“बात दृष्टि के कोण की नहीं, पूरी दृष्टि की है। मेरी नज़र में उनकी दृष्टि द्वेषपूर्ण है। देखिए, द्वेष का मतलब है दो नज़र से देखना! दो नज़र यानी ‘हम’ और ‘वे’ की नजर से देखना! वे जीवन के हर प्रसंग को ‘हम’ और ‘वे’ की नज़र से, अर्थात द्वेषपूर्ण नज़रिए से देखते हैं। यह नज़रिया जहरीला है। भेदभाव से भरा है।”
प्रफुल्ल कोलख्यान के साथ महेश मिश्र की यह बातचीत ई-मेल के ज़रिये टुकड़ों-टुकड़ों में हुई है. और शायद अभी भी हो रही है. कुछ समय पहले ‘समालोचन’ पर एक अंश प्रकाशित हुआ था. उसके बाद का हिस्सा यहाँ पढ़ सकते हैं.
प्रफुल्ल कोलख्यान के साथ महेश मिश्र की बातचीत
महेश मिश्र : आपने हाल ही में लिखा कि “जो इतिहास वर्तमान को ग़लत ढंग से प्रभावित करता है वह इतिहास नहीं हो सकता।” क्या मतलब था इसका….इतिहास और राजनीतिक स्मृति में आप क्या अंतर मानते हैं?
प्रफुल्ल कोलख्यान : इतिहास में राजनीति के अलावा भी बहुत-कुछ होता है। अन्य विषयों की ही तरह इतिहास का भी प्रारूप विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक पाठ्यक्रम की मूल चेतना के सहमेल से ही विकसित होता है। जरा ठहरकर सोचने पर पता चलता है कि हमारे पाठ्यक्रम में जो इतिहास चेतना जगह पा सकी है, वह सिर्फ राजनीतिक स्मृति से बंधी हुई है। वह भी सत्ता की राजनीतिक स्मृति तक ही। जबकि इतिहास जनजीवन की समग्र स्मृति होता है और राजनीतिक स्मृति उस समग्रता का एक निर्मायक अंश होता है — इतिहास के ढांचे का भी और इतिहास की चेतना का भी।
राजनीतिक स्मृति में राजनीतिक प्रक्रियाओं के सभी पक्षों की मेल-मोहब्बत, घात-प्रतिघात और मिलीभगत दर्ज रहती है। लेकिन जब सत्तारूढ़ दल सत्ता की शक्ति का इस्तेमाल करते हुए जटिल राजनीतिक स्मृति को विलोपित करने की कोशिश करती है, जिसे विलुप्त या तिरोहित करना संभव नहीं होता, तो उसे इतिहास की चेतना पर निरर्थक बोझ होने की हिकारत और नफरत से लाद दिया जाता है। कभी-कभी तो हिकारत और नफरत का यह राजनीतिक इस्तेमाल सामाजिक घटकों के बीच दुश्मनी का माहौल बना देता है। उदाहरण के लिए, भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति के इतिहास की चेतना के साथ आज की सत्ता का व्यवहार देखा जा सकता है। सह-मिलानी और सहानुभूतिक सामाजिक चेतना की गहरी होती जा रही दुश्मनी में इसे कोई भी देख सकता है।
हालांकि आजकल सायास देखना-सुनना कम हो गया है। बिना मेहनत के जो सामने टपक जाए उसे ही देखने-सुनने में लोग लगे रहते हैं — एल्गोरिदम! क्या पता! लेकिन इतिहास की चेतना, राजनीतिक स्मृति और सत्ता की स्मृति का संदर्भ थोड़ा-बहुत साफ हुआ होगा। लुप्त, गुप्त और सुषुप्त करने की प्रक्रियाएं लगातार जारी रहती हैं — तुलसीदास को याद करें, हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ। जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥
इतिहास या अतीत की उपलब्धियों का मोह भविष्य को दुर्घटनाग्रस्त कर देता है। अतीत से बेहतर भविष्य हो, इस बात के लिए अपने वर्तमान में सर्वोत्तम और सर्वोच्च उपाय करनेवाला समाज ही प्रगतिशील होता है। प्रगतिशील समाज ही सभ्यता के आगे बढ़ने का रास्ता तैयार कर सकता है। यह रास्ता लोकतंत्र का रास्ता है। इतिहास की मिथ्या चेतना के प्रतिनिधि जब सत्तारूढ़ हों तो ये सत्ता के छलनायक इतिहास के नायक को खलनायक और खलनायक को नायक बनाने में लग जाते हैं।
