सत्य के अन्वेषी और ‘अंधेरे की आदत’ वाला समाज / सुभाष गाताडे


अगर सर्दी आती है, तो क्या बसंत दूर हो सकता है? (If Winter Comes, Can Spring Be Far Behind’ – Ode to West Wind, P B Shelley)– इस उम्मीद भरे स्वर में लेखकों-संस्कृतिकर्मियों के दायित्व पर विचार करने के साथ-साथ सुभाष गाताडे यहाँ वाम-जनवादी आंदोलन की सीमाओं की भी निर्मम पड़ताल कर रहे हैं। मूल आलेख जनवादी लेखक संघ दिल्ली के राज्य सम्मेलन के खुले सत्र में प्रस्तुत किया गया था और नया पथ के लिए लेखक ने यह परिवर्द्धित संस्करण तैयार किया है।

‘The Crisis consists precisely in the fact that the old is dying and the new cannot be born ; in this interregnum a great variety of morbid symptoms appear.’

Antonio Gramsci, Prison Notebooks

प्रस्तावना

हम एक नाजु़क वक्त़ से गुजर रहे हैं।

कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति – जो न्याय, अमन और बराबरी की चाहत रखता हो, समूची मानवता को तरक़्क़ी के रास्ते पर ले जाना चाहता हो, यह दावा नहीं कर सकता कि उनमें से किसी ने भी इस बात का तसव्वुर भी किया होगा कि 21 वीं सदी की तीसरी दहाई में हम ऐसे दौर से रूबरू होंगे।

एक ऐसा दौर जहां हम और वे की सियासत उरूज पर दिख रही है, आबादी के अच्छे ख़ासे हिस्से को अमनुष्य घोषित करना, दीमक, कीड़ों, मकौड़ों की श्रेणी में शुमार करना एक सम्मानित उद्यम में रूपांतरित हुआ है। नागरिक शुद्धता की क़वायदों के ज़रिए ‘अवांछितों’ को, ‘अधर्मियों’ को, असहमतों को गणतंत्र के दायरों से भी बाहर, सरहद पार मुल्कों के बियाबान में धकेल देने की मुहिमों पर इन्साफ़ के रखवाले कहे गए संस्थानों से भी मुहर लग रही है।

इस खत़रनाक समय को अलग अलग ढंग से परिभाषित किया जा रहा है।

कोई कहता है कि यह ऐसा दौर है जब यह प्रतीत हो रहा है कि समूचा समाज एक उन्मादी खुशी के साथ एक गर्त में जा रहा है और उसे इस बात का कोई इल्म भी नहीं है।

मेरे एक मित्र – जो एक प्रख्यात मार्क्सवादी  विचारक हैं – कहते हैं, यह ऐसा दौर है जब समाज को गोया अंधेरे की आदत हो गयी है, मद्धिम सी रौशनी से भी उसकी आंखें चुंधिया जाती है।

ज़ाहिर सी बात है कि यह ऐसा दौर है जब विचारकों से, लेखकों, कलाकारों, सांस्कृतिक  कर्मियों, समाज के बेहतर भविष्य के लिए हमेशा फिक्रमंद रहनेवाले बुद्धिजीवियों से उम्मीद की जाती है कि वे समाज में फैल रहे कुहासे को भेदने में पहल करें। अपने साहस, अपने विवेक, अपनी कुशलता, अपनी आकलन क्षमता और अपनी चतुरता के बल पर वक्त़ की सच्चाई को लोगों तक पहुंचाएं। पस्तहिम्मत, निराश और दिशाहीन हो रहे लोगों को बताएं कि ‘अगर सर्दी आती है, तो क्या बसंत दूर हो सकता है? (If Winter Comes, Can Spring Be Far Behind’ – Ode to West Wind, P B Shelley)

2.

आशवित्ज़ अब और नहीं ?

