डॉ. कालिंदी परीख की गुजराती कहानी ‘स्टोरकीपर’ का हिंदी अनुवाद किया है श्री राजेन्द्र निगम ने। अपनी सरलता और मिज़ाज में क्लासिक कहानियों की याद दिलानेवाली ‘स्टोरकीपर’ शब्दशः एक बैठक वाली कहानी है।
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हल्की गुलाबी ठंड की चादर इस समय वायु की चंचल लहर से कुछ दूर हो गई थी, लेकिन नीम ने तुरंत मानो अपने आलस को दूर कर दिया हो, इस तरह वह अपनी डालियों रूपी भुजाओं को हिलाने लगा।
दो डालियों के बीच में सावधानी से बनाए गए एक घोंसले में फरर्र करती हुए एक चिड़िया पहुँच गई। उसकी चोंच में वह कहीं से चावल के कुछ दाने ले आई थी।
चिड़िया को देखते ही धुनी हुई रुई जैसे छोटे नाजुक बच्चों ने अपनी चोंच कुछ खोली और चिड़िया ने उसी समय वे दाने उसमें डाल दिए।
नर्मदाबहन ने बेटे अरविंद के पास एक थाली में एक भाकरी और गुड़ का टुकड़ा रखा और कहा, “लो, कुछ नाश्ता कर लो, फिर चाय भी देती हूँ।”
लेकिन अरविंद तो थाली के सामने वैसा ही बैठा रहा। नर्मदाबहन ने यह देखा और वे अरविंद के पास गईं। उसके सिर पर हाथ से सहलाया और बोलीं, “ऐसे हिम्मत नहीं हारते, मुझे लगता है कि इस समय मंदिर में वे शंकरदादा से पूछते ही होंगे। मेरा भोला भगवान उन्हें हाँ कह ही देंगे। तुम चिंता मत करो…”
“लेकिन माँ,” अरविंद पस्त आवाज में बोला, “यह सातवाँ इंटरव्यू है और अब तक तो कहीं भी मेल नहीं पड़ा। सभी जगह या तो सिफारिश चाहिए या फिर रुपया! और रुपया है कहाँ? फिर मेरे पिताजी तो सिफारिश में मानते ही नहीं हैं। कई बार तो कहते हैं, “मेरे कितने ही विद्यार्थी बहुत आगे बढ़ गए हैं। बहुत ऊँची-ऊँची नौकरी करते हैं।”
“तो उन्होंने पैंतीस साल शिक्षक की नौकरी की है, तो ऐसा तो होगा न !” नर्मदाबहन आनंद के आवेग में बोलीं, “तुमने देखा नहीं कि दो वर्ष पहले जब निवृत हुए, तब सबने उनकी कैसी-कैसी तारीफ की थी। उन्हें कैसे सम्मानित किया था! लेकिन…” नर्मदाबहन से एक नि:श्वास निकल गई।
“लेकिन इसमें क्या हुआ? कुछ फंड के रुपए मिले और यह तीन हजार की मामूली पेंशन। प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक को ट्यूशन भी क्या मिलेगी और फिर साथ में यह सत् की पूँछ! घर बुला-बुलाकर मुफ्त में कितनों को पढ़ाया! कुछ फीस भी यदि रखी होती तो अच्छा था! फंड के रुपए तो सब शोभा की शादी में काम में आ गए। अब तो तुम्हारे ऊपर आशा है।”
“लेकिन माँ, मुझे पूरा पढ़ने भी कहाँ दिया?” अरविंद ने अपना असंतोष व्यक्त किया, “इस बारहवीं में मुझे दो प्रतिशत अधिक आए होते, तो कुछ नहीं तो पी.टी.सी. तो हो जाता, लेकिन वहाँ भी नसीब ने कुछ मदद नहीं की और फिर प्राइवेट कॉलेजवाले तो डोनेशन माँगते हैं।
उनमें भी एक कॉलेज के प्रमुख तो पिताजी से ही पढ़े हैं। लेकिन मेरे पिताजी! वह क्यों जाएँगे उनके पास सिफारिश के लिए? और देखना इसमें भी ऐसे ही होगा। नहीं तो, नगरपालिका के प्रमुख के हाथ में सब कुछ है।”
पिताजी का सम्मान उनके प्रमुखपद के अंतर्गत ही हुआ था, तब उन्होंने ही तो कहा था, “रेवाशंकर साहब जैसे पवित्र गुरु जी का मैं विद्यार्थी रहा और मैं उसे मैं मेरा परम सौभाग्य मानता हूँ |”
“माँ, एक बार, मात्र एक बार यदि मेरे पिताजी उनसे मिलकर सिफारिश कर दें तो यह स्टोरकीपर की नौकरी मुझे मिल सकती है।”
नर्मदा बहन ने कहा, “धीरज रखो। सब कुछ अच्छा होगा।”
“लेकिन कितना धीरज! आज सोमवार हो गया। गुरुवार को इंटरव्यू है और कौन जाने कितने लोग सिफारिश लेकर पहुँच गए होंगे, वहाँ प्रमुख ने किसी को वचन भी यदि दे दिया होगा, तो हमें पता भी कैसे चलेगा?”
