“सत्य का सम्यक स्वरूप वह है जिसके केन्द्र में तथ्य या प्रमाण नहीं, बल्कि मनुष्य की अंतर्निहित संवेदना और अस्तित्व की धड़कन है। यहाँ तथ्यों का इन्कार नहीं होगा बल्कि स्वीकार होगा, फिर भी जीवन उससे सीमित और परिभाषित नहीं होगा। हम जानते हैं कि साहित्यिक सत्य ही वह कोटि है जो हमें हमारे भीतर के प्रश्नों, हमारे अनुत्तरित सवालों और हमारी स्वतंत्रता के दायित्व से एक साथ रूबरू करा सकता है। यह अनुभव की गहराई, अस्तित्व की असंगति और भावनाओं की तीव्रता में प्रकट होता है और इन सबका विराट समग्र होता है।”–सत्य के बारे में महेश मिश्र का यह लेख किसी बड़े लेख की तैयारी जैसा लगता है। छोटे आकार में लंबी परास और मौलिक चिंतन। अनिल कुमार यादव के साथ बातचीत पर आधारित इनकी पुस्तक अनिच्चवत संखारा इन दिनों चर्चा में है।

सत्य क्या है? ऐसा अटल तत्त्व जो परेशान तो हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं!… या फिर देश-काल-परिस्थिति के हिसाब से रंग बदलता हुआ एक गिरगिट!
क्या यह केवल लोगों के विश्वास में गहरे धँसी हुई कोई अवधारणा है, जिसे कुटिल सत्ताएँ लुभावनी व्याख्याओं के ज़रिये अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेती हैं?
या यह वही अवधारणा है, जिसके बरअक्स धीरे-धीरे असंतोष का पर्वत जमा होता है और अंततः एक दिन उन्हीं सत्ताओं को ध्वस्त कर देता है?
या सत्य वास्तव में केवल एक पासा है, जिसकी कामयाबी या विफलता उसे चलाने वाले खिलाड़ी पर निर्भर करती है?
या यह कुछ और है—कुछ ऐसा, जिसे मनुष्य अपनी समस्त प्रतिभा और बुद्धि से भी अंततः जान नहीं सकता?
यह विषय मुझे काफी समय से आकर्षित करता रहा है। सभ्यताओं में सत्य की आवश्यकता किन-किन रूपों में पड़ी होगी, कैसे-कैसे विकास हुआ होगा, किन सभ्यताओं में सच को अधिक सम्मानित समझा गया होगा और किन-किन सभ्यताओं में किस-किस रास्ते से गुज़रकर इसके स्वरूप की समझ स्थिर की गयी होगी?
क्या यह समझ स्थिर हुई भी?
इस आलेख में इन्हीं कुछ जिज्ञासाओं पर विचार करने का मन है और यह भी जानने का कि मनुष्य अस्तित्व में सत्य की क्या भूमिका है… इस सबके बीच में यह नहीं भुलाना है कि सच के विभिन्न रूप — पारलौकिक सच, सामाजिक सच और व्यक्तिगत सच एक दूसरे से भिन्न होने के बावज़ूद एक सतत द्वंद्वात्मक गतिशीलता और आदान-प्रदान में होते हैं।
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मनुष्य सभ्यता की शुरुआत में सच ‘अवधारणा’ नहीं, ‘उपस्थिति’ थी। प्रकृति में उगता-अस्त होता सूरज, मौसम का बदलता मिज़ाज, जन्म-मृत्यु इत्यादि के तथ्य ही सत्य भी थे।
समाज के विकास के साथ, मिस्र में देवी मा’ त (Ma’at) संतुलन और न्याय के लिए ज़िम्मेदार बनीं, प्राचीन भारत में ऋत् को सत्य और ब्रह्म माना गया और सृष्टि तथा जीवन को संचालित करनेवाली शाश्वत व्यवस्था के रूप में समझा गया तथा मेसोपोटामिया में राजा दैवीय सच तक पहुँच होने का दावा बताकर राज करते थे।
मोटे तौर पर इन समाजों में- असत्य समाज और सृष्टि दोनों के संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश के रूप में देखा जाता था।
