आषाढ़ का एक दिन : सिनेमाई रूपांतरण में प्रयोगशीलता / जवरीमल्ल पारख
‘मणि कौल के लिए साहित्यिक कृति फिल्म निर्माण के लिए कच्चे माल की तरह नहीं थी। साहित्यिक कृति पर फिल्म
‘मणि कौल के लिए साहित्यिक कृति फिल्म निर्माण के लिए कच्चे माल की तरह नहीं थी। साहित्यिक कृति पर फिल्म
‘उमैरा अहमद के लेखन में सामाजिक जटिलताओं में, नैतिक दुविधाओं में फँसी वे तमाम स्त्रियाँ हैं जो चुपचाप हर दिन
आज विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए थोड़े बदलाव के साथ जवरीमल्ल पारख का यह आलेख। इसका यह बलाघात
“मैं जीवन भर यह अनुसंधान करता रहा हूँ कि किस प्रकार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों की परंपरा और उनके विकास
“हालाँकि फिल्म पकिस्तान की सरज़मीं पर लिखी और फिल्मायी गयी है मगर इसकी गिरफ़्त में दोनों मुल्कों के बँटवारे और
हिन्दी सिनेमा के निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान में) में
23 दिसम्बर को श्याम बेनेगल के इंतकाल के साथ हिंदी और भारतीय सिनेमा के एक युग का अवसान हो गया
व्यक्ति-स्वातंत्र्य जिस पूंजीवाद का ऐतिहासिक नारा रहा है, उसके पास निगरानी और नियंत्रण की अकूत ताक़त है और उसके रहते
‘मौसिक़ी की दुनिया के इस शाहकार का शुमार रहती दुनिया तक किसी नायाब अजूबे से कम नहीं।’– साहिर की लिखी