए पारिस्थितिक संकट केवल प्रकृति का संकट नहीं। यह वर्ग का संकट भी है।
“शस्यश्यामलां” : खेत के पीछे कौन है?
गीत का शस्यश्यामल भारत केवल हरे खेतों का दृश्य नहीं है। उस हरियाली के पीछे किसान है। मिट्टी है।बीज है।जल है। श्रम है। ऋतु है। और बाजार भी है। इसलिए “शस्यश्यामला” को केवल कृषि-संपन्नता की सौंदर्यात्मक छवि बनाकर देखना उसके अर्थ को छोटा कर देता है। आलोचनात्मक दृष्टि यहाँ पूछेगी— अन्न कौन पैदा करता है? भूमि किसके पास है? जल किसके नियंत्रण में है? उत्पादन का लाभ किसे मिलता है? और उत्पादन की लागत कौन वहन करता है? किसी देश का खाद्य उत्पादन बढ़ना महत्वपूर्ण है। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या किसान सम्मानपूर्वक जी रहा है? क्या मिट्टी स्वस्थ है? क्या भूजल बच रहा है?क्या खेती जलवायु परिवर्तन के दबाव में टिकाऊ है? यदि शस्यश्यामल भारत केवल खेत की तस्वीर है और किसान उस तस्वीर से बाहर है, तो हमारी राष्ट्रीय कल्पना अधूरी है।
हिमालय : भारत-माता का शरीर और जलवायु संकट
भारत-माता की कल्पना यदि धरती से जुड़ी है, तो हिमालय को केवल राष्ट्रीय गौरव के दृश्य की तरह देखना पर्याप्त नहीं। मार्च 2026 की ICIMOD रिपोर्ट के अनुसार हिन्दूकुश-हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों में बर्फ के क्षय की दर 2000 के बाद दोगुनी हुई है। 1990 से 2020 के बीच क्षेत्र के ग्लेशियरों ने लगभग 12 प्रतिशत क्षेत्र और लगभग 9 प्रतिशत अनुमानित बर्फीला भंडार खोया। हिमालय का संकट केवल हिमालय का संकट नहीं। यह नदियों का संकट है। जल का संकट है। कृषि का संकट है। मैदानी भारत का संकट है। भविष्य की पीढ़ियों का संकट है। हम भारत-माता के पर्वतों पर गर्व करते हैं। लेकिन क्या हम उनके पारिस्थितिक भविष्य के प्रति उतने ही चिंतित हैं? राष्ट्र की भौगोलिक कल्पना को पारिस्थितिक जिम्मेदारी में बदलना होगा।
धरती माँ और उपभोक्ता मनुष्य:
यहीं “वन्दे मातरम्” का सबसे असुविधाजनक प्रश्न सामने आता है। हम कहते हैं धरती माँ है। लेकिन आर्थिक व्यवहार में धरती अक्सर संसाधन बन जाती है। नदी, जल-संसाधन। जंगल,खनिज और भूमि-संसाधन। पर्वत;निर्माण और खनन का क्षेत्र। समुद्र बंदरगाह और औद्योगिक क्षेत्र। और अंततः मनुष्य श्रम। यहाँ समस्या किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल से बड़ी है। यह विकास के उस मॉडल का प्रश्न है जिसमें प्रकृति को लगातार आर्थिक मूल्य में परिवर्तित किया जाता है और मनुष्य तथा पर्यावरण के बीच के संबंध को उत्पादन और उपभोग की भाषा में मापा जाता है। माँ की भाषा और बाजार की भाषा हमारे भीतर एक साथ चल रही हैं। हम उसे माँ कहते हैं। और उसी समय उसका दोहन करते हैं। यही हमारे समय का सबसे बड़ा नैतिक विरोधाभास है।
“सुमधुर भाषिणीम्” : भारत की आवाज़ कितनी है? भारत की आवाज़ एक नहीं है। यह अनेक भाषाओं, बोलियों और सांस्कृतिक स्मृतियों से बनी है। इसलिए “सुमधुर भाषिणीम्” को किसी एक भाषा की श्रेष्ठता के रूप में पढ़ना भारत की बहुलता को छोटा करना होगा। भारत की शक्ति यह नहीं कि सभी एक ही भाषा बोलें। भारत की शक्ति यह है कि अनेक भाषाएँ स्वयं को भारत की भाषा मान सकें। भाषा जब पहचान का आधार बनती है तो संस्कृति को जीवित रखती है। लेकिन जब वही भाषा दूसरे को कम भारतीय साबित करने का उपकरण बनती है, तब सांस्कृतिक विविधता राजनीतिक संघर्ष में बदलने लगती है। राष्ट्र की मधुरता उसके एक स्वर में नहीं, अनेक स्वरों को सुन सकने की क्षमता में है।
