बेगूसराय का कम्युनिस्ट आंदोलन – 1 / जनार्दन प्रसाद सिंह


बिहार का बेगूसराय ज़िला, जो 1972 से पहले मुंगेर ज़िले के अंतर्गत एक सब-डिविशन था, की ख्याति बिहार के लेनिनग्राद के रूप में रही है। पिछली सदी के 50 और 60 के दशक में वहाँ एक कम्युनिस्ट कार्यकर्त्ता के रूप में सक्रिय रहे कॉमरेड जनार्दन ने उस दौर के आंदोलन की खूबियों और खामियों को याद किया है। इस दस्तावेज़ी लेखन में दूसरी जगहों के वर्तमान और भूतपूर्व कम्युनिस्ट कार्यकर्त्ताओं को भी अपने अनुभवों की झलक मिले तो कोई आश्चर्य नहीं।

1950 से 1965 तक का कालखंड बेगूसराय की कम्युनिस्ट पार्टी का स्वर्णिम काल था। मैंने भी उसी समय 1952-53 के सत्र में मैट्रिक की परीक्षा दी और आगे की पढ़ाई के लिए बेगूसराय आ गया। वहाँ बीए पास करने तक यानी 1958 तक मैं जी. डी. कॉलेज में रहा और कई छात्र आंदोलनों में मैंने खुलकर भाग लिया। इसलिए पार्टी की प्रांतीय कमेटी ने मुझे ज़िला कमेटी का सदस्य बना दिया। यह जानकर किसी को भी आश्चर्य होगा कि उस समय जी. डी. कॉलेज में 22 कार्ड होल्डर पार्टी मेम्बर थे। सब एक से बढ़कर एक। सभी पार्टी के काम में अपनी भूमिका निभाने के लिए लालायित रहते थे। कोई आंदोलन हो या चुनाव प्रचार, वे पार्टी के लिए बहुत ही कारगर हथियार साबित होते।

पार्टी में भी संगठन बहुत जीवंत और जागरूक था। कम्युनिस्ट पार्टी के सभी बड़े नेता हर सप्ताह लगभग दो या तीन दिन, और कुछ लोग तो छह दिन, गाँवों में बिताते थे। गाँवों के संगठन भी जीवंत और जागरूक थे। मैं जैसा जानता हूँ, लगभग हर गाँव में दो-चार या दस लोग पार्टी के सक्रिय सदस्य थे। कॉ. सुखदेव सिंह, कॉ. सियाराम यादव, शुरू के दिनों में कॉ. देवकी सिंह भी गाँवों में रहा करते थे। कॉ. बी. के. आज़ाद तो लगभग अपने पसंदीदा क्षेत्र के गाँवों में ही रहते थे। कुछ पार्टी इकाइयाँ ऐसी थीं जहाँ गाँव के शादी-विवाह के फ़ैसले भी लिये जाते थे। ज़ाहिर है, गाँवों में जाकर टिकने वाले नेता वहाँ सोये तो नहीं रहते होंगे। उनके संपर्क में कुछ-न-कुछ गतिविधियाँ होती रहती थीं।

डॉ. पी. गुप्ता तो बेगूसराय पार्टी की जान ही थे। वे दो रुपये में मरीज़ देखते थे और पार्टी कॉमरेड को तो अपने पास से दवाइयाँ भी देते थे। वे भी इलाज के लिए दूर-दूर गाँवों में जाते थे और मरीज़ को देखने के बाद कुछ ख़ास लोगों से पार्टी संबंधी चर्चा भी करते थे।

कॉमरेड सूरज का पूरा नाम सूर्यनारायण सिंह था। वे पार्टी की बेगूसराय ज़िला इकाई के सेक्रेटरी थे और आगे एमपी/सांसद भी हुए। सब हाल उनका एक ही तरह का रहन-सहन रहता था। वे भी अधिकतर गाँवों का दौरा किया करते और पार्टी यूनिट के साथ सतत संपर्क बनाये रखते थे। वे सदा ग्रामीण वेशभूषा में ही रहते थे और खाना भी वैसा ही खाते थे। मैंने उन्हें भूख लगने पर शाम का नाश्ता करते देखा है। बहुत सारा भूँजा मँगाकर दरी के ऊपर बिछे हुए अख़बार पर सारा भूँजा रख दिया जाता और वहाँ मौजूद सभी कॉमरेड खाने में लग जाते। फिर चाय चलती थी। किसी-न-किसी समर्थ कॉमरेड को उस दिन के भूँजा और चाय का ख़र्च वहन करना पड़ता था और वे खुशी-खुशी करते थे। यह चलन पार्टी को बाँधे रखने में अहम भूमिका निभाता था।