विडम्बना ही है कि ऐसे हालात महज़ अपने मुल्क तक ही सीमित नहीं हैं।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाए गए मुल्क के कर्णधारों से लेकर सबसे ताक़तवर मुल्क के प्रेसिडेंट तक, अपने आप को ‘ईश्वर के प्रेषितों’ के रूप में पेश करने की होड़ हमारे सामने है, भले ही उनकी नीतियां, उनके क़दम मुल्क की अवाम के बड़े हिस्से पर कहर बरपा करते दिख रहे हैं।

945 में जब दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका ख़त्म हुई थी और रफ़्ता-रफ़्ता आशवित्ज़ (https://www.auschwitz.org/en) जैसे यातनाशिविरों के बहाने नात्सी नस्लीय सफ़ायों की खूंरेजी का, यहूदियों के, असहमतों, कम्युनिस्टों, जिप्सियों  या समलैंगिकों के क़त्लेआम की ख़बरों का दुनिया को पता चला था – जिसमें आधिकारिक तौर पर 11 लाख लोग गैस चैम्बरों में डाल कर मार दिए गए थे, और तमाम लोग भूखमरी और बीमारी से ही मर गए थे- तब यह कहा गया था कि आशवित्ज़ इसलिए हुआ क्योंकि शेष मानवता को पता नहीं चला, महायुद्ध की प्रचंड आपाधापी में जब ख़बरों की सत्यता-असत्यता को पहचानना मुश्किल होता है, नात्सी दरिन्दों के ऐसे अत्याचारों की ख़बरें सार्वजनिक नहीं हो सकीं, और यह संकल्प भी दोहराया गया कि आशवित्ज़ अब और नहीं !

गाज़ा में – चौबीसों घंटा प्रसारण करते रहने वाले मीडिया के सामने – सम्पन्न जनसंहार, जब आधिकारिक तौर पर 60-70 हज़ार लोग मार दिए गए जिसका बहुलांश बच्चों और महिलाओं का था, मानवता के ख़िलाफ़ अपराध घोषित किए गए अपराधों को – अस्पतालों, स्कूलों पर बमबारी, जनता के व्यापक हिस्से को भूखा रखना, गाज़ा के सघन आबादी वाले इलाकों में तोपों, बमों के जरिए सफेद फॉस्फोरस  का छिड़काव (https://www.hrw.org/news/2023/10/12/questions-and-answers-israels-use-white-phosphorus-gaza-and-lebanon ; https://citizenevidence.org/2023/10/13/israel-opt-identifying-the-israeli-armys-use-of-white-phosphorus-in-gaza) जो मनुष्य के शरीर पर चिपककर भयानक जलन पैदा करता है (815 डिग्री सेल्सियस) आदि को – डंके की चोट पर अंजाम दिया गया। इस जनसंहार के कर्णधार इज़राइल के प्रधानमंत्री नेतनयाहू, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय द्वारा युद्ध अपराधी घोषित किया गया (https://www.icc-cpi.int/defendant/netanyahu), उन्हें हथियारों, बमों की सप्लाई करने में अमेरिका से लेकर लिबरल डेमोक्रेसी कहलानेवाले यूरोप के तमाम मुल्क आगे रहे, उन्होंने भी इस जनसंहार को रोकने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि उसे होने दिया।

हमारी आंखों के सामने सम्पन्न गाज़ा के जनसंहार-जैसी त्रासदी, जिसमें सैकड़ों पत्रकार जियनवादी हुकूमत की निशानदेही पर हत्या का शिकार हुए, इसी बात की ताईद करती है कि आशवित्ज़ अब कहीं भी कभी भी हो सकता है, होने दिया जा सकता है।

यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आम जनमानस में जिस उदार जनतंत्र ( लिबरल डेमोक्रेसी ) की हिमायत होती आयी थी, तानाशाही हुकूमतों के ख़िलाफ़ या सामन्ती-औपनिवेशिक हुकूमतों से मुक्ति पा रहे नवस्वाधीन देशों के सामने भी वह एक आदर्श के तौर पर पेश होती आयी थी, उस पर भी अब सवाल उठ रहे हैं। यह पूछा जा रहा है कि आखिर पश्चिमी यूरोप के तमाम लिबरल जनतंत्रों ने किस तरह इस जनसंहार का साथ दिया, किस तरह वह आज भी इज़राइल जैसे एक औपनिवेशिक प्रोजेक्ट के साथ मजबूती से खड़े हैं? इतना ही नहीं, किस तरह ऐसे जनतंत्र पूंजी की ताक़तों के बलबूते और नस्लीय या सांप्रदायिक पहचान के उभारे जाने के आधार पर जनता को ग़लत दिशाओं में लामबंद करने की परिघटना का शिकार हो रहे हैं, रातों रात चुनावी जनतंत्रों का अधिनायकवादी जनतंत्रों में तब्दील होना नॉर्मल होता जा रहा है, ये बातें भी उभर कर सामने आयी हैं।

3.

‘अब यह मुमकिन नहीं कि आप कोई पक्ष न लें !’

अगर हम अपने चारों ओर निगाह डालें तो यही बात कह सकते हैं कि बदलते हालात में अब ख़ामोशी ओढ़ना विकल्प नहीं!

विचारकों , लेखकों, संस्कृतिकर्मियों या समाज के बेहतर भविष्य के लिए सक्रिय लोगों के सामने अब यह विकल्प नहीं कि वह आसपास हो रहे इस चिन्ताजनक घटनाक्रम पर अपना मौन बनाये रखें, अपने तटस्थ होने का दावा करते रहे ! व्यापक समाज भले ही अतीत के गौरवगान के अलग क़िस्म के उन्माद में झूम रहा हो, आपको हर डग पर, हर क़दम पर यह कहते रहना ही होगा कि Not In My Name ‘नॉट इन माई नेम’, अर्थात जो भी हो रहा है, मैं या हम उसके साथ खड़े नहीं है, हम अपने आप को अलग कर रहे हैं।

ऐसा भी प्रतीत हो सकता है कि इतिहास अपने आप को दोहरा रहा है।

आज से इक्यानवे साल पहले पैरिस में आयोजित उस ऐतिहासिक कांग्रेस को याद कर सकते हैं जिसकी पहल रोमा रोला ( Romain Rolland) और हेनरी बारब्यूज ( Henri Barbusse)  जैसे लेखकों ने ली थी। फासीवाद के आसन्न ख़तरे को देखते हुए लेखकों के संयुक्त मोर्चे के गठन की पृष्ठभूमि  इस कांग्रेस के पीछे थी। मैक्सिम गोर्की के संरक्षण में सम्पन्न लेखकों के इस सम्मेलन के लिए आमंत्रित लेखकों में विविध क़िस्म के लेखक शामिल हुए थे। (https://rokantyfaszystowski.org/en/miedzynarodowy-kongres-pisarzy-w-obronie-kultury)

महान कवि एवं नाटककार बर्तोल्ट ब्रेश्ट  ने इसी फासीवाद विरोधी लेखक सम्मेलन में अपने संक्षिप्त भाषण में सत्य को बयां करने की मुश्किलों के बारे में पांच बातें रखी थी। उनके मुताबिक पांच मुश्किलें इस प्रकार हैं :

‘..सत्य को लिखने के लिए साहस की ज़रूरत, सत्य को पहचानने की ज़िद , सत्य को हथियार की तरह आजमाने की कुशलता, सत्य किनके हाथों में प्रभावी हो सकता है इसका आकलन करने की क्षमता, सत्य को तमाम लोगों तक पहुंचाने की चतुरता ..’