मिथ्या चेतना में नवाचार का कोई प्रसंग और संदर्भ बन ही नहीं सकता है।
इतिहास की मिथ्या चेतना के इस्तेमाल पर चलनेवाली राजनीति कभी भी और किसी भी कीमत पर लोकतंत्र के अनुकूल या लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकती है।
वर्तमान को ग़लत ढंग से प्रभावित करने का मतलब क्या है? वैसे भी राजनीतिक दृष्टि अपने लिए इतिहास को एक ख़ास ढंग से हमेशा देखती ही है तो वर्तमान में ऐसा क्या आप देख रहे हैं जो आज के नियंताओं को नहीं दिख रहा है…
वर्तमान को ग़लत ढंग से प्रभावित करने का मतलब है इतिहास की मिथ्या चेतना को सक्रिय करना जो अतीत की मिथ्या उपलब्धियों की ओर ले जाती है। इतिहास की मिथ्या चेतना भारत की सहमिलानी प्रवृत्तियों को कुंद और भोथरा बना रही है।
मुंहतक्की से न मोक्ष मिलता है, न मुक्ति। मुंहतक्की मुक्ति का पथ नहीं है — मुंहतक्की किसी की हो। स्वाधीनता और स्वतंत्रता का मतलब ही जीवन का मुंहतक्की से मुक्त होना है। मनुष्य के जीवन को ईश्वर सहित किसी भी सत्ता की परमुखापेक्षी बनानेवाली राजनीति कभी भी लोकतांत्रिक नहीं हो सकती है। व्यक्ति और समाज की समस्याओं के हल निकालने का बोझ भगवान के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। इसीलिए मनुष्य को अपनी समस्याओं के हल के लिए भगवान पर भरोसे की राजनीति पर अपनी उम्मीद नहीं टिकानी चाहिए। बल्कि मनुष्य पर भरोसा करनेवाली राजनीति पर अपनी उम्मीद टिकानी चाहिए। धर्म और भक्ति का महत्व कम-से-कम लोकतांत्रिक राजनीति में नहीं है।
और क्या यह प्रामाणिक ढंग से कहा जा सकता है कि वे वर्तमान को दोषपूर्ण ढंग से ही देख रहे हैं?
वे से आशय आरएसएस से है! प्रामाणिक! महेश जी सवाल यह नहीं है कि वे किस नज़र से देखते हैं! भूत को, कह लें इतिहास को, जिस नज़र से वे देखते रहे हैं, वह बुनियादी रूप से ग़लत है। बात दृष्टि के कोण की नहीं, पूरी दृष्टि की है। मेरी नज़र में उनकी दृष्टि द्वेषपूर्ण है। देखिए, द्वेष का मतलब है दो नजर से देखना! दो नज़र यानी ‘हम’ और ‘वे’ की नजर से देखना! वे जीवन के हर प्रसंग को ‘हम’ और ‘वे’ की नज़र से, अर्थात द्वेषपूर्ण नज़रिए से देखते हैं। यह नज़रिया जहरीला है। भेदभाव से भरा है। उनकी मान्यताओं में कई अच्छी बातें हो सकती हैं, इसकी संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह सच है। लेकिन भोजन चाहे जितना भी स्वादिष्ट और पौष्टिक हो लेकिन क्या फायदा! क्या फायदा यदि वह जहरीला या जहरमिला हो! महेश जी, द्वेष और तिकड़म भारत या किसी भी समाज के लिए ख़तरनाक होता है। तिकड़म का अर्थ होता है दो को लड़ाकर तीसरे के फायदे का जुगाड़! वे लोग तो विद्वेषी और तिकड़मी दोनों हैं — नीमचढ़ा करेला! महेश जी, आप प्रमाण और प्रामाणिकता की बात कर रहे हैं। इनके अधिकतर कारनामे दुष्प्रेक्ष्य होते हैं। दुष्प्रेक्ष्य अर्थात जिसके वास्तविक रूप को देखना-पहचानना मुश्किल हो।
इसी से जुड़ी बात है कि क्या इतिहास से जुड़ा सबसे बड़ा संकट तथ्यों का विकृतिकरण है? या वर्तमान की वैचारिक आकांक्षाओं के अनुसार अतीत को पढ़ने की प्रवृत्ति इतिहास का अधिक बड़ा संकट है?