इस तरह का सामूहिक नाश्ता-खाना पार्टी कामरेड्स के बीच बड़े आनंद का अवसर होता था और इनमें कई बार शहर-देहात के कार्यकर्त्ताओं के बीच के संबंधों की गहराई झलकती थी। नावकोठी नामक गाँव और उसके आसपास के मल्लाह कॉमरेड महीने में एकाध बार मुक़दमे की तारीख़ पड़ने पर बेगूसराय आते थे जो उन दिनों सब-डिवीज़न हेड-क्वार्टर हुआ करता था। कई लोग एक साथ आते थे और अपने खाने के लिए रोटी और मछली लाते थे। लेकिन हर मल्लाह कॉमरेड के पास तीन-चार लोगों के खाने लायक़ मात्रा होती थी। मक्के की बड़ी-बड़ी रोटियाँ, आजकल के पिज़्ज़ा वाले आकार की, और छोटी मछली। उनके आने के बाद पार्टी ऑफिस के आसपास के सभी कामरेड्स को सूचित कर दिया जाता और जिसे भी सूचना मिलती, दौड़ा चला आता कि मक्के की रोटी और मछली खाने को मिलेगी। हर किसी को रोटी का एक बड़ा टुकड़ा और उसी पर रखकर छोटी मछली दे दी जाती। हम लोग गाँव से आये उन साथियों के साथ वहीं पार्टी ऑफिस के बारामदे पर बैठकर और कुछ लोग खड़े-खड़े इस भोज का मज़ा लेते। ऐसा लगभग हर महीने होता क्योंकि उन्हें कोर्ट की ओर से हर महीने की तारीख़ दी जाती थी।

बेगूसराय की कम्युनिस्ट पार्टी के विकास में वहाँ की मिट्टी में पलने-बढ़ने वाले लोगों के चारित्रिक गुणों की भी भूमिका थी। यह क्षेत्र ऐसा था जिसमें सौहार्द के बीज अनायास और तेज़ी से पनपते थे। यहाँ कभी हिन्दू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ था। जातिवादी संघर्ष और हिंसा का नामो-निशान नहीं था। 1984 में जब सिखों के विरुद्ध भयानक दंगे हुए, तब भी बेगूसराय शांत रहा, कोई घटना नहीं हुई। मैंने तो चुनावों में भी भाग लिया था; कभी गोली नहीं चलती थी, झड़पें होती थीं, लेकिन लप्पड़-थप्पड़, लाठी-डंडा से ऊपर बात नहीं जाती थी।

यह स्थिति तब तक बनी रही जब तक कामदेव सिंह नामक एक बहुत बड़े स्मगलर का चुनाव-प्रचार में प्रवेश नहीं हुआ था। कामदेव सिंह पढ़े-लिखे नहीं थे। बैलगाड़ी चलाते-चलाते वे स्मगलर बन गये थे। पहले गाँजा की चोरबाज़ारी के सिलसिले में नेपाल के दिग्गज स्मगलरों के संपर्क में आने पर उन्होंने अपने कारोबार का क्षेत्र-विस्तार किया। इसी क्रम में उन्होंने विशाल संपदा खड़ी कर ली और बड़ा संगठन भी बना लिया। उनके संपर्क में सैकड़ों नौजवान आये और उन्होंने सभी प्रकार के मारक हथियारों के संचालन का कौशल हासिल किया। उनका यह संगठन लगभग एक आर्मी की टुकड़ी की तरह था। कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर तत्कालीन सभी दलों के नेताओं ने, जिनका भी बेगूसराय से संबंध था, सारे केस हटवा लेने के झूठे वादे करके उन्हें ठगा और अपना स्वार्थ सिद्ध किया। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के ख़िलाफ़ कामदेव सिंह का इस्तेमाल करके अपना काम निकाल लिया लेकिन उन पर लगे सारे स्मगलिंग और हत्या के मामले ज्यों-के-त्यों बने रहे।

बेगूसराय के राजनेताओं के विपरीत, यह बेगूसराय का पुलिस तंत्र था जिसके सक्रिय सहयोग के कारण कामदेव सिंह क़ानून की गिरफ़्त में आने से बचते रहे। यहाँ तक कि कम्युनिस्ट पार्टी के लोग जब सरकार में शामिल हुए तब भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाये। कामदेव सिंह के विरुद्ध संघर्ष में पार्टी ने अपना बहुत मूल्यवान भविष्य खो दिया। कई अच्छे भावी नेता मारे गये। पार्टी भी अपने पथ से विपथ हुई। गुंडा गिरोहों की आपसी दुश्मनी से लाभ उठाते हुए उन्हीं गुंडों को पार्टी ने अपने साथ लिया जिनके ख़िलाफ़ अभी तक वह संघर्ष करती आयी थी। इस काम में डॉ. पी. गुप्ता की अगुआ भूमिका मानी गयी। इसी के कारण पार्टी उन रास्तों पर चली जिन पर चलकर उनके लोगों ने करप्शन के गुर सीखे और पैसों से प्यार करना भी।

यह पार्टी ऐसी बदली कि उसका चेहरा ही पहचान के बाहर हो गया। कॉमरेड सूरज के रहते ही पार्टी में भोला सिंह जैसे एक एमएलए हुए और पार्टी ऑफिस में ठेकेदारों का आना-जाना, उठना-बैठना भी शुरू हो गया। यह भी सच है कि भोला सिंह बहुत लोकप्रिय भी हो गये।

कॉम. सूरज की बेदाग छवि के कारण जब उन्होंने कामदेव सिंह की गिरफ़्तारी के लिए भूख हड़ताल की तो उन्हें सभी पार्टियों का समर्थन हासिल हुआ। इस आमरण अनशन ने ऐसी फ़िज़ा तैयार की कि सारा प्रशासन तंत्र हिल उठा और हलचल दिल्ली तक चली गयी। कामदेव के उत्पात से निपटने के लिए केंद्र से जो टीम आई, उसने अपने उद्देश्य के बारे में स्थानीय पुलिस प्रशासन को कुछ नहीं बताया। सब कुछ गोपनीय रखकर कामदेव सिंह पर दबिश हुई और वे मारे गये।