इस कोटि का सारा सत्य अब मिथकों की शब्दावली में हमारे पास उपलब्ध है। इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, हमें मिथकों के बारे में संक्षेप में विचार कर लेना चाहिए।
मिथकों की श्रेणी में इतना विपुल साहित्य रचा गया और अभी भी रचा जा रहा है कि उसे किसी चलताऊ पैमाने से निरस्त करने का कोई तुक नहीं है। मिथकों के बारे में गहराई से विचार करने वाले विद्वान जोसेफ़ कैम्पबेल मानते हैं कि मिथक असत्य नहीं, बल्कि रूपक के रूप में प्रकट शाश्वत सत्य हैं। वे विस्मय को जगाते हैं, ब्रह्मांड की व्याख्या का प्रयास करते हैं, समाज को मूल्य और व्यवस्था प्रदान करते हैं तथा मनुष्य की अंतर्यात्रा का आदिम मायनों में मार्गदर्शन करते हैं। अगर आप उनका ग्रहण शाब्दिक अर्थों में करेंगे तो वे आपको जड़ बना देंगे, और यदि उन्हें आप मेटाफर के रूप में समझेंगे तो वे जीवन्त सत्य लगेंगे और मानवीय प्रतिभा के बारे में हमें विनम्र कर देंगे।
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सभ्यता के अगले चरण में आया दर्शन का युग। यूनान, चीन और भारत में सत्य को दैवीय चंगुल से छुड़ाकर मनुष्य के विवेक और तर्क के दायरे में लाने की आरम्भिक कोशिशें हुईं।
प्लेटो सत्य को शाश्वत प्ररूपों में देख रहे थे, अरस्तू निरीक्षण और तार्किक प्रमाण में, बुद्ध के लिए दु:ख ही सच था, कन्फ्यूशियस के लिए यह नैतिक सम्बंधों के संतुलन में था।
इस तरह सत्य को मानवीय दायरे में लाने की अलग अलग सभ्यताओं में कई गंभीर कोशिशें हुईं।
उसके बाद आये मध्य-काल में सच की अवधारणा एक बार फिर स्वर्ग की बाट देखने लगी अर्थात् पारलौकिक मायनों से परिभाषित होने की तरफ़ आगे बढ़ी। चर्च और धार्मिक संस्थाएँ सत्य को क़ैद करने लगीं और मनुष्य को आज्ञापालन के लिए बाध्य करने लगीं। इस्लामी दुनिया में अविसेना जैसे विद्वान आस्था और तर्क का मेल तो करा रहे थे लेकिन कुल मिलाकर यह तर्क और सत्य के लिए ख़तरे का समय ही था।
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आगे आया प्रबोधन और पुनर्जागरण का काल। इसमें हम पाते हैं कि गैलीलियो, कोपर्निकस, देकार्ते, न्यूटन आदि ने सच को ठोस स्वरूप देने की कोशिश की जिसका विकसन और पल्लवन तर्क, विज्ञान, विवेक, समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मानवीय मूल्यों की तरफ क्रमश: आगे बढ़ा।
लेकिन आधुनिकता सत्य के लिए इतनी निरापद भी नहीं साबित हो पाई। सच को एप्रोप्रियेट करने की कोशिशें शुरू हो गईं और दूसरी ओर उसके स्वरूप को समझने के अधिक जटिल और नुआन्स्ड प्रयास भी होने लगे।
मार्क्स ने सच के वर्गीय स्वरूप का विश्लेषण किया, नीत्शे को सारे सच मुखौटे नज़र आए तो फ्रॉयड ने अवचेतन में सच को ढूँढ़ना चाहा।
एक तरह से सच के बहुलतावादी, अस्थिर और बहस-तलब स्वरूप को हम यहाँ पाते हैं।
बीसवीं सदी ने, इस बहस को अलग ही ऊँचाई तक पहुँचा दिया। अधिनायकवादी शासनों ने परम-सत्य जान लेने का दावा किया और जनता से सामूहिक आज्ञापालन सुनिश्चित किया- सारे तथ्य प्रोपेगैण्डा में बदल गए – लाखों करोड़ों मौतें हुईं।
