नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा (2024) का पुनर्पाठ
एक संग्रह के बहाने केशव तिवारी के समूचे काव्य-संसार पर विहंगम दृष्टि डालनेवाले राकेश कुमार मिश्र लम्बे समय से रंगमंच, साहित्य और अनुवाद की दुनिया में सक्रिय हैं। संप्रति गुजरात के एक कॉलेज में अंग्रेजी के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

आरंभ : काव्य-भाषा की साधना और एक दीर्घ आत्मीयता
हिंदी के प्रतिष्ठित कवि केशव तिवारी जी से मेरा संवाद भले ही हाल के समय में आरंभ हुआ हो, किंतु उनकी कविताओं के साथ मेरा पाठकीय रिश्ता वर्षों पुराना और आत्मीय है। लंबे समय से उन्हें पढ़ते हुए यह अनुभव लगातार गहराता गया है कि उन्होंने हिंदी कविता में एक ऐसी विशिष्ट काव्य-भाषा अर्जित की है, जो आकस्मिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सतत साधना, वैचारिक अनुशासन, गहरे आत्ममंथन और अनुभव की कठोर तपस्या का परिणाम है। उनकी भाषा में जो संयम है, वह केवल शैलीगत गुण नहीं; वह जीवन-दृष्टि का विस्तार है। उनके शब्दों में जो धीरज है, वह उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता से उपजता है। तीन दशकों से अधिक लंबी उनकी काव्य-यात्रा में भाषा, अनुभव और दृष्टि का जो त्रिवेणी-संगम दिखाई देता है, वह आज की नई पीढ़ी के लिए एक चुनौती की तरह उपस्थित है—एक ऐसा मानदंड, जिसे प्राप्त करना आसान नहीं, और जिसकी ओर बढ़ना भी निरंतर साधना की मांग करता है।
संग्रह का स्वरूप : समय, समाज और लोक-चेतना का सघन दस्तावेज़
फ़रवरी 2024 में हिंदी युग्म द्वारा प्रकाशित उनका चौथा कविता-संग्रह ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’ समकालीन हिंदी कविता की परंपरा में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जाना चाहिए। यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन भर नहीं है; यह हमारे समय, समाज और लोक-चेतना का एक सघन काव्यात्मक दस्तावेज़ है। विषय-वस्तु की विविधता के साथ-साथ काव्य-भाषा की परिपक्वता, बिंबों की गहनता, भाव-संयम की अनुशासित संरचना और संवेदना की सघनता—इन सबका ऐसा संतुलित संयोजन विरले ही देखने को मिलता है। इन कविताओं में लोक का धड़कता हुआ जीवन है, समय की विडंबनाएँ हैं, व्यक्ति के भीतर चल रहे अंतर्द्वंद्व हैं, और समकालीन समाज की जटिल परतें हैं। पाठक इन कविताओं को सरसरी निगाह से पढ़कर आगे नहीं बढ़ सकता; उसे ठहरना पड़ता है, रुककर सोचना पड़ता है, और बार-बार लौटकर उन पंक्तियों के भीतर छिपे अर्थ-संसार को टटोलना पड़ता है। इस संग्रह की विशेषता यह है कि इसमें विषय-वस्तु की विविधता और भाषा की परिपक्वता एक संतुलित रूप में उपस्थित हैं। बिंबों की गहनता, भाव-संयम की अनुशासित संरचना और संवेदना की सघनता—ये सब मिलकर ऐसी कविता का निर्माण करते हैं, जिसे सरसरी तौर पर पढ़ना संभव नहीं। यह कविता पाठक से रुकने, ठहरने, सोचने और बार-बार लौटकर पढ़ने की मांग करती है। प्रत्येक पुनर्पाठ में अर्थ की नई परतें खुलती हैं; यही उसकी जीवंतता है।
‘पास’ को ‘दूर’ से न देखने की नैतिकता
