विभेदीकरण की संस्कृति और लोकतन्त्र का नया संस्करण / डॉ.  उपासना गौतम


डॉ उपासना गौतम की कविताएँ आप नया पथ में पढ़ चुके हैं। इस बार हमारे संवैधानिक मूल्यों के क्षरण पर उनका आलेख पढ़िए!

“हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सबमें, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित कराने वाली, बंधुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्प होकर अपनी संविधान सभा में आज तारीख़ 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति माघशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”

संविधान की प्रस्तावना में निहित उपर्युक्त मूल विचारों को याद रखना वर्तमान समय की अनिवार्य ज़रूरत बन चुका है। ख़ासकर जब सत्तासीन सेवकों ने आलोकतांत्रिक गतिविधियों के विध्वंसकारी तूफान में पूरे समाज को झोंक दिया हो।

बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था – किसी भी देश का संविधान बुरा है मगर उसको संचालित करने वाले लोग अच्छे हैं तो वह अच्छा साबित होगा। अगर किसी भी देश का संविधान अच्छा है और उसको चलाने वाले लोग बुरे हैं तो वह बुरा साबित होगा।

वास्तव में बाबा साहब अंबेडकर के इस कथन में एक भावी चेतावनी छुपी हुई थी। उनका यह कथन इस बात का द्योतक है कि अच्छी व्यवस्था अच्छे संचालन पर निर्भर करती है और अच्छा संचालन अच्छे लोगों पर। निश्चित ही अच्छे लोगों से मेरा तात्पर्य पूर्वाग्रहों से मुक्त मानवीय मूल्यों की गरिमा को स्थापित करने वाले लोगों से हैं। इस परिभाषा में जाति-धर्म, लिंग आदि के विभेदीकरण के लिए दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं है। निसंदेह संविधान में निहित अधिकारों को संचालित कर उसको लागू करने की प्रक्रिया को ईमानदारी से पूर्ण करने में ही अच्छी व्यवस्था के तत्व सम्मिलित होते हैं। लेकिन यह खेद का विषय है कि लोकतन्त्र के 79 वर्ष बीतने के बाद भी हम इस बात पर संघर्षरत हैं कि संविधान के तहत जो अधिकार हमको लोकतन्त्र में मिले हैं, उनमें से कुछ ही अधिकारों का लाभ बहुसंख्यक पीड़ित-वंचित तबके को मिला, महज़ उन चंद लागू अधिकारों को भी ख़त्म करने पर उतारू सत्ताधारी पुनः एक अंधकारमय भविष्य तय कर रहे हैं। इसमें कोई संशय की बात नहीं है। एक-एककर वे नया विधान लागू कर रहे हैं। तमाम घटनाएँ इसकी बानगी है। अभी हाल ही में एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने की बात हो या जातिगत आधार पर दबंगई की घटनाओं का लगातार बढ़ना, या आरक्षण विरोधी नीतियों को बड़ी चालाकी से लागू करना जिससे एक बहुसंख्यक अवाम को तकनीकी रूप से दरकिनार किया जा सके। इन हालात में संवैधानिक रूप से अभिव्यक्ति के अधिकार (Freedom of speech) के तहत सड़कों पे उतरे लोगों पर आरोप लगाकर और पुलिसिया दमन और प्रदर्शनकारियों को अकेला पाकर दबंगों द्वारा बेतहाशा मारपीट की घटनाएँ इस बात का सूचक है कि हजारों वर्षों से चले आ रहे जातिगत दमन के वायरस अभी तक उनके दिमाग में है।

एक घटना 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद अभियान की है। प्रदर्शन के बाद मेरठ में प्रदर्शनकारियों को दबंगों ने अलग-अलग अकेला पाकर पीट-पीटकर अधमरा कर दिया जिसका वीडियो भी वायरल हुआ था। यह कोई नई बात नहीं है, इससे पहले भी सहारनपुर की एक बड़ी घटना में यही जातिगत फासीवाद खुलकर सामने आया था। अगर घटनाओं के आंकड़ों को तथ्य बनाकर उसका सही-सही विश्लेषण प्रस्तुत किया जाए तो हमको ज्ञात होगा कि किस तरह पूरा तंत्र देश की बहुसंख्यक अवाम के ख़िलाफ़ काम कर रहा है। पेड मीडिया इन सभी मामलों को किस सफाई से बराबर कर देता है, यह चिंता का विषय है। घटना की सही तफ़तीश हम तक नहीं पहुँचती, उल्टा उस घटना का एक दूसरा पक्ष परोसा जाता है जो सच को दबाने का घिनौना काम करता है। इन सभी के मूल में हिन्दू धर्म संस्कृति से उत्पन्न वर्चस्व और भेदभाव की ग्रंथि हजारों सालों से बदलते सत्तातंत्र में अपने परिवर्तित रूप में कार्यरत रही है।

