प्रतिरोध, आत्मान्वेषण, पश्चाताप और समकालीन यथार्थ का काव्य-आख्यान / हर्ष पाठक


समकालीन साहित्य में कविता केवल सौंदर्यशास्त्रीय उपभोग की वस्तु न होकर अपने समय के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ, अधिनायकवादी रुझानों और मानवीय संवेदना के क्षरण के विरुद्ध एक सशक्त सांस्कृतिक प्रतिरोध का माध्यम है। इसी प्रगतिशील और जनवादी चेतना के संवर्धन हेतु जनवादी लेखक संघ (जलेस), इलाहाबाद इकाई द्वारा अपनी निरंतर चलने वाली विचार-शृंखला ‘घर गोष्ठी’ के अंतर्गत एक विशेष साहित्यिक संध्या का आयोजन किया गया। ‘काव्यपाठ एवं संवाद’ शीर्षक से आयोजित यह कार्यक्रम दिनांक 8 अगस्त 2026, शनिवार को सायं 5:00 बजे संपन्न हुआ।

आयोजन के दिन इलाहाबाद शहर की पृष्ठभूमि विशेष रूप से हलचल भरी थी। एक ओर जहाँ शहर के केपी ग्राउंड में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जी की विशाल राजनीतिक रैली आयोजित हो रही थी, जिसमें उन्होंने छात्रों के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था पर सरकार की निरंकुशता पर सवाल उठाए और जिस रैली के कारण पूरा प्रशासनिक व सामाजिक तंत्र राजनीतिक गहमागहमी में व्यस्त था, वहीं दूसरी ओर अग्निपथ अपार्टमेंट के आत्मीय परिसर में नगर के मूर्धन्य चिंतकों, आलोचकों, कवियों और जनवादी चेतना से प्रतिबद्ध बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में समकालीन काव्य-सरोकारों पर गंभीर मंथन चल रहा था। इस काव्य-संध्या के केंद्र-बिंदु देश के ख्यातिलब्ध वरिष्ठ पत्रकार, संपादक एवं प्रगतिशील कवि डॉ. सुभाष राय थे।

हिंदी साहित्य और समकालीन पत्रकारिता में डॉ. सुभाष राय की पहचान एक विचारशील, निर्भीक और जन-सरोकारों से जुड़े प्रबुद्ध रचनाकार की रही है। वे लंबे समय से प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र ‘जनसंदेश टाइम्स’ के प्रधान संपादक हैं तथा वर्तमान में लखनऊ में निवास करते हुए साहित्य की विभिन्न विधाओं—कविता, कहानी, व्यंग्य, निबंध और आलोचना में निरंतर सक्रिय हैं। उनका प्रसिद्ध काव्य-संग्रह ‘सलीब पर सच’ तथा समसामयिक अग्रलेखों का संग्रह ‘जाग मछंदर जाग’ समकालीन हिंदी साहित्य में विशेष रूप से विचारित और प्रशंसित रहा है।

घर–गोष्ठी में कवि सुभाष राय ने लगभग 25 कविताओं का पाठ किया। उनकी कविताओं का दायरा व्यक्तिगत पश्चाताप, पारिवारिक स्मृतियों के अंतरंग स्पर्श, व्यवस्था के शिकार आम जन की पीड़ा, पर्यावरण और मिट्टी की सर्वशक्तिमानता से लेकर आज के फासीवादी और युद्धोन्मादी समय के विरुद्ध सीधे राजनीतिक प्रतिरोध तक फैला हुआ है।

काव्यपाठ का शुभारंभ कवि ने ‘माफ़ी’ शीर्षक कविता से किया। यह कविता आधुनिक मध्यवर्गीय मनुष्य की उस नैतिक कायरता और आपराधिक तटस्थता को कटघरे में खड़ा करती है, जहाँ वह सड़क पर पड़े बीमार, भूखे आदमी, हवालात में घसीटे जा रहे सच बोलने वाले दोस्तों, और बाल मजदूरी करते बच्चों की चीख को अनदेखा कर बच निकलता है। अगली कविता ’झुकेंगे नहीं’ में कवि ने इस भागती अँधेरी दुनिया में उम्मीद की एक लौ जलाई है —