“तुमि विद्या” : ज्ञान किसका है? गीत भारत-माता को विद्या के रूप में भी देखता है। लेकिन आज शिक्षा पर प्रश्न केवल विद्यालयों की संख्या का नहीं, ज्ञान की गुणवत्ता और समान अवसर का भी है। ASER 2024 ने ग्रामीण भारत में बच्चों की बुनियादी पढ़ने और अंकगणित की क्षमता में 2022 के बाद सुधार दर्ज किया है। उदाहरण के लिए, कक्षा V के ग्रामीण बच्चों में कक्षा II स्तर का पाठ पढ़ पाने का अनुपात 2022 के 42.8 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 48.8 प्रतिशत हुआ। सुधार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सीखने का संकट समाप्त हो गया। इसलिए “विद्या” को केवल गौरव के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं। हमें पूछना होगा क्या ज्ञान सभी का अधिकार है? क्या गरीब बच्चे को समान अवसर मिलता है? क्या ग्रामीण और शहरी शिक्षा के बीच की दूरी कम हुई है? क्या मातृभाषा में शिक्षा का सम्मान है?क्या कारीगर का ज्ञान ज्ञान है? क्या किसान का पारंपरिक पर्यावरणीय ज्ञान है? क्या आदिवासी समुदायों का प्रकृति-संबंधी अनुभव ज्ञान है? यदि “विद्या” केवल संस्थागत और अभिजात ज्ञान तक सीमित हो जाए, तो भारत की विशाल लोक-स्मृतियाँ और ज्ञान-परंपराएँ अदृश्य हो जाती हैं।
“शक्ति” : देवी की शक्ति और स्त्री की शक्ति
“वन्दे मातरम्” मातृभूमि को शक्ति से जोड़ता है। भारतीय संस्कृति में स्त्री को देवी कहने की परंपरा अत्यंत प्रभावशाली है। लेकिन यहाँ एक असुविधाजनक प्रश्न है; क्या स्त्री को देवी कहने और उसे बराबर मनुष्य मानने के बीच कोई अंतर नहीं है? देवी को सर्वशक्तिमान कहना सरल है। वास्तविक स्त्री को अपने जीवन पर अधिकार देना कठिन है। भारत में महिला श्रमबल भागीदारी 2018 के 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 35.3 प्रतिशत हुई है यह महत्वपूर्ण सुधार है; फिर भी विश्व बैंक ने कौशल, वित्त, सुरक्षित परिवहन और आवास जैसी संरचनात्मक बाधाओं की ओर संकेत किया है। इसलिए “शक्ति” का आधुनिक अर्थ केवल देवी की पूजा नहीं हो सकता। शक्ति का अर्थ agency भी है। अपने जीवन का निर्णय लेने का अधिकार। शिक्षा। रोजगार। संपत्ति। सुरक्षा। और समान नागरिकता।
आदिवासी भारत : संस्कृति का उत्सव और अधिकार का प्रश्न
भारत की सांस्कृतिक विविधता पर गर्व करते हुए हम आदिवासी कला, शिल्प, नृत्य और प्रकृति-दृष्टि को भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। लेकिन एक कठिन प्रश्न है क्या हम आदिवासी संस्कृति का केवल सौंदर्य ग्रहण कर रहे हैं या उसके अधिकारों को भी स्वीकार कर रहे हैं? वनाधिकार अधिनियम, 2006 ने वन-आश्रित आदिवासी समुदायों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को मान्यता दी है तथा ग्राम सभा को वन और जैव-विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका दी है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना और समुदायों की आजीविका, खाद्य-सुरक्षा तथा वन-संरक्षण से जुड़े अधिकारों को मजबूत करना है। फिर भी सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व और वास्तविक अधिकार एक ही बात नहीं हैं। किसी आदिवासी चित्र को संग्रहालय में लगाना आसान है। उस समुदाय के भूमि-अधिकार और सांस्कृतिक अधिकार का सम्मान करना कठिन। किसी समुदाय की कला को “भारतीय विरासत” कहना सुंदर है। लेकिन उसके जीवित अधिकारों की रक्षा करना उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यहीं सांस्कृतिक अधिग्रहण का प्रश्न गंभीर बनता है।
सांस्कृतिक अधिग्रहण : किसका प्रतीक, किसका राष्ट्र?