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सार्त्र और कामू जैसे अस्तित्ववादी विचारकों ने सच को फिर से एक अलग ही परिप्रेक्ष्य दे दिया। यहाँ सत्य को मानवीय और ज़िम्मेदार संदर्भ दिया गया। बाद में फूको ने सच को मासूम मानने से इंकार कर दिया, और उसे शक्ति के साथ गलबहियाँ करनेवाला बताया।
आज के समय को कुछ लोग सत्योत्तर काल (पोस्ट-ट्रुथ एरा) कह रहे हैं – जहाँ भावनाओं का ज्वार सच पर भारी पड़ता है। इस काल में सच के लिए पहुँच जितनी आसान हुई, वह उतना ही दुर्बल, क्षीणकाय हुआ है। इस डिजिटल समय में झूठ की रफ़्तार बहुत अधिक हो गई है और सूचनाधिक्य और इंटरनेट संजाल मानसिक-सामाजिक जंजाल-से बन गए हैं और इससे सच ही नहीं, मनुष्य का पूरा अस्तित्व भी मैनिपुलेट होने के लिए अधिक वल्नरेबल हो गया है।
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मानव सभ्यता में सत्य को किस रूप में देखा गया, इसके संक्षिप्त परिचयात्मक इतिहास को देख लेने के बाद हम उसकी उपस्थिति के मोटे-मोटे स्वरूप के बारे में विचार कर सकते हैं।
मेरी समझ में सच के तीन स्वरूप हैं जो मनुष्य-जीवन को अपने-अपने ढंग से प्रभावित करते हैं– दैवीय-रहस्यात्मक सच, वैज्ञानिक-प्रमाणनीय सच और सांस्कृतिक-साहित्यिक सच।
यहाँ समझने के नज़रिए से जो विभाजन किया जा रहा है, वह कठोर नहीं है, न हो सकता है, लेकिन मोटे तौर पर दैवीय-रहस्यात्मक सच में मिथकों, धार्मिक आख्यानों और प्रतीकों आदि द्वारा अभिव्यक्त सच आते हैं, जो ठीक समझ में तो नहीं आते लेकिन इसके बावजूद ये मनुष्य के भाव-लोक और चित्त के सूक्ष्मतम कोनों को गहराई और तीव्रता से आलोड़ित करते हैं। कल्पना की उड़ान को ऐसे ‘सच’ इतनी रोमांचक विस्तृति देते हैं कि मनुष्य-संसार में यह अपने पूरे विभव के साथ आज भी मौजूद है। इस अलौकिकता में कल्पना के उड़ान की सम्भावना अनंत, सौंदर्य अनंत, विस्तार अनंत और शक्ति अपरम्पार होती है।
और फिर ये परम गुण (एब्सॉल्यूट्स) मनुष्य के चित्त के लिए न सिर्फ़ मोहक प्रतीत होते हैं बल्कि बेहद शक्तिशाली भी साबित होते हैं।
मानवता का बड़ा हिस्सा इस पहले सच के मोहपाश में आज भी है, भले ही समय के साथ कतिपय समाजों में इसके प्रभाव में कमी आई हो, पर दूसरी तरह के सच के दायरों से वह आज भी अपना स्थान ले लेने के लिए उद्यत ही दिखता है। वैज्ञानिक तकनीकी ज्ञान और आधुनिक साहित्यिक-सांस्कृतिक संपदा ने दैवीय क़िस्म के सच की शक्ति को सीमित किया है और उसके प्रभाव और तीव्रता में निस्संदेह कमी मानी जा सकती है लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि मानवता का बड़ा हिस्सा आज भी इस प्रथम सत्य के मोहपाश में बँधा हुआ है, भले ही मात्रा और तीव्रता भिन्न-भिन्न हों।
