‘अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि हमारे बचपन का सामाजिक संसार कितना सहज था। किसके घर से गोश्त आया, किसके यहाँ सेवइयाँ बनीं और किसने किसे खिलाया—इन बातों में धर्म की पहचान से अधिक पड़ोस और अपनत्व की भूमिका हुआ करती थी। कम-से-कम मेरी बालसुलभ दुनिया में तो यही सच था। त्योहारों की पहचान उनके धार्मिक विधान से पहले उनके स्वाद, खुशबू और रिश्तों से बनती थी। लेकिन घर के भीतर धीरे-धीरे एक दूसरा संसार भी आकार ले रहा था।’–आपबीती में जगबीती। मयंक खरे का का यह संस्मरण पढ़ते हुए शायद आपको लगे कि वे आपकी ही आपबीती सुना रहे हैं।

जब से होश सँभाला है, तब से अगर मेरा कोई सबसे पसंदीदा शौक रहा है, या यूँ कहिए कि सबसे प्रिय टाइमपास, तो वह है गोश्त खाना। और अगर समय, सुविधा और मनःस्थिति तीनों साथ दे दें, तो उसे पकाना भी। गोश्त के प्रति यह अनुराग कब और कैसे पैदा हुआ, इसका कोई निश्चित समय तो याद नहीं, लेकिन इतना ज़रूर याद है कि बचपन की बहुत-सी सुखद स्मृतियाँ किसी-न-किसी तरह गोश्त की खुशबू से जुड़ी हुई हैं।
हमारे बचपन में इतवार का मतलब केवल स्कूल की छुट्टी नहीं हुआ करता था। वह गोश्त का दिन भी था। घर में अक्सर इतवार को बकरे का गोश्त बनता था और हम लोग सुबह से ही चाक-चौबंद हो जाया करते थे। उस दिन एक तरह का अघोषित उपवास रहता था। नाश्ते में कोई दिलचस्पी नहीं, खाने की कोई जल्दी नहीं। सारी भूख जैसे दोपहर के लिए सुरक्षित रखी जाती थी।
उन दिनों गोश्त अक्सर सुबह ही मिलता था, इसलिए सुबह ही बनता था। मछली ज़रूर शाम को पकती थी, क्योंकि वह बिकने भी शाम को ही आती थी। मछली तो ख़ैर यदा-कदा ही बनती थी, लेकिन बकरे का गोश्त हमारे घर का साप्ताहिक उत्सव था। एक ऐसा उत्सव, जिसकी न कोई औपचारिक घोषणा होती थी, न कोई निमंत्रण, लेकिन जिसकी तैयारी में घर का एक छोटा-सा सदस्य सबसे अधिक उत्साहित रहता था।
आज सोचता हूँ तो हैरत होती है कि जिस बच्चे को स्कूल जाने के लिए दस बार जगाना पड़ता था, उसकी नींद इतवार की सुबह पता नहीं कैसे छह बजे ही खुल जाती थी। मैं सुबह-सुबह चबूतरे पर बैठ जाता और पिताजी की साइकिल निकलने का इंतज़ार करता। पिताजी भी मेरी इस दिलचस्पी से परिचित थे। अक्सर मुझे अपने साथ गोश्त खरीदने ले जाते।
गोश्त खरीदना भी एक कला थी और इस कला की शुरुआती तालीम मुझे पिताजी से ही मिली। कौन-सा हिस्सा अच्छा है, दस्त क्या है, चाप किसे कहते हैं, अंडू और खस्सी में क्या अंतर होता है—ये सारी बारीकियाँ उन्हीं से सीखीं। पिताजी तो गोश्त का रंग देखकर ही बता देते थे कि जानवर कैसा रहा होगा। कसाई की दुकान पर उनका आत्मविश्वास देखने लायक होता था। वह केवल गोश्त खरीदते नहीं थे, उसकी बाकायदा परख करते थे। मुझे लगता था कि गोश्त के मामले में पिताजी से जैसे जानकार बहुत कम ही लोग है।
घर लौटने के बाद मेरी बेचैनी का दूसरा दौर शुरू होता। गोश्त चढ़ने से लेकर पकने तक मैं रसोई के आसपास ही मँडराता रहता। बीच-बीच में यह जाँचने के बहाने कि गोश्त गला या नहीं, एकाध बोटी निकालकर चख लेता। यह जाँच इतनी बार होती कि कई बार पकने से पहले ही गोश्त का अच्छा-खासा हिस्सा मेरे पेट में पहुँच चुका होता। इस हरकत के लिए कई बार मज़म्मत भी हुई, लेकिन स्वाद के सामने नसीहतों का असर बहुत देर तक कहाँ टिकता है!