एक अर्थ में आपकी बात बिल्कुल सही है। लेकिन एक अर्थ में ही! तथ्य भाषा में उतरते ही बदलने लगते हैं! इस बदलाव को समझना ज़रूरी है। तथ्य, सत्य और आभास के फर्क को ध्यान में रखना होगा। घटना का अनुभव में जुड़ना और फिर अनुभव का भाषा में बदलना एक जटिल प्रक्रिया होती है। इतिहास केवल सामान्य भाषिक अभिव्यक्ति नहीं है। जिंदा इतिहास सक्रिय संज्ञानात्मक पुनर्निर्माण की निरंतर जारी प्रक्रिया से नाभिनालबद्ध होता है। इसमें भाषायी-सांस्कृतिक क्षमता निर्माण का सवाल केंद्रीय महत्त्व का होता है। इस पूरी प्रक्रिया में तथ्यों के विकृतिकरण का स्कोप भी होता है। कुल मिलाकर यह कि इतिहास वर्तमान का अधीनस्थ होता है। इतिहास सिर्फ तथ्य नहीं होता है, सत्य और फिर आभास भी तो होते ही हैं। विकृतिकरण और उससे जुड़ी समस्याएं जैसे जीवन के अन्य प्रसंगों में वैसे ही इतिहास के मामले में भी रहती ही है। इतिहास को वर्तमान का अधीनस्थ मानें तो वर्तमान की प्राथमिकताओं से इतिहास में बदलाव या विकृतिकरण होता है। यहां यह टांकना जरूरी है कि हर बदलाव विकृतिकरण नहीं होता है; बदलाव तो प्रसंस्करण के लिए भी जरूरी होता है। विकृतिकरण और प्रसंस्करण सामान्य लोगों के व्यापक हिताहित को ध्यान में रखकर समझा जा सकता है। भाषायी-सांस्कृतिक निर्भरशीलताओं का प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र पड़ता है। हिंदी लेखक बनने के अपने फैसले को ठीक से निभा न पाने की अपनी कमजोरियों का बोझ भाषाई-सांस्कृतिक निर्भरशीलताओं पर डालने का पाप नहीं कर सकता हूँ।
हां, कह सकते हैं कि वर्तमान की वैचारिक आकांक्षाओं और राजनीतिक जरूरतों, स्वार्थ-जनित और स्वार्थ-प्रेरित प्रवृत्तियों की कारस्तानियों को भी जवाबदेह माना जा सकता है।
इतिहास, स्मृति और मिथक, इन तीनों के बीच आप क्या भेद करते हैं? सार्वजनिक जीवन में ये तो घुल-मिल जाते ही हैं, हम देख रहे हैं…..इनके मिश्रण के क्या परिणाम होते हैं?
इतिहास का संबंध घटनाओं से जुड़े तथ्यों की लिखित बहुआयामी अभिव्यक्ति से जुड़ा होता है। स्मृति समानांतर और अधिकतर मामलों में अलिखित होती है। अधिकतर मामलों में इसलिए कह रहा हूं कि कई बार स्मृति का इस्तेमाल साहित्य और विभिन्न कला-रूपों और प्रारूपों में भी होता है। स्मृति में खुद को असली इतिहास या जनता के इतिहास के रूप में देखे जाने की ज़बरदस्त ज़िद रहती है। मिथ परमात्मा को ही प्रमाण मानता है। मिथ में धार्मिक तत्वों, आस्थाओं और धारणाओं के लिए पर्याप्त जगह रहती है। मिथ को अपेक्षाकृत आसानी से जन-भावनाओं की राजनीतिक ताकत से जोड़ दिया जा सकता है। साहित्य में मिथहास (मिथ+इतिहास) और सत्ता की आकांक्षाओं के वशीभूत राजनीति जनजीवन को उथल-पुथल में डाल देती है। इनके मिश्रण से जनजीवन को उत्तेजित करने, विधायी विस्तार में जहरीले अंतरध्वंस की स्थिति-परिस्थिति बन जाती है। इस समय भारत में मिथ और इतिहास को मिथहास में बदला जा चुका है।
क्या साहित्य अपने समय के इतिहास को अधिक ईमानदारी से दर्ज करता है? यह सवाल इसलिए जरूरी है कि एक तरह के साहित्यकार दृढ़ता से मानते हैं कि साहित्य अपने समय की घटनाओं से अधिक मनुष्य की चेतना और उसके नैतिक द्वंद्व को अभिव्यक्त करता है। क्या यह दावा सच है?
