रचना

हमारे दौर में न्याय-व्यवस्था का जो हश्र हुआ है, उसे इस दौर के विशिष्ट कवि हरीश चन्द्र पाण्डे की यह

सुमित की कविताएँ सुमित अपने कवि-कर्म को लेकर गंभीर हैं यद्यपि उनकी काव्ययात्रा आरंभ हुए ज़्यादा दिन नहीं हुए हैं।

सरगर्मी

समकालीन साहित्य में कविता केवल सौंदर्यशास्त्रीय उपभोग की वस्तु न होकर अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ, अधिनायकवादी रुझानों और मानवीय

विचार

“बात दृष्टि के कोण की नहीं, पूरी दृष्टि की है। मेरी नज़र में उनकी दृष्टि द्वेषपूर्ण है। देखिए, द्वेष का

‘मणि कौल के लिए साहित्यिक कृति फिल्म निर्माण के लिए कच्चे माल की तरह नहीं थी। साहित्यिक कृति पर फिल्म

‘तोलस्तोय पतित स्त्री के चरित्र को ध्यान में रखकर यह उपन्यास लिखना शुरू करते हैं, पर आन्ना का चरित्र जिस

अस्मिता

न्याय रहित अदालती फ़ैसला आख़िरकार ग्यारह साल बाद अदालत किसी नतीजे तक पहुँची। नतीजा अप्रत्याशित नहीं था। जाति आधारित हिंसा

सुमित की कविताएँ सुमित अपने कवि-कर्म को लेकर गंभीर हैं यद्यपि उनकी काव्ययात्रा आरंभ हुए ज़्यादा दिन नहीं हुए हैं।

बजरंग बिहारी तिवारी के इस सुदीर्घ लेख के पांचवें भाग में : राजकमल चौधरी, परमानन्द श्रीवास्तव, विजेंद्र, कुमार विकल और

देशकाल

भारत-माता की कल्पना भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे प्रभावशाली और साथ ही सबसे जटिल सांस्कृतिक निर्मितियों में से एक है। भारत

न्याय रहित अदालती फ़ैसला आख़िरकार ग्यारह साल बाद अदालत किसी नतीजे तक पहुँची। नतीजा अप्रत्याशित नहीं था। जाति आधारित हिंसा

‘जिस किसी ने भी स्वतंत्रता संग्राम का अध्ययन किया है, वह जानता है कि हिंदुत्व संगठनों, विशेषकर आरएसएस के लिए

आलोचना

‘तोलस्तोय पतित स्त्री के चरित्र को ध्यान में रखकर यह उपन्यास लिखना शुरू करते हैं, पर आन्ना का चरित्र जिस

बजरंग बिहारी तिवारी के इस सुदीर्घ लेख के पांचवें भाग में : राजकमल चौधरी, परमानन्द श्रीवास्तव, विजेंद्र, कुमार विकल और

लगता है, लंबे समय तक सिर्फ़ पढ़ाई में लगे रहने के बाद महेश मिश्र दुबारा लिखाई में लौटे हैं। नया