तुम चाहे जितना अँधेरा फैलाओ
जितना खून बहाओ
हम पेड़, फूल, नदी और पहाड़ की तरह
तुम्हारे रास्ते में खड़े, खिले रहेंगे
खिले रहेंगे, ठिठकेंगे नहीं, झुकेंगे नहीं।

इसके पश्चात कवि ने अपनी व्यक्तिगत स्मृतियों के क्षितिज को खोलते हुए ‘माँ से माफ़ी’ और ‘पिता से माफ़ी’ कविताएँ पढ़ीं। ‘माँ से माफ़ी’ में कवि ने माँ की अद्भुत मितव्ययिता—साबुन के बचे टुकड़ों और घी के खाली डिब्बों से भी जीवन की उपयोगिता निचोड़ लेने की क्षमता—के सामने अपनी अकर्मण्यता और दूरियों का अपराधबोध व्यक्त किया। वहीं ‘पिता से माफ़ी’ में एक ऐसे पिता का चित्र उभरा जिन्होंने जीवन भर छड़ी तक नहीं उठाई, बच्चों को आवारागर्दी करने दी, स्वयं को खेत में बोकर बच्चों के सपनों में ढाल दिया, और अंत समय में भी बेटे से कोई मदद नहीं माँगी। इसी कड़ी में ‘माँ’ कविता में कवि ने यह सार्वभौमिक सत्य स्थापित किया कि आँसुओं के अलावा प्रेम की कोई अन्य प्रामाणिक भाषा नहीं होती और जब मनुष्य के पास सारी चालाक भाषाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब वह माँ के सबसे निकट होता है।

सत्ता की बर्बरता, छद्म-राष्ट्रवाद और फासीवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध सुभाष राय की कविताएँ बेहद आक्रामक और प्रतिरोधी रुख अपनाती हैं। ‘आर्यावर्त आओ’ कविता में व्यंग्य की उल्टी शैली या यूं कहें आयरनी का प्रयोग करते हुए लोकतंत्र, सहिष्णुता, शांति और संविधान को देश से बाहर चले जाने का फरमान सुनाया गया है ताकि शास्त्रों और स्मृतियों के कायदे से चलने वाला पुराना ‘सतयुग’ वापस आ सके, जहाँ शंबूक फिर मारा जाए और स्त्रियाँ अग्निपरीक्षा दें। ‘तुम्हारे हाथ नहीं आएँगे’ तथा ‘पराजित हुआ’ कविताओं में कवि ने ऐतिहासिक विवेक को स्वर देते हुए कहा कि जिसके पास बंदूकें, तोपें, टैंक, मिसाइलें और छल-छद्म के चक्रव्यूह हैं, वे अंततः पराजित होते हैं और इतिहास में हमेशा निहत्थे जन ही विजयी हुए हैं। ‘लाठियाँ और तलवारें’ में पुरखों की हिंसक जीविका के बरक्स पिता की श्रम-संस्कृति को खड़ा करके यह सिद्ध किया गया कि तलवारों से सिलाई नहीं हो सकती और हिंसा अंततः अपना ही सीना चाक करती है।

प्रकृति के अनाम घटकों के प्रति आत्मीयता सुभाष राय की संवेदना का मुख्य आधार है। पाब्लो नेरुदा और उदय प्रकाश की काव्य-पंक्तियों से आंशिक रूप से प्रेरित कविता ‘कैसे कह दें’ में कवि कहता है कि जिस चिड़िया, जिस फूल और जिस पौधे का नाम हमें नहीं मालूम, वे भी हमारी ज़िंदगी को सुंदर बनाते हैं, इसलिए अनजान लोग भी हमारे अपने हैं। ‘नदी’ कविता में नदी के अप्रतिहत प्रवाह, अँधेरे में भी रास्ता बना लेने और पहाड़ की चिट्ठी समुद्र तक पहुँचाने के जिजीविषापूर्ण स्वभाव का वर्णन है। ‘मिट्टी की ताकत’ में मिट्टी को ही ईश्वर और परम सत्ता का दर्जा देते हुए यह दिखाया गया कि कैसे समय के साथ बड़े-बड़े महलों, किलों, राजमार्गों और मनुष्यों के अहंकार को मिट्टी अपने भीतर ढँक लेती है। ‘आजकल’ कविता में शहर के शोर, जलती बस्तियों और ढहते मकानों के बीच घटती संवेदना के प्रति बेचैनी और खुद को दफ़न करके सड़कों पर उतरने वाले पागलों जैसा हो जाने की अकुलाहट व्यक्त हुई है।