साहित्यकार या साहित्यकारों और साहित्य के आलोचकों के दावों का सम्मान करना चाहिए – दही का खट्टा होना उस का गुण है लेकिन अपने दही को कौन खट्टा कहता है, यहां दावा मायने दही! हर गंभीर लेखक ईमानदारी से दर्ज करने की कोशिश करता है। कोशिश का कामयाब होना कई बातों पर निर्भर करता है। बड़ा लेखक वही होता है जिसकी ईमानदार कोशिश कामयाब भी होती है। कामयाब होना कौन नहीं चाहता है! लेकिन हर कोई कामयाब नहीं होता है, कामयाबी के सभी कारकों को कई लेखक साध नहीं पाते हैं। प्रशंसात्मक स्वीकृति तो कोशिश के हिस्से में दर्ज होना चाहिए। परखियेगा! भाषायी प्रभाव कैसा होता है! कोई साहित्य संस्कृत में लिखे जीने के चलते गोमुखी, इंग्लिश में लिखे जाने के चलते अग्रमुखी और हिंदी में लिखे जाने के चलते अनुमुखी होने के प्राथमिक परसेप्शन देता है। एक सीमित संदर्भ में, अनुमुखी परसेप्शन की भाषा में कोई अपेक्षाकृत मौलिक समझे जाने लायक काम करना कितना मुश्किल होता है! परसेप्शन में अपेक्षाकृत मौलिक होने की तलाश में लगे लोग जो अपनी भाषा के प्रति दायित्व से खुद को मुक्त समझने में सक्षम हैं वे या तो अग्रमुखी इंग्लिश की तरफ लपकते हैं। लेकिन जिनका हाथ इंग्लिश में अपेक्षाकृत तंग है, वे गोमुखी संस्कृत की तरफ जाने की कोशिश करते हैं। लेकिन हिंदी के अनुमुखी परसेप्शन के साथ जीने-मरने की स्थिति में बने रहने वाले लोगों से कोई क्या उम्मीद कर सकता है!
हिंदी को न इलाके के लोग अपना सक्रिय समर्थन देते हैं न कोई इलाकाई प्रेरणा देते हैं। अनुमुखी भाषायी इलाके के परसेप्शन वाले लोगों का सारा कारोबार अग्रमुखी परसेप्शन में हो रहा है, गोमुखी पीछे खींच रहा है – हमारी ज्ञान-दशा और ज्ञानोदय के इतिहास के बारे में अधिक कुछ कहना मेरे लिए आसान नहीं है बल्कि बहुत मुश्किल है। तमाम गतिविधियाँ व्यावहारिक रूप से बाजारू या आभासी तौर पर प्राथमिक जनता की भाषा में होता हुआ दिखती तो हैं लेकिन वास्तविक अर्थ में गोमुखी या अग्रमुखी भाषा में होती हैं। नैतिक द्वंद्व! नैतिकता बची नहीं, बची तो खूँटी में बँधी बकरी की तरह दिखती है। नैतिकता नहीं तो क्या हुआ, कई अ-नैतिक द्वंद्व तो हैं न! खैर!
यह सब कहने के बाद बड़े दुस्साहस के साथ कहने की कोशिश करता हूँ कि मनुष्य की चेतना और उसके नैतिक द्वंद्व का संबंध संस्कृति के सक्रिय अंश से होता है। मैं समझता हूं कि संस्कृति की समझ बहुस्तरीय होती है। सांस्कृतिक संरचना के एक स्तर पर सक्रिय संस्कृति रहती है। किसी अन्य स्तर पर निष्क्रिय संस्कृति रहती है। किसी अन्य स्तर पर भेदभावपूर्ण सांप्रदायिक राजनीति के इस्तेमाल के लिए तैयार संस्कृति का मृत तत्व भी होता है।
संस्कृति के जीवंत और सक्रिय हिस्से का जनजीवन में बड़ा महत्व होता है। इसी महत्वपूर्ण संदर्भ में नैतिक द्वंद्व और नवाचार के प्रभाव को महसूस किया जा सकता है। संस्कृति की समझ (Cultural Competence) और संस्कृति में अंतर्निहित अनिवार्य मूल्यों के नैतिक द्वंद्व के जीवन से जुड़ाव के बारीक रेशों को बहुत धीरज के साथ समझना होगा। मनुष्य के किसी भी संदर्भ को गहराई से समझने के लिए नृवंशीय और नृवैज्ञानिक अध्ययनों को गंभीरता से देखना-दिखलाना ज़रूरी है। फिलहाल, यहां एल पी विद्यार्थी के नृवैज्ञानिक और नृवंशीय अध्ययनों, खासकर प्रकृति-मनुष्य-अध्यात्म (nature-man-spirit Complex) को देखा जाना चाहिए। प्रकृति-मनुष्य-अध्यात्म की जटिल संरचना को समझे बिना, मनुष्य को प्रकृति से काटकर सिर्फ सभ्यता और संस्कृति के संदर्भ में देखते हुए निकाले गये निष्कर्षों में बुनियादी ग़लती के होने की आशंकाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है।