वहीं, वैज्ञानिक और प्रमाणनीय सत्य अनुभव, अवलोकन और तर्क की कसौटी पर ही बनता भी है और परखा भी जाता है। यह वस्तुनिष्ठ, प्रमाणित होने के योग्य और निरंतर संशोधनीय है। यह सत्य मानव बुद्धि और समाज की व्यवस्थित समझ, तकनीकी उन्नति, चिकित्सा और उद्योग का आधार है। दैवीय सत्य जहाँ भाव और कल्पना को रोमांचित करता है, वैज्ञानिक सत्य हमें वास्तविकता के स्पष्ट मानचित्र बनाने और उसे नियंत्रित करने की क्षमता देता है। यह सच आधुनिक सभ्यता का वाह्य-आंतरिक परिवेश बनाने में सबसे उपयोगी भूमिका निभाता है। इसने मनुष्य को रोग-मुक्त किया, सुरक्षा और सुविधा दी और एक ऐसा सौंदर्य-बोध भी जो जीवन से सीधे भिड़ता है, सामना करता है, उसे सरल-सहज और रहस्यमुक्त बनाने की कोशिश करता है। उसे अपने जीवन का स्वामी बनाने की कोशिश करता है।
इस तरह के सत्य में शायद एक ही कमी है कि यह मानवीय मूल्यों की परवाह नहीं करता है… मोटे तौर पर वे इसके कंसर्न नहीं होते। हालाँकि वे मानवीय मूल्यों की सेवा में सबसे अधिक तत्पर होते हैं लेकिन उनको निर्देशित करनेवाला निकाय मूलतः विज्ञान के, वैज्ञानिक सच के दायरे से बाहर होता है।
सत्य का तीसरा आयाम, साहित्यिक-सांस्कृतिक है जो मानव संवेदना, अनुभव और सामूहिक स्मृति की गहराइयों से जन्म लेता है। महाकाव्य, उपन्यास, कविता, नाटक और अन्य ललित कलाओं के माध्यम से यह अभिव्यक्त होता है। यह सत्य न तो शाब्दिक-वैज्ञानिक अर्थों में प्रमाणित किया जा सकता है, न ही दैवीय आदेश की तरह अपरिवर्तनीय और ठस्स होता है; परंतु यह हमारे दुःख, सुख, न्याय-अन्याय और संभावनाओं को अर्थपूर्ण ढंग से उजागर करता है। इसमें कल्पना और रचना की अनंत संभावनाएँ निविष्ट होती हैं, जो हमें अस्तित्व की उन गहराइयों से जोड़तीं हैं जहाँ अनुभव और संवेदना तथ्यों से अधिक निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
इस प्रकार हम पाते हैं कि मनुष्य के विचार-जगत में सत्य के तीन आयाम हैं- पहला है, धार्मिक सत्य, जो दिव्यता और परलोक की कल्पना से जन्म लेता है। धार्मिक कथाएँ हमें विस्मय और कल्पना देती हैं, वैज्ञानिक खोजें हमें प्रमाण और दिशा प्रदान करती हैं, लेकिन साहित्यिक सत्य हमें अस्तित्व की जीवंत असंगति, हमारे निर्णयों की ज़िम्मेदारी और हमारी संवेदनाओं की तीव्रता का अनुभव कराता है। यह सत्य हमेशा उद्घाटित होता रहता है—अधूरा, अपूर्ण, संभावनाओं से भरा। यही वह सत्य है जो मनुष्य को केवल देखनेवाला नहीं, बल्कि जीने, सोचने और अपनी नियति का साझेदार बनाता है। उसे भोक्ता और दृष्टा एक साथ बनाता है। मूल्य के मानदंड और मूल्य दोनों तय करता है।
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यदि हम इस आलेख से बाहर भी अपने को स्थित करें और ध्यान दें तो पायेंगे कि मनुष्य की नियति किसी अंतिम समाधान में नहीं है बल्कि वह उन अनवरत प्रश्नों और संभावनाओं में है जो उसे बार-बार नए रूप में जीने, समझने और रचने को विवश करते हैं। जहाँ तथ्यों के आलोक में कल्पना–जगत बुनना होता है। जहाँ ठोस ज़मीन पर खड़े होकर भी सपने देखना होता है, जहाँ यथार्थ मार्गदर्शन करेगा और कल्पना जीवन को सुन्दर बनाने की राह सुझाएगी।
और क्या यहीं साहित्यिक सत्य परिदृश्य में नहीं उभरने लगता है?