“नहीं, नहीं ऐसा नहीं होगा। कल मैंने उन्हें बहुत समझाया है। जवान लड़का यदि बेकार रहे तो बहुत परेशानी आती है। और साथ ही बेरोजगार लड़के को कोई लड़की भी नहीं देता है। हम तो अब बूढ़े हुए, लेकिन अरविंद का ठिकाना लग जाए और यह हम नहीं देखेंगे तो कौन देखेगा? हमने तो बहुत-बहुत कहा है और कुछ नर्म तो पड़े हैं। भगवान करेंगे तो…”
“अच्छा ही करेंगे,” दरवाजे में से आवाज आई। रेवाशंकर मास्टर आ गए थे। सफेद लेकिन कुछ थोड़ा सा मैला कुर्ता और वैसी ही धोती। शरीर कुछ पतला हो गया था। गर्दन से कुछ झुक भी गए थे। सिर के बाल सब सफेद थे, लेकिन आँखें अभी भी पानीदार लगती थीं।
हाथ में से बिलीपत्र का गुच्छा नर्मदाबहन को दिया और अरविंद की ओर देखते हुए कहा, “जाऊँगा, मैं प्रमुख निरंजनभाई के पास जाऊँगा। हाँ, इतने वर्षों का मेरा व्रत भंग होगा। मुझे अच्छा तो नहीं लगेगा, लेकिन तुम्हारी माँ बेचारी बहुत दुखी है। मुझसे सहन नहीं होता है। जाना पड़ेगा, अभिमान तो भला किसका शेष रहा है, तो मेरा क्या रहेगा?” इतना बोलते हुए मास्टर साहब मानो कुछ थक गए हों, इसलिए पास रखी, बिना हत्थे की कुर्सी पर बैठ गए।
लेकिन अरविंद का मुँह खिल उठा! “पिताजी, आप जाएँगे तो मेरी नौकरी फिर पक्की ही समझना। आपके वचन को प्रमुख साहब नहीं टालेंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।”
नर्मदाबहन पानी ले आई और मास्टर साहब को दिया, “लो, अब बाप बेटे दोनों कुछ नाश्ता कर लो।” वे अंदर जाकर रसोईघर में से दूसरी भाखरी और गुड़ के कुछ और टुकड़े ले आईं।
मास्टर ने सिर घुमाया, “मेरी इच्छा नहीं है, अरविंद तुम नाश्ता कर लो। मैं निरंजन के घर जा रहा हूँ। वह अकेला होगा, तो उससे बात ठीक से हो सकेगी।”
“लेकिन यह गुड़ का टुकड़ा तो मुँह में रखते हुए जाओ, अच्छा शकुन माना जाता है,” ऐसा कहते हुए नर्मदाबहन ने मास्टर साहब के आगे कुछ गुड़ जबरन रख ही दिया। उनके मुँह पर भी हल्की-हल्की मुस्कुराहट आ गई थी।
“अच्छा हुआ, भगवान ने लाज रख ली। किसी तरह मान तो गए। नहीं तो, लाख रुपया रखो, तब भी वे अपने रास्ते से डिगेंगे नहीं। लेकिन अरविंद का भाग्य कि उन्होंने जाना स्वीकार किया।”
***
छोटे से कंपाउंड में कुछ वृक्ष और पौधे व्यवस्थित रूप से लगे हुए थे। वातावरण प्रफुल्लित था। सुंदर बंगले के मुख्य दरवाजे के बाईं ओर प्रमुखजी का बैठक-कक्ष था। अंदर के खंड से चाय-नाश्ते के बाद प्रमुखजी बैठक-कक्ष में ही जा रहे थे और तब ही दरवाजे पर हल्की-सी थपथपाहट हुई।
निरंजनजी ने स्वयं ही दरवाजा खोला। रेवाशंकर जी को देखते ही बोल उठे, “अरे साहब, आप? पधारिए, पधारिए! आज तो मेरे नसीब खुल गए!” मास्टर खुश हुए। निरंजन बात रख लेगा। पैंतालीस से अधिक की उम्र का है, लेकिन लगता है मानो तीस की उम्र का ही हो।
उन्होंने एकदम श्वेत कुर्ता और वैसा ही श्वेत इस्तरी किया हुआ पाजामा पहना हुआ था। व्यक्तित्व प्रभावशाली था। होंठों पर मुस्कुराहट और आँखों में स्वागत का भाव!
