अखिलेश सिंह की इस छोटी-सी कहानी में आप जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, कथाभाषा अधिक परिपक्व-चुहलबाज़ होती जाती है और कथा-स्थितियाँ अधिक मानीख़ेज़। 1990 में फैज़ाबाद, उत्तर-प्रदेश में जन्मे अखिलेश सिंह कवि, गद्यकार और अनुवादक हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद फिलहाल कृषि मंत्रालय, नई दिल्ली में कार्यरत हैं।
पंचायत का चुनाव ख़त्म हो गया। बगल के गाँव में बसे भाँटों के समाज में बड़े ही शोक का माहौल है। बेहद सूनापन—जैसे दीवाली की बिल्कुल अगली सुबह। अब तक तो ख़ूब त्यौहारी चल रही थी। कोई न कोई नेता मुर्गे-दारू का इंतज़ाम कर ही देता था। चुनाव लड़नेवाले चुनाव के आख़िरी पखवाड़े में संसार के सबसे दानी-उदार-विनम्र लोग हो जाते हैं।
भाँटों की तरह ऐसे ही एक दूसरे तबके में रामकुमार उर्फ़ कुमरे भी एक मतदाता हैं, जिनके परिवार में पाँच वोट हैं। कुमरे और उनके तबके के वोट को प्रायः पैसे या दारू से ख़रीद लिया जाता रहा है। हालाँकि फैलने वाली अन्य बातों की तरह यह भ्रम भी फैल गया था, या फैलाया ही गया था कि केवल कुमरे का तबका ही बिकता है, जबकि बिकते सभी बिरादरी के लोग हैं। पूरे गाँव में कुछ ही घरों ने ही ऐसी ऐंठ बना रखी है कि पैसे, दारु आदि पर न बिकें, या फिर बिकें तो इतने अधिक पैसे पर बिकें जितने पर पंचायत चुनाव के लिए वोट ख़रीदना बेहद मँहगा ही नहीं, अव्यावहारिक भी लगे।
और यह क्या बात हुई? कथा जिस प्रवृत्ति पर कही जा रही हो, वही हिक़ारत के लहज़े में कही जाए? ‘बिकना’ क्या ही ख़राब शब्द है! कोई पैसे लेकर वोट दे ही दे तो क्या वह बिक गया? दरअस्ल बिकना ज़्यादा कठोर शब्द है। इसे तो इसकी व्यवहारिक भंगिमा का ही नाम देना चाहिए। चुनावों के दौरान असल में यह बिकना नहीं, बल्कि ‘खर्चा-पानी’ लेना है। भला रोज़-रोज़ चुनाव होते हैं क्या! जो चीज़ रोज़-रोज़ न हो उसे धूम-धड़ाके से होना ही चाहिए।
धूल उठना शुरू होती है और कथा आगे बढ़ती है…
चुनाव में उम्मीदवारों का नामांकन हुआ और ख़ूब गहमागहमी के बीच पर्चा वापसी भी हो गई है। यानी अब असली प्रत्याशी मैदान में हैं। चुनाव के लिए तय दिन में अब पन्द्रह दिन ही बचे रह गए हैं। पाँच दिन बाद तो चुनाव निशान भी मिल ही जाएगा।
राज्य निर्वाचन आयोग, ग्राम-सभा के चुनाव में गाँवों का ख़याल बहुत रखता है। यह इस तरह भी देखा जा सकता है कि चुनाव चिह्न गाँवों के रोज़मर्रा की ज़रूरतों से उठकर ही मिल जाते हैं—अनाज ओसाता किसान, चारपाई, कड़ाही, घण्टी, खड़ाऊँ, लालटेन, कैरमबोर्ड। चुनावों के वक़्त इन अतरंगी चुनाव-चिन्हों पर आधारित बहुत-सी चुनावी व्यंजनाएँ पैदा होती हैं, और बयार की तरह फैल भी जाती हैं। ऐसे ही एक बार एक उम्मीदवार—जिसका चुनाव निशान खटिया था—के कुछ समर्थक परचा बाँटने निकले। एक रंगीला प्रचारक दुपहरी में बर्तन माँजती हुई एक नवोढ़ा को परचा थमाते हुए कह उठा, ‘भौजी! खटियवे पर दिहू (भाभी खटिया पर ही देना)।’ इसके बाद उस रंगीले प्रचारक के मुँह पर, कई घंटे तक जले और कुछ मिनटों तक खुरचने से भी साफ़ न हो पाए कटोरे की छाप रह गई। इसके बाद खटिया निशान वाले उम्मीदवार के कुछ वोटों का नुक़सान जो हुआ सो अलग।