Cultural appropriation की अवधारणा को “चोरी” जैसे सरल अर्थ में समझना उचित नहीं। यह इस प्रश्न से जुड़ी है कि किसी संस्कृति के प्रतीक को कौन ग्रहण करता है, किस शक्ति-संबंध के भीतर ग्रहण करता है और ग्रहण के बाद उसका अर्थ तथा सामाजिक स्वामित्व कैसे बदलता है। “वन्दे मातरम्” के संदर्भ में यह कहना कि पूरा गीत किसी एक संस्कृति की “चोरी” है, ऐतिहासिक रूप से सरलीकरण होगा। लेकिन यह प्रश्न पूरी तरह वैध है; जब किसी विशेष धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीक को राष्ट्र की सार्वभौमिक पहचान में बदल दिया जाता है, तब उसकी मूल सांस्कृतिक विशिष्टता का क्या होता है? क्या वह विविधता का प्रतीक रहता है? या वह एक सांस्कृतिक मानक बन जाता है? यही अंतर सांस्कृतिक स्मृति और सांस्कृतिक वर्चस्व के बीच है।
आस्था और अंधविश्वास के बीच
धर्म और आस्था को अंधविश्वास कहकर खारिज कर देना भी एक प्रकार का सांस्कृतिक अहंकार हो सकता है। भारतीय धार्मिक परंपराओं ने करुणा, संयम, सह-अस्तित्व और प्रकृति के प्रति संवेदना के अनेक रूप विकसित किए हैं। समस्या धर्म नहीं है। समस्या तब है जब विश्वास विवेक को समाप्त कर दे। जब प्रश्न पूछना अपमान मान लिया जाए। जब वैज्ञानिक दृष्टि को शत्रु समझा जाए। जब किसी धार्मिक प्रतीक की आलोचना को राष्ट्र-विरोध माना जाए। और जब धार्मिक पहचान राजनीतिक श्रेष्ठता का आधार बनने लगे। धर्म मनुष्य में करुणा उत्पन्न करे तो वह मानवीय शक्ति है। लेकिन यदि वह भय, घृणा या वर्चस्व पैदा करे, तो उसके सामाजिक प्रभाव की आलोचना आवश्यक है।
आदर्श भारत और यथार्थ भारत
यहीं आदर्श भारत (Normative India) और यथार्थ भारत (Empirical India) के बीच का अंतर महत्वपूर्ण हो जाता है। “वन्दे मातरम्” एक आदर्श भारत की कल्पना करता है. सुजल, सुफल, शस्यश्यामल, ज्ञान और शक्ति से संपन्न। वर्तमान भारत वह भारत है जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय यथार्थ में हमारे सामने है। इन दोनों के बीच की दूरी ही आलोचनात्मक आत्मपरीक्षण की जगह है। यदि नदी प्रदूषित है, तो “सुजलाम्” झूठ नहीं हो जाता। लेकिन “सुजलाम्” को सच मानकर नदी की गंदगी को अनदेखा करना भी ईमानदार नहीं है। यदि हवा प्रदूषित है, तो “मलयजशीतलाम्” अप्रासंगिक नहीं हो जाता। बल्कि वह हमारे सामने प्रश्न रखता है। यदि हर बच्चे को समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलती, तो “विद्या” केवल गौरव का शब्द नहीं रहती। यदि स्त्री अभी भी समानता के लिए संघर्ष कर रही है, तो “शक्ति” केवल देवी का रूपक नहीं रह सकती। यदि किसी नागरिक की धार्मिक पहचान उसे कम राष्ट्रवादी समझने का कारण बनती है, तो “मातरम्” की सार्वभौमिकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
