एप्सटीन, हमसे ग़लती हुई! / समीना ख़ान


‘दुनिया जिन हस्तियों की तरफ़ बड़ी उम्मीद से देखती थी, वे एप्सटीन गांव के निवासी निकले।… इस विलेज ने पूरी कायनात को यह पैगाम दिया है कि इस धरती पर बसने वाली दोनों आबादियों के बीच सिर्फ़ आग और पानी का रिश्ता है।’–अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौक़े पर समीना ख़ान की टिप्पणी।

जिन दिनों दुनिया ग्लोबल विलेज बनने की तैयारी में थी, ठीक उन्हीं दिनों एप्सटीन विलेज की भी बुनियाद पड़ी। एप्सटीन विलेज ने वह भरोसा छीन लिया जो बना तो नहीं था मगर उसकी चाह थी। यक़ीन के उसी बीज को रोपने की चाहत में एक विलेज का ख्वाब देखा था। जज़्बे और उम्मीद के खाद-पानी को इसकी परवरिश के लिए चुना था।

यक़ीन का यह पौधा परवान चढ़ता तो क्या बात होती! नन्हा-सा बीज्, बड़ा भारी दरख़्त बनने में कुछ वक़्त लेता। इसे अरमानों की आंच भरी हरारत मिलती। मौसमों की निगरानी और ओस की मोहब्बत इस दरख़्त पर आस के जुगनुओं को दावत देती। इन जुगनुओं का बसेरा अंधेरों में भी इसे झिलमिलाए रखता।

और एक दिन वह वक़्त भी आता जब यह दरख़्त भरोसे के फलों से लद जाता। परिंदे समय का क़ासिद बन कर इस की दास्तानें चहचहाते और हवाएं इन दास्तानों को डाकिया बनकर दूर ले जातीं। सुदूर के पंछी जब इन पैग़ाम को पढ़ते तो यक़ीनन उनमें कुछ तो सहर में आते और ऐसा ही भरोसे का दरख्त उगाने की चाहत उनके दिलों में जगह करती।

हां, यही ख्वाब तो देखा था! अपने आस पास मौजूद उन साथियों के बूते पर जिन्हें अपने साथ पाया था। जो हमें बराबरी का एहसास दिलाते। जो न तो हमें पीछे चलने की ताकीद करते थे और न ही आगे निकलने को अपना हक़ समझते थे। इसी धरती पर हम-कदम चलने वाले कुछ साथियों ने यह उम्मीद जगाई थी कि उन्होंने हमारा यक़ीन जीत लिया है। यक़ीन कीजिए, वे बिलकुल हमारे जैसे थे। उन्हें भी दर्द होता था और उन्हें भी चाट खाने का शौक़ था। उन्हें कई ऐसे कामों में जूझते देखा जिन्हें उनकी बिरादरी ने कभी भी अच्छी निगाह से नहीं देखा था।

यक़ीन जीतने वाले यह लोग हमारे आस-पास ही थे। इनकी एक और तारीफ़ भी है मेरी जानकारी में। जब आधी आबादी के नुमाइंदे बाक़ी आधी आबादी पर अपना जायज़ गुस्सा उतार रहे होते, उस वक़्त ये बड़ी ख़ामोशी से, उस आधी आबादी के साथ खड़े नज़र आते और बिलकुल बुरा माने बिना अपनी बिरादरी को आईना दिखाने की कोशिश करते। कई बार शक हुआ था कि कहीं ये बहरूपिए तो नहीं? मुमकिन है कुछ रहे भी हों, मगर इस शक पर शर्मिंदा करने वाली कई मिसालें भी सामने आईं। इन्हीं मिसालों ने हौसला दिया था कि इन दरख्तों पर उगने वाले फलों का कारोबार करना है और इस ख्वाब को हक़ीक़त में बदलना है। भरोसे के उस विलेज का ख्वाब पूरा करने का इरादा मजबूत हो गया था। इस विलेज में आधी आबादी और आधी आबादी से कुछ ऐसे नुमाइंदों को बसाना था जो सदियों से दो आबादियों के बीच चली आ रही जंग को बेअसर कर देते।

अफ़सोस कि भरोसे के विलेज का ख्वाब टूट गया। एप्सटीन विलेज की तेजाबी तासीर ने मेरे यक़ीन के बीज को भस्म कर दिया है। अब उम्मीद का कोई पौधा वजूद में न आ सकेगा। दुनिया जिन हस्तियों की तरफ़ बड़ी उम्मीद से देखती थी, वे एप्सटीन गांव के निवासी निकले। एप्सटीन गांव बहुत बड़ा है। हम सबके ख़यालों से भी बड़ा। शायद ब्रह्माण्ड से भी ज़्यादा बड़ा और कई प्रकाश वर्ष दूर तक फैला। इस विलेज ने पूरी कायनात को यह पैगाम दिया है कि, इस धरती पर बसने वाली दोनों आबादियों के बीच सिर्फ़ आग और पानी का रिश्ता है।

जिन करतूतों पर शर्मिंदगी की प्रलय आ जानी चाहिए थी, वहां स्वयंघोषित क्लीनचिट हैं। इस गांव से आने वाली बेहिसी की तरंगे अपना दायरा बढ़ाते हुए आधी आबादी को दहला देने वाले संदेश दे रही हैं। इन तरंगों ने उस ज़मीन को बांझ कर दिया है, जिस पर भरोसे के फल का दरख़्त उगना था। जिसे खूबसूरत ख्वाब समझ रहे थे, वह इतना खौफ़नाक होगा यह नहीं सोचा था। ख्वाब टूट गया है। इस ख्वाब की किरचों ने उम्मीदों को ऐसा लहूलुहान किया है जिसका इलाज अब किसी मसीहा के बस का नहीं। ये किरचें इतनी गहरी चुभी हैं जिन्हें न कोई निकाल सकता है और न ही कोई ऐसा मरहम है जो इन ज़ख्मों को भर सके।

एप्सटीन, हमसे ग़लती हुई! तुम्हारे होते हुए एक ख्वाब देखने की ग़लती।

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7 thoughts on “एप्सटीन, हमसे ग़लती हुई! / समीना ख़ान”

  1. बहुत नायाब प्रस्तुति है समीना . बड़ी महीन नज़र से इन भीतरघातियों को आपने पहचाना है . वर्ग संघर्ष को तिलांजलि दिला कर एकता तोड़ी और आइडेंटिटी पॉलिटिक्स को बढ़ावा देकर उनके साथ छल – कपट किया , धोखा दिया .दिन पर दिन ग़ुलामी और एकाधिकार को बढ़ावा दिया जा रहा है .

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  2. अच्छा लिखा है। लेखनी में और तीखेपन की जरूरत थी।

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