कामदेव सिंह के साथ लड़ाई ने पार्टी को इस कदर क्षत-विक्षत कर दिया कि सारा भविष्य ही अंधकार में डूब गया। कई भावी नेता मारे गये। इंद्रदेव और विभूति जैसे भविष्य के नेता पार्टी से छिन गये। मुझे तो उन लोगों से मिलने का अवसर नहीं मिला क्योंकि बेगूसराय को भूलकर मैं पटना में पूरी तरह से रम गया था। मेरे परिवार को तब इसकी नितांत आवश्यकता थी। और फिर बेगूसराय में न पार्टी को मेरी ज़रूरत महसूस होती थी, न मुझे पार्टी के संपर्क की। फिर भी कई मित्रों के माध्यम से जानकारी तो मिलती ही रहती थी।

बेगूसराय की पार्टी जितनी सुसंगठित थी, उसे देखते हुए यह किसी के लिए भी हैरत और जिज्ञासा का विषय होगा कि उसका मुक़ाबला कामदेव सिंह ने कैसे किया होगा! वस्तुतः, कामदेव सिंह ने काफ़ी सुसंगठित तंत्र खड़ा कर लिया था। इस संगठन में बड़ी संख्या में समर्पित नौजवान कार्यकर्त्ता थे जिन्हें आधुनिक हथियारों की बाक़ायदा ट्रेनिंग दी गयी थी। ये नौजवान आम तौर पर उसके गाँव के आसपास के होते थे और ज़रूरतमंद परिवारों से आते थे। उन्हें समय पर पर्याप्त मात्रा में आर्थिक मदद कामदेव सिंह से मिल जाती थी। बहन की शादी हो, घर के बीमार सदस्यों का महँगा इलाज कराना हो, या माँ-पिता की मृत्यु पर क्रिया-कर्म में करना हो—इन मौक़ों पर ऐसी आर्थिक मदद मिल जाती और वे कामदेव सिंह के मुरीद हो जाते।

कामदेव सिंह के संगठन में बढ़िया वेतन भी मिलता था। यहाँ तक कि अगर वह नौजवान पकड़ा जाकर जेल चला गया, तब भी उसके वेतन की राशि उसके घर पहुँचती रहती थी। मारे जाने पर एकमुश्त बहुत अच्छी रक़म परिवार वालों को दी जाती। यही वजह है कि लड़के उनके प्रति समर्पित और ईमानदार बने रहते थे और कभी छोड़कर भागते नहीं थे। इस तरह का व्यवस्थित क्रिमिनल संगठन खड़ा करना कामदेव सिंह के बस की बात तो नहीं थी, इसलिए ऐसा लगता है कि संगठन का प्रबंधन कोई और देखता होगा। जहाँ तक खुद कामदेव की बात है तो अपनी अशिक्षा के कारण वे अपनी अपार संपदा का कोई चिरस्थायी साबित होने वाला सदुपयोग नहीं कर सके। कोई भी बढ़िया आमदनी देने वाला निवेश उन्होंने नहीं किया। जिन लोगों को उन्होंने अपने साथ लिया और काफ़ी कुछ दिया, वे भी उनके निधन के बाद उनके परिवार के प्रति ईमानदार नहीं बने रह सके। इसके विपरीत, मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूँ, और मैं ही क्यों, बेगूसराय और आसपास के सभी लोग जानते हैं, जिन्होंने गाँजे की स्मगलिंग से अपार धन कमाया और किसी राजनीतिक दल से कोई झमेला नहीं लिया। सभी राजनीतिक पार्टियों को चंदा देते हुए, शिक्षण संस्थाओं की मदद करते हुए ऐसे लोग समाज में खूब सम्मानित बने रहे।

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बेगूसराय में कम्युनिस्ट पार्टी के बिखराव की वजहों पर सोचते हुए कई बातें सामने आती हैं।

पहली बात तो यह कि आम शिक्षा और पार्टी शिक्षा, दोनों में पार्टी की कोई अभिरुचि नहीं थी। मैं ज़िला कमेटी का सदस्य बना तो 3-3 दिनों तक चलनेवाली बैठकों में भाग लेता रहा, पर मेरी दिलचस्पी शिक्षा-संस्थानों, शिक्षकों और विद्यार्थियों की समस्याओं में थी और पार्टी नेतृत्व की इन विषयों में कोई रुचि नहीं थी। अव्वल तो इस आइटम को आख़िरी दिन रखा जाता था। उस दिन जब बात होने वाली होती तो लोग दूसरी समस्याओं पर वाद-विवाद करके थक चुके होते थे। फिर अभिरुचि और जानकारी, दोनों के अभाव में इस समस्या पर बात करना या सुनना पसंद नहीं करते थे। वे यह कहकर टाल देते कि इसे कॉमरेड जे पी सुलझा लेंगे, हम लोग इस पर बहुत विस्तार से बहस करके क्या कर सकते हैं! उन्हें शायद इस बात में यक़ीन नहीं था या जानकारी नहीं थी कि इन्हीं शिक्षण संस्थानों में नेता पैदा करने की पचास प्रतिशत से ज़्यादा क्षमता थी। शेष पचास प्रतिशत ही संघर्षों के कारण पार्टी से जुड़ते थे। मैं ज़िला कमेटी की बैठकों में बैठ-बैठ कर बोर हो चुका था।