समकालीन जीवन के ब्यौरों को कविता में दर्ज करने की सुभाष राय की कला ‘यात्रा’ और ‘ट्रेन’ कविताओं में उरूज पर दिखती है। ‘यात्रा’ में यात्राओं के दौरान मिलने वाले बिछड़े दोस्तों के संशय, आँख चुराते बच्चों, असहाय अपाहिज लोगों और उनका अपमान करने वाली अंधी व्यवस्था का बारीक चित्रण है। ‘ट्रेन’ कविता पूरी रेलगाड़ी के एक डिब्बे को आधुनिक भारत की लघु-दुनिया बनाकर प्रस्तुत करती है—जहाँ दौड़ता बच्चा, फोन पर सौदेबाजी में उलझा ठेकेदार, कंप्यूटर खोले बिक चुका कॉर्पोरेट प्रोफेशनल, मोबाइल पर युद्ध की खबरें सुनकर महँगाई व एलपीजी से डरते यात्री और चंग बजाकर भीख माँगती बच्ची सब मिलकर एक पटरियों से उतरी हुई व्यवस्था का चित्र खींचते हैं। ‘सुरंगें’ कविता आज के नागरिक के भीतर व्याप्त उस डर का दस्तावेजीकरण करती है जहाँ स्वतंत्रता, जुलूस और विरोध सब सुरंगों में कैद हैं और ऊपर से बुलडोज़र चढ़ आए हैं। ‘बच्चों का दर्द’ में सरहदों और युद्ध से बेखबर बच्चों की मासूमियत को उकेरा गया है, जबकि ‘बिना पंख उड़ना’ में अफ़वाहों, झूठ, छर्रों, ज़हर और बिना पंख उड़ती मौत के ज़माने की भयावहता दर्ज है।

अपनी काव्य-यात्रा में सुभाष राय ने मुक्तछंद के साथ-साथ छंदबद्धता और लयात्मकता का भी अद्भुत संधान किया है। ‘जय महाकाल’ कविता में डमरू की ताल (डम डम डिम-डिम) पर रामराज्य के नाम पर फैलाए जा रहे उन्माद, बेरोजगारी, अंधविश्वास और पुलिस-अदालत की दमनकारी साँठगाँठ पर करारा राजनीतिक प्रहार किया गया है। ‘चल खुसरो बाहर निकल’ में अमीर खुसरो के छंद और दोहे की शैली में सत्ता के सामने असहाय जनता की लाचारी और संघर्ष को रूपायित किया गया है। ‘स्वप्न पर पहरे’ एक ग़ज़लनुमा ढर्रे की रचना है जो सपनों पर लगती पहरेदारी और गिरते पुलों के दौर को दर्ज करती है। ‘आधी रात का सूरज’ फैंटेसी की उस युक्ति का प्रयोग करती है जहाँ स्वप्न में कटे हुए सिर अपने धड़ों से जुड़ जाते हैं और छुरें फूलों में बदल जाते हैं। अंततः ‘रातों में’ और ‘तुम मनुष्य हो’ कविताओं में कवि व्यवस्था की नींद के बीच हुकूमतें पलटने का आह्वान करता है और मनुष्य से सारे हथियार, पहचान-पत्र और धर्मों की गठरी फेंककर सूर्य, नदियों, पहाड़ों और पूरी पृथ्वी की प्राकृतिक आराधना की ओर लौटने की अपील करता है।

काव्यपाठ के दौरान प्रस्तुत रचनाओं में से कुछ कविताओं ने अपनी तीखी राजनीतिक मारकता, भाषाई अनुशासन और संवेदनात्मक गहराई से उपस्थित प्रबुद्ध श्रोताओं को गहराई से आंदोलित किया। यहाँ ऐसी पाँच सर्वाधिक प्रभावशाली कविताओं की छोटी व्याख्या और उनके मूल काव्यांश उद्धृत किए जाने की आवश्यकता दिखाई पड़ती है।

1. आर्यावर्त आओ :