इस सत्य की यही शक्ति है—यह मनुष्य को अनुभव, संभावनाओं और अंतःदृष्टि की अनंत उड़ान में ले जाता है।
सत्य के विभिन्न स्वरूपों पर ऊपर जो हमने विचार किया है, उससे हम इतना मान सकते हैं कि सत्य का सम्यक स्वरूप वह है जिसके केन्द्र में तथ्य या प्रमाण नहीं, बल्कि मनुष्य की अंतर्निहित संवेदना और अस्तित्व की धड़कन है। यहाँ तथ्यों का इन्कार नहीं होगा बल्कि स्वीकार होगा, फिर भी जीवन उससे सीमित और परिभाषित नहीं होगा।
हम जानते हैं कि साहित्यिक सत्य ही वह कोटि है जो हमें हमारे भीतर के प्रश्नों, हमारे अनुत्तरित सवालों और हमारी स्वतंत्रता के दायित्व से एक साथ रूबरू करा सकता है। यह अनुभव की गहराई, अस्तित्व की असंगति और भावनाओं की तीव्रता में प्रकट होता है और इन सबका विराट समग्र होता है।
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इस तरह मैं अपने आलेख को साहित्यिक-सांस्कृतिक सत्य के पक्ष में ले जाने का प्रस्ताव कर रहा हूँ और इसको प्रस्तावित करने का तर्क मुझे ज्याँ पॉल सार्त्र की कृति सत्य और अस्तित्त्व (Truth and Existence) में दृढ़ता से और कन्विंसिंग तरीक़े से मिला है।
यह पुस्तक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लिखी गई लेकिन प्रकाशित हुई 1989 में। पुस्तक इस बात को उम्दा तरीक़े से रखती है कि सच स्थिर और प्रदत्त नहीं है बल्कि वह उद्घाटन में निहित है, वह अनवेलिंग (unveiling) में है, वह अज्ञान से अलगाने में है। वह सतत प्रक्रिया है। सच को दैवीय या परम्परा के खूँटे से बाँधकर पाया नहीं जाता बल्कि सीमित किया जाता है। सार्त्र अद्भुत प्रखरता से मानवीय और लौकिक सच की खोज करते हुए दिखते हैं।
यह पुस्तक उस बुनियादी संकट को सामने रखती है जो ईश्वरविहीन जगत में सत्य की संकल्पना से जुड़ा है।
पर हमें इस सवाल का सामना तो करना पड़ेगा कि यदि हम दैवीय हस्तक्षेप को नकार दें, तो सत्य का कोई परम स्वरूप शेष नहीं रह जाएगा और वह दुष्टों के हाथ में पड़ने और अस्थिर होने से अपने आपको नहीं बचा पाएगा।
क्या सच का अस्थिर होना उसको अवमूल्यित नहीं करता?