एक घटना से इस मामले में पार्टी की स्थिति साफ़ हो जायेगी। जब मैं चुनाव से वापस आया तो मेरे पास कोई काम नहीं था। मैंने पार्टी के सामने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि मैं पार्टी के आदेश पर चुनाव में चला गया, पर मैं पूरा वक्ती कार्यकर्त्ता नहीं बन सकूँगा। मुझे कोई ऐसा काम करना होगा जिससे मैं कुछ पैसा कमाकर अपने परिवार को बेगूसराय में रख सकूँ। मैंने एक काम तो यह किया कि अपनी यूनिट में, जिसका मैं सेक्रेटरी था, एक कार्यक्रम चलाया। उस समय रूस-चीन विवाद शुरू हो चुका था और उससे पहले कॉम. स्टालिन की भर्त्सना का प्रस्ताव पार्टी में ख्रुश्चेव के नेतृत्व में पास हो चुका था। उसी समय पार्टी एजुकेशन के लिए एक किताब रूस से प्रकाशित होकर आयी जिसका नाम था, ‘फाउंडेशंस ऑफ़ मर्क्सिज़म एंड लेनिनिज़म’। हम लोगों ने इसे ही आधार बनाकर अपनी यूनिट में हर शनिवार को लंबी बहसों का सिलसिला शुरू किया। ऐसा कार्यक्रम बनाया गया कि हर शनिवार शाम को एक कॉमरेड पहले से निश्चित किये गये विषय पर बोले और फिर दूसरे सारे सदस्य प्रश्नोत्तर में भाग लें। यह कार्यक्रम क़रीब तीन-चार महीने तक चला। इस तरह कई शिक्षक तैयार हुए जो पार्टी के क्लासों में किसी खास क्षेत्र के कार्यकर्त्ताओं को पार्टी की विचारधारा से अवगत करा सकते थे। मैंने बुद्धिजीवी सेल की ओर से विभिन्न थाना कमेटियों को पत्र लिखा कि अगर उनकी दिलचस्पी अपने यहाँ कार्यकर्त्ताओं को प्रशिक्षित करने में हो तो हमें कार्यक्रम बनाकर अवगत कराएँ, हम लोग शिक्षक भेज देंगे। उनकी ओर से जो दिलचस्पी दिखायी गयी, वह देखने लायक़ थी। दो जगह सफल कार्यक्रम शुरू किये गये। पहले स्थान पर जो कार्यक्रम हुआ, उसमें यह ग़लती देखी गयी कि बाहर गाँव से आने वाले कार्यकर्त्ताओं और शिक्षकों के नाश्ते और भोजन की व्यवस्था में स्थानीय कार्यकर्त्ता इतने व्यस्त हो गये कि उन्हें इत्मीनान से क्लास में बैठने की फुरसत नहीं मिल पायी। दूसरे स्थान पर इसमें सुधार किया गया। एक जगह पर लोगों को बैठाकर खिलाने-पिलाने के बजाये यह व्यवस्था की गयी कि स्थानीय कॉमरेड बाहर से आने वाले कार्यकर्त्ताओं और शिक्षकों में से बाँट-बाँटकर अपने-अपने घरों में नाश्ता और भोजन कराएँ। इससे क्लास में सभी स्थानीय कार्यकर्त्ता उपस्थित रहने लगे। दूसरी जगह का कार्यक्रम और भी सफल रहा। लगता था कि जैसे कोई जन-आंदोलन चल रहा है। यह दृश्य देखकर किसी को भी यह महसूस होता कि ऊपर बैठे नेताओं की अपेक्षा निचली कमेटियों के कार्यकर्त्ता पार्टी शिक्षा के प्रति कितने जागरूक और लालायित थे।

यह सब चल रहा था कि एक दिन कॉम. सूरज का संदेश लेकर एक आदमी आया और मुझे पार्टी ऑफिस बुलाया गया। कॉमरेड ने पूछा कि आपने किस तरह यह पार्टी शिक्षण का काम चलाने का निर्णय अकेले अपने यूनिट में ले लिया, जबकि आपको ज़िला कमेटी की अनुमति और सहयोग से यह कार्यक्रम चलाना चाहिए था। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि आप द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पढ़ाने में चीनी लाइन पढ़ाते हैं जबकि हमारी ऑफिशियल लाइन सोवियत लाइन है। मैंने कहा कि मैं तो रूसी-चीनी-विवाद की बात कभी पढ़ाता ही नहीं हूँ, बल्कि मेरे सभी कॉमरेड सोवियत प्रकाशन ‘फाउंडेशंस.. ’ को ही आधार बनाकर अपना कार्यक्रम चलाते हैं। मैंने उनसे यह भी कहा कि पार्टी प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाना ज़रूरी है कि नहीं, आप व्यक्तिगत तौर पर क्या मानते हैं? यह एंटी-पार्टी कार्यक्रम है या पार्टी को मज़बूत करने वाला कार्यक्रम है? जहाँ तक ग़लत पढ़ाने या चीनी लाइन पढ़ाने का सवाल है, इसका तो एक ही समाधान है कि पूरी ज़िला कमेटी बैठे और मैंने अब तक जो पढ़ाया है, उसे प्रस्तुत करूँ, फिर मुझसे प्रश्न करके सपष्टीकरण माँगा जाये और यह भी बताया जाये कि इसमें कहाँ पर रूसी-चीनी-विवाद है।

