जर्मन नाटककार मारियुस फ़ॉन मायेनबुर्ग के नाटक डेर हेस्लिषे पर आधारित और चर्चित नाट्य निर्देशक तथा नाटककार सपन सारन द्वारा निर्देशित बदसूरत के मंचन की समीक्षा कर रहे हैं संजय कुंदन।

पिछले दिनों राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के द्वितीय वर्ष के छात्रों ने नाटक ‘बदसूरत’ का मंचन किया। यह जर्मन नाटककार मारियुस फ़ॉन मायेनबुर्ग के नाटक ‘डेर हेस्लिषे’ पर आधारित है। इसका हिंदी में अनुवाद और निर्देशन चर्चित नाट्य निर्देशक और नाटककार सपन सारन ने किया। म्यूनिख में जन्मे मायेनबुर्ग एक लेखक, रंग-निर्देशक और अनुवादक हैं। उन्होंने बर्लिन की आर्ट्स अकादमी में नाट्य-लेखन का अध्ययन किया है। उनके नाटक ‘द अग्ली वन’, ‘फायरफेस’ और ‘ए पीस ऑफ प्लास्टिक’ काफ़ी चर्चित रहे हैं और पंद्रह से अधिक भाषाओं में अनूदित हो चुके हैं। उनके नाटकों का दुनिया भर में सफल मंचन हुआ है और उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। नाट्य लेखन के अतिरिक्त मायेनबुर्ग ने अंग्रेज़ी भाषा के अनेक महत्त्वपूर्ण नाटकों का जर्मन भाषा में अनुवाद भी किया है। उन्होंने समकालीन जर्मन और अंतरराष्ट्रीय रंगमंच को समृद्ध बनाने में अहम योगदान दिया है।
उनका नाटक ‘बदसूरत’ पूँजीवादी व्यवस्था में मनुष्य के एक उत्पाद में बदल जाने की विडंबना की ओर ध्यान खींचता है। कथानक के केंद्र में एक कॉरपोरेट कंपनी है, जिसमें काम करने वाले एक इंजीनियर ओटो ने एक महत्त्वपूर्ण तकनीकी आविष्कार किया है, लेकिन कंपनी उसे एक सम्मेलन में अपनी खोज को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करने के लिए नहीं भेजना चाहती। उसके अधिकारियों को लगता है कि उसका व्यक्तित्व आकर्षक नहीं है, उसकी वजह से कंपनी की छवि पर ख़राब असर पड़ सकता है। ओटो को बताया जाता है कि चूँकि वह बदसूरत है इसलिए उसे इस आयोजन में नहीं जाना चाहिए। ओटो अपनी पत्नी से भी इस बारे में पूछता है तो वह भी कहती है कि वह बदसूरत है। ओटो के लिए यह एक बड़ा झटका है। वह परेशान हो जाता है। एक डॉक्टर यह प्रस्ताव रखता है कि वह ओटो के चेहरे को सर्जरी द्वारा बदलकर ख़ूबसूरत बना सकता है। पर इसमें जोख़िम है। ओटो इस जोख़िम के लिए तैयार हो जाता है। यह प्रयोग सफल होता है और ओटो एक ख़ूबसूरत चेहरे के साथ सामने आता है।
अब वह कंपनी के लिए ख़ास बन जाता है। उसके प्रचार करने से कंपनी का माल ज़्यादा बिकने लगता है। यही नहीं समाज उसे एक मॉडल के रूप में देखने लगता है। स्त्रियाँ उसकी दीवानी हो जाती हैं। यहांँ तक कि समलैंगिक पुरुष भी उसके प्रति आकर्षित हो जाते हैं। वह जहाँ जाता है, भीड़ लग जाती है। ज़ाहिर है, ओटो को अपनी विशिष्टता का अहसास होने लगता है। वह विशिष्टता की क़ीमत अपनी कंपनी से वसूलना चाहता है। लेकिन कंपनी सतर्क हो जाती है। उसे लगता है कि ओटो पर उसकी निर्भरता ठीक नहीं। फिर ओटो की अति लोकप्रियता कंपनी के लिए घातक हो सकती है। तो कंपनी अपने एक और अधिकारी का चेहरा बदलवा देती है और एक नया मॉडल खड़ा कर देती है, ठीक ओटो के चेहरे-मोहरे वाला। फिर यह सिलसिला बढ़ने लगता है और शहर में उसी के चेहरे वाले कई लोग आ जाते हैं। ओटो अपने को ठगा हुआ महसूस करता है। इस बीच उसका पारिवारिक जीवन भी संकट में पड़ चुका है। वह फिर से अपनी पुरानी पहचान और सुकून की ज़िंदगी पाना चाहता है, पर अब यह संभव नहीं।