जब हम संविधान की बात करते हैं, उसमें निहित अधिकारों की बात करते हैं, तो यह साफ तौर पर समझना होगा कि हम राजनीति की भी बात करते हैं, क्योंकि पूरी मशीनरी सत्ता से प्रभावित होकर संचालित होती है। यहाँ राजनीति एक महत्वपूर्ण घटक है। इससे सरोकार आप रखें न रखें, लेकिन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में वह आपसे पूरा सरोकार रखती है। शासन–प्रशासन का संचालन सामान्य जन-जीवन को प्रत्येक स्तर पर प्रभावित करता है। इस बात का उदाहरण हरेक नीति-विधान और उसके संचालन में उपलब्ध है। इस बात को समझने के लिए किसी भारी-भरकम प्रारूप की आवश्यकता नहीं है, बड़े सरल ढंग से इसको समझा जा सकता है, मसलन – भूख से मरने वाले लोगों का  सर्वेक्षण कीजिये और इनका जातिगत खाका तैयार करें। भूख से मरने वाले लोगों को शायद न पता हो लेकिन जानकार व्यक्ति यह समझ सकता है कि इसकी ज़िम्मेदारी सत्ताधारी तंत्र की है। तब एक बड़ा सवाल यहाँ उठता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग कौन है? उनकी क्या मानसिकता है? कुछ अपवादों को छोडकर बाकी सब ब्राह्मणवादी-पूंजीवादी हैं। यह अपवाद उसी ब्राह्मणवादी चक्र में इस कदर फंसे होते हैं कि स्वतंत्र स्थिति में आने की क्षमता विकसित नहीं कर पाते। वास्तव में शिक्षा, सरकारी नौकरी, खेती-किसान, उद्योग और व्यवसाय यानि मनुष्य के जीवन प्रत्येक दिशा व दशा में विकास की परिधि, समान अवसरों व साधनों के समान वितरण पर और उन सामाजिक परिस्थियों पर निर्भर करती है जो मनुष्य को बिना किसी भेदभाव के उसकी गरिमा के साथ स्वीकार करती है। लेकिन देश की सामाजिक व्यवस्था हिन्दू धर्म के वैधानिक विभेदीकरण से इस कदर ग्रस्त है कि जिस समता, स्वतन्त्रता, बंधुत्व को बाबा साहब ने संविधान की प्रस्तावना में निहित किया, वह कभी पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो सकी। इसके मूल में जाने पर पता चलता है कि जातिव्यवस्था पर आधारित होने के कारण ये सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक संबंध इतने असामाजिक और अलोकतान्त्रिक ही नहीं बल्कि इतने अमानवीय होते हैं कि यह क्रूरता की हदों को तोड़ते हुए फासीवादी हमलों में बदल जाते हैं। हजारों-लाखों क्रूर घटनाओं का एक अनवरत सिलसिला है। धर्म और जाति के वर्चस्व में स्त्रियॉं-बच्चियों का क्रूर बलात्कार कर उनकी नृशंस हत्या करना जैसे जघन्य अपराध धर्म की आड़ में हो रहे हैं और पूरा तंत्र इन जघन्य अपराधियों को बचाने की प्रक्रिया में बड़ी तेजी से जुटता है, और तो और ऐसे क्रूर धर्मांद अपराधियों के बचाव पक्ष में तैयार की गई एक भीड़ का सड़कों पर, हाथों में भगवा झण्डा लिए, भारत माता की जय बोलकर किया गया प्रदर्शन, निश्चित ही सोचने पर मजबूर करता है। यह सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है। जम्मू-कश्मीर में एक आठ वर्ष की बच्ची आसिफा के अपहरण के बाद कई दिनों तक उसका कुछ लोगों द्वारा क्रूर बलात्कार कर उसकी नृशंस हत्या कर दी गई। जिससे पूरा देश मातम में डूब गया। वहीं दूसरी तरफ उन्नाव में एक दलित नाबालिक लड़की के साथ सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक ने बलात्कार किया और उसके पिता की विधायक के भाई और पुलिस ने पीट-पीटकर हत्या कर दी। इन खबरों के चर्चा में आने के बाद इनके विरोध से एक दवाब बना है जिससे मामला थोड़ा आगे बढ़ा और आरोपियों की गिरफ्तारी हुई। आगे इस पर क्या फैसला आता है, यह देखना अभी बाकी है । बहरहाल, ऐसी