यह कविता समकालीन भारतीय राजनीति में सुनियोजित ढंग से छीने जा रहे लोकतांत्रिक अधिकारों, इतिहास के पुनरुत्थानवाद और संवैधानिक संस्थाओं के विघटन पर रचा गया एक बेहद मारक व्यंग्य है। कवि ने यहाँ सीधे शासक वर्ग की छद्म-भाषा को आत्मसात कर व्यंग्यात्मक लहज़े का सृजन किया है:

“आओ आर्यावर्त, तुम आओ। सहिष्णुता, तुम जाओ। चली जाओ! इस देश से हमने अपने पुरखों के उन सारे संदेशों को अपनी स्मृति से मिटा दिया है जिनमें तुम्हारा जिक्र था। उन सारी कथाओं को पाठ्यपुस्तकों से बाहर कर लिया है जिन्हें पढ़कर बच्चे तुमसे परिचित हो सकते थे। हमने तलवारों की भाषा ईजाद की है, हम चाहते हैं कि हमारी प्रजा इसकी धार को महसूस करे। समझे कि इससे उँगलियाँ ही नहीं, गले भी कट सकते हैं। उन सब का स्वागत है जो तलवारों के पक्ष में हैं।

लोकतंत्र, तुम जाओ। चले जाओ इस देश से! तुमने बहुत क्षति पहुँचाई है हमें। तुम्हारी वजह से बहुत सारे लोग बोलने लगे हैं, जिन्हें हमने सदियों तक बोलने नहीं दिया, जिनकी जबान काटी, जिनके कान में पिघलता सीसा भर दिया, जिन्हें बस्तियों से दूर रखा, जिन्हें घरों में कैद रखा, वे भी किताबें खोलकर बैठ गए। स्वाधीनता का उच्चारण सीख गए।

हमें नया देश बनाना है, जहाँ शास्त्रों का आदेश चलेगा। जहाँ स्मृतियों के कायदे-कानून होंगे, हम सत्ययुग की वापसी चाहते हैं। शंबूक जन्म लेगा तो फिर मारा जाएगा। स्त्रियों को अग्निपरीक्षा से गुज़रना होगा। बच्चों को स्कूल जाने की जरूरत नहीं, वे युद्धाभ्यास करें और लड़ने को तैयार रहें।

संविधान, तुम रहो… एक पवित्र मंत्र की तरह पूजाघर में। अगरबत्ती की गंध और फूलों से घिरे हुए, झूठ, गालियों और गलतियों से पुख्ता सुरक्षा कवच की तरह… तुणीर में बहुत सारे बाण हैं, फिर भी सुरक्षित जगह है तुम्हारे लिए, तुम भी एक अस्त्र में बदल जाओ…

शांति, जाओ। अहिंसा, जाओ। विश्राम करो पर्वत कंदराओं में… जाओ भारत, तुम भी जाओ। आओ आर्यावर्त, तुम आओ!”

2. जय महाकाल :

शास्त्रीय डमरू-ताल (डम डम डिम-डिम, रिमझिम रिमझिम) की गेय आवृति में ढली यह रचना धार्मिक पाखंड, कॉर्पोरेट-धर्म गठजोड़ और निर्मित किए जा रहे छद्म-उन्माद पर एक तीखा काव्यात्मक हमला है। गोष्ठी में इस कविता के छंदानुशासन और मारकता की विशेष सराहना हुई:

“जय महाकाल, जय महाकाल ! बोलो मिलकर जय महाकाल ! डम डम डिम-डिम, डम-डम डिम-डिम, यह राम राज्य की बड़ी मुहिम। लो मेघ भक्ति के बरस रहे, रिमझिम रिमझिम, रिमझिम रिमझिम।

भूखे हो कोई बात नहीं, लंबी हो जितनी रात सही, मत मचल अगर कुछ काम नहीं, बदलेगा कैसे भाग्य अगर जिह्वा पर शिव का नाम नहीं। प्यारे सारा दुख-दर्द भूल, ले हाथों में अपने त्रिशूल, माथे पर धर अब भस्म-धूल, धीरे-धीरे डमरू सँभाल, जय महाकाल, जय महाकाल !