संयोग कुछ ऐसा रहा कि जिनसे मैं ट्यूशन पढ़ने जाता था, वे भी एक मुस्लिम परिवार की महिला थीं। हम उन्हें ‘फ़ारूक़ी बहनजी’ कहते थे। वह एक पुराने ज़मींदार घराने से थीं। उनके यहाँ खान-पान का अपना ही ठाठ था। अक्सर बड़ी-सी देग चढ़ी रहती थी और उसमें पकते गोश्त की खुशबू पूरे घर में फैली रहती थी।
अब ज़रा उस बच्चे की हालत का अंदाज़ा लगाइए जिसे पढ़ने के लिए किताब खोलकर बैठना हो और आसपास ज़ाफ़रान तथा मसालों की खुशबू तैर रही हो। गणित के सवाल हों या अंग्रेज़ी के पाठ, मेरा ध्यान बार-बार उस देग की तरफ़ चला जाता था। किताब के अक्षर आँखों के सामने होते, लेकिन दिमाग़ में गोश्त की बोटियाँ घूमती रहतीं।
कभी-कभी बाजी मेहरबान होतीं तो स्टू भी खिला देती थीं। उस स्टू का स्वाद आज भी स्मृति में कहीं सुरक्षित है। उसमें केवल मसालों का स्वाद नहीं था, एक घरेलू अपनापन भी था। वह किसी औपचारिक मेहमाननवाज़ी का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बच्चे की ललक को पहचानकर उसे कुछ खिला देने का सहज स्नेह था।
धीरे-धीरे हालत यह हो गई कि बिना गोश्त के पेट ही नहीं भरता था। हालाँकि उन दिनों घर की परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थीं कि रोज़ गोश्त खाने की कल्पना भी की जा सके। लेकिन शौक़ अपनी राह निकाल ही लेता है।
उस ज़माने में दो रुपये में किसी होटल पर क्वार्टर प्लेट चावल के साथ एक बोटी और सुरवा मिल जाता था। सुरवा यानी गोश्त का मसालेदार शोरबा। आज की पीढ़ी के लिए शायद यह कल्पना करना भी मुश्किल हो कि एक बोटी और थोड़े-से शोरबे के सहारे चावल की पूरी प्लेट किस आनंद से खाई जा सकती थी। लेकिन हमारे लिए वह किसी दावत से कम नहीं होता था। दो रुपये का जुगाड़ भी यदा-कदा हो ही जाता और फिर लगता कि जीवन की एक बड़ी इच्छा पूरी हो गई।
ईद और बकरीद का इंतज़ार तो हमें होली-दिवाली से भी ज़्यादा रहता था। त्योहारों का हमारा अपना भूगोल था और उसमें स्वाद की सीमाएँ धार्मिक सीमाओं से कहीं अधिक खुली हुई थीं।
ईद के दिन आमतौर पर सेवइयों के साथ गोश्त-रोटी भी खाने को मिल जाती थी। सेवइयाँ तो त्योहार की मिठास थीं, लेकिन असली निगाह गोश्त पर लगी रहती थी। बकरीद का मामला कुछ अलग था। उस दिन कुर्बानी के बाद हमारे घर भी कच्चा गोश्त आता था। वह केवल खाने की चीज़ नहीं, पड़ोस और रिश्तों के बीच आवाजाही का एक ज़रिया भी था।
उन दिनों घर में फ्रिज नहीं हुआ करता था। लिहाज़ा जो गोश्त आया, उसे पकना था और जो पक गया, उसे शाम तक समाप्त भी होना था। आज की तरह अगले दिन के लिए बचाकर रखने की सुविधा नहीं थी। इसलिए बकरीद का पूरा दिन ही खाने-खिलाने में बीत जाता था।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि हमारे बचपन का सामाजिक संसार कितना सहज था। किसके घर से गोश्त आया, किसके यहाँ सेवइयाँ बनीं और किसने किसे खिलाया—इन बातों में धर्म की पहचान से अधिक पड़ोस और अपनत्व की भूमिका हुआ करती थी। कम-से-कम मेरी बालसुलभ दुनिया में तो यही सच था। त्योहारों की पहचान उनके धार्मिक विधान से पहले उनके स्वाद, खुशबू और रिश्तों से बनती थी।
