तीन कविताएँ / मनोज पाण्डेय
एक कवि जो बसंत को पेड़ों के सामूहिक संहार से विचलित होते देखना चाहता है। एक कवि जिसे धरती पर
एक कवि जो बसंत को पेड़ों के सामूहिक संहार से विचलित होते देखना चाहता है। एक कवि जिसे धरती पर
दलित स्त्री कविता का स्वर भिन्न तरीके से प्रश्नवाची रहा है। इस स्वर ने दलितवादी प्रश्नवाचकता को बहुआयामी बनाया है।
हमारे दौर में न्याय-व्यवस्था का जो हश्र हुआ है, उसे इस दौर के विशिष्ट कवि हरीश चन्द्र पाण्डे की यह
सुमित की कविताएँ सुमित अपने कवि-कर्म को लेकर गंभीर हैं यद्यपि उनकी काव्ययात्रा आरंभ हुए ज़्यादा दिन नहीं हुए हैं।
प्रकाश चंद्रायन को ‘नया पथ’ के प्रिंट संस्करण से लेकर ऑनलाइन तक आप पहले से पढ़ते आये हैं। उनका एक
नया पथ में इस बार वरिष्ठ और सुपरिचित कवि अनिल गंगल की कविताएँ। भविष्य के लिए, स्वाद, एक टिटिहरी की
दलित कविता प्रश्नवाची तेवर के कारण विशेष रूप से पहचानी गई। जैसे-जैसे उसका विकास होता गया, प्रश्नों की रंगत बदलती
चार-पाँच साल पहले एक मित्र ने योजना बनायी कि कुछ लोगों के दस वर्ष की उम्र तक के संस्मरणों की
“मैं किस बात पर बोलता हूं, किस बात पर चुप रहता हूं। किस बात पर क़दम आगे बढ़ाता हूं, किस