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हम इस संदर्भ पर इसी पुस्तक और सार्त्र तथा कतिपय अन्य दार्शनिकों के विचारों के आलोक में इसे समझने की कोशिश करेंगे।
सार्त्र का अस्तित्ववादी दर्शन सत्य को किसी स्थिर, पूर्वनिर्धारित या दैवीय आदेश के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे मनुष्य के सक्रिय और नैतिक अस्तित्व से जुड़ी एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है। अपनी इस पुस्तक में वे पारंपरिक दार्शनिक अवधारणाओं को चुनौती देते हुए यह कहते हैं कि सत्य केवल किसी निष्क्रिय वस्तु के रूप में खोजा जानेवाला नहीं है, बल्कि वह मनुष्य की सक्रिय क्रियाओं, उनकी स्वतंत्रता, और उनके ज़िम्मेदार व्यवहार के माध्यम से प्रकट होता है।
सार्त्र मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger) की पुस्तक बीइंग ऐंड टाइम (Being and Time) से प्रभावित तो हुए लेकिन दोनों दार्शनिकों के अस्तित्व और सत्य के विचार में कई महत्वपूर्ण अंतर हैं, विशेषकर उस मानव स्वतंत्रता और नैतिक ज़िम्मेदारी के दृष्टिकोण से जिसे सार्त्र अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।
हाइडेगर का सत्य, जिसे वह “aletheia” कहते हैं, उद्घाटन और छिपाव की प्रक्रिया में निहित है और वह एक तत्त्वमीमांसीय (ontological) घटना है। यह मानव स्वतंत्रता या नैतिक अभिव्यक्ति से अधिक नहीं जुड़ा होता।
दूसरी ओर सार्त्र ने मानव स्वतंत्रता को अधिक गहन और व्यावहारिक भूमिका दी। उनके अनुसार, “अस्तित्व सार से पहले है” (Existence precedes essence), अर्थात् मानव की प्राथमिक अवस्था अस्तित्व है, और उसे निरंतर परिस्थितियों के बीच रहकर अपने अर्थ और स्वरूप का निर्माण करना पड़ता है।
अस्तित्व एक स्थिर सिद्धांत नहीं, बल्कि दीर्घकालिक मानव निर्माण का प्रोजेक्ट है, जिसमें नैतिक प्रतिबद्धता अनिवार्य है। सार्त्र का सत्य हमेशा सामाजिक और पारस्परिक होता है, क्योंकि वह अन्य मानवों और समाज के संदर्भ में प्रयुक्त होता है। उनका मूल तर्क यह है कि सत्य कोई ऐसी निष्क्रिय वस्तु नहीं है जो अपने आप को खोजे जाने की प्रतीक्षा कर रही हो, बल्कि सत्य मानवीय क्रिया के माध्यम से खुद को सामने लाता है। वे लिखते हैं,
Truth reveals itself to action. All action is knowledge… and all knowledge, even intellectual knowledge, is action.
वे सत्य को एक सतत, चलती हुई प्रक्रिया के रूप में स्थापित करते हैं, जिसमें मनुष्य निरंतर अपनी चेतना के द्वारा संसार को अर्थ देता है और उसे सक्रिय रूप से उद्घाटित करता है। इस तरह, सत्य और स्वतंत्रता एक-दूसरे के अभिन्न अंग बन जाते हैं; केवल वह व्यक्ति जो स्वतंत्र होता है, सत्य की खोज या उसका अस्वीकार कर सकता है, और बिना स्वतंत्रता, सत्य केवल सत्याभास, अज्ञान या मिथ्या-ज्ञान होता है।
सार्त्र का आग्रह ही यह है कि मनुष्य चेतना का स्वभाव reveal (उद्घाटन) करना है। एक बच्चा मासूम इसीलिए है क्योंकि उसे वस्तुओं और घटनाओं के स्वरूप का ज्ञान नहीं है, वे उसके सामने रिवील नहीं होती हैं।
मनुष्य अपनी चेतन क्रियाओं से केवल अस्तित्व में नहीं रहता, बल्कि एक निरंतर उभरनेवाली, विकसित होनेवाली रचना है। यही कारण है कि सत्य उसके लिए कोई प्राप्त, ठोस , स्थिर संपत्ति नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है—समय और कर्म के माध्यम से उजागर होती हुई।
यहाँ प्रश्न उठ सकता है कि यदि सत्य केवल विखंडित, प्रसंग-अवलंबित और सापेक्ष ही है, तो भला उसमें कोई नैतिक बल शेष रह सकता है?