निरंजनभाई ने झुक कर मास्टर साहब के चरण छुए। वे स्वयं उनका हाथ पकड़ कर बैठक-कक्ष में ले गए। एक आराम कुर्सी पर उन्हें बिठाया और फिर कुछ जोर से आवाज लगाई, “अरे यहाँ आओ न, देखो कौन आया है?”
कुछ ही देर में निरंजनभाई की पत्नी और उनका दस-बारह वर्ष का पुत्र आ गया।
“ये…” निरंजनभाई पहचान दें, उसके पहले ही उनकी पत्नी बोल उठी, “अरे, साहब को कौन नहीं पहचानता है?” उन्होंने अपने पुत्र को कहा, “साहब के चरण छुओ। तुम्हारे पापा के भी साहब हैं। पुत्र ने नीचे झुक कर चरण स्पर्श किए। मास्टर साहब भाव-विभोर हो गए। उन्होंने बच्चे को लगभग उठा ही लिया। “बहुत सुखी रहो।”
“मैं चाय नाश्ता लेकर आती हूँ,” ऐसा कहकर निरंजनभाई की पत्नी जाने लगी। “नहीं-नहीं, ऐसी कोई तकलीफ मत करिए,” रेवाशंकरजी ने कहा। लेकिन सहज हँसकर निरंजनभाई की पत्नी तो चली गईं। उनका पुत्र भी उनके पीछे गया।
“साहब, आप आए, यह बहुत अच्छा लगा। पुराने दिन याद आ गए। आपने हाथ पकड़ कर एक बार कक्षा के बाहर निकाल दिया था लेकिन फिर वापस बाहर आकर मुझे कक्षा के अंदर ले गए थे और मैं रो रहा था!”
“यह तो ऐसा है, निरंजनभाई—“
“साहब, आप तो मुझे नीरु ही कहें! आप तो मेरे पिता के समान हैं। अहा-हा, तब गुरु-शिष्य के कैसे मधुर संबंध थे! सुविधाएँ कम, लेकिन शिक्षण में कैसी सात्विकता थी और इस समय की तो बात ही जाने दें।”
और फिर वर्तमान शिक्षण के गुण दोष की चर्चा होने लगी। मास्टरजी को भी उनका मनपसंद विषय मिल गया, इसलिए वे खिल उठे। इस दौरान चाय नाश्ता आ गया और बातों का दौर ऐसा चला कि एक घंटा कब बीत गया, उसका अहसास ही नहीं हुआ।
नगरपालिका के मुख्य अधिकारी फाइल के साथ आए और तब मास्टरजी को ख्याल आया, “अरे! मैं तो कितनी देर से बैठा हूँ।”
वे जाने के लिए खड़े हुए।
“साहब, आप कभी-कभी मुझे दर्शन-लाभ देते रहें।” दोनों हाथ जोड़कर निरंजनभाई ने कहा और फिर मास्टर को दरवाजे तक विदा करने के लिए आए।
घर लौट रहे मास्टर तो निरंजन भाई की खानदानी व्यवहार-कुशलता के बारे में ही सोचते रहे। “आहा! देखो, कितना बड़ा प्रमुख है, लेकिन नम्रता कैसी है! मेरा कैसा सम्मान किया! और साथ ही कभी-कभी आते रहने के लिए भी कहा है,” और रेवाशंकरजी के मन में यकायक बिजली कौंधी, “लेकिन, लेकिन मूल बात तो रह ही गई। अरविंद की नौकरी के लिए मैं तो कुछ बोला ही नहीं। याद ही नहीं आया। शायद याद आता भी, तब भी जीभ क्या खुलती?”
मास्टर ने सिर हिलाया, फिर हँस दिए। मेरा हाल तो सुदामा जैसा हो गया था। लेकिन सुदामा तो जब घर पहुँचा तो उसका ‘छप्पन कोटि का आवास’ हो गया था। यहाँ तो कुछ होना नहीं है, और मास्टर के कदम ढीले हो गए।
“घर जाकर माँ-बेटे को क्या जवाब दूँगा? हे भोलानाथ! जो आप करोगे वही सत्य है! अब निरंजन के पास वापस तो नहीं जा सकता। भाग्य में जो होगा, सो होगा।”
मास्टर ने घर में जैसे ही कदम रखे कि माँ-बेटे एकदम सामने आ गए। “क्या कहा प्रमुख साहब ने?” दोनों एक साथ बोल उठे।
“पिताजी, सब-कुछ ठीक से पक्का कर दिया है न?” अरविंद ने उत्सुकता से पूछा।
मास्टर अंदर आए। कुर्सी पर बैठे और बोले, “निरंजन का स्वभाव बहुत अच्छा है। मुझे बहुत सम्मान दिया।”
“तब तो नौकरी पक्की,” अरविंद बोल उठा।
“मुझे तो विश्वास था कि आपके वचन का वे मान रखेंगे, ” नर्मदाबहन बोली, “जरा खुल कर बात करो। क्या कहा उन्होंने?”