डुबकी जा एक लगा ले तू, अपना सौभाग्य जगा ले तू, बाहर मंदिर के परिसर में छोटी दुकान सजा ले तू। अब रोज़गार की कमी कहाँ, जंगल से तोड़ धतूरा ला, कुछ बेच और कुछ खुद खा जा…

यह रात नहीं जाने पाए, चाहे अँधियारा पड़ जाए, अब यह कैसी लाचारी है? न्यायालय-पुलिस हमारी है, जनता पर चढ़ी खुमारी है, यह अवसर मत जाने देना। कुछ साम, दाम, कुछ दंड-भेद, सब रण में आजमाने देना… सिंहासन तक आने वाले रास्तों पर काँटे बोने दो, चिंता मत कर, बस बजा थाल, जय महाकाल, जय महाकाल !”

3. अकेलापन :

यह कविता मात्र व्यक्तिगत एकांत या अकेलापन का अनुभव नहीं है, बल्कि पूँजीवादी और हिंसक शक्तियों द्वारा समाज में किसी भी व्यक्ति या समूह को योजनाबद्ध तरीके से आइसोलेटेड करने के षड्यंत्र का समाजशास्त्रीय उद्घाटन है:

“मैं कुछ समय के लिए अकेला होना चाहता हूँ, पर हो नहीं पाता… मैं जब भी अकेला होता हूँ, अनजानी आवाजें, जिन्हें कभी सुना नहीं गया, मुझसे बतियाना चाहती हैं। किसी के रोने-चीखने की, देह में चाकुओं के उतरने की आवाजें। फंदें बहुत सारे झूलने लगते हैं दिमाग में, उनके पास उन गलों के सारे ब्यौरे हैं जिन पर वे कभी कसे गए, जिनका कहीं किसी एफआईआर में जिक्र नहीं हुआ। भूख अपना इतिहास सुनाना चाहती है, कोड़े बहुत थक गए हैं खुली पीठों पर गिरते-गिरते…

मैं इन सबसे बचना चाहता हूँ, बिल्कुल अकेला हो जाना चाहता हूँ। जब भी ऐसी कोशिश करता हूँ, मेरा अकेलापन ही करने लगता है मेरा पीछा। मैं घिर जाता हूँ अकेली कर दी गई आवाजों से, अकेले कर दिए गए इतिहास से, अकेले कर दिए गए दुःख से। मारने के पहले अकेली कर देने की रीति सदियों से चली आई है, अगर आप अकेले पड़ रहे हैं, तो समझ लीजिए कोई आपको मारने की तैयारी में है।”

4. माँ :

भाषा और मानवीय संबंधों की निकटता को अत्यंत सहज और मार्मिक ढंग से व्यक्त करती यह लघु कविता काव्य-संवेदना का अनुपम उदाहरण है:

“माँ जब बहुत खुश होती थी, रो पड़ती थी। जब बहुत दुखी होती थी, रो पड़ती थी। जब आशीष देना चाहती थी, रो पड़ती थी। जब डाँटना चाहती थी, रो पड़ती थी। आँसू के अलावा प्रेम की कोई और भाषा नहीं होती।

जब मेरे पास कोई भाषा नहीं थी, मैं माँ के पास था। जब मेरे पास भाषाएँ आई, मैं माँ से दूर होता गया। जब मेरे पास कोई भाषा नहीं होगी, मैं माँ के पास हूँगा।”

काव्यपाठ संपन्न होने के उपरांत जनवादी लेखक संघ के मंच से उपस्थित आलोचकों, शोधार्थियों और कवियों के बीच एक अत्यंत गंभीर और बहुआयामी परिचर्चा आयोजित की गई। कवि बसंत त्रिपाठी जी ने इस परिचर्चा के लिए उपस्थित विद्वतजन एवं छात्रों को अपने स्थान से ही स्वस्थ संवाद स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया। इस संवाद में कविता के रूप-विधान से लेकर इतिहास-लेखन में स्त्री-स्वर की उपेक्षा जैसे मौलिक प्रश्नों पर विचार हुआ।

गोष्ठी में पूजा द्वारा यह आलोचनात्मक प्रश्न उठाया गया कि सुभाष राय की ‘ट्रेन’ या ‘यात्रा’ जैसी कविताओं में ब्यौरों और विवरणों का बहुत अधिक विस्तार है, जिससे कभी-कभी कविता की संक्षिप्तता और सूक्ष्म काव्यात्मकता क्षीण होती प्रतीत होती है।