उनका कहना था कि

‘..इन पांचों मुश्किलों को एक साथ और एक ही वक्त़ दूर करना होगा।’ (https://autonomies.org/2024/06/bertolt-brecht-writing-the-truth-five-difficulties-1935/#: )

हम याद कर सकते हैं, आज से ठीक नब्बे साल पहले जबकि नवोदित स्पैनिश गणतंत्र को कुचलने के लिए जनरल फ्रैंको की सेना के साथ, जर्मनी और इटली की नात्सीवादी, फासीवादी हुकूमतों की मशीनरी खड़ी हुई थी, तब मशहूर ब्रिटिश लेखिका एवं राजनीतिक एक्टिविस्ट नॅन्सी कुनार्ड (1896-1965), ब्रिटिश अमेरिकन कवि डब्लू एच ऑडेन  (1907-1963) और इंग्लिश कवि और उपन्यासकार स्टीफन स्पेण्डर (1909-1995) ने मिल कर इस युद्ध को लेकर यूरोप के 200 लेखकों को एक प्रश्नसूची भेजी, जिसके नतीजे बाद में ‘Left Review ’ में ‘आथर्स टेक साइडस ऑन द स्पैनिश वॉर ’ शीर्षक से प्रकाशित हुए।

लेखकों को भेजी गयी प्रश्नसूची में यह सवाल उठाया गया था

‘क्या आप स्पैनिश गणतंत्र की क़ानूनी सरकार और उसकी जनता के पक्ष में या विपक्ष में खड़े हैं , क्या आप फ्रैंको और फासीवाद के पक्ष में या विपक्ष में खड़े हैं ? क्योंकि अब यह मुमकिन नहीं कि आप कोई पक्ष न लें।’

कुल मिला कर 147 लोगों ने जवाब दिया, जिनमें से 126 गणतंत्र के पक्ष में थे तो पांच फ्रैंको के समर्थन में थे। (Sometimes Writers Have to Take Sides, https://time.com/6294142/spanish-civil-war-writers)

बीसवीं सदी की ओर पलट कर देखें तो हमें ऐसे कई उदाहरण दिखते हैं, जो अंधेरे के आदी हुए इस समाज को जगा देने के लिए आज भी प्रेरणास्त्रोत बन सकते हैं।

स्पैनिश गणतंत्र को बचाने के लिए कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की पहल पर हुई ‘इंटरनेशनल ब्रिगेड’ के गठन की बात और उसके आवाहन पर किस तरह सैकड़ों लेखक, कलाकार, चित्रकार वहां संघर्ष में शामिल होने के लिए पहुंचे थे और किस तरह उसूलों की हिफ़ाज़त के लिए उन्होंने वहां शहादत दी, क्रिस्टोफर कॉडवेल, राल्फ फॉक्स जैसे महान लेखक रणभूमि में ही कुर्बान हुए (https://international-brigades.org.uk/education/introduction-2) — यह इतिहास भले ही अब विस्मृत-सा हो चला है, इस कठिन समय में उसे याद करना मददगार साबित हो सकता है।

यूरोप में फासीवाद-नात्सीवाद किस तरह समूची इन्सानियत के लिए खत़रा बना हुआ है, इसका एहसास औपनिवेशिक मुल्कों में स्वाधीनता के लिए उठ रहे स्वरों में, आंदोलनों में भी था, उनके कर्णधार भी इसके प्रति सचेत थे। खुद औपनिवेशिक भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की अहम आवाज़ बन कर उभर रहे नेहरू के अपने संस्मरण इस बात की गवाही देते हैं कि जब अपनी पत्नी कमला के इलाज के लिए वह यूरोप गए थे, तब किस तरह उनसे मुसोलिनी के प्रतिनिधियों ने संपर्क किया था और उन्हें सूचित किया था कि वह उनसे मिलने के लिए उत्सुक हैं। नेहरू द्वारा बेहद संयम के साथ इस निमंत्रण से इन्कार करने के बावजूद भारत वापसी की यात्रा में जब उनका विमान कुछ घंटों के लिए रोम में रुका था, तब भी मुसोलिनी के क़रीबी वरिष्ठ अधिकारी इस निमंत्रण के साथ मिले थे और उन्होंने कहा था कि ‘ड्यूस आप का इन्तज़ार कर रहे हैं’। नेहरू ने फिर एक बार मिलने के प्रति असमर्थता प्रगट की और मुसोलिनी के प्रति अपना धन्यवाद प्रगट किया। अपनी बहुचर्चित किताब ‘भारत एक खोज’ (Discovery of India) में उन्होंने फासीवादी प्रचार के लिए बहाना बनने से इन्कार करने का विशेष उल्लेख भी किया।  (https://www.nationalheraldindia.com/time-prism/prime-minister-nehru-no-prop-for-fascist-propaganda)