लेकिन घर के भीतर धीरे-धीरे एक दूसरा संसार भी आकार ले रहा था।
बचपन में माँ गोश्त पका तो देती थीं, लेकिन स्वयं खाती नहीं थीं। हमारे खाने पर उन्हें कोई विशेष आपत्ति भी नहीं थी। उनकी अपनी आस्थाएँ थीं और हमारी अपनी रुचियाँ। दोनों के बीच एक व्यावहारिक समझौता बना हुआ था। घर की रसोई में यह सह-अस्तित्व बिना किसी बड़े वैचारिक विवाद के चलता रहा।
फिर एक दिन गाँव से पंडित जी आए। उन दिनों माँ मेरी शिक्षा-दीक्षा को लेकर परेशान रहती थी। मां ने अपना यह दुख पण्डित जी को बताया। पंडित जी ने तुरंत एक नुस्ख़ा बता दिया। नुस्ख़ा यह था कि घर में हर महीने सत्यनारायण भगवान की कथा होनी चाहिए और चौके में गोश्त बनना बंद हो जाना चाहिए। उनके अनुसार चौके में गोश्त बनने से घर में बुरी आत्माओं का वास हो जाता है।
लड़के को कलेक्टर बनाने का यह तरीका माँ को जँच गया। अब तक जिस चौके में गोश्त बिना किसी व्यवधान के पकता था, वहाँ अचानक उसका प्रवेश निषिद्ध हो गया। माँ ने फरमान जारी कर दिया और घर में उसे पूरी सख़्ती से लागू भी कर दिया गया।
पिताजी ने बदली हुई परिस्थितियों से समझौता करने में ही भलाई समझी। वैसे भी उनकी भी यही इच्छा थी, वो तो मेरा नारा कलेक्टर के बंगले में ही गाड़ आये थे, सो उन्होंने भी चुप मार ली। उन्होंने गोश्त पकाने के लिए अलग बर्तन और स्टोव की व्यवस्था कर दी। इस तरह गोश्त को चौके से निष्कासित करके घर के किसी दूसरे कोने में शरण दे दी गई।
मुझे यह व्यवस्था कुछ अजीब लगती थी। वही गोश्त, वही घर, वही खाने वाले लोग, लेकिन चौके के भीतर वह दरिद्रता का कारण था और चौके के बाहर स्वीकार्य। मेरी समझ में यह गणित नहीं आता था। हालाँकि उस उम्र में मेरे पास इस विरोधाभास को व्यक्त करने के लिए कोई दार्शनिक भाषा नहीं थी। मेरी समस्या बिल्कुल सीधी थी—गोश्त मिलना चाहिए और समय पर मिलना चाहिए।
कुछ दिनों तक यह व्यवस्था चलती रही।
इसी बीच धार्मिक फ़िल्मों और लोकप्रिय धार्मिक संस्कृति का प्रभाव हमारे घर तक भी पहुँचा। ‘जय संतोषी माँ’ और ‘बजरंगबली’ जैसी फ़िल्मों का असर घरेलू आस्थाओं पर गहरा पड़ा। मंगलवार और शुक्रवार को गोश्त खाने की मनाही हो गई। धीरे-धीरे यह निषेध केवल घर में पकाने तक सीमित नहीं रहा। बाहर जाकर खाने पर भी आपत्ति होने लगी।
धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि यह केवल गोश्त खाने या न खाने का मामला नहीं था। इसके पीछे एक पूरी मानसिक संरचना काम कर रही थी, जिसमें मनुष्य के जीवन की वास्तविक समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय उन्हें धार्मिक कर्मकांडों के हवाले कर दिया जाता था। ग़रीबी का संबंध आमदनी, रोज़गार और सामाजिक परिस्थितियों से कम, चौके में पकने वाले भोजन और देवी-देवताओं की कृपा से अधिक जोड़ा जाने लगा था।