केशव तिवारी जी को पढ़ते हुए हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि, उपन्यासकार और संपादक अविनाश मिश्र की चर्चित किताब नवाँ दशक : नवें दशक की हिंदी कविता पर एकाग्र (2024) का स्मरण सहज ही हो आता है। अविनाश मिश्र ने जिस सूक्ष्मता से समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य को परखा है, उसी संदर्भ में उन्होंने केशव तिवारी के बारे में जो टिप्पणी की है, वह उनकी काव्य-दृष्टि की गहराई को रेखांकित करती है—कि कवि केशव, “अपने काव्य-विषयों के सर्वाधिक निकट रहने वाले कवियों में से हैं; वे ‘पास’ को ‘दूर’ से देखकर निकल जाने की सुविधा नहीं चुनते।” यह कथन केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि उनकी कविता के स्वभाव का सटीक विश्लेषण है। केशव तिवारी की कविता अनुभव से भागती नहीं, बल्कि अनुभव के बीचोंबीच खड़ी होकर संवाद करती है। वह जीवन की जटिलताओं को बाहर से नहीं देखती, उन्हें भीतर से जीती है। केशव की कविता अनुभव से भागती नहीं; वह उसके बीच खड़ी होकर संवाद करती है। वह जीवन की जटिलताओं को बाहरी दृष्टा की तरह नहीं देखती, बल्कि उन्हें भीतर से जीती है। इसलिए उनकी कविता में यथार्थ का ताप है, केवल विवरण नहीं।
लोक-भाषा, प्रतिरोध और नैतिक स्पष्टता
यदि कोई पाठक लोक-जीवन के द्वंद्व, पीड़ा, स्मृतियों और जिजीविषा को व्यापक सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहता है, तो इस संग्रह तक पहुँचना अनिवार्य है। ‘नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा’ केवल शीर्षक की दृष्टि से ही मार्मिक और अर्थपूर्ण नहीं है; यह प्रतीकात्मक स्तर पर भी बहुत कुछ कहता है—नदी का मर्सिया वही गा सकता है, जो स्वयं पानी हो, जो भीतर से उस वेदना और प्रवाह को जानता हो। इसी तरह केशव तिवारी की कविताएँ भी भीतर से उपजी हुई आवाज़ें हैं; वे बाहरी शोर नहीं, भीतर की प्रतिध्वनियाँ हैं।
समकालीन हिंदी कविता में ऐसे कवि बहुत कम हैं, जो सच को बिना किसी लाग-लपेट के सच कह सकें और झूठ को स्पष्ट रूप से झूठ। केशव तिवारी की कविता इस नैतिक साहस की मिसाल है। उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभूति होती है कि कविता उनके लिए केवल कलात्मक कौशल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मानवीय सरोकारों से गहरे स्तर पर जुड़ी हुई रचनात्मक जिम्मेदारी है। पिछले तीन दशकों में वे अनेक जनवादी मोर्चों पर सक्रिय रहे हैं, और इस सामाजिक सक्रियता का ताप उनकी कविताओं में साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकता है। अवध की धरती का अनुभव, उसकी मिट्टी की गंध, वहाँ के सामाजिक-आर्थिक बदलावों की आंच—ये सब उनकी कविता में केवल पृष्ठभूमि के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत तत्व के रूप में उपस्थित हैं। अवध क्षेत्र में पिछले दशकों में आए आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों को समझने के लिए उनकी चर्चित कविता ‘अवधी में’ विशेष रूप से प्रासंगिक है। एक पाठक के तौर पर मैं चाहता हूँ आप इस कविता के साथ कुछ देर रहें।
एक हत्यारे ने पूछा अवधी में –
का हाल चाल बा
एक ठग ने पूछा भैया—
बहुत दिन मा देख्याना
एक हारे प्रधान ने की शिकायत—