हिन्दोस्तां की सरजमीं पर उन्हीं दिनों प्रगतिशील लेखक संघ की नींव पड़ी थी, जिसके पहले सम्मेलन (अप्रैल 9-10, 1936) की अध्यक्षता प्रेमचंद ने की थी, जिसमें मुल्क की तमाम ज़बानों के लेखक इकठ्ठा हुए थे।

यह जानना भी दिलचस्प है कि लेखकों की एक तंज़ीम बनाने की ज़रूरत का ख़याल उन दिनों लंदन में अध्ययनरत या सक्रिय रहे चार दोस्तों — सज्जाद ज़हीर, अहमद अली, मुल्कराज आनंद और मोहम्मद दीन तासीर को पहली दफ़ा आया जो खुद मार्क्सवादी  विचारों से इत्तेफ़ाक रखते थे और तरक्पक़ीसंद संगठनों के साथ सरगर्म भी थे।(https://rekhtalearning.com/blog/the-progressive-writers-movement-origins-impact-an)

औपनिवेशिक हिन्दोस्तां की हालात से वे बेहद परेशान थे और एक नया समाजी-सियासी निज़ाम क़ायम करने का ख़याल रखते थे। उन्होंने आपसी गुफ़्तगू में यह महसूस किया कि इसे मुमकिन बनाने के लिए साहित्य एक अच्छा ज़रिया बन सकता है, जो सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन  खड़ा कर सकता है और एक नयी साहित्यिक संस्कृति को जनम दे सकता है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने प्रस्तावित संगठन / तंज़ीम का एक मसविदा घोषणापत्र तैयार किया और हिन्दी-उर्दू के तमाम लेखकों, रचनाकर्मियों को भेजा, लेखकों की जिस तरह की उत्साहवर्द्धक प्रतिक्रिया थी, उसे देखते हुए लखनऊ  में स्थापना सम्मेलन का आयोजन हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए हिन्दी-उर्दू के महान लेखक और उपन्यासकार प्रेमचंद को आमंत्रित किया गया था।

अपने अध्यक्षीय भाषण, जिसका फोकस ‘साहित्य का उददेश्य’ था, के अंत में प्रेमचंद ने साहित्य की अपनी समझदारी को साझा किया था :

‘..हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो– जो हममें गति और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं, क्योंकि अब और ज़्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।