खैर, इस पर तो बात आगे बढ़ी नहीं, बस कॉमरेड ने सीधे आदेश दे दिया कि आप यह काम छोड़ दीजिए, ज़िला कमेटी इसे करेगी। लंबी बहस के बाद मैंने काम आगे न करने का निश्चय किया जिससे आम कार्यकर्त्ता में बहुत असंतोष हुआ। ज़िला कमेटी में कोई भी सदस्य द्वंद्वात्मक और ऐतिहासिक भौतिकवाद पढ़ाने में सक्षम नहीं था। एक बी. के. आज़ाद ही कुछ कर सकते थे तो वे हमेशा कुछ मौलिक चिंतन में ही लगे रहते थे।

वैसे बी. के. आज़ाद के ‘मौलिक चिंतन’ में काफ़ी कुछ सचमुच ग़ौर करने लायक़ होता था। एक बार की बात है, हम लोग ज़िला कमेटी की बैठक में भाग लेने किसी गाँव में गये थे। वहाँ बैठक में इस विषय पर बात चल रही थी कि बेगूसराय में अपना ऑफ़िस बनाने के लिए कुछ ज़मीन खरीदी जाये और संभव हो तो पार्टी की किताबों की एक दुकान खोली जाये। उस समय बी. के. आज़ाद ने अलग ले जाकर मुझे कहा, तुम चुपचाप सुन रहे हो, कुछ अपने विचार नहीं रखोगे? मैंने कहा, आज़ाद साहब, इस संबंध में मुझे जब कुछ करना ही नहीं है तो बेकार मैं माथापच्ची क्यों करूँ? इस पर आज़ाद ने मौलिक लेकिन सही बात कही। बोले, मकान-दुकान-प्रेस सब हो जाये तो यह पार्टी स्वयं हैव्स की श्रेणी में आ जायेगी। फिर वह हैव नॉट्स का सही नेतृत्व क्यों और कैसे करेगी? दूसरी बात, कल को अगर कोई राष्ट्रीय दुर्घटना हो जाये और पार्टी को ग़ैर-क़ानूनी क़रार कर दिया जाये, तो ये नेता जो गद्दी पर बैठे हैं, सरकार के भरोसे सारी संपत्ति छोड़कर अन्डरग्राउन्ड होंगे या जेल जा पायेंगे, कि सरकार के आगे सरेंडर कर देंगे?

यह बात तो सैद्धांतिक रूप से सही थी, पर मेरे जैसे पार्ट टाइम सदस्य को ये बातें उठाकर वहाँ नक्कू नहीं बनना था।

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अब मैं एक नितांत अप्रिय प्रसंग पर बात करना चाहता हूँ। यह बात कॉमरेड चंद्रशेखर से संबंधित है। अप्रिय इसलिए कि बेगूसराय की कम्युनिस्ट पार्टी आँख मूँदकर कॉमरेड पर निर्भर होती जा रही थी। ऐसा लगता था कि जिस दिन वे किसी वजह से बेगूसराय पार्टी को उपलब्ध नहीं रहेंगे, यहाँ की पार्टी ही बिखर जायेगी। कॉम. चंद्रशेखर को बेगूसराय ने जितना प्यार और सम्मान दिया, संभवतः वे उस मात्रा में उसे लौटा नहीं पाये। उनका बेगूसराय के साथ चुनावी रिश्ता था, जैसा कि उनके समकालीन कांग्रेसी नेताओं का हुआ करता था। वस्तुतः वे बिहार के दूसरे सबसे प्रभावशाली नेता बाबू रामचरित्तर सिंह के पुत्र थे। इसीलिए कांग्रेस से भी अनेक लोग उनसे स्नेह-सहयोग का रिश्ता रखते थे। कॉम. चंद्रशेखर  का क़द बेगूसराय को मिली हुई तीन बड़ी इंडस्ट्री के इलाक़े में काम करने की वजह से बढ़ा। ये थीं : गंगा किनारे बरौनी थर्मल पॉवर, बरौनी खाद कारख़ाना, और तीसरा बरौनी तेलशोधक कारख़ाना। इन कारख़ानों के बनने से बेगूसराय के आसपास के गाँवों का चरित्र ही बदल गया। ये आम तौर पर खेतिहर भूमिहारों के गाँव हुआ करते थे। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में इन गाँवों ने आन्दोलन करके अधिगृहीत ज़मीन का बहुत अच्छा दाम वसूला। फलतः वहाँ नगदी वाले लोगों की संख्या काफ़ी बढ़ गयी और इन खेतिहर गाँवों का चरित्र ही बदल गया। कुछ लोगों ने टैक्सियाँ ख़रीद लीं, कुछ ने होटल का धंधा शुरू कर दिया या किराना आदि की बड़ी दुकानें खोल लीं। पैसा अपने साथ दारू भी लाया जो उस खेतिहर समाज में बहुत बुरा माना जाता था।

इस पूरे क्षेत्र में कॉम. चंद्रशेखर का बहुत प्रभाव था, क्योंकि तीनों कारख़ानों में ली गयी ज़मीनों का ऊँचा मुआवज़ा वसूलने और हर घर से एक आदमी को नौकरी दिलाने के आन्दोलन में उनकी नेतृत्वकारी भूमिका थी। लेकिन वे लंबे समय तक बेगूसराय में रहकर पार्टी को सही दिशा-निर्देश नहीं दे सकते थे। वे प्रांतीय नेता थे और ज़्यादा समय पटना में रहते थे।

