हमारे दौर में न्याय-व्यवस्था का जो हश्र हुआ है, उसे इस दौर के विशिष्ट कवि हरीश चन्द्र पाण्डे की यह छोटी-सी कविता बिना वाचाल हुए, सिर्फ़ प्रेमचंद की ‘पंच परमेश्वर’ के हवाले से, रेखांकित कर देती है। 2026 की प्रेमचंद जयंती पर इस कविता को पढ़ना अलग महत्त्व रखता है।
‘पंच परमेश्वर’ का पुनर्वाचन और एक प्रस्ताव

 

जुम्मन शेख़!
ख़ूब किया अपनी बूढ़ी ख़ाला को परेशान तुमने
जिसने तुम्हें अपनी कुल जायदाद दे दी
उसी को महरूम रखा रोटी कपड़े से

गांव की कौन सी चौखट छोड़ी उसने आप बीती बताने से
किस चौखट ने नहीं किया उसे निराश
हार कर शरण ली पंचायत की
कि पंचों का फ़ैसला अल्लाह का हुक्म होता है

ख़ूब ख़ुश हुए तुम कि पंच तो अपना ही अलगू है
दांतकटी रोटी की दोस्ती है
हज करने गया तो तुम्हें ही सौंप गया घर
लड्डू फूटे मन ही मन कि अब बुढ़िया की ख़ैर नहीं

पर क्या हुआ ऐसा कि पंच होते ही बदल गया लंगोटिया यार
तुम्हारे ही खिलाफ़ दे दिया फ़ैसला दो टूक
–सरासर ग़लत हो तुम जुम्मन!
ता हयात तुम्हीं खिलाओगे ख़ाला को

वो क्या था ऐसा कि न्याय की कुर्सी पर बैठते ही पंच को
ख़ाला का स्वर ब्रह्माण्डीय प्रतिध्वनि देने लगा था
–बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न करोगे?

अपनी चूल छोड़ते दांतों के बीच से निकसे स्वरों में
इतनी ताक़त होती है क्या?
क्या वह अदृश्य आत्मा को चिमटी से पकड़ लेती है?

जुम्मन शेख्र!
जल्द ही कितना अच्छा मौक़ा आ गया था तुम्हारे पास बदला लेने का
अबकी अलगू ही पंचायत पहुंच गया था साहू सेठ के ख़िलाफ़
कि बैल का पैसा नहीं दे रहा साहू
अबके तुम्हीं थे पंच, मौक़ा सुनहरा था
हारना था अलगू को और तुम्हारे कलेजे में ठंडक पड़नी थी
क्या होता है दोस्ती में धोखा
समझ जाएगा अलगू

फिर पूछता हूं
पर क्या था ऐसा कि पंच की गद्दी पर बैठते ही
तुम्हारा ईमान दिप दिप करने लगा था
द्वेष के दंश काफूर हो गये
पक्षधरता के पात गिर गए
ईमान के कल्ले फूट आए
और जिता दिया अलगू को ही

मैं फिर पूछता हूं
क्या न्याय की कुर्सी में ईमान की तरंगें प्रवाहित होती हैं

अगर इस बात में लेशमात्र भी सत्यता है
तो मेरा भी एक प्रस्ताव है
–कि न्याय की लघुतम कुर्सी से लेकर
महत्तम कुर्सी पर बैठने वाले शख़्स को
शपथ ग्रहण करते समय
‘पंच परमेश्वर’ की एक प्रति
उसकी मातृभाषा में दे दी जाए

‘दूध-बोली’ की पैठ आत्मा तक होती है