चुनाव प्रचार भी क्या साधना की चीज़ है, जाने क्या-क्या दाँव खेलना पड़ जाए! चूँकि बैलेट पेपर में चुनाव चिन्ह का क्रम प्रत्याशियों के नाम के अकारादि क्रम से होता है, इसलिए प्रत्याशी व उनके प्रचारकों को अपने-अपने चुनाव-चिन्ह को ऊपर से तीसरा, नीचे से दूसरा—कुछ इस अंदाज़ में वोटरों को समझाना होता है।
कुछ इसी तरह चुनाव-चिन्ह समझाने निकला एक युवक कुमरे के पास पहुँचा। मिलते ही उसने कुमरे को ‘काका’ कहकर संबोधित किया। कुमरे की हालत अच्छी नहीं कही जा सकती—अच्छी नहीं यानी इतनी बुरी कि मनरेगा के तहत चल रहे काम में चार बाई छः का गड्ढा खोदने उन्हें बुखार में भी जाना पड़ता था।
इस सदी का पहला दशक बीतने को था। वोट पाने के लिए उस युवक ने कुमरे और उनके भाईयों के परिवार के बीच, रोज़-रोज़ आवाजाही शुरू कर दी। शाम को जब वे सारे भुर्रा पीते, तो वह वहीं बैठा रहता। उनसे गप्पें करता। उनकी माली हालत पर दुःख जताता। हर रोज़ दो-दो पहर तक वह उनके साथ बैठता। उस युवक का उनके बीच लगातार दस दिनों तक बैठना, बातें करना, सुख-दुःख पर हँसना या चुप हो जाना ऐसा था कि कुमरे समेत बाकी सभी परिवारदरहे उसे अपने बीच का मानने लगे। ऐसा इसलिए था कि इसके पहले कभी भी उन्हें किसी चुनाव में ‘खर्चे-पानी’ से ऊपर नहीं माना गया था।
यह सन दो हज़ार दस था। ग्राम सभा में हर आदमी फुसफुसाहट में बातें किए जा रहा था। प्रत्याशी तो कुल दस ही थे लेकिन दो ठाकुर प्रत्याशियों और एक यादव प्रत्याशी—जोकि निवर्तमान प्रधान भी था—के बीच की जंग ने वोटरों को साइलेंट कर दिया था। कोई खुलता नहीं था। मतदाता तो सभी प्रत्याशियों के मुँह में मिठाई रख देते थे। प्रत्याशी भी पूरा दमखम झोंके पड़े थे। रामानुज यादव नाम के एक प्रत्याशी ने तो एक बीघा खेत और अपनी दो गाभिन भैंसें तक बेंच दी। प्रधानी है ही कमाल की चीज! प्रधान से काम सबको पड़ना है, सब को प्रधान के यहाँ मत्था टेकना है।
मतदान के तीन दिन पहले से पैसे-साड़ी-शराब के बँटने की शुरुआत हो चुकी थी। वह युवक उस रोज़ भी कुमरे के पास पहुँचा। कुमरे को तेज़ बुख़ार था। काका-काका पुकारते हुए वह लगभग उनके ओसारे तक दाख़िल हुआ। सितम्बर का महीना था, लेकिन कुमरे एक बेहद गंधैला कम्बल ओढ़े पड़े थे। युवक की आवाज़ सुनकर हुमसकर भीत से सट गए। अपनी गरगराती आवाज़ में कुमरे ने उसे बैठने को कहा। उनकी हालत देखकर वह युवक आगे कुछ नहीं बोल पाया। उसने मतदान की बात तक नहीं की, चुनाव निशान और किसी लामबंदी की भी नहीं। जेब से दो सौ रुपये निकालते हुए उसने कुमरे की ओर देखते हुए बोला : काका! दवाई करा लेना। लेकिन रुपया पकड़े हुए उसका बढ़ा हुआ हाथ कँपने लगा। यह क्षण की प्रबलता थी। छोटा, बहुत छोटा; भार, बहुत भारी क्षण। क्या ऐसे ही किसी सघन तत्व में महाविस्फोट होने से यह दुनिया शुरू हुई थी? क्या समय ही वह सबसे अनिवार्य तत्व है जिससे यह दुनिया बनती है ?