हमारी पीढ़ी ने इस बदलाव को बहुत क़रीब से देखा है। एक समय विस्तृत धार्मिक अनुष्ठानों के लिए जिस तरह के साधन और अवकाश की आवश्यकता होती थी, वे अपेक्षाकृत संपन्न परिवारों को अधिक सुलभ थे। लेकिन धीरे-धीरे धार्मिक कर्मकांडों का ऐसा विस्तार हुआ कि दो जून की रोटी जुटाने वाला आदमी भी अपनी आर्थिक हैसियत से बढ़कर इन आयोजनों में उलझने लगा। जो परिवार पहले ही अभावों से जूझ रहा था, उसके सामने अभावों से मुक्ति का रास्ता उसकी आर्थिक परिस्थितियों को बदलने में नहीं, बल्कि एक और कथा, एक और व्रत और एक नए अनुष्ठान में बताया जाने लगा।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अधिक क्षति वैज्ञानिक चेतना की हुई। सवाल पूछने की जगह विश्वास ने ले ली और तर्क की जगह भय ने। ग़रीबी क्यों है, इसका उत्तर तलाशने के बजाय यह समझाया जाने लगा कि घर में कौन-सा भोजन पकने से दरिद्रता आती है और सप्ताह के किस दिन क्या खाने से देवी-देवता अप्रसन्न हो जाते हैं। इस तरह जीवन की भौतिक समस्याओं को आध्यात्मिक कारणों से जोड़कर उनके वास्तविक सामाजिक और आर्थिक संदर्भों को ही ओझल कर दिया गया।
मुझे लगता है कि कर्मकांडों की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वे कई बार मनुष्य को अपनी वास्तविक परिस्थितियों से संघर्ष करने के बजाय उन्हीं परिस्थितियों के साथ समझौता करना सिखाते हैं। जो आदमी अपनी मेहनत से जीवन बदलने की कोशिश कर सकता था, वह अपनी बदहाली का कारण किसी अदृश्य नाराज़गी में खोजने लगता है। उसकी सीमित कमाई का एक हिस्सा भी ऐसे अनुष्ठानों में खर्च होने लगता है, जिनसे उसकी आर्थिक स्थिति में कोई सुनिश्चित परिवर्तन नहीं होता।
हालाँकि व्यक्तिगत आस्था और कर्मकांड के इस विस्तार में अंतर करना ज़रूरी है। आस्था मनुष्य को मानसिक संबल भी दे सकती है, लेकिन जब वही आस्था प्रश्न करने की स्वतंत्रता को बाधित करने लगे और अभावग्रस्त जीवन पर एक अतिरिक्त आर्थिक तथा मानसिक बोझ बन जाए, तब उसकी आलोचना आवश्यक हो जाती है।
हमारे घर में भी यही विरोधाभास था। ग़रीबी दूर करने के लिए सत्यनारायण की कथा शुरू हुई, लेकिन ग़रीबी अपनी जगह बनी रही। अलबत्ता गोश्त पकाने के लिए अलग बर्तन और स्टोव खरीदने पड़े। यानी दरिद्रता दूर करने के उपाय ने घर के ख़र्च में थोड़ी और बढ़ोतरी कर दी थी। यह बात उस समय शायद किसी को हास्यास्पद नहीं लगी होगी, लेकिन आज सोचता हूँ तो उस पूरे प्रसंग की विडंबना पर हँसी भी आती है और अपने समय की सामाजिक चेतना को लेकर चिंता भी होती है।