ओटो जिस प्रक्रिया से यहांँ तक पहुँचता है, उसे बड़े रोचक ढंग से बुना गया है। उसके साथ अजीबोगरीब घटनाएँ घटती जाती हैं, और ऐसा लगता है कि उसका पूरा जीवन एक प्रहसन में बदल गया है लेकिन अंत में उसकी त्रासदी खुलकर सामने आती है।
सच कहा जाए तो जर्मन परिवेश में लिखा गया यह नाटक पूरी भूमंडलीकृत दुनिया का यथार्थ है। इस नव-साम्राज्यवादी दौर में बाज़ार अपने तरीक़े से राज कर रहा है। वही हमारे तमाम सामाजिक मूल्य तय कर रहा है। मानव सौंदर्य का निर्धारण बाज़ार की शक्तियों के हाथ में है। उसने सुंदरता के अपने मानदंड उछाले हैं। इस मानदंड पर खरे उतरने वाले स्त्री-पुरुष ही सामाजिक जीवन में प्रमुखता पाते हैं, स्वीकार्य होते हैं। बाक़ी एक हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। भारत में ही देखें तो गोरेपन को स्त्री जीवन की सार्थकता के रूप में प्रचारित किया जाता है। और इसके पीछे मंशा होती है-फेयरनेस क्रीम बेचना। सौदर्य के मानक पर अपने को सफल साबित करने के लिए अनेक फिल्मी कलाकारों ख़ासकर अभिनेत्रियों ने अपने नैन-नक्श को उसके अनुरूप बनाने के लिए ऑपरेशन कराए हैं जिससे कुछ को तो कई तरह की शारीरिक दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा है।

ऐसे मूल्य स्थापित करने वाले तंत्र की नज़र में मनुष्यता की कोई कीमत नहीं है। मानवीय गुण, सदविचार, सदव्यवहार का कोई मोल नहीं। आपकी पहचान आपके चेहरे-मोहरे, कपड़े और उपभोग की वस्तुओं से होती हैै। यह तंत्र मनुष्य को भी एक सामान ही समझता है। वह हर किसी को एक टूल की तरह इस्तेमाल करता है। वह यह बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई टूल इतना ताक़तवर बन जाए कि उसी से सौदेबाज़ी करने लगे। इसलिए कॉरपोरेट नए-नए नायक तैयार करता है फिर उन्हें गिरा भी देता है। वह किसी को शक्तिशाली नहीं होने देता क्योंकि वह अपनी सत्ता बनाए रखना चाहता है। वह जीवन के हर क्षेत्र पर नियंत्रण चाहता है। राजनीति को ही लें, दुनिया की अनेक निर्वाचित सरकारें जब दुनिया के शीर्ष व्यावसायिक वर्ग को चुभने लगीं, तो उनका तख़्तापलट कर दिया गया। लेकिन इसी विमर्श को और विस्तार दें, तो कुछ मूलभूत प्रश्नों की ओर भी ध्यान जाता है। सवाल है कि यदि हमारी पहचान केवल बाहरी रूप पर आधारित हो, तो वह कितनी स्थायी है? जब सभी लोग एक जैसे दिखने लगें, तब ‘मैं कौन हूँ?’ का प्रश्न उभरता है। असल में इस मानव जीवन का सौंदर्य ही उसकी विविधता में है। विविधता ही प्राकृतिक है। हर आदमी एक-दूसरे से रंग-रूप और स्वभाव में अलग है। किसी का बाह्य व्यक्तित्व सुंदर है तो किसी का आंतरिक व्यक्तित्व। सही अर्थों में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। हर व्यक्ति अपने आप में विशिष्ट है। हर किसी की विशिष्टता का सम्मान ही जीवन का मूलाधार है और इसी में जीवन की सार्थकता भी है, लेकिन उपभोक्तावाद इसी विविधता को नष्ट करने पर तुला हुआ है। वह हर किसी को एक-जैसा बनाने पर आमादा है। उसके लिए बाहरी चमक-दमक ही मायने रखती है।