युवक की देह थरथराने लगी थी। मानो कुमरे काका का बुखार उसे ही चढ़ आया हो। पैसे की तरफ़ मुख़ातिब होकर वे और हुमस आए थे, उनकी कीचड़ सनी आँखें फूलती हुई मिट्टी की तरह बाहर आ रही थीं। कुमरे से बस इतना ही कहा गया : का भईया, तुम भी? कुमरे के कहे इन चार शब्दों में कौन-सा शब्द सबसे भारी था, वह युवक नहीं तौल नहीं पा रहा था। शायद ‘भी’ या ‘तुम भी’ या फिर सभी—एक-एक करके सारे शब्द। उस एक बहुत छोटे, बहुत भारी क्षण ने उस युवक को उस समूची चुनावी संस्कृति, कुमरे जिस तबके से आते हैं उसके बारे में आसानी से बिक जाने के प्रवाद, और पिछले दस दिन में उनके बीच उसकी अपनी कमाई हुई विश्वसनीयता—इन सबको गुत्थमगुत्था करके एक साथ उपस्थित कर दिया था। अब सबकुछ युवक के सामने दृश्य में था। हकलाते हुए उसने कहा : नाही काका, चलो हम तुमको दिखा आते हैं डॉक्टर के पास…ह..मारा ऐसा कोई मतलब नहीं था। कुमरे ने मना कर दिया। बुख़ार उनकी देह में सभ्यता की शुरुआत से ही, पर्याप्त पोषण और मानव-गरिमा से अपदस्थ होने की शूल-सज्जा की तरह निवास कर रहा है।
यह साल दो हज़ार दस का सितम्बर महीना था। इधर कुमरे काका ने उस युवक की बात मन पर हावी न रहने दी थी और उधर उस युवक का अभियान सफल रहा, उसका प्रत्याशी चुनाव जीत ही गया।
हम बीत जाते हैं …
धूल के घटकों में जाने कौन-कौन से कण बढ़ते गये। ‘मनुष्य ने पेड़ लगाये’—जैसे दृश्य बढ़ते गये। जंगली लताएँ नहीं, कटे-छँटे फिट-फाट बोनसाईयों के गमले बढ़ते गए। गाँव के सिवान में कुछेक आछी के पेड़ थे, अब वे नहीं रह गए—ऐसी जगहें बढ़ती गईं। फुर्सतों को नष्ट करनेवाली बातें भी बढ़ती ही गईं। इतने सब के बढ़ने में इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक बेहद व्यस्त रहा या यूँ कहें कि वह पूरी दुनिया में सड़कों पर ही रहा। लोग तस्वीरों में बदले और देखते-देखते चलचित्रों में बदलने लगे। इस दूसरे दशक में नष्ट होती हुई पुरानी चीज़ें इस कदर बढ़ती गईं कि वे बढ़ते-बढ़ते महामारी बन गईं।
इस बीच वह युवक भी बढ़ता गया और कुमरे का परिवार भी। अब कुमरे के दो लड़के जवान हो गये थे। कमाने लगे थे और परिवारदरहे भी हो गए थे। एक ने मूर्ति बनाने का काम शुरू कर दिया था और दूसरा दिल्ली-पंजाब कमाने निकल गया। इन सबके साथ ही वे भी थोड़े बूढ़े हो गए थे।
अब एक बार फिर वही समय था—ग्राम सभा के चुनाव का। ग्राम-सभा का चुनाव सिर्फ़ जनप्रतिनिधियों के चयन का उपक्रम ही नहीं होता; बल्कि इस दौरान लोग ज़्यादा मिलते-जुलते हैं। एक दूसरे की थाह लेते हैं। कहीं जुड़ते हैं, तो कहीं जोड़ते हैं। आपसी संबंधों की आजमाइश होती है। यह भरोसे और उम्मीदों का समय होता हैं—नजदीकियों और नीचताओं का भी। आपके लिए जान देने को तैयार लोग भी इस दौरान आपको वोट देने पर बारहा सोचने पर मजबूर हो सकते हैं।
