देखने का अर्थ और अर्थ का देखना / डॉ. सुमन पाण्डेय


गुजरात लॉ सोसाइटी यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद की फैकल्टी ऑफ़ डिज़ाइन में असिस्टंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत सुमन पांडेय का यह लेख जॉन बर्जर की किताब और उसके हिंदी अनुवाद की अहमियत बताने के साथ-साथ उनके मुखपृष्ठ पर एक गंभीर टिप्पणी करता है। लेख का अत्यंत संक्षिप्त रूप इंडिया टुडे में प्रकाशित हो चुका है।

“Don’t judge the book by its cover”- यह कहावत हमें सिखाती है कि किसी पुस्तक या विचार का मूल्य केवल उसके बाहरी रूप से नहीं आँकना चाहिए। परंतु एक कला इतिहास की प्रोफेसर, आलोचक और सांस्कृतिक शोधकर्ता के रूप में मैं यह अनुभव करती हूँ कि कुछ पुस्तकें ऐसी होती हैं जिन्हें उनके कवर से ही पढ़ना आरंभ किया जा सकता है। जॉन बर्जर की Ways of Seeing ऐसी ही एक अनोखी कृति है, जो अपने कवर से ही अपने तर्कों और दृष्टिकोण की स्थापना करने लगती है।

Ways of Seeing 1972 में प्रकाशित हुई थी और यह आधुनिक कला आलोचना, दृश्य संस्कृति (visual culture) और सेमियोटिक अध्ययन की एक आधारभूत पुस्तक मानी जाती है। यह ग्रंथ बीबीसी की एक टेलीविज़न शृंखला पर आधारित है, जिसका उद्देश्य कला और दृश्य अनुभव को जनता के लिए आलोचनात्मक दृष्टि से समझाना था। बर्जर का तर्क था कि हम जो देखते हैं, वह हमारे ज्ञान, अनुभव और विचारधारा से गहराई से प्रभावित होता है, और कोई भी दृष्टि तटस्थ नहीं होती। सात निबंधों में विभाजित यह पुस्तक चित्रकला, नग्नता और स्त्री-दृष्टि, विज्ञापन और यांत्रिक पुनरुत्पादन के प्रभावों जैसे विषयों पर विमर्श करती है। इसने कला को केवल सौंदर्यात्मक अनुभव के बजाय एक सामाजिक और वैचारिक संरचना के रूप में देखने की परंपरा स्थापित की।

इस पुस्तक के आवरण पर शीर्षक के नीचे दो छोटे पैराग्राफ लिखे गए हैं, जिनमें बर्जर यह कहते हैं कि “Seeing comes before words” और “The relation between what we see and what we know is never settled” अर्थात् देखना शब्दों से पहले आता है, और देखने व जानने के बीच का संबंध कभी स्थिर नहीं होता। इन पंक्तियों के ठीक मध्य में रेने माग्रेट  की प्रसिद्ध पेंटिंग The Key of Dreams रखी गई है, जिसमें चित्र और शब्द के बीच जानबूझकर असंगति दिखाई गई है। यह चित्र स्वयं बर्जर के तर्क को दृश्य रूप में प्रमाणित करता है कि देखने और दिखाए जाने के बीच हमेशा एक दूरी, एक अस्थिरता, एक व्याख्यात्मक अंतराल मौजूद रहता है। इस प्रकार मूल अंग्रेज़ी कवर अपने दृश्य और शब्दों के संयोजन से अर्थ की अस्थिरता का ही प्रदर्शन करता है।

इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद देखने के तरीक़े  (राजकमल प्रकाशन, 2026) अनुवाद के स्तर पर अत्यंत सटीक है, किंतु उसके कवर डिज़ाइन में निहित सांस्कृतिक प्रतीक बर्जर के मूल तर्क — अर्थ की अस्थिरता — को स्थिरता और गौरव के रूप में पुनर्लेखित कर देते हैं। यही दृश्यात्मक और वैचारिक अंतर इस लेख के विश्लेषण का केंद्र है।

माग्रेट की पेंटिंग और बर्जर की सेमियोटिक दृष्टि

रेने माग्रेट की पेंटिंग The Key of Dreams (1930) बर्जर की Ways of Seeing के कवर पर मात्र सजावट के लिए नहीं रखी गई, बल्कि यह चित्र स्वयं पुस्तक की दार्शनिक चेतना और सेमियोटिक तर्क का दृश्य रूप है। इस पेंटिंग में कलाकार ने चार परिचित वस्तुएँ चित्रित की हैं : एक घोड़ा, एक दीवार घड़ी, एक जग (jug) और एक सूटकेस (valise)। परंतु इन वस्तुओं के नीचे दिए गए शब्द उन वस्तुओं से मेल नहीं खाते — घोड़े के नीचे “The Door”, घड़ी के नीचे “The Mind”, घड़े के नीचे “The Bird”, और केवल सूटकेस के नीचे “The Valise” जो वस्तु और शब्द का एकमात्र संगत संबंध है।