जैसे हालात आज मौजूद हैं, प्रगतिशील ताक़तों में, तरक्पक़ीसंद स्वरों में जो आपसी मतभेद अभी समाप्त नहीं हुए हैं, और आज़ाद जुबानों पर जिस क़िस्म के पहरे लगा दिए गए है, उस वक्त़ यह उम्मीद करना बेकार होगा कि हम किसी अलसुबह किसी इंटरनेशनल ब्रिगेड के गठन की ख़बर पढ़ेंगे, 1935 के पैरिस की तरह लेखकों के बड़े जलसे का आगाज़ देखेंगे! दरअसल हमें इसकी ज़मीन तैयार करने के लिए पहल लेनी होगी, अपने विवेक के आधार पर फ़ैसला लेना होगा, जिस तरह की पहल भारत की विभिन्न भाषाओं में सृजनरत  लेखकों, कलाकारों,  संस्ककृतिर्मियों ने ली थी, जब उन्होंने मुल्क के बदतर होते हालात को देखते हुए महसूस किया कि उन्हें अब बोलना ही होगा, जो कुछ उनके इर्दगिर्द घटित हो रहा है, उसको लेकर अपनी बेचैनी ज़ाहिर करनी होगी, सत्ता के नशे में चूर हुक्मरानों को बताना होगा कि समाज में बढ़ती असहिष्णुता या बढ़ रही भीड़ द्वारा हत्याएं उम्मीदों के नहीं बल्कि डर के गणतंत्र को ढाल रही हैं। इसी असहिष्णुता का परिणाम था कि कामरेड गोविन्द पानसरे, प्रोफेसर कलबुर्गी या गौरी लंकेश जैसे अग्रणी लेखक, विद्वान तथा एक्टिविस्ट मारे गए थे और नरेंद्र दाभोलकर की हत्या को अंजाम देने वाली विचारधारा की तूती बोलने लगी थी। अपने आक्रोश को प्रकट करने के लिए लेखकों ने प्रतिष्ठित सरकारी एवार्ड वापस किए थे (2015)

अगर हम उस समय को याद करें तो दिखता है कि केन्द्र में मोदी हुकूमत क़ायम हुए एक साल भी नहीं बीता था, लेकिन असहिष्णुता तेज़ी से बढ़ रही थी, भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं ने परिघटना का रूप लिया था, कभी बीफ़ के नाम पर तो कभी किसी अन्य बहाने से निरपराधों पर ख़ासकर दलित एवं अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों पर हमले बढ़ रहे थे। बीफ़ के नाम पर दिल्ली के बगल में स्थित दादरी में अख़लाक की हत्या — जो उनके घर में घुस कर कर दी गयी थी और जिसे गांव के ही निवासियों ने बाहरी आततायी तत्वों के साथ मिल कर अंजाम दिया था — ने उस चिंगारी का काम किया कि लेखकों-सृजनकर्मियों को लगा, अब मौन रहना अपराध होगा।

अवार्ड वापसी की इस ऐतिहासिक मुहिम का आग़ाज़ हिन्दी के मशहूर साहित्यकार उदय प्रकाश ने किया था जब 2015 में उन्होंने ‘बढ़ती असहिष्णुता’ तथा भीड़ द्वारा हत्या की घटना विरोध में उन्हें मिले साहित्य एकादमी के एवार्ड को वापस  किया था।

याद रहे, उदयप्रकाश के अवार्ड वापसी के बाद देश की तमाम भाषाओं के लेखकों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों द्वारा अपने एवार्ड वापस करने की मुहिम चल पड़ी थी। अशोक वाजपेयी, नयनतारा सहगल आदि तमाम बड़े बड़े नाम उसमें जुड़ते गए थे। रचनाकर्मियों के इस अहिंसक प्रतिरोध ने मोदी हुकूमत को बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर किया था। प्रथम प्रधानमंत्री  जवाहरलाल नेहरू की भतीजी और मशहूर लेखिका नयनतारा सहगल ने 1986 में मिले साहित्य अकादमी के विख्यात पुरस्कार को वापस करते हुए ‘द अनमेकिंग आफ इंडिया’ शीर्षक से अपना बयान जारी किया था और बताया था कि ‘सांस्कृतिक विविधता को बचाने में मोदी सरकार की चुप्पी और ‘ सत्ताधारी हिन्दुत्व की विचारधारा से असहमत आवाज़ों के बचाव के लिए अपना पुरस्कार वापस कर रही है।’ (https://indianculturalforum.in/2015/10/06/nayantara-sahgal-returns-her-sahitya-akademi-award)

वैसे यह कहना वाजिब नहीं होगा कि विचारशील लोग, लेखक, कलाकार निरंतर प्रतिरोध की मशाल ही थामे रहते आए हैं।