पाठक जानना चाहेंगे कि यह चुनाव दस साल बाद क्यों था। पंचवर्षीय रीति से रगड़ खाते जनादेश को यहाँ दस वर्ष कैसे कर दिया गया। असल में मामला यह था कि वह युवक जिस प्रत्याशी के लिए कैनवासिंग करने गया था, वह प्रत्याशी पिछले चुनाव में सीटों में आरक्षण के नाते चुनाव नहीं लड़ पाया। इस बार फिर से वही प्रत्याशी मैदान में थे। दस वर्ष पहले चुनाव जीते हुए और दस वर्ष बाद एक बार फिर से चुनाव में आजमाईश का अवसर पाए हुए।
समय अब सदी के तीसरे दशक में है। जीवन की लगभग सारी योजनायें इस समय मोबाइल फोन पर फल रही हैं। चुनाव और चुनावी राजनीति भी इससे कहाँ अछूते रहे गए हैं! कुमरे के दोनों लड़को और दोनों बहुओं के पास अब स्मार्ट फोन है। अब तक लगभग परिवार का हर वयस्क, अलग-अलग प्रत्याशियों के द्वारा डील किया हुआ दीख रहा है। अब तो एक घर से एक ही जगह वोट जाए तो बड़ी भल जानो। संयुक्त परिवारों के साथ ही अब परिवार के मुखियाओं का दौर भी बीत रहा है। चाहे वे ग्राम सभा के चुनाव हों या आम-जीवन; सबकुछ जो आस-पास है वह किसी बड़ी उम्मीद से जुड़ा हुआ होगा ही— यह ज़रूरी नहीं।
जैसे बरसात के मौसम में झाड़ियों और पौधों में बियास के साथ ही मच्छर भी बढ़ते ही जाते हैं, वैसे ही चुनावों में सिर्फ़ नेता व खैर-मक़दम करनेवाले लोग ही नहीं, बल्कि मतदाताओं की इच्छाओं और हरकतों का दायरा भी बढ़ता ही जाता है। और इसके लिए किसी भी रामकुमार उर्फ़ कुमरे को कटघरे में खड़ा करना पाप है।
वह युवक एकबार फिर से कुमरे काका से मिल रहा था। वह उसे पिछले ग्यारह सालों से जानते थे। लेकिन जितना ग्यारह साल पहले जानते थे, उतना अब नहीं। यह परिचय दिनों-दिन विकसित नहीं हो पाया था।
इधर गहमा-गहमी ज़ोरों पर है। लगभग सारे प्रत्याशी अच्छा पैसा ख़र्च करने की हालत में भी हैं। यह साल दो हज़ार इक्कीस है, इस साल इसी सदी में पैदा हुए लोग भी प्रधानी का चुनाव लड़ने की अर्हता रखते हैं और अब लोगों में सादगी-ईमानदारी और अन्य घिसे-पिटे मूल्यों पर भरोसा करने का पुराना हैंगओवर नहीं रह गया है—यह जलवे का दौर है।
उस युवक की उम्र और अनुभव, दोनों बढ़ने के बावजूद उसके चुनावी आदर्श वैसे ही उछाल मार रहे थे। और कुमरे काका उसी प्रत्याशी को फिर वोट देंगे, उसके पास इस बात के कलात्मक रीति के आश्वासन भी थे लेकिन उनके दोनों लड़के, रवि और किशोरे, अलग ही उम्मीदवारों के साथ अपनी गोटी सेट किये बैठे थे। किशोरे हालाँकि धीरे-धीरे पाले में आ रहा था, और कुमरे काका ने भी आश्वासन दे ही रखा था कि वे कुछ वोट अपने परिवार से और घींच-घाँच लेंगे।