हमारी पीढ़ी की त्रासदी यह थी कि आधुनिक शिक्षा का विस्तार तो हो रहा था, लेकिन घरों के भीतर तर्क और वैज्ञानिक दृष्टि को उसी अनुपात में जगह नहीं मिल रही थी। स्कूल में हमें कारण और परिणाम का संबंध समझाया जाता था, जबकि घर में बताया जाता था कि मंगलवार को गोश्त खाने से अनिष्ट हो सकता है। किताबों में विज्ञान था और रसोई में निषेधों का अपना विधान। हम इन्हीं दो संसारों के बीच बड़े हो रहे थे।
मेरे लिए इस अंतर्विरोध का पहला अनुभव किसी किताब या वैचारिक बहस से नहीं, बल्कि अपने घर के चौके से शुरू हुआ था। तब मुझे नहीं मालूम था कि इसे वैज्ञानिक चेतना और रूढ़िवाद के बीच संघर्ष कहा जा सकता है। मैं तो बस इतना जानता था कि जो गोश्त कल तक घर में सहजता से पकता था, आज वही अपवित्र घोषित हो गया है।
और शायद यहीं से मेरे भीतर सवाल पूछने की वह छोटी-सी आदत पैदा हुई, जिसने आगे चलकर बहुत-सी मान्यताओं को बिना परखे स्वीकार करने से मुझे रोका।
अब गोश्त खाना केवल स्वाद का मामला नहीं रह गया था। वह घर के भीतर अनुशासन, आस्था और अवज्ञा का प्रश्न बनने लगा था। कभी बाहर से खाकर आ जाओ तो घर में भारी क्लेश खड़ा हो जाता। मुझे यह बात समझ नहीं आती थी कि जो चीज़ कल तक सहज थी, वह अचानक इतनी आपत्तिजनक कैसे हो गई। क्या किसी भोजन का चरित्र सप्ताह के दिनों के साथ बदल जाता है? मंगलवार को जो वर्जित है, वह बुधवार को स्वीकार्य कैसे हो जाता है?
पिताजी ने नए हालात से समझौता कर लिया था। शायद घर की शांति उनके लिए गोश्त के स्वाद से अधिक महत्त्वपूर्ण थी। जीवन के अनुभव ने उन्हें सिखा दिया था कि हर लड़ाई लड़ना ज़रूरी नहीं होता। लेकिन मैं उस उम्र में था, जब समझौते की समझ कम और अपनी इच्छाओं पर पहरा लगाए जाने का प्रतिरोध अधिक होता है।
धीरे-धीरे घर के भीतर मेरा तालमेल बिगड़ने लगा।
मैं उस समय हाईस्कूल में पढ़ता था। किशोरावस्था की दहलीज़ पर खड़ा मेरा मन धीरे-धीरे विद्रोही होता जा रहा था। घर में बढ़ते धार्मिक निषेध और रोज़मर्रा की इच्छाओं पर लगती पाबंदियाँ मुझे स्वीकार नहीं थीं। बात केवल गोश्त खाने की नहीं रह गई थी, बल्कि अपनी तरह से जीने और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का प्रश्न बन गई थी। घर में आए दिन होने वाली तकरार से पिताजी भी आजिज आ चुके थे। अंततः उन्होंने मेरी ज़िद के आगे हथियार डाल दिए और मुझे आगे की पढ़ाई के लिए इलाहाबाद भेजने का निर्णय कर लिया।
घर से निकलते समय पिताजी को शायद उम्मीद रही होगी कि बाहर रहकर लड़का कुछ समझदार होगा और पढ़ाई में मन लगाएगा। उधर मेरे मन में अपनी आज़ादी का एक अलग ही संसार आकार ले रहा था। इलाहाबाद मेरे लिए केवल पढ़ाई का शहर नहीं, घर की वर्जनाओं से मुक्ति का रास्ता भी था।
इलाहाबाद स्टेशन पर उतरकर बाहर निकला तो सामने ‘शेरे पंजाब होटल’ दिखाई पड़ा।
उसे देखते ही लगा, मानो बरसों की मुराद पूरी हो गई हो!
संपर्क : 9450169406