यह चित्र, देखनेवाले को तुरंत एक संज्ञानात्मक अस्थिरता (cognitive dissonance) की स्थिति में डाल देता है
क्योंकि उसकी दृष्टि जो देखती है, वह उसके ज्ञान से मेल नहीं खाती।हम बचपन से यह सीखते हैं कि हर वस्तु का एक निश्चित नाम और अर्थ होता है; पर माग्रेट की यह पेंटिंग उस स्थिरता को तोड़ देती है। वह हमें दिखाती है कि चित्र (image) और शब्द (word) के बीच का संबंध प्राकृतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और विचारधारात्मक है। यही बिंदु जॉन बर्जर की Ways of Seeing का मूल तर्क भी है। इस प्रकार, हम जो “देखते” हैं, वह वस्तुनिष्ठ नहीं, बल्कि एक निर्मित अनुभव (constructed experience) है। माग्रेट की पेंटिंग इस दर्शन को दृश्य रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ वस्तुएँ (दृश्य संकेत) और उनके सूचक शब्द (भाषिक संकेत) एक-दूसरे से असंगत रहकर दर्शक को यह एहसास कराते हैं कि अर्थ किसी वस्तु में अंतर्निहित नहीं होता, बल्कि वह देखने वाले के ज्ञान, भाषा, और संदर्भ से निर्मित होता है। यह पेंटिंग एक प्रकार की सेमियोटिक चेतना विकसित करती है, जो कहती है कि हर “संकेत” (sign) — चाहे वह चित्र हो या शब्द — अपने अर्थ में स्वायत्त नहीं, बल्कि संरचनात्मक रूप से व्याख्यात्मक है। बर्जर इसी चेतना को Ways of Seeing के माध्यम से दृश्य संस्कृति, कला इतिहास, और विज्ञापन जगत तक विस्तार देते हैं। इस प्रकार, The Key of Dreams केवल एक कलात्मक चयन नहीं, बल्कि बर्जर के विमर्श का प्रारंभिक सेमियोटिक साक्ष्य है। यह पाठक को आरंभ में ही यह चेतावनी देता है कि जिस “देखने” की प्रक्रिया को वह स्वाभाविक मानता है, वह वास्तव में विचारधारात्मक रूप से अनुकूलित (ideologically conditioned) है। यही कारण है कि बर्जर की पुस्तक का कवर केवल दृश्य सजावट नहीं, बल्कि पुस्तक के दार्शनिक तर्क का पहला दृश्य रूप है, जो यह दर्शाता है कि अर्थ स्थिर नहीं, बल्कि निर्मित और विवादित है।

 

हिंदी अनुवाद देखने के तरीके का कवर: दृश्य स्थिरता और सांस्कृतिक पुनर्लेखन

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित Ways of Seeing का हिंदी अनुवाद देखने के तरीक़े भाषा के स्तर पर निष्ठापूर्वक अनुवादित है; किन्तु उसका कवर डिज़ाइन मूल ग्रंथ की वैचारिक दृष्टि से एक भिन्न सांस्कृतिक और दृश्य संसार रचता है। मूल पुस्तक के कवर पर जहाँ रेने माग्रेट की पेंटिंग The Key of Dreams देखने और जानने के बीच के अस्थिर संबंध को उद्घाटित करती है, वहीं हिंदी अनुवाद का कवर इस अस्थिरता को स्थिर सांस्कृतिक प्रतीकों में रूपांतरित कर देता है।

इस कवर पर चार प्रमुख छवियाँ रखी गई हैं —

  1. हड़प्पाकालीन त्रिफुलिया संत, मूर्ति    – जो भारतीय सभ्यता की प्राचीनता और निरंतरता का प्रतीक है;
  2. चोलकालीन पार्वती की कांस्य प्रतिमा – दक्षिण भारतीय शिल्प परंपरा और भक्ति-सौंदर्यशास्त्र का प्रतिनिधि;
  3. गंधार कालीन बुद्ध मूर्ति – भारतीय दर्शन और यूनानी प्रभाव के सम्मिलन का प्रतीक;
  4. सारनाथ का अशोक स्तंभ – शक्ति, नीति और धर्म के प्रसार का चिह्न।

ये सभी प्रतीक भारतीय कला और संस्कृति के गौरवशाली इतिहास को अभिव्यक्त करते हैं। परंतु जब इन्हें Ways of Seeing के कवर पर रखा जाता है और यह बर्जर की मूल दृष्टि — अर्थ की अस्थिरता और दृष्टि की आलोचनात्मक चेतना — को एक स्थिर सांस्कृतिक दावे (cultural assertion) में परिवर्तित कर देते हैं। जहाँ माग्रेट की पेंटिंग पाठक से प्रश्न पूछती है: “क्या तुम जिस अर्थ को देख रहे हो, वह स्थायी है?”, वहीं हिंदी कवर का दृश्य मानो कहता है: “हम जो देखते हैं, वह हमारी सांस्कृतिक पहचान से निर्मित है, और उसका अर्थ हमारी परंपरा में निहित है।”