तोहरे घरे कै वोट नाही मिला
लगा तिरलोचन और मान ही नहीं
अवधी में इनका भी कारोबार चलता है
यह कविता केवल भाषा या लोक का उत्सव नहीं, बल्कि बदलते समय की विडंबनाओं और विसंगतियों का साक्ष्य भी है। केशव तिवारी लोक-भाषा को केवल सांस्कृतिक विरासत के रूप में नहीं देखते; वे उसे प्रतिरोध और संवाद की सशक्त जमीन के रूप में ग्रहण करते हैं। उनके लिए कविता शब्दों की बाजीगरी या भाषिक चातुर्य का खेल नहीं है। वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि कविता में अनावश्यक शोर, आत्म-प्रदर्शन या चतुराई का कोई स्थान नहीं। उनके लिए कविता जीवन का केंद्रीय उद्देश्य है—एक नैतिक और रचनात्मक प्रतिबद्धता। वे उस ‘चतुर’ कवि-भाव से दूर रहते हैं, जो शब्दों के आडंबर से पाठक को चकाचौंध तो कर सकता है, पर जीवन की सच्चाइयों से उसका सामना नहीं कराता। उनके यहाँ कविता सर्वप्रथम है—जीवन की हर परिस्थिति में, हर उतार-चढ़ाव में। जैसा कि केशव जी अपनी एक चर्चित कविता में कहते हैं:
चतुर कवि तो गाल बजाएगा
नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा
यही कारण है कि उनकी कविताओं में ईमानदारी की एक ठोस जमीन दिखाई देती है। वे जीवन के सुख-दु:ख, विफलताओं, संघर्षों और उम्मीदों को कविता के माध्यम से जीने और भोगने के लिए तैयार रहते हैं। ‘दु:ख आएगा’ जैसी कविता इस बात का संकेत देती है कि वे दु:ख से डरते नहीं, उसे जीवन का अनिवार्य सत्य मानकर स्वीकार करते हैं। इस कविता को देखें :
खड़े खेत में
मस्त साँड-सा कुदराएगा
दु:ख आएगा
साफी बाँधे लटठ लिए
हम भी मिलेंगे खुल्ले में
चौड़े से
बिना इसके
कोई तर्क
न काम आएगा
दु:ख आएगा
पर
उल्टे पाँव लौट जाएगा
नब्बे के दशक के बाद जिस तरह बाजारवाद ने समाज के हर क्षेत्र को अपनी चपेट में लिया है, उसकी आहट भी उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से दर्ज़ है। उनके चौथे कविता संग्रह में शामिल ‘डोर टू डोर सामान बेचती लड़कियाँ’ और ‘चित्रकूट की देवांगना घाटी पर खुल रहा है हवाई अड्डा’ जैसी कविताएँ बाज़ार के विस्तार, स्त्री-जीवन की विडंबनाओं और बदलते सामाजिक परिदृश्य की गहरी पड़ताल करती हैं। वे केवल वर्णन नहीं करतीं, बल्कि उस अंतर्ध्वनि को पकड़ती हैं, जो बाजार और मनुष्य के बीच के तनाव से उत्पन्न होती है।
इस प्रकार, केशव तिवारी की कविता समकालीन हिंदी साहित्य में एक नैतिक और सौंदर्यात्मक मानदंड की तरह उपस्थित है। वह हमें यह याद दिलाती है कि कविता केवल शब्दों का शिल्प नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं के साथ एक गंभीर और ईमानदार मुठभेड़ है। उनके यहाँ कविता समय की साक्षी भी है, प्रतिरोध की भाषा भी, और मनुष्य की गरिमा की रक्षा का साधन भी।
नव-सामंतवाद, बाज़ार और भाषा पर संकट