कॉमरेड चंद्रशेखर स्वयं विधान सभा चुनाव तेघरा चुनाव क्षेत्र से लड़ते थे जो उनका गाँव का क्षेत्र था। चुनाव के समय उनका पूरा ध्यान तेघरा पर ही लगा रहता था। वहाँ के लिए वे सारी रणनीति बनाते रहते थे। सही कहूँ तो वे कांग्रेसी संस्कृति वाला चुनाव लड़ते थे। अपने सारे रिसोर्सेस और साधन वहीं लगाते थे, बल्कि पार्टी से भी जो कुछ मिलता था, उसमें से लॉयन्स शेयर वे अपने विधान सभा क्षेत्र में ही लगाते थे। मैं जब चुनाव में खड़ा हुआ तब मुझे इस रहस्य का ज्ञान हुआ, लेकिन मैंने अपने लिए कभी बात नहीं उठायी। सीताराम महाज ने यह जानकर कि मुझे पार्टी फंड में से कुछ नहीं मिला, अपनी शर्मिंदगी व्यक्त की। मैं तो पहले से ही जानता था कि हम लोगों को खड़ा ही किया गया है कॉमरेड के चुनाव क्षेत्र का सुरक्षा घेरा बनाने के लिए। चुनाव से काफ़ी पहले ही हमलोगों ने अपनी यूनिट में बातचीत करके यह तय किया था कि पत्र लिखकर प्रांतीय कमेटी को भेजा जाये। हम लोगों ने प्रांतीय कमेटी को सुझाव दिया था कि कॉमरेड चंद्रशेखर का एक विधानसभा क्षेत्र से लड़ना पार्टी के लिए बहुत हानिकारक है; वे जिस तरह के लोकप्रिय नेता हैं, उसे देखते हुए उन्हें केवल छहों विधानसभा क्षेत्र और एक लोकसभा क्षेत्र पर सुयोग्य उम्मीदवार का चयन करके उन्हें लड़ाना और अपने प्रभाव से जिताना चाहिए। उनका एक क्षेत्र पर ध्यान लगे रहने से पार्टी को हानि होने की आशंका है। बल्कि यह कहना चाहिए कि उनका जितना उपयोग हो सकता है, उतना नहीं हो रहा है।

हमारे पत्र की प्रांतीय कमेटी ने, जैसी कि उम्मीद थी, कोई नोटिस नहीं ली।

बहरहाल, इन शिकायतों के बावजूद मेरा मानना है कि वहाँ पार्टी को ठीक से संभालने की क्षमता जिन दो नेताओं में थी, उनमें से एक थे कॉम. चंद्रशेखर। दूसरे थे, कॉम. सूर्यनारायण सिंह। ये क्रमशः चाँद-सूरज थे। कॉमरेड चंद्रशेखर की असमय मृत्यु से पार्टी को अपूरणीय क्षति हुई और बिखराव की शुरुआत हो गयी।

बूर्जुआ राजनीति में लगी पार्टियों और कम्युनिस्ट पार्टी में यह फ़र्क़ तो होना ही चाहिए कि किसी व्यक्ति-नेता और उसके जुटाये संसाधनों पर उसकी निर्भरता न हो, और दूसरे, उसके प्रभावशाली नेता भी खुद को अपरिहार्य बनाने के सोच से मुक्त होकर अपनी कतारों को योग्य और सक्षम बनायें। इस उसूल को व्यवहार में न उतार पाने की सूरत में बड़े से बड़ा कम्युनिस्ट आंदोलन बिखर जाता है।

जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा, उस दौर में पार्टी के पास एक से बढ़कर एक लोग थे। पार्टी के ऐसे रत्नों में से एक थे कॉमरेड सियाराम यादव। अद्भुत व्यक्ति थे। उनका जन्म एक अत्यंत ग़रीब परिवार में हुआ था। उनके पिता जी से मैं मिला था। वे सुंदर सिंह नाम के एक भूस्वामी के यहाँ बँधुआ मज़दूर थे। उन्हें मैंने बहुत छोटा अधोवस्त्र पहने, लंबी दाढ़ी बढ़ाये, खुरपी से खेत में काम करते देखा था। सियाराम यादव बहुत ही तीक्ष्ण बुद्धि के आदमी थे। उन्होंने बीए-बीएड पास करके एक स्कूल शिक्षक का काम पकड़ लिया था, तभी पार्टी की ओर से उन्हें पटना आने और पीपीएच में अपना हाथ बँटाने का आदेश हुआ। कुछ दिनों बाद उन्हें बेगूसराय भेज दिया गया। सियाराम ने नौकरी लगने के बाद एक ग़लती कर ली थी; उन्होंने विवाह कर लिया था और दो बच्चे भी हो गये थे। मुझे सही जानकारी नहीं है लेकिन पार्टी सूत्रों से ज्ञात हुआ था कि शायद 30-40 रुपये उन्हें पार्टी से प्रतिमाह मिलते थे। अब इन पैसों में रहने के लिए मकान लें कि महीने भर परिवार को खिलाने के लिए राशन पानी का इंतज़ाम करें! नतीजा यह हुआ कि एक बहुत सुयोग्य नेता को परिवार के राशन के लिए सिकरोहला के कॉमरेड बीसो दा और वहीं के श्री श्याम बाबू की सेवा में लगे रहना पड़ता था। ये लोग अच्छे काश्तकार थे और अनाज आदि से मदद करने में सक्षम थे तथा पार्टी में भी अदम्य विश्वास रखते थे। दूसरे सज्जन थे श्रीराम सिंह, जो रामदीरी गाँव के सम्पन्न किसान भी थे और व्यापार उद्योग से भी संबंध रखते थे। उन दिनों अभ्रक का खनन भारी आमदनी देने वाला काम था। श्रीराम सिंह उसमें भी लगे हुए थे। वे भी कॉमरेड सियाराम की थोड़ी बहुत मदद करके उनसे लाभ उठाते थे। बाद में उन्हीं के सहयोग से कॉमरेड सियाराम ने छोटे ठेके लेने का काम शुरू किया। तेलशोधक कारखाना बनने के दौरान जो रिहायशी मकान बन रहे थे, उसमें भी उन्होंने लकड़ी आदि की सप्लाइ का काम किया।