लेकिन जब चुनाव नज़दीक आ गया तो उस युवक को मालूम हुआ कि कुमरे काका के यहाँ तो दारू की ठेक लगी पड़ी है। वह रोज़ कई प्रत्याशियों से दारू झटक ले रहे हैं। उस युवक को असुरक्षा महसूस हुई—बड़ी भारी असुरक्षा। अभी तक उन्होंने उससे खुलकर कुछ डिमांड नहीं रक्खी थी। फिर भी, आदमी का मन! कैसे भी, किसी भी हिल्ले, कहीं भी रम सकता है।
चुनाव के बिल्कुल दो दिन पहले की शाम में वह कुमरे काका से मिला। वे अपने जामे में नहीं थे। उनकी सिरकी जैसी टांगें अलग हरकत करती दीखीं। वे बेहद जल्दी में अपने घर की तरफ़ जा रहे थे। उस युवक ने थोड़ी देर की इत-उत के बाद उनका पीछा किया और सीधा उनके क़दम रुकते ही पीछे से पहुँच गया। कुमरे को उस हालत में देखकर गुस्से में वह रुआँसा सा हो रहा था। चुनाव के दौरान जो आदमी दारू पकड़ने लगे, उसका क्या भरोसा! लेकिन गुस्सा ज़ाहिर करना, ठीक चुनाव के पहले ठीक नहीं था। कुमरे घर के ओसारे के दाई तरफ़ लगे चारा-मशीन के डोंगे में जब अपनी जेब में पड़ी शीशी निकाल, छिपाकर निवृत्त हुए तो वह उनसे मुख़ातिब हुआ : और बताओ काका ! परसों चुनाव है। निशान तो याद है न!
कुमरे : अरे भईया, हम तुम्हें भूलेंगे! सब याद है। चिंता न करो।
वह हक़लाते हुए पूछ बैठा : काका कुछ दारू-सारू चाहिए हो तो बताना!
कुमरे काका की आँखें चमक उठीं : हाँ भईया! तुम सब न ध्यान रखोगे तो कौन रखेगा!
सब ध्यान रखेंगे! यह क्या था? युवक जानता तो है लेकिन फिर भी उसने टटोल की : अरे काका, औरो सब दे जाते हैं?
भईया, जिसकी जो इच्छा। भीख न देई तौ का तुमड़ी फोड़ देई… कुमरे के स्वर के बाह्य आवरण में थोड़ी बेचारगी थी। वे हँसे नही, होंठो को सिर्फ़ हँसी की हरकत में लाए, जहाँ आँखें स्थिर होकर जैसे कोई दाँव खेल रही हों। उनका चेहरा अभी-अभी बोले गए मुहावरे में तब्दील हो गया था।
वह युवक कुमरे को तीन सौ रुपये और दो शीशी देसी दारू देकर लौटने को हुआ ही कि उन्होंने उसे पीछे से आवाज़ देकर एक शीशी और माँग ली, क्योंकि उनका बड़ा लड़का यानी किशोरे बाहर गया हुआ था। यह साल दो हज़ार इक्कीस है और वह साल दो हज़ार दस था। इस बीच क्या-क्या बदला? इस बार कुमरे को कोई बुखार नहीं था। वे थोड़े उम्रदराज़, थोड़े सुविधासंपन्न, थोड़े मुखर और थोड़े ‘चलन के हिसाब’ से हुए थे।
“इसमें ऐसी क्या बड़ी बात है! खर्चा-पानी लेना कोई बड़ी बात है क्या! चार दिन की बहार है। रोज़-रोज़ चुनाव कहाँ आता है! यह पार्थिव देह कब तक बुखार में पड़ी रहकर संसार में किसी अच्छाई की आस लगाए रहेगी! चार दिन की ज़िंदगी है, कितनी बातों के मायने सहेजे जाएँ! वह युवक कुमरे के उस दस या ग्यारह वर्षीय जीवन को जानता ही कितना है! बदलाव—जीवन की तमाम दशाओं और उलझे विचार रज्जुओं के लिए इसकी भी तो एक स्वाभाविक जगह है! सब कुछ बदलता है, बाबू !”