इस पुस्तक की कविताओं को गहराई से पढ़ते हुए केशव तिवारी की संपूर्ण काव्य-यात्रा का क्रमिक विस्तार और उसका ऊर्ध्वगामी विकास स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उनके प्रथम संग्रह से लेकर इस नवीनतम कृति तक की यात्रा केवल समय का अंतराल नहीं है; यह एक रचनात्मक परिपक्वता, वैचारिक गहराई और भाषिक प्रांजलता की सतत साधना का परिणाम है। आरंभिक कविताओं में जो संवेदनात्मक ऊर्जा थी, वह यहाँ आकर एक सुविचारित, संयत और विश्लेषणात्मक दृष्टि में रूपांतरित हो गई है। यह परिष्कार मात्र शैलीगत नहीं है; यह समय की जटिलताओं को अधिक निर्भीकता, अधिक जिम्मेदारी और अधिक स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त करने की क्षमता में परिवर्तित हुआ है।
उनकी लोक-दृष्टि विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह लोक-दृष्टि किसी रोमानी भावुकता से संचालित नहीं होती; यह लोक-जीवन की अंतर्विरोधी संरचनाओं, उसकी जड़ताओं और उसमें व्याप्त संक्रमित मानसिकताओं को परत-दर-परत उघाड़ती है। केशव उन सूक्ष्म प्रक्रियाओं को पहचानते हैं जिनके माध्यम से नव-सामंतवादी वर्चस्व आज की सामाजिक संरचना में पुनर्स्थापित हो रहा है। उनकी कविताओं में यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि यह नव-सामंतवाद कोई एकाकी या पृथक सत्ता नहीं है; उसकी जड़ें नव-पूंजीवाद, नव-साम्राज्यवाद और नव-उदारवाद के सम्मिलित तंत्र से पोषित होती हैं। यही वह जटिल गठजोड़ है, जिसने आज के समय में विश्व को एक विराट बाजार में रूपांतरित कर दिया है—ऐसा बाजार, जो केवल वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि मनुष्य, संस्कृति, भाषा और स्मृतियों का भी उपभोग करता है।
जहाँ आधुनिकता की परियोजना अपनी समावेशी और आलोचनात्मक संभावनाओं के साथ सफल नहीं हो सकी, वहाँ नव-सामंतवाद ने अवसर पाकर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। आधुनिकता की असफलताओं और विसंगतियों के बीच उसने अपनी पैठ बनाई है और अब वह समाज की संरचना में पचखियाँ फेंक रहा है—छद्म नैतिकताओं, सांस्कृतिक प्रतीकों और धार्मिक आवरणों के माध्यम से। केशव की नई पुस्तक में समय-संगत पूंजी और बाजार के उन शातिर औजारों की गहरी पड़ताल की गई है, जिनसे जघन्य लूट की प्रक्रियाएँ संचालित हो रही हैं। हिंदी कविता में बाजार की इस आक्रामकता और उसकी चालाकी को इतनी पैनी दृष्टि से देखना विरल है।
आज संकट केवल भाषिक शिल्प का नहीं है; भाषा की देह पर भी खतरे के स्पष्ट निशान दिखाई दे रहे हैं। भाषा की संरचना, उसके अर्थ-ग्रहण की पद्धति, उसकी संवेदनात्मक क्षमता—सब कुछ योजनाबद्ध आक्रमणों से प्रभावित हो रहा है। यदि कविता भाषा की सर्वोच्च विश्वसनीयता का माध्यम है, तो भाषा की तासीर को बचाए रखना भी कविता का नैतिक दायित्व है। केशव तिवारी इस दायित्व को गंभीरता से ग्रहण करते हैं। वे भाषा पर हो रहे प्रायोजित हमलों को पहचानते हैं और अपनी कविता के माध्यम से उस भाषा-समुदाय को सचेत करते हैं, जो अनजाने में इन आक्रमणों का शिकार बन सकता है।
नव-सामंतवादी साजिशें जिन केंद्रों से संचालित हो रही हैं, उन पर प्रहार करना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी है लोक-रुचियों का प्रांजल परिष्कार। क्योंकि यदि लोक-रुचियाँ ही संक्रमित हो जाएँ, यदि भाषा की अंत:प्रकृति ही भिंजर जाए, तो फिर लोक-लुटेरों से संघर्ष किसके लिए और किस आधार पर किया जाएगा? आज लुटेरों की निगाह “संघनित लोक” पर है—ऐसा लोक, जिसे बाजार कच्चे माल की तरह देखता है और साथ ही उसे उत्पादों के उपभोक्ता में रूपांतरित कर देना चाहता है। यह मनुष्य की अंतिम संसाधनिक शक्ति है—उसकी श्रम-शक्ति, उसकी क्रय-शक्ति और उसकी सांस्कृतिक चेतना। यदि यह भी संक्रमित हो जाए, तो व्यापार के लिए कुछ भी शेष नहीं बचेगा।