इसी क्रम में दूसरे सदस्य थे कॉमरेड सुखदेव सिंह। बहुत ही ग़रीब और बुद्धि के बहुत ही तीक्ष्ण व्यक्ति थे। उन्होंने बी एससी की पढ़ाई के समय कॉलेज छोड़कर अखिल भारतीय पोस्टल स्ट्राइक में भाग लिया और तब से पार्टी में ही रह गये। उन्हें कॉमरेड सियाराम की तरह कोई मददगार भी नहीं मिल सके थे। जब मैं ‘जनशक्ति’ दैनिक के संपादकीय में नियुक्त हुआ, उसी समय उन्हें भी और कॉमरेड ब्रह्मदेव राय को व्यवस्थापकीय विभाग में नियुक्त किया गया। उनकी ग़रीबी की ऐसी-ऐसी घटनाओं से मेरा वास्ता पड़ा कि मैं उनका ज़िक्र भी नहीं कर सकता। एक ही कम्यून में एक-एक कमरा लेकर हमलोग रहते थे। कॉमरेड राय भी अपने परिवार के साथ रहते थे। सुखदेव भाई अपनी माँ और दो बच्चों के साथ थे। उनकी पत्नी गाँव में रहती थीं। कम्यून में किचन और बाथरूम कॉमन था।

जब मैंने लक्ष्मी पुस्तकालय (विद्यालयी पुस्तकों का एक प्रकाशन) में पार्ट टाइम काम करना शुरू किया, उसके कुछ ही दिनों बाद ‘जनशक्ति’ का प्रकाशन बंद हो गया। तब तक मैं लक्ष्मी पुस्तकालय के व्यवस्थापकीय और संपादकीय, सम्पूर्ण काम का प्रभारी हो चुका था। मैंने सुखदेव भाई को वहाँ नियुक्त कर लिया। कुछ दिन बढ़िया काम करने के बाद उन्हें बेगूसराय ब्रांच का मैनेजर नियुक्त करके वहाँ भेज दिया गया। यह उनके मनोनुकूल था, क्योंकि वहाँ से वे पार्टी का काम भी थोड़ा-बहुत कर लेते थे। इस काम में आमदनी बेहतर होने से परिवार को खाने-पीने की अच्छी सुविधा मिल गयी। ग़लत बात यह हुई कि उनका बड़ा बेटा वीरेंद्र गुंडागर्दी में अव्वल हो गया और उसने परिवार को ग़रीबी से एकदम निजात दिला दी। इस बेहतर आमदनी का सुख कॉमरेड सुखदेव भी उठाने लगे, उन्हें भी अच्छा लगा। उसी समय पार्टी का सीपीआई और सीपीएम में बँटवारा हो गया। इस बँटवारे का लाभ उठाकर उन्होंने अलग ही एक पार्टी बना ली। पुराने पार्टी ऑफिस को क़ब्ज़े में लेकर अपनी अलग राजनीति करने लगे जिसमें बड़ी संख्या में क्रिमिनल पृष्ठभूमि के हथियारबंद लोगों का सहयोग लिया। उनका बेटा इसका माध्यम बना। अंत में उसी क़ब्ज़ाये हुए पार्टी ऑफिस के कुर्सी बैठे वे मारे गये। उनके एक शिष्य ने ही गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। इस तरह पार्टी के लिए परम उपयोगी एक विलक्षण प्रतिभा का अंत हो गया।

दो लोग थे जो अलग अलग जगह की ट्रेड यूनियन से बेगूसराय लाये गये थे। कॉमरेड देवकी सिंह को मुंगेर सिगरेट फैक्ट्री की यूनियन से और बाबा, जिनका मैं नाम भूल रहा हूँ, को टाटा की यूनियन से बेगूसराय लाया गया था। ये दोनों मूलतः यहीं के रहने वाले थे। लेकिन यहाँ ग्रामीण परिवेश में काम करने में वे असफल रहे और उन्हें फिर यूनियनों में ही प्रतिनियुक्त कर दिया गया। बाबा, जिनके पिता जी भी उन्हें बाबा ही कहते थे, को टाटा भेज दिया गया और कॉमरेड देवकी सिंह को तेलशोधक के यूनियन में लगाया गया।