शर्मनाक घटनाएँ किसी भी संवेदनशील समाज का हिस्सा नहीं हो सकतीं। इस सबके चलते अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की धज्जियां उड़ चुकी हैं। विगत कुछ वर्ष पहले एक आदिवासी महिला कार्यकर्ता सोनी सूरी के जिस्म में पत्थर डालने वाले पुलिस अधिकारी को पुरस्कृत किया जाता है। यह लोकतन्त्र का मनुवादी-पूंजीवादी संस्करण है जिसे वर्तमान सरकार पूरी तरह से लागू कर खेल रही है । निसंदेह यह आलोकतांत्रिक प्रक्रिया है। इस पर सरकारों की जवाबदेही बनती है। यदि इस मनोविकृति या राजनीतिक मनोविकार पर मानवीय दृष्टिकोण से सोचें तो पहला सवाल यही उठता है कि यह मनोविज्ञान कैसे पनपता है? ये कैसी श्रेष्ठता ग्रंथि है जो वर्चस्व के लिए हमेशा तथाकथित उच्चजाति वर्ग को इतना भयभीत रखती है कि उसको मनुष्यता के मानकों से नीचे या कहा जाए गर्त में पहुँचा देती है । जब आप इन सवालों का हल ढूँढने निकलेंगे तो इसके चिंतनफलक (Paradigm) धार्मिक-राजनीतिक मनोविज्ञान ही होंगे, उससे एक पूरा सामाजिक ताना-बाना अपने आप शीशे की तरह साफ नजर आयेगा, क्योंकि यह दोनों आपस में इतने गूँथे हुए हैं कि इनको अलग करके देखना संभव नहीं है। यहाँ यह भी समझना मुख्य बात है कि तथाकथित हिन्दू धर्म (सनातन धर्म) की कोख से निकले वर्णव्यवस्था के विधान और उसके टूटने के भय और उससे मिलने वाली चुनौतियों के डर से पैदा हुए मनुविधान (मनुस्मृति) में दलितों और स्त्रियों के लिए घोर कड़े विधान बना दिये गए। यह नोट करना चाहिए कि स्त्रियों के लिए पितृसत्तात्मक और सामंती संस्कृति के उदय का रूप धार्मिक है, इसके साथ ही तथाकथित हिन्दू धर्म पूरी तरह से राजनीतिक है, जो भेदभाव और अलगाव पर टिका है। इसे लिंग और जाति की आंतरिक संरचना में आसानी से देखा जा सकता है। इस संदर्भ में यह स्वीकार्य है कि डॉ अंबेडकर ने जातिप्रथा को केवल दलितों की ही नहीं, पूरे भारतीय समाज के विकास की सबसे बड़ी और गहरी समस्या माना है। जातिप्रथा संबंधी अपने गहन अध्ययन में वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि यह केवल दलितों को ही नहीं, गैर दलितों की भी सबसे बड़ी समस्या है। जाति दलितों को ही नहीं, गैरदलितों से भी तोड़ती है। जाति आधारित भेदभाव के कारण ही दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता रहा है और इस अमानवीय व्यवहार की पूरी प्रक्रिया में गैरदलितों का अमानवीयकरण (Dehumanization) होता गया है।

बाबा साहब अंबेडकर ने जातिविहीन व वर्गविहीन समाज का सपना देखा था। इस संबंध में यह निश्चित कर लेना चाहिए कि किसी भी प्रकार का भेदभाव चाहे वह जातिगत हो अथवा लिंगाधारित, वह समाज को एक उन्नत समाज में कभी भी तब्दील नहीं होने देगा। इसके उलट यह ऐसा भयावह अवरोधक है जो विकृत समाज को जन्म देता है जहाँ मानवीय मूल्यों के लिए निषेधात्मक प्रवृत्ति का मनोविज्ञान संस्कारित रूप से तैयार होता है।

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संदर्भ सूची :-

1-संविधान की प्रस्तावना

2-मानस मुकेश , लेख-डॉ अंबेडकर का सपना, पुस्तक –अंबेडकरवादी विचारधारा और समाज, संपादक तेज सिंह, प्रथम संस्करण : 2008, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली.

3-एन. डी. टी.वी. हिन्दी न्यूज़, प्राइम टाइम (संबन्धित घटनाएँ )

4-दैनिक भास्कर में प्रकाशित संबन्धित घटनाएँ

5-सोशल मीडिया पर प्रकाशित संबन्धित घटनाएँ

 

 

 

 

 

 


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