इस शंका के समाधान में स्वयं कवि सुभाष राय तथा अन्य वरिष्ठ आलोचकों ने विचार रखा कि आज का सामाजिक-राजनीतिक दबाव और यथार्थ इतना जटिल और फैला हुआ है कि आधुनिक कविता केवल सूक्ष्म इशारों में बात करके अपना दायित्व पूरा नहीं कर सकती। आज के विशाल जनसमूह को संबोधित करने के लिए विवरण अनिवार्य हो गए हैं। महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कालजयी रचनाओं—’सरोज स्मृति’ और ‘राम की शक्ति पूजा’—का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया गया कि निराला के यहाँ भी एक-एक छोटी घटना और स्थिति की बहुत गहरी विवरणात्मकता है, जो कविता को विस्तार और प्रामाणिकता देती है। ‘ट्रेन’ कविता में डिब्बे के भीतर दौड़ते बच्चे, सौदेबाज़ ठेकेदार, बिक चुके प्रोफेशनल्स और महँगाई से डरते आम यात्रियों का विवरणात्मक चित्रण उस वैश्विक महायुद्ध और सामाजिक पतन को मूर्त करने के लिए आवश्यक था। हालांकि कविता सुनते हुए मुझे जहां तक लगा कि सुभाष राय जी की कविताओं में घटनाओं का विवरण उनकी पृष्ठभूमि से आया है। वे लंबे समय से संपादन में सक्रिय हैं तो पत्रकारिता का प्रभाव लाज़मी है।

परिचर्चा में वरिष्ठ साहित्यकार श्रीप्रकाश मिश्र द्वारा ‘जय महाकाल’ और ‘चल खुसरो बाहर निकल’ कविताओं की छंदबद्धता, लय और गेयता की भूरी-भूरी प्रशंसा की गई। वक्ताओं ने कहा कि आज की अतुकांत और गद्यात्मक कविता के दौर में सुभाष राय द्वारा शास्त्रीय छंदों और लोक-लय (डमरू की डिम-डिम) का प्रयोग जन-कवि बाबा नागार्जुन की याद दिलाता है। नागार्जुन जिस तरह छंद के अनुशासन में रहकर बेहद आक्रामक राजनीतिक व्यंग्य रचते थे, ठीक उसी तरह सुभाष राय ने भी छंद का प्रयोग जनता की ज़बान पर सीधे चढ़ जाने वाले तीखे व्यंग्य के लिए किया है।

संवाद के दौरान एक मौलिक और गहन ऐतिहासिक प्रश्न केतन यादव द्वारा उभरा कि दक्षिण भारत (तमिल में अंडाल, कन्नड़ में अक्का महादेवी), कश्मीर (लल्लेद), बंगाल और महाराष्ट्र (जनाबाई) की समृद्ध परंपरा के विपरीत हिंदी भाषा की लगभग एक हज़ार साल की इतिहास-परंपरा में लंबे समय तक (विशेषकर छठी-सातवीं से ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के बीच) प्रमुख स्त्री-कवयित्रियाँ क्यों नदारद दिखाई देती हैं?

इस प्रश्न पर सुभाष राय और उपस्थित विद्वानों ने सामाजिक-ऐतिहासिक धरातल पर विस्तृत रोशनी डाली। वे सामाजिक मुक्ति और आंदोलनों की भूमिका के बारे में बताते हुए कहते हैं कि इतिहास गवाह है कि जब-जब देश में किसी बड़े क्रांतिकारी व्यक्तित्व या सामाजिक आंदोलन ने स्त्रियों, शूद्रों और दलितों को पाबंदियों से मुक्ति दी, तब-तब बड़ी संख्या में स्त्री और दलित कवि सामने आए। उदाहरण के लिए, कर्नाटक के बारहवीं सदी के वचन आंदोलन में बसवेश्वर के क्रांतिकारी विचार से प्रेरित होकर तीन सौ से अधिक शूद्र और स्त्री कवि उभरे। इसी प्रकार, दक्षिण के बारह आलवार संतों में सबसे प्रतिष्ठित संत नम्मालवार शूद्र थे और अंडाल एक अनाथ, अज्ञात जाति की स्त्री थीं, जिन्हें आलवार संत विष्णुचित्त (पेरियालवार) और स्वयं भगवान विष्णु ने बिना जाति पूछे स्वीकार किया। छठी से ग्यारहवीं शताब्दी के दौरान उत्तर भारत (हिंदी क्षेत्र) में कश्मीर से लेकर दक्षिण तक सीमाओं के विस्तार और वर्चस्व को लेकर भयानक युद्ध चल रहे थे। उत्तर भारत निरंतर विदेशी आक्रमणों और आंतरिक सैन्य संघर्षों से जूझ रहा था। इस भयग्रस्त, असुरक्षित और युद्धोन्मादी माहौल में स्त्रियों की रचनाशीलता अपने घरों के भीतर ही कैद होकर रह गई और बाहर नहीं आ सकी।