“उन्होंने तो बहुत कहा, बहुत मजेदार बात की।”
“लेकिन अरविंद की नौकरी…”
“नौकरी, नौकरी! हाँ, वह तो इंटरव्यू अच्छा देगा तो मिलेगी ही। निरंजन सिफारिश में मानता होगा, ऐसा लगता नहीं है।”
“अर्थात्?” अरविंद बोला।
“अर्थात् यही कि, यही कि… “ मास्टर हें हें करने लगे।
“अर्थात् आपने अरविंद के सिफारिश नहीं की, यही न?” नर्मदाबहन की आवाज कुछ भारी हो गई, “मुझे मालूम था कि आपकी जीभ नहीं खुलेगी!”
“हाँ, हाँ कुछ ऐसा ही हुआ। लेकिन भगवान पर भरोसा रखो।” रेवाशंकर कुछ खिसिया गए।
अब तीनों में से कोई कुछ नहीं बोला। अरविंद पैर पछाड़ता हुआ बाहर चला गया। नर्मदाबहन पूजा की कोठरी में गई। मास्टर वहीं बैठे रहे।
***
गुरुवार आया और ठीक शाम के पाँच बजे इंटरव्यू देकर अरविंद आ गया। मास्टर साहब ने उसकी ओर देखा।
नर्मदाबहन ने पूछ लिया, “कैसा रहा इंटरव्यू? क्या पूछा?”
“ख़ास कुछ नहीं। पिताजी की तबीयत के बारे में पूछते रहे प्रमुख साहब। दो-चार इधर-उधर के सवाल पूछे और मुझे कहा, ‘जा सकते हो!’ इसमें क्या समझें? निश्चित ही किसी दूसरे का तय कर दिया होगा। अरविंद रुआँसा हो गया।
नर्मदाबहन का कपाल फूटा। मास्टर ने आँखें बंद कीं।
तभी नगरपालिका का चपरासी आया, “साहब, यह कागज,” उसने रेवाशंकरजी के चरण छूते हुए कहा। मास्टर ने कागज लिया। चपरासी गया और फिर लिफाफा खोला, उसमें दो कागज थे।
एक तो अरविंद को स्टोरकीपर की नौकरी मिलने का आदेश था और दूसरा प्रमुखजी का एक निजी पत्र मास्टरसाहब के नाम था, उसमें लिखा था-
“पूजनीय साहब,
आप जिस दिन मेरे घर आए, तब ही मैं समझ गया था कि आप आपके पुत्र के लिए आए हैं। उम्मीदवारों की सूची से और फिर आवेदनों की फाइल में से मुझे आपके पुत्र के द्वारा की गई अर्जी के बारे में मालूम हो गया था।
लेकिन साहब, आपने उस बारे में बात नहीं की और इस तरह आपने अपनी गरिमा भलीभाँति प्रदर्शित की। आपने हमेशा जिस बात का विरोध किया, उसके विपरीत तो आप आचरण कदापि प्रदर्शित नहीं करेंगे। आपके प्रति मेरा मान अब बहुत बढ़ गया है। स्टोरकीपर के रूप में हमें एकदम प्रमाणिक व्यक्ति चाहिए। क्योंकि उसमें गड़बड़ी होने की पर्याप्त गुंजाइश रहती है।
आपके संस्कार जिसमें उतरे होंगे, वह आपका पुत्र सौ प्रतिशत प्रमाणिक होगा ही और इसके लिए इसमें किसी सिफारिश का प्रश्न ही उपस्थित कहाँ होता है।
आजकल ऐसे प्रामाणिक व्यक्ति का मिलना दुर्लभ होता है। आपके अरविंद ने आवेदन किया, इस प्रकार हमें एक प्रकार से मदद ही मिली है। इसके लिए हम आपके आभारी हैं। कभी जरूर पधारिएगा।”
रेवाशंकर मास्टर ने कागज माँ- बेटे को थमा दिया |
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मूल गुजराती लेखिका,
डॉ. कालिंदी परीख,
3, देना बैंक सोसायटी,
अमरेली – 365601.
मो. 9429139145.
गुजराती से हिंदी अनुवादक.
राजेन्द्र निगम,
10-11, श्री नारायण पैलेस,
झायडस हॉस्पिटल रोड,
थलतेज, अहमदाबाद – 380059.
मो. 9374978556.
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