संस्कृति के विकास में मिश्रण का महत्व है, इसे अंग्रेजी के शब्द कल्ट (Cult) और कल्चर (Culture) के सांस्कृतिक संदर्भ से समझा जा सकता है। लेकिन संस्कार शब्द पर ध्यान देने से यह बात समझ में आती है कि इस में मिश्रण से अधिक महत्वपूर्ण बहिष्करण है। महेश जी, एक बार फिर आपका ध्यान भाषायी-सांस्कृतिक निर्भरशीलता की ओर खींचना जरूरी है। संस्कृति की समझ (Cultural Competence) पर भी ध्यान देना ज़रूरी है।
क्या किसी समाज की बौद्धिक परिपक्वता इस बात से पहचानी जानी चाहिए कि वह अपने इतिहास के असुविधाजनक अध्यायों से कैसे संवाद करता है, न कि केवल अपने गौरवशाली अतीत से? भारत के संदर्भ में आपको क्या लगता है?
बिल्कुल सही कहा है आपने। बिल्कुल सहज-सरल बुद्धि से यह बात तुरंत समझ में आ जाती है। सुविधाजनक निष्कर्षों और आराध्यमूलक, वीर-पूजा की राजनीति के लिए पहले से तैयार निष्कर्षों को बगल में दबाये लोगों की कुटिल-क्रूर-सांप्रदायिक राजनीतिक बुद्धि की समझ में यह बात कभी नहीं आ सकती। फिलहाल, तो यही है कि भारत के जनजीवन के समग्र और भारत बोध के बहुलांश पर कुटिल-क्रूर-सांप्रदायिक राजनीतिक लोगों का प्रभाव चरम पर पहुँचकर अब उतार पर है। निरंतर जारी जनजीवन की विराटताओं की तुलना में अकेले-अकेले व्यक्तियों का जीवन और जीवन-अनुभव महत्वपूर्ण तो है लेकिन पूर्ण नहीं हो सकता है।
किसी समाज की, व्यक्ति की भी बौद्धिक परिपक्वता, कह लीजिए परिपक्व भविष्य-उन्मुखता का पता मुग्ध करनेवाली, आत्म मुग्ध करनेवाली सफलता के बखान से नहीं लगता है। बल्कि परिपक्वता की पहचान इस बात से की जानी चाहिए कि वह अपने इतिहास के असुविधाजनक अध्यायों, विफलताओं से संवाद करने के लिए यथार्थ दृष्टि का कितना और कैसे निवेश करता है। किसी व्यक्ति या राजनीतिक-सामाजिक-समूह की परिपक्वता का पता आत्म-मुग्धता में नहीं, निरंतर जारी आत्म-विरेचन और विश्लेषण की जीवंत प्रक्रिया से चलता है। अतीत के गौरवशाली होने का भाष्य अकर्मण्य लोगों का आभूषण होता है। भारत के संदर्भ में बहुत सारे लोग हैं जो इस मानसिकता में रहते हैं कि बाप मेरा घी खाया, हाथ मेरा सूंघ लो! आजकल ऐसे लोग एक खास किस्म की राजनीति में अधिक दिखते हैं!
अनुभव तो यही कहता है कि कई बार बातें बहुत प्रेमपूर्ण माहौल में होती है लेकिन नतीजा किसी काम का नहीं होता है, कभी-कभी तो बिल्कुल विपरीत भी होता है। महेश जी, उम्मीद करता हूँ कि यह बातचीत काम की भले ही न हो, लेकिन जीवन-मूल्यों के विपरीत नहीं होगी।
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गोमुखी
अग्रमुखी
अनुमुखी
कितना सटीक ऑब्जरवेशन है!
इस परसेप्शन से वाकिफ़ तो था लेकिन प्रफुल्ल कोलख्यान की तरह व्यक्त नहीं कर पा रहा था।
पूरी बातचीत समृद्ध करने वाली है।
*सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिय।*
इस बातचीत को कई बार पढूँगा।