वक्ता और अन्य प्रबुद्ध जनों ने यह कड़वा सच उजागर किया कि अंडाल या मीरा जैसी महाद्वीपीय स्त्री संतों की क्रांतिकारी वैचारिकता को समाज ने ठीक से स्वीकार नहीं किया, बल्कि उन्हें मंदिरों में मूर्तियों की तरह बिठाकर उनके नाम पर पूजा-पाठ और व्रत शुरू कर दिए ताकि उनकी विद्रोही चेतना को निष्प्रभावी किया जा सके। इसके अतिरिक्त, आलोचक कृष्णदत्त पालीवाल के पद ‘मर्दवादी आलोचना’ का हवाला देते हुए कहा गया कि द्विवेदी युग के नैतिक आवरण और इतिहास-संकलनकर्ताओं की पुरुषवादी दृष्टि के कारण रीतिकाल व मुगल दरबार (जैसे जेब-उन-निसां या भारतेंदु काल की स्त्रियाँ) में लिख रही दर्जनों स्त्री-कवयित्रियों को मुख्यधारा के साहित्यिक इतिहास से छाँटकर बाहर कर दिया गया।

पत्रकारिता के लंबे अनुभव के कविता पर पड़ने वाले प्रभाव पर चर्चा करते हुए स्वीकार किया गया कि रोज़मर्रा की खबरों, घटनाओं और विषमताओं से लगातार गुजरने के कारण सुभाष राय की कविताओं में दृश्यात्मकता और समय की तल्खी गहराई से उतरी है।

परिचर्चा के दौरान कवि की एक पूर्व-चर्चित कविता ‘मेरा पता’ की तुलना प्रख्यात पंजाबी कवयित्री अमृता प्रीतम की इसी शीर्षक की कविता ‘मेरा पता’ से की गई, इस पर प्रकाश डालते हुए कुछ तुलनात्मक बातें हैं :

सुभाष राय की कविता समाज से गहरे लगाव का आख्यान है। उनका घर केवल मकान नंबर से नहीं बनता, बल्कि गोल चौराहा, बाएँ घूमती गली, घर की मेहरी (कामवाली), धोबी, सड़क और पुरखों की बनाई विरासत सब मिलकर उनका पता निर्धारित करते हैं। इसके विपरीत अमृता प्रीतम अपने मकान का नंबर, गली का नाम और सारे रास्ते मिटा देना चाहती हैं ताकि जो भी उनके घर तक पहुँचे, वह हर दरवाज़ा खटखटाकर अपनी आत्मा की पूर्ण स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में उनके पते को खोजे।

सचिन गुप्ता द्वारा कविता में कवि के अहिंसक विचारों को रेखांकित किया गया। लगभग सभी कविताओं के माध्यम से कवि गांधीवादी अहिंसा को प्रश्रय देना चाहते हैं। प्रियदर्शन मालवीय जी ने भी ‘जय महाकाल’ और ‘माँ’ कविता पर विस्तृत चर्चा करते हुए सुभाष राय जी के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला।

परिचर्चा में अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कवि हरीशचंद्र पाण्डेय जी द्वारा यह भी रेखांकित किया गया कि ‘आधी रात का सूरज’ जैसी कविताओं में प्रयुक्त फैंटेसी (जहाँ कटे सिर धड़ों से जुड़ जाते हैं और छुरें फूल बन जाते हैं) वास्तव में घोर हिंसक यथार्थ के बीच एक कवि द्वारा रची गई प्रति-संसार की मानवीय युक्ति है। इसके अलावा परिचर्चा में उनकी समसामयिक कविता ‘बच्चों आओ’ (जिसमें बच्चों के लिए रखा बारूद खत्म होने की बात है) का भी उल्लेख किया गया।