यह परिवर्तन सूक्ष्म होते हुए भी गहरा है क्योंकि यह देखने की प्रक्रिया को आलोचनात्मक अभ्यास (critical act) से हटाकर सांस्कृतिक स्वीकृति (cultural affirmation) में बदल देता है। अब देखने का अर्थ है अपनी जड़ों, परंपराओं और प्रतीकों को पहचानना; जबकि बर्जर का उद्देश्य था उन जड़ों और प्रतीकों के पीछे की विचारधारा और सत्ता-संरचना को प्रश्नांकित करना। इस प्रकार, हिंदी कवर में प्रतीकों का यह चयन एक प्रकार का दृश्य पुनर्लेखन (visual rewriting) बन जाता है जहाँ मूल विचार की अस्थिरता को एक स्थिर सांस्कृतिक व्याख्या से प्रतिस्थापित किया गया है। यह दृश्यात्मक पुनर्पाठ पाठक को बर्जर की आलोचनात्मक चेतना से थोड़ा दूर ले जाकर एक आत्मगौरवपूर्ण सांस्कृतिक दृष्टि के निकट पहुँचा देता है। यह कवर Berger की आलोचनात्मक दृष्टि को एक सांस्कृतिक पहचान और विरासत के उत्सव में बदल देता है  जहाँ अर्थ का निर्माण अब प्रश्न नहीं, बल्कि घोषणा बन जाता है।

यह परिवर्तन यह भी संकेत देता है कि अनुवाद केवल भाषा का रूपांतरण नहीं, बल्कि दृष्टि और विचार का भी पुनर्निर्माण है। क्योंकि दृश्य प्रतीक विशेषकर पुस्तक के कवर जैसे प्रमुख स्थल पाठक की अपेक्षाओं, पूर्वधारणाओं और अर्थ-निर्माण की दिशा को गहराई से प्रभावित करते हैं।

अतः देखने के तरीक़े का कवर बर्जर की “अर्थ की अस्थिरता” वाली दृष्टि को “अर्थ की सांस्कृतिक स्थिरता” में रूपांतरित कर देता है, और यह रूपांतरण केवल दृश्य नहीं, बल्कि वैचारिक भी है।

यद्यपि इस लेख में मैंने ‘देखने के तरीक़े’ के कवर की दृश्यात्मक व्याख्या की आलोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की है, किन्तु यह स्वीकार करना आवश्यक है कि राजकमल प्रकाशन द्वारा सामने लाया गया यह हिंदी अनुवाद अत्यंत सटीक, सारगर्भित और भावपूर्ण है। इस अनुवाद ने बर्जर की गहन विचारधारा और जटिल दार्शनिक विमर्श को हिंदी पाठकों के लिए सुलभ, सुबोध और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत किया है।

बर्जर की Ways of Seeing केवल कला की पुस्तक नहीं, बल्कि देखने, समझने और अर्थ-निर्माण की पूरी प्रक्रिया पर एक गहन विमर्श है। यह पुस्तक बताती है कि हर दृश्य चाहे वह चित्रकला हो, मूर्तिकला, विज्ञापन या मीडिया,
हमारी दृष्टि को प्रभावित करता है और उसके पीछे सत्ता, संस्कृति और विचारधारा सक्रिय होती है।

अतः ‘देखने के तरीक़े’ हर उस विद्यार्थी और पाठक के लिए अनिवार्य पाठ है जो कला, डिज़ाइन, दृश्य संस्कृति, संचार और विचार की दुनिया को केवल आँखों से नहीं, चेतना से देखना चाहता है। यह पुस्तक हमें अपने देखने के तरीक़ों पर पुनर्विचार करने और दृश्य संसार की गहराइयों को समझने का अवसर देती है।

suman.fineart@gmail.com


5 thoughts on “देखने का अर्थ और अर्थ का देखना / डॉ. सुमन पाण्डेय”

  1. इस पुस्तक के आवरण पर एक अत्यन्त जरुरी टिप्पणी । प्रकाशित करने के लिए नया पथ का आभार !

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  2. *”जहाँ माग्रेट की पेंटिंग पाठक से प्रश्न पूछती है: “क्या तुम जिस अर्थ को देख रहे हो, वह स्थायी है?”, वहीं हिंदी कवर का दृश्य मानो कहता है: “हम जो देखते हैं, वह हमारी सांस्कृतिक पहचान से निर्मित है, और उसका अर्थ हमारी परंपरा में निहित है।”*

    सुमन पाण्डेय का यह विश्लेषण हमें देखने के प्रति, अर्थ ग्रहण के तरीकों के प्रति जागरूक बनाता है ।
    सुमन जी ने उचित ही अनुवाद की गुणवत्ता की प्रशंसा की है । मेरा निवेदन है कि गूगल अनुवाद के इस युग में बर्जर की किताब हिंदी के एक बेहतरीन कवि – आलोचक आशीष मिश्र द्वारा अनूदित हुई है। सुमन जी को अनुवादक का नाम लेकर तारीफ़ करनी चाहिए।

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