सार्त्र कहते हैं कि प्रत्येक उद्घोषित सत्य में दो तत्व अनिवार्यतः निहित रहते हैं—unveiling (उद्घाटन) और gift (उपहार)। एक ओर यह यथार्थ का अनावरण करता है, दूसरी ओर यह दूसरों को संबोधित करता है।
सत्य की यह द्विगुणी प्रकृति मनुष्य पर उत्तरदायित्व आरोपित करती है: मैं केवल उस सत्य के लिए जवाबदेह नहीं हूँ जिसे मैंने जाना, बल्कि उन अप्रत्याशित परिणामों के लिए भी ज़िम्मेदार हूँ जिनसे वह दूसरों की चेतना और जीवन को प्रभावित करता है।
और इसी बिंदु पर सत्य केवल ज्ञान का प्रश्न नहीं रहता, वह नैतिकता का प्रश्न बन जाता है।
सार्त्र के हिसाब से मानवीय सत्य की संकल्पना को नैतिक रूप में समझना उन मौलिक द्वंद्वों को स्वीकारना है जो बार-बार सामने आते हैं—सापेक्ष और परम, सीमित और असीम, विशेष और सार्वभौमिक। मेरा सत्य ऐतिहासिक और प्रासंगिक है, किन्तु जैसे ही मैं उसे बोलता हूँ, वह एक सार्वभौमिक दावे के रूप में सामने आता है।
यही कारण है कि सत्य का नैतिक स्वरूप हमसे दोहरी माँग करता है—विनम्रता की, क्योंकि यह सदैव सीमित और आंशिक है; और साहस की, क्योंकि उसे प्रकट करना और साझा करना हमारी ज़िम्मेदारी है।
पुनः ध्यान दें कि सत्य का नैतिक स्वरूप जिन दोहरी अपेक्षाओं के साथ आता है, वे क्या हैं – विनम्रता और साहस। क्या दैवीय या वैज्ञानिक सच विनम्र हो पाते हैं?
अधिकतर मामलों में नहीं।
यह अपेक्षित विनम्रता संशय, दुविधा, अनिश्चितता में ही निविष्ट हो सकती है और वह साहित्य में ही सम्भव हो पाता है।
अतः, सार्त्र का आह्वान यह नहीं है कि हम सत्य के लिए किसी दैवीय गारंटी को खोजें, बल्कि यह कि हम अपने मानवीय उत्तरदायित्व को स्वीकारें।
नैतिक मानवीय सत्य वह है जो सीमित होते हुए भी सार्वभौमिक की ओर बढ़ता है; जो चेतना के भीतर जन्म लेता है, किंतु दूसरों के जीवन में प्रकाश और जोखिम दोनों लाता है।
यह मनुष्य के जीवित होने की प्रतिबद्धता है—यथार्थ को ईमानदारी से उद्घाटित करना, उसे साझा करना, और उसके परिणामों की ज़िम्मेदारी उठाना।
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अब मेरी समझ में एक ही सवाल और बचता है कि अगर सच का स्वरूप स्थिर नहीं है तो क्या यह सत्योत्तर युग (Post-Truth Era) वाली बात ही नहीं हो गई…उससे कुछ मिलती-जुलती बात?