जनवादी लेखक संघ, प्रयागराज द्वारा आयोजित यह ‘काव्यपाठ एवं संवाद’ कार्यक्रम महज एक साहित्यिक औपचारिकता न होकर समकालीन कविता के प्रतिरोधी चरित्र, सामाजिक सरोकारों और ऐतिहासिक विवेक का एक जीवंत दस्तावेज़ बन गया। डॉ. सुभाष राय की कविताओं ने यह संदेश पूरी प्रखरता से दिया कि सत्ताएँ चाहे कितनी ही बर्बर, सशस्त्र और छद्म-उन्मादी क्यों न हो जाएँ, अंततः इतिहास में मनुष्यता, निष्छल प्रेम, मिट्टी की ताकत और निहत्थे जन ही विजयी होते हैं।

सफल एवं विचारोत्तेजक परिचर्चा के उपरांत आयोजक विवेक निराला तथा जनवादी लेखक संघ इलाहाबाद की कार्यकारिणी द्वारा उपस्थित सभी गणमान्य अतिथियों, आलोचकों और काव्य-प्रेमियों के प्रति बसंत त्रिपाठी जी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन और स्वागत वक्तव्य जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष (इलाहाबाद) विवेक निराला जी ने दिया। इस अवसर पर सूर्यनारायण, लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता, सीमा आज़ाद, विश्वविजय, विपुल प्रकर्ष, अनिता, शालू शुक्ला, महेंद्र प्रताप, सुनील त्रिपाठी, आशीष कुमार, प्रदीप्त प्रीत, शिवांगी गोयल, पूजा, रंजीत कुमार, अरविंद शर्मा, सचिन गुप्ता तथा अन्य प्रबुद्ध जन एवं छात्र–छात्राओं की अधिक संख्या में उपस्थिति रही।

हर्ष पाठक हिंदी में स्नातकोत्तर एवं वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोधरत हैं। मो० नं० : 9335883003

2 thoughts on “प्रतिरोध, आत्मान्वेषण, पश्चाताप और समकालीन यथार्थ का काव्य-आख्यान / हर्ष पाठक”

  1. बेहतरीन रिपोर्ट! जिसमें सृजनात्मकता का सौंदर्य भी विद्यमान है।
    धन्यवाद हर्ष पाठक जी। आप यूं ही कविताओं के साथ-साथ साहित्य की अन्य विधाओं में भी अपनी लेखनी निरंतर गतिशील बनाए रखें।……….

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  2. बहुत-बहुत अच्छा लगा घरेलू कवि गोष्ठी की रिपोर्ट पढ़कर। घर बचे हुए ‎हैं! घर बचे हुए हैं, तभी तो बचा है घरेलूपन और हो रही है — घरेलू ‎कवि गोष्ठी! कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी कोने-अंतरे में तानाशाह समय ‎की चीख-पुकार से बाहर होती है, अभी भी होती है कवि गोष्ठी! ‎
    जो हुआ हमारे समय में वह बहुत-बहुत अफसोसनाक और भयानक ‎हुआ। जीवन के अन्य प्रसंग अपनी जगह, साहित्य खासकर हिंदी ‎साहित्य और उस में भी कविता का साथ छूटता चला गया। ‎
    यह कैसे हुआ, यह क्योंकर हुआ! एक विधा के रूप में कविता के यथार्थ ‎और जीवन के स्वप्न का ताल-मेल बिगड़ गया! सवाल यह है कि क्या ‎समकालीन कविता दुख की घड़ी में मनुष्य के साथ खड़ी हो पाती है! ‎नहीं शायद इस तरह से कहा जा सकता है या कहा जाना चाहिए, कि ‎व्यक्ति अपने दुख की किसी घड़ी में समकालीन कविता के पास पहुंचने ‎की कोशिश करता है! ‎
    नहीं, नहीं-नहीं किसी पर दोषारोपण या दोष निरूपण नहीं। अपनी ‎आत्मा की तहकीकात करने की कोशिश में सवाल सामने खड़ा हो गया ‎है कि क्या फिर से कुछ किया जा सकता है! क्या लौटना होगा ‎समकालीन के पीछे! पीछे कहां तक! निराला तक! 1936 तक! कहां ‎तक? क्या पता! ‎
    सादर
    प्रफुल्ल कोलख्यान

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