इस स्वतंत्रता दिवस पर “वन्दे मातरम्” से कुछ प्रश्न
इस 80वें स्वतंत्रता दिवस पर जब “वन्दे मातरम्” बजे, तो शायद हमें केवल यह नहीं सुनना चाहिए कि गीत क्या कह रहा है। हमें यह भी सुनना चाहिए कि उसके शब्द हमारे वर्तमान से क्या पूछ रहे हैं। क्या हमारी नदियाँ सुजल हैं? क्या हमारी धरती सुफल है? क्या हमारी हवा मलयजशीतल है? क्या हमारे खेत शस्यश्यामल हैं? क्या हमारी भाषा सचमुच सुमधुर है? क्या विद्या सबकी है? क्या शक्ति सबकी है? क्या भक्ति करुणा में बदल रही है? क्या हमारी मातृभूमि अपनी सभी संतानों के लिए समान रूप से आत्मीय है? यदि इन प्रश्नों में कहीं उत्तर “नहीं” है, तो शायद राष्ट्रगीत समाप्त नहीं हुआ है। वहीं से वह हमारे लिए शुरू होता है।
राष्ट्रवाद : उद्घोष से नागरिकता तक
राष्ट्रवाद का सबसे सरल रूप है “हम महान हैं।” उससे थोड़ा कठिन है “हम महान थे।” लेकिन लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद का सबसे कठिन रूप है “हमारे पास महान विरासत है, लेकिन हमारा वर्तमान अभी भी अधूरा है।” अपने राष्ट्र की आलोचना करना राष्ट्र-विरोध नहीं है। नदी की गंदगी पर प्रश्न उठाना राष्ट्र-विरोध नहीं। स्त्री की असमानता पर प्रश्न उठाना राष्ट्र-विरोध नहीं। आदिवासी विस्थापन पर प्रश्न उठाना राष्ट्र-विरोध नहीं। धार्मिक वर्चस्व पर प्रश्न उठाना राष्ट्र-विरोध नहीं। शिक्षा की असमानता पर प्रश्न उठाना राष्ट्र-विरोध नहीं। बल्कि यदि राष्ट्र को नागरिकों का साझा घर मानें, तो इन प्रश्नों को उठाना उस घर के प्रति जिम्मेदारी है। राष्ट्रप्रेम यदि केवल अतीत के गौरव में है, तो वह स्मृति है। राष्ट्रप्रेम यदि वर्तमान की चुनौतियों के प्रति जिम्मेदारी में बदलता है, तो वह जीवित नागरिकता है।
“वन्दे मातरम्” की आज सबसे बड़ी प्रासंगिकता शायद इस बात में नहीं कि हम उसे कितनी बार गाते हैं। बल्कि इस बात में है कि वह हमें अपने शब्दों और अपने व्यवहार के बीच की दूरी देखने के लिए बाध्य कर सकता है। यदि हम उसे स्वतंत्रता-संग्राम की स्मृति के रूप में पढ़ते हैं, तो हमें उस स्वतंत्रता का अर्थ भी समझना होगा। यदि हम उसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति के रूप में पढ़ते हैं, तो हमें यह पूछना होगा कि उस राष्ट्रवाद में सभी नागरिकों के लिए कितनी जगह है। यदि हम उसकी मातृभूमि को धार्मिक प्रतीकों में देखते हैं, तो हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में किसी एक धार्मिक संवेदना को नागरिक राष्ट्रभक्ति की अनिवार्य कसौटी नहीं बनाया जा सकता। यदि हम उसकी