यह समझ नहीं आता कि कौन सी चुनावी रणनीति थी जिसके तहत कॉम. चंद्रशेखर और कॉम. सूरज ने भोला सिंह को बेगूसराय से खड़ा कर दिया। उस समय भोला पार्टी के सदस्य भी नहीं थे। यह आश्चर्य की बात है कि कम्युनिस्ट पार्टी की निचली इकाई ने उन्हें पार्टी की सदस्यता के लायक़ न समझ कर उनका आवेदन अस्वीकृत कर दिया था। उन्होंने पार्टी बाद में जॉइन किया और ऑफिस में एक कांग्रेसी नेता की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया। पार्टी में रहते हुए उसने ऑफिस में ठेकेदारों की पार्टी शुरू कर दी। बाद में उसने कांग्रेस जॉइन कर लिया। वह कई पार्टियों में घूमता रहा, लेकिन एक ख़ास तबके में अपना प्रभाव बनाए रखा। दबंग भूमिहारों और बड़े ठेकेदारों को वह सहयोग देता रहा और उनसे सहयोग प्राप्त करता रहा। उसने अच्छी आर्थिक और राजनीतिक हैसियत बना ली थी। यहाँ तक कि जिस भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी को बेगूसराय में कभी पाँव टिकाने की ज़मीन नसीब न हुई, उसे भोला ने अपने खड़े किये हुए लाभार्थी वर्ग के बल पर चुनावी जीत दिलाकर प्रतिष्ठित कर दिया। उसने वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी को बहुत क्षति पहुँचायी।

इस बीच कॉम. चंद्रशेखर की असमय मृत्यु हो गयी जिसने पार्टी को भीतर और बाहर से बिखराव के कगार पर ला खड़ा किया। और कॉम. सूरज की मृत्यु ने तो पार्टी को निर्णायक रूप से तोड़कर रख दिया। अभी भी पार्टी में कार्यकर्त्ता तो थे, पर उन्हें एक सूत्र में बाँधकर सक्रिय रख सकने वाला कोई व्यक्तित्व पार्टी में नहीं बचा था। यही है पार्टी के बिखराव और पतन की कहानी।

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7 thoughts on “बेगूसराय का कम्युनिस्ट आंदोलन – 1 / जनार्दन प्रसाद सिंह”

  1. कॉमरेड जनार्दन प्रसाद सिंह के दस्तावेज़ी संस्मरण का पहला भाग जिस किफ़ायती लहजे में निष्ठुर आत्मसंयम और आवेशी संलग्नता में तालमेल बैठाकर लिखा गया है वह इसे यादगार बना देता है। इससे (लेनिनग्राद) बेगूसराय के इतिहास व वर्तमान में किसी भी कारण से रुचि रखने वाले जिज्ञासुओं की उम्मीदें बढ़ जाएँगी।
    अगले अंक का बेसब्री से इंतज़ार है। विस्तार से टिप्पणी लिखने का तभी अवसर बनेगा।

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  2. सारगर्भित जानकारी. जनार्दन दा को लाल सलाम

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  3. हिन्दीछेत्रोमेवामदलोउनकेजनसंगठनोजनसंघर्षोस्थापितवामजननेताओकास्वर्णिमकाल उप्र विहार आदिकाथा।मैनेवर्ष1962मेसीपीआईकीसदस्यताकामरेडझारखन्डराय एवंसरजूपान्डेजीकेप्रेरणासेलिया।वहीदोनोमेरेप्रस्तावकसमर्थकबने।वर्ष1967मे अतिउत्साहमेशिछकनौकरीसेत्यागपत्रदिया।मेरेकार्यसेप्रवन्धकसंतुष्टथेउन्होनेसमयटालनेकीनियतसेमुझेनिलम्वितकरदिया।मैमुडकरदेखानहीअबतकजुडाहू

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  4. ढेरों शुक्रिया! अगर कुछ और ठहरकर, कुछ विस्तार में बात की जा सके तो यह लेख अनमोल बन जाएगा। बेगूसराय की कम्युनिस्ट राजनीति की मुख्य पहचान हमारी पीढ़ी के लिए हिंसा और हत्या की राजनीति ही रही। कमोबेश पूरे बिहार में क्या चल रहा था उसी का एक विस्तार। आपके पास वह स्मृति और दृष्टि है कि आप इस रूढ़ छवि की परतों में ले जा सकते हैं। आगे की कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा।

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  5. इस लेख से कुछ अछूते और नामालूम प्रसंग से अवगत हुआ।इस लेख के बरअक्स मुझे कामरेड चंद्रशेखर के ज़िले के मास लीडर और कामरेड सूर्य नारायण के मजबूत संगठन कर्ता के बारे में पता था। बल्कि कामरेड सूर्य नारायण को अपने मार्क्सवादी विचार आरंभ का प्रेरणा पुंज मानता था। उनके नहीं रहने पर इसी शीर्षक से एक श्रद्धांजलि लेख भी लिखा था। ख़ैर! आप उन महत्त्वपूर्ण कालों, घटनाओं, प्रसंगों के न केवल साक्षी रहे हैं, बल्कि सरोकारी रहे हैं। आपके लेख में जीवंतता और यथार्थता की ताज़गी है।इसे मेरे लिए दुबारे-तिबारे पढ़ने की जरूरत है।

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