आज का पोस्ट ट्रुथ समय, जिसमें तथ्यात्मक ज्ञान की जगह भावना और व्यक्तिगत विश्वास को प्राथमिकता दी जाती है, सत्य की भूमिका को गंभीर संकट में डाल रहा है। इस युग में तथ्य लचीले, सत्ता, मीडिया और राजनीतिक विचारधाराओं के अधीन होते जा रहे हैं, जिससे समाज में भरोसे का संकट उत्पन्न हो गया है और लोकतंत्र ख़तरे में पड़ गया दिखता है (चाहे वह सबसे पुराने लोकतंत्र में हो या सबसे बड़े लोकतंत्र में, बाक़ी व्यवस्थाओं में तो जो जनतांत्रिक मूल्यों का क्षरण है, उसके लिए वैसे भी दुनिया अधिक विचलित नहीं दिख रही है)।
ऐसे समय में ज्ञान और तथ्य दुर्बल, हताश होकर भावनाओं और छद्म-सत्यों के लिए अपनी जगह छोड़ते दिख रहे हैं।
अब इस काल की प्रकृति की तुलना यदि सार्त्र के नैतिक मानवीय सच से करें तो हम समझ जायेंगे कि उनका सच झूठ से विस्थापित होने वाला नहीं है।
पोस्ट-ट्रुथ एरा की ‘नैतिक’ संहिता के उलट सार्त्र का सत्य मानव सक्रियता और नैतिक प्रतिबद्धता की उपज है, जो इस अनैतिक युग की निराशा और सापेक्षता को चुनौती देता है। जहाँ पोस्ट-ट्रुथ तथ्यों पर संदेह करता है और जान-बूझकर भ्रम फैलाता है, सार्त्र के इस दर्शन के अनुसार हमें सत्य की वह सक्रिय, नैतिक और सामाजिक प्रक्रिया अपनानी होगी जो स्वतंत्र मूल्यों, बहस और जवाबदेही पर आधारित हो।
सत्योत्तर युग में, जहाँ तथ्य और तर्क कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं, सार्त्र की सक्रियता, नैतिकता और स्वतंत्रता पर आधारित सत्य की अवधारणा हमें एहसास कराती है कि कैसे सत्य को केवल जानकारी या तथ्य से नहीं, बल्कि प्रभावी मानव व्यवहार, जवाबदेही और सत्य के आग्रह से सुरक्षित रखा जा सकता है।
यह समग्र रूप में सार्त्र की अवधारणा– एथिकल ह्यूमन ट्रुथ (नैतिक मानवीय सत्य) के माध्यम से ही चरितार्थ हो सकती है। यह सच कोई शाश्वत, पूर्व-नियत प्रकाशन नहीं है, बल्कि मनुष्य की उस अनवरत यात्रा का नाम है जिसमें वह सत्य को खोजता, रचता और दूसरों के साथ साझा करता है—और यही साझा करना उसे उसकी नैतिक गरिमा और मानवीय आभा दे सकता है।







दर्शनशास्त्र की एक सदाबहार गुत्थी ‘सत्य’ को यहाँ जिस तरह विवेचित और प्रस्तुत किया गया है वह दिशाबोधक है। हमारे जैसे दर्शनशास्त्र को न समझने वाले साधारण पाठकों को सत्य के ठोस, तरल और वाष्प रूप का अवबोध करा पाना इस लेख की उपलब्धि है।
महेश जी के प्रति कृतज्ञता।
विचारोत्तेजक लेख है. गहन चिंतन और बहस की मांग करता है. सत्य को सही सही परिभाषित करने का द्वार खोलता है. इससे निकाले बहुत सारे उद्धरणों को मैंने अपने बौद्धिक मित्रों और ग्रुपों में शेयर किया है . लेखक व संपादक को हार्दिक बधाई
बहुत अच्छा लेख,जिसने जिम्मेदारी के साहस और जानने की विनम्रता की यात्रा में हमें शामिल किया।
विचारोत्तेजक लेख है. बधाई
एक महत्वपूर्ण पुस्तक से अपने परिचय कराया आपको धन्यवाद, संभवत सत्य को समझने के लिए यह पुस्तक काफी होगी इसी बहाने हम अपने समय को भी पहचान सकेंगे
सत्य के बारे में रोचक व विशेष जानकारियों से संबंधित आलेख पढ़ कर अच्छा लगा।