विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ और मणि कौल की फ़िल्म / जवरीमल्ल पारख
आज विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए थोड़े बदलाव के साथ जवरीमल्ल पारख का यह आलेख। इसका यह बलाघात
आज विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए थोड़े बदलाव के साथ जवरीमल्ल पारख का यह आलेख। इसका यह बलाघात
प्रखर अध्येता और समाजवैज्ञानिक कमल नयन चौबे ने टॉम बॉटमोर द्वारा संपादित ए डिक्शनरी ऑफ़ मार्क्सिस्ट थॉट का हिंदी अनुवाद
प्रताप दीक्षित के नवीनतम कहानी संग्रह ‘कगार के आख़िरी सिरे पर’ की समीक्षा कर रहे हैं माधव महेश. ‘उम्मीद पर
“मैं जीवन भर यह अनुसंधान करता रहा हूँ कि किस प्रकार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों की परंपरा और उनके विकास
“ये लघुकथाएं एक संक्षिप्त काल की हैं, फिर भी लेखक ने परिस्थितियों, विचारों और बयान करने की कला को दोहराने
“ग्राम्शी ने क्रांति को केवल सत्ता–हस्तांतरण की घटना नहीं माना, बल्कि उसे एक लंबी सांस्कृतिक प्रक्रिया बताया। यदि पूँजीवाद अपनी
“सोफ़ोक्लीज़ की कृति यह बताने नहीं आती कि शोकांतिका केवल भाग्य का खेल है; वह हमें यह दिखाती है कि
“हालाँकि फिल्म पकिस्तान की सरज़मीं पर लिखी और फिल्मायी गयी है मगर इसकी गिरफ़्त में दोनों मुल्कों के बँटवारे और
‘भाषा के साथ इस अद्भुत तादात्म्य को दस्तावेज़ के रूप में दर्ज करती ‘इन अदर वर्ड्स’ भाषा के साथ होने