केशव जी की काव्य-यात्रा को यदि एक सूत्र में बाँधकर देखना हो, तो कहा जा सकता है कि उनकी रचनाशीलता ध्वनियों, बिंबों और भाषागत शिल्प की निरंतर ऊर्ध्वगामी प्रक्रिया है। यह विकास आकस्मिक नहीं है; यह एक लंबी रचनात्मक परंपरा का परिणाम है। विशेषतः उनकी अवधी और अवध पर केंद्रित कविताएँ इस यात्रा की दिशा को स्पष्ट करती हैं। वहाँ लोक-संस्कृति का उत्सव नहीं, बल्कि उसका आलोचनात्मक पुनर्पाठ है; वहाँ भाषा का प्रयोग मात्र सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप के लिए है।
अंतः कहा जा सकता है कि केशव की कविता केवल सौंदर्यबोध का विस्तार नहीं, बल्कि समय की आलोचनात्मक चेतना का सशक्त दस्तावेज़ है। वह हमें सचेत करती है, भाषा की रक्षा का आग्रह करती है, लोक-चेतना को परिष्कृत करने की आवश्यकता बताती है और नव-सामंतवादी-पूंजीवादी गठजोड़ के विरुद्ध एक वैचारिक प्रतिरोध का स्वर निर्मित करती है। उनकी काव्य-यात्रा निरंतर ऊर्ध्वगामी है—संवेदना में, विचार में, भाषा में और नैतिक साहस में।
खेत, फसल और श्रम का विमर्श
केशव तिवारी जी की कविताओं में खेत-खलिहान से जुड़े कई दृश्य हैं। यहाँ ‘खेत’ मात्र भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि स्वामित्व, श्रम, उत्पादन और अधिकार की जटिल संरचना का प्रतीक है; और ‘फसलें’ केवल कृषि-उत्पाद नहीं, बल्कि श्रम के मूर्त परिणाम, जीवन-निर्वाह के साधन और मनुष्य की आशाओं का दृश्य रूप हैं। हिंदी के युवा कवि और अवधी भाषा के गंभीर अध्येता शैलेन्द्र कुमार शुक्ल ने ‘समालोचन’ के अपने लेख में कवि केशव के काव्य-संसार का गहन विश्लेषण करते हुए ‘खेत’ और ‘फसल’ के अंतर के बारे में विस्तार से बात किया है। जब कवि कहता है कि खेत नहीं, खेतों में फसलें खड़ी होती हैं, तो वह संकेत करता है कि वास्तविकता का केंद्र स्वामित्व नहीं, श्रम है; भूमि का नाम नहीं, उसकी जीवित उत्पादकता है। यहीं से नव-सामंतवाद की आलोचना का द्वार खुलता है। नव-सामंतवाद की मूल रणनीति यही है कि वह ‘खेत’—अर्थात् स्वामित्व और नियंत्रण—को केंद्र में रखता है, जबकि ‘फसल’—अर्थात् श्रम और उत्पादन—को हाशिए पर धकेल देता है। यह संरचना स्वामित्व के प्रतीक को इतना महिमामंडित कर देती है कि श्रम का वास्तविक अस्तित्व अदृश्य होने लगता है। कवि की लक्षणा इस अदृश्यता को भेदती है। वह हमें यह याद दिलाती है कि खेत का अर्थ उसकी फसल से है; भूमि का अर्थ श्रम से है; स्वामित्व का अर्थ उत्पादकता से है।
यह स्वभाविक ही है कि इस संग्रह में अवध क्षेत्र से निकलने वाली कई नदियों पर केंद्रित कविताएँ संग्रहीत हैं। ‘बकुलाही’ नदी को संबोधित इस कविता को देखें :
नदी के नाम पर सबसे पहले
मैंने छुआ तुम्हारा पानी
दिसंबर के जाड़े में
कमर तक भींग
तुम्हें पार कर देखा
भयहरन नाथ का मेला
तुम्हारे नरकुल से बनाई क़लम
और उसी से लिखना सीखा