प्रकृति-कल्पना को स्वीकार करते हैं, तो हमें अपनी नदियों, जंगलों, मिट्टी, हिमालय और हवा के प्रति अपने व्यवहार को देखना होगा। यदि हम “विद्या” कहते हैं, तो हमें शिक्षा की असमानता दिखाई देनी चाहिए। यदि हम “शक्ति” कहते हैं, तो वास्तविक स्त्री की स्वतंत्रता दिखाई देनी चाहिए। यदि हम “भक्ति” कहते हैं, तो उसमें करुणा होनी चाहिए। यदि हम “मातरम्” कहते हैं, तो उस माँ की सभी संतानों के लिए समान नागरिकता का प्रश्न हमारे सामने होना चाहिए। क्योंकि माँ की जय बोलना सरल है। माँ को स्वस्थ रखना कठिन है। माँ की प्रतिमा बनाना सरल है। माँ की धरती, जल और हवा की रक्षा करना कठिन है। गीत गाना सरल है।गीत के अर्थ को जीना कठिन है।
और शायद इससे भी कठिन है अपने राष्ट्रगीत को इतनी आलोचनात्मक ईमानदारी से पढ़ना कि उसमें अपनी असुविधा भी दिखाई दे और अपनी जिम्मेदारी भी। इसीलिए “वन्दे मातरम्” को केवल समर्थन या विरोध के द्वंद्व में बंद कर देना उसके ऐतिहासिक और समकालीन अर्थ को सीमित करना होगा। हमें उससे सहमत होने से पहले उसे समझना होगा। उसकी विरासत को स्वीकार करने के साथ उसकी सीमाओं को भी देखना होगा। उसकी मातृभूमि की कल्पना को वर्तमान भारत की वास्तविकता के सामने रखना होगा। और अंततः यह पूछना होगा जिस भारत को हम माँ कहते हैं, क्या हम उसके साथ सचमुच संतान की तरह व्यवहार कर रहे हैं या एक उपभोक्ता की तरह?
और यदि भारत-माता वास्तव में भारत के करोड़ों लोग हैं, तो फिर प्रदूषित हवा में साँस लेता बच्चा, सूखती नदी के किनारे खड़ा किसान, विस्थापित आदिवासी, असमानता से जूझती स्त्री,अपनी भाषा बचाता समुदाय, और अपनी धार्मिक पहचान के साथ बराबरी से जीने की इच्छा रखने वाला नागरिक क्या वे भी भारत-माता के उतने ही अभिन्न अंग हैं जितनी हमारी कल्पना में बनी वह भव्य मातृ-प्रतिमा?यदि उत्तर “हाँ” है, तो राष्ट्रवाद की अगली यात्रा प्रतिमा से मनुष्य की ओर होनी चाहिए। माँ की जय से माँ की चिंता तक। नारे से नागरिकता तक। स्मृति से जिम्मेदारी तक। और राष्ट्रवाद से मनुष्यता तक।





वंदे मातरम के आईने में भारत वर्ष की जो परिकल्पना की जाती है उसे परिपुष्ट करता हुआ आपका आलेख अत्यंत सारगर्भित और सूचनापरक लगा। शानदार विश्लेषण के लिए धन्यवाद 💐🌹
बहुत उम्दा विश्लेषण। हार्दिक शुभकामनाएं आपको।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और संवेधानिक राष्ट्रवाद में अंतर और अनिवार्यता पर प्रश्नचिन्ह.. सशक्त लेखन.. बहुत दक्षता से राष्ट्रगीत के अर्थों के सूत्रों को पर्यावरण , किसान सशक्तिकरण के साथ जोड़ा है.. वो सराहनीय है… गायन से अधिक आत्मसात करना अनिवार्य होना चाहिए..suman ji..अद्भुत