… अगर इतनी लेक्चरबाजी कर पाने की सकत होती, तो कुमरे काका ऐसा ही कुछ बोलते। इतना सब कुछ सोचने के बाद सुस्थिर हो, सन दो हज़ार इक्कीस में ठीक से लौटने के बाद उस युवक ने यही सोचा।
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संजीव भाई ये कहानी छापने के लिए आपका भी शुक्रिया l जिस तरह से परिवेश का साक्षात्कार करती है बहुत जोरदार है l भाषा भी उतनी ही प्रवाहमय है l लेखक को बधाई l
कहानी अच्छी लगी।
एक जगह अश्लीलता को छू गई है।
उसे अश्लीलता नहीं कहते अशोक जी।
नई पीढ़ी के महत्त्वपूर्ण कथाकार अखिलेश सिंह की रचनात्मक पहचान का एक प्रमुख आधार समय के प्रति उनकी उल्लेखनीय सजगता है। प्रस्तुत कहानी में समय केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक सक्रिय और निर्णायक तत्व के रूप में उपस्थित है। एक स्तर पर यह समय 2010 से 2021 तक के सामाजिक-राजनीतिक कालखंड में विस्तृत है, जबकि दूसरा स्तर रामकुमार उर्फ़ कुमरे के भीतरी संसार में फैलता हुआ दिखाई देता है—जहाँ समय स्मृति, अनुभव और विवशताओं के रूप में लगातार काम करता है।
2021 के चुनाव तक आते-आते कुमरे की दुनिया में इतना गहरा और निर्णायक परिवर्तन घटित हो चुका है कि अब उसे अपने वोट को बेचने को लेकर किसी तरह का नैतिक द्वंद्व नहीं रह जाता। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं है, बल्कि 2010 से 2021 के बीच लगातार घटित होते सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दबावों का परिणाम है। इस पूरे संक्रमणकाल को अखिलेश भाई ने अत्यंत सतर्कता, संवेदनशीलता और वैचारिक स्पष्टता के साथ कथा में दर्ज़ किया है।
कहानी इस बात का सशक्त उदाहरण है कि किस तरह बाहरी समय और भीतरी समय एक-दूसरे में हस्तक्षेप करते हुए पात्र की चेतना और उसके निर्णयों को गढ़ते हैं। ‘अंतराल’ के लिए प्रिय गद्यकार अखिलेश भाई को हार्दिक बधाई, तथा इस महत्त्वपूर्ण प्रस्तुति के लिए ‘नया पथ’ और संजीव सर का भी विशेष आभार।
अखिलेश सिंह कविता और गद्य के बाद कहानी में भी नई उर्जा लेकर आएं हैं। वह मुझे इसलिए भी पसंद हैं कि चहुंओर हुआं हुआं के बीच वह चुपके से कुछ बेहतरीन करते जा रहे हैं। उम्मीद है कि वह आगे भी हमें बेहतरीन कहानियां देंगे।
हुई जिन से तवक़्क़ो’ ख़स्तगी की दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़-ए-सितम निकले
— ग़ालिब
जनतंत्र को नीचे से ऊपर देखने का सलीका देने वाली बेहतरीन कहानी।
अखिलेश जी को साधुवाद।
यह सवाल पूछने का मन है कि भाँट मोहल्ले से शुरू होने वाली कहानी भाँटो को आगे भुला क्यों देती है?