आज के इस बेहद ज़टिल मुद्दे को मंच पर साकार करना आसान नहीं था। यह चुनौती नाटककार के सामने तो थी ही, पर उससे भी ज़्यादा निर्देशक के सामने। इसलिए इसमें एक लचीली अयथार्थवादी संरचना अपनाई गई जिसमें ज़ोर किसी चरित्र या चरित्रों को स्थापित करने की बजाय सामूहिक संकट को सामने लाने पर था। यहाँ एक व्यक्ति दरअअसल एक समूह का प्रतीक था, इसलिए एक ही चरित्र की विभिन्न मनःस्थितियों को व्यक्त करने के लिए दो या तीन अलग-अलग अभिनेताओं का इस्तेमाल किया गया। इसमें एक अभिनेता स्वतंत्र इकाई की तरह भी आया और कोरस के हिस्से के रूप में भी। इससे नाटकीय दृश्यों को गतिशील बनाए रखने में भी मदद मिली। अभिनेताओं का मंच के बीचोंबीच गहरे किए गए एक क्षेत्र से प्रवेश करना भी एक अलग प्रभाव छोड़ रहा था। यह हाशिए से केंद्र में आने और फिर हाशिए पर जाने को भी दर्शा रहा था। मंच का स्थापत्य कॉरपोरेट के मशीनी ढाँचे के अनुकूल था। कोरस का मूवमेंट भी उस ढाँचे को स्थापित कर रहा था। सारे अभिनेताओं ने अपने चरित्र के साथ न्याय किया, लेकिन ओटो की भूमिका में कृष्ण कांत और उसकी पत्नी की भूमिका में शैव्या सहाय ने विशेष तौर पर प्रभावित किया। नाटक में ओटो के प्रति एक वृद्ध महिला के आसक्त होने का दृश्य कहीं-कहीं अति नाटकीय और लंबा खिंचता भी नज़र आया। नाटक को थोड़ा संपादित करने की ज़रूरत महसूस हो रही थी। कुछ दृश्यों में दर्शकों से संवाद करने या उनसे आई कॉन्टैक्ट बनाने की कोशिश अच्छी लगी लेकिन अंत में कलाकारों का दर्शकों से परिचय न करवाना थोड़ा अखरा। इससे दर्शकों को लगता है कि वह भी रंग-प्रक्रिया का एक हिस्सा है।
ग़ौरतलब है कि इस नाटक की निर्देशक सपन सारन मुंबई की थिएटर संस्था ‘तमाशा थिएटर’ की सह-संस्थापक हैं। वर्ष 2017-18 में उन्हें नेशनल थिएटर ऑफ वेल्स द्वारा ‘सिस्टर्स’ नामक परियोजना के सह-लेखन के लिए आमंत्रित किया गया था। यह एक वर्ष तक चलने वाली परियोजना थी, जो दक्षिण एशियाई महिलाओं के जीवन, उनके इतिहास और उनके अनुभवों पर केंद्रित थी। सपन को वर्ष 2018 में तेंदुलकर-दुबे फेलोशिप मिली और 2024 में आदित्य विक्रम बिड़ला किरण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी कविताएँ अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके नाटकों का पहला संग्रह ‘ओट्टम और अन्य नाटक’ दिल्ली स्थित वाम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है।
इस नाटक को तैयार करने के अपने अनुभव के बारे में सपन कहती हैं कि इस नाटक ने कलाकारों के चयन, मंच-सज्जा और नाट्य-रूप के स्तर पर अनेक रोचक चुनौतियाँ प्रस्तुत कीं, जिन्होंने पूरी प्रक्रिया के दौरान लगातार सक्रिय और सजग बनाए रखा। किसी छात्र-निर्मित प्रस्तुति में वह जिस बात की सबसे अधिक अपेक्षा करती हैं- वह है सामूहिकता। इस नाटक में वह भी मिला और उससे कहीं अधिक पटकथा ने सीखने और खोजने के अनेक अवसर प्रदान किए, साथ ही स्वयं और समाज के बारे में गंभीर चिंतन की ओर भी प्रेरित किया।नाटक की तैयारी के पैंतालीस दिन हँसी, आनंद, बहस, संशय, विचारों की परीक्षा, असफलताओं, निरंतर अभ्यास, नई खोजों और साथियों के बीच गहरी मित्रता से भरे रहे हैं।सपन के शब्दों में, ‘जब मैं यह टिप्पणी लिख रही हूँ, तब मुझे तीव्रता से यह एहसास हो रहा है कि आज बाहरी दुनिया में साझा अनुभवों और साथ होने के ये सरल क्षण कितने दुर्लभ और कठिन हो गए हैं। ऐसे समय में रंगमंच ही हमारी एकमात्र आशा है।’






