इस सृष्टि में जागे हुए सुरों के साथ / राकेश कुमार मिश्र
नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा (2024) का पुनर्पाठ एक संग्रह के बहाने केशव तिवारी के समूचे काव्य-संसार पर
नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा (2024) का पुनर्पाठ एक संग्रह के बहाने केशव तिवारी के समूचे काव्य-संसार पर
प्रखर अध्येता और समाजवैज्ञानिक कमल नयन चौबे ने टॉम बॉटमोर द्वारा संपादित ए डिक्शनरी ऑफ़ मार्क्सिस्ट थॉट का हिंदी अनुवाद
प्रताप दीक्षित के नवीनतम कहानी संग्रह ‘कगार के आख़िरी सिरे पर’ की समीक्षा कर रहे हैं माधव महेश. ‘उम्मीद पर
“ये लघुकथाएं एक संक्षिप्त काल की हैं, फिर भी लेखक ने परिस्थितियों, विचारों और बयान करने की कला को दोहराने
“सोफ़ोक्लीज़ की कृति यह बताने नहीं आती कि शोकांतिका केवल भाग्य का खेल है; वह हमें यह दिखाती है कि
‘भाषा के साथ इस अद्भुत तादात्म्य को दस्तावेज़ के रूप में दर्ज करती ‘इन अदर वर्ड्स’ भाषा के साथ होने
नात्सी अत्याचार का भयावह दौर… अपने बेटे से दूर नात्सियों के यातना शिविर में फँसी अन्ना सेम्योनोव्ना… शिविर के अँधेरे
कुछ लोगों की राय है कि दमन के दौर लेखन को व्यंजना शक्ति की ओर अधिकाधिक उन्मुख करते हैं और
‘इतिहास में अधीनस्थ होने का अर्थ मूक होना या अशक्त होना नहीं है। संघर्ष हुआ है, इसे स्वीकार करने की