तुम्हारा नाम—बकुलही
केशव की कविता इस पूरे परिदृश्य को एक आलोचनात्मक दृष्टि से देखती है। वह सीधे नारे नहीं लगाती, पर संकेतों और बिंबों के माध्यम से उस मानसिक संरचना को उद्घाटित करती है, जो लोक-चेतना को प्रतीकात्मक उत्सवों में उलझाकर उसके वास्तविक प्रश्नों को विस्मृत कर देती है। “खेत” और “फसल” का भेद उसी प्रकार है, जैसे वास्तविक संकट और उसके प्रतीकात्मक नाट्य-रूपांतरण का भेद। कवि का दायित्व केवल स्थितियों का वर्णन करना नहीं, बल्कि अपने लोक को उन अदृश्य घातों से सावधान करना भी है, जो धीरे-धीरे उसकी चेतना को क्षीण कर सकते हैं। केशव अपनी कविता में यही जिम्मेदारी निभाते दिखाई देते हैं। वे जानते हैं कि नव-सामंतवाद का सबसे बड़ा हथियार प्रत्यक्ष हिंसा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भाषिक आच्छादन है—ऐसा आच्छादन, जिसमें शोषण उत्सव में बदल जाता है और संकट प्रदर्शन में। इसलिए उनकी कविता लोक को स्मरण कराती है कि उत्सव का समय वही है, जब जीवन की वास्तविक शर्तें सुरक्षित हों; दीप वही अर्थपूर्ण है, जो अंधकार की वास्तविक संरचना को समझते हुए जलाया जाए; और खेत वही है, जिसकी फसल पर श्रमिक का अधिकार सुनिश्चित हो। कवि अपने लोक को इस वैचारिक घेराबंदी से बाहर निकालने के लिए जो कुछ कर सकता है, वह कविता में करता है। वह शब्दों को चेतावनी में बदलता है, बिंबों को विवेक में और भाषा को प्रतिरोध में। उसकी कविता किसी तात्कालिक उत्तेजना का परिणाम नहीं, बल्कि जिम्मेदार हस्तक्षेप है—ऐसा हस्तक्षेप जो लोक-चेतना को पुनः केंद्र में स्थापित करना चाहता है।
अंत में: नैतिक-सौंदर्यात्मक मानदंड
केशव तिवारी की काव्य-यात्रा को यदि एक सूत्र में बाँधना हो, तो कहा जा सकता है कि वह संवेदना, विचार और भाषा की ऊर्ध्वगामी प्रक्रिया है। उनका चौथा संग्रह केवल सौंदर्यबोध का विस्तार नहीं, बल्कि समकालीन समय की आलोचनात्मक चेतना का सशक्त दस्तावेज़ है। उनकी कविता हमें स्मरण कराती है कि साहित्य का दायित्व केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि वैचारिक स्पष्टता, भाषिक ईमानदारी और लोक-चेतना की रक्षा भी है। “खेत” और “फसल” के भेद को पहचानना ही आज की ऐतिहासिक आवश्यकता है—क्योंकि यदि श्रम अदृश्य हो गया, तो स्वामित्व की चमक अंततः मनुष्य की गरिमा को विस्थापित कर देगी। इस प्रकार, केशव तिवारी की कविता समकालीन हिंदी साहित्य में एक नैतिक-सौंदर्यात्मक मानदंड के रूप में स्थापित होती है—जहाँ भाषा विवेक है, कविता प्रतिरोध है और लोक उसका केंद्र। “चतुर कवि तो गाल बजाएगा / नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा”—यह पंक्ति उनकी समूची काव्य-दृष्टि का सार है। कविता उनके लिए शब्दों का खेल नहीं; वह जीवन के प्रति नैतिक प्रतिबद्धता है।
[केशव तिवारी, नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा, हिंदी युग्म, नोएडा (उ.प्र.), फ़रवरी 2024, मूल्य : 249/-]
असिस्टेंट प्रोफेसर (अँग्रेज़ी), डॉ. आशाबेन पटेल सरकारी विज्ञान कॉलेज
तालुका : उंझा, जिला : मेहसाणा (उत्तर गुजरात), पिन कोड : (384170)
मोबाईल : 8758127940 ईमेल : rakeshansh90@gmail.com