2024 के चुनावों के साल भर पहले हम सभी उस परिदृश्य से भी रूबरू थे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मासिक  रेडियो कार्यक्रम मन की बात – जिसे सुना जाना महानगरों के बाहर अन्य शहरी, ग्रामीण इलाक़ों के स्कूलों में तमाम स्थानों पर अनिवार्य कर दिया गया है – के 100 एपिसोड पूरे होने पर राजधानी दिल्ली में आयोजित एक कला प्रदर्शनी में देश के कई अग्रणी कलाकारों ने अपनी पेंटिंग और इन्स्टालेशन रखने में संकोच नहीं किया था। (https://thewire.in/the-arts/modis-mann-ki-baat-and-its-many-themes-as-rendered-by-some-well-known-artists-of-the-country)

भारतीय अकादमिक एवं लेखक सुश्री अनन्या वाजपेयी ने इस प्रदर्शनी पर लिखा था कि किस तरह ‘जन शक्ति’ नाम से सम्बोधित इस प्रदर्शनी का मुख्य मकसद प्रधानमंत्री को कला का बड़ा मर्मज्ञ के तौर पर पेश करना था’। गौरतलब है कि मन की बात में प्रस्तुत बारह विषयों पर — जो विकास के विमर्श में हमेशा उठने वाली संकल्पनाएं हैं, जैसे पानी, कृषि, विमानन और अंतरिक्ष टेक्नोलोजी, पर्यावरण एवं जंगल, आस्था और रीति रिवाज, अंतरराष्ट्रीय  मामले, खेलकूद, सार्वजनिक स्वास्थ्य आदि — इन जानेमाने कलाकारों को अपनी पेंटिंग तैयार करनी थी या अपनी इन्स्टालेशन लगानी थी। सुश्री वाजपेयी का वाजिब सवाल था कि

आखिर ये कलाकार, जो अपने उदारवादी नज़रिये के लिए, आलोचनात्मक रुख के लिए तथा धर्मनिरपेक्ष सियासत के लिए जाने जाते हैं, एक दक्षिणपंथी प्रशासन की नीतियों का भोंपू बनने के लिए क्यों तैयार हो गए और सबसे बढ़ कर ‘अत्यधिक आत्ममुग्ध नेता के विचारों का वाहक बनने के लिए क्यों खड़े हो गए?’

निश्चित ही ऐसी घटनाएं किसी नवोदित लेखक या विचारक को निरुत्साहित कर सकती हैं, लेकिन अगर आप व्यापक परिप्रेक्ष्य में ऐसे समर्पणों को देखें तो यह समझ में आयेगा कि यह उस ऐतिहासिक संघर्ष का ही हिस्सा है जो सदियों से सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, शान्ति-अशान्ति, समानता-विषमता के बीच चलता आया है और तमाम उतार चढ़ावों के बावजूद – जहां कभी कभी समय का रथ पीछे लुढ़कता हुआ दिखता है – समय की अग्रगामी गति को कोई रोक नहीं सकता।

यथास्थिति के हक में और परिवर्तन के ख़िलाफ़ खड़े इन तमाम व्यक्तियों / ताक़तों की भूमिका पर इतिहास अपना क्या फैसला सुनाएगा, इसका आकलन मुश्किल नहीं है।

4.

असहमति की आवाज़ से आगे

मौजूदा निज़ाम और हमारे इर्दगिर्द बद से बदतर हालात के प्रति अपनी असहमति का इज़हार करना गोया पहला क़दम होगा हर विचारशील व्यक्ति का, लेखक, कलाकार, सांस्कृतिक  कर्मी का या हर उस व्यक्ति का जो अपनी जनता के बेहतर भविष्य की कामना करता है और अपने स्तर पर उसके लिए सक्रिय है।

गौरतलब है कि अभी इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त़ ही फ्रांस से यह ख़बर आयी है कि किस तरह उस मुल्क के बड़े लेखकों, विचारकों, दार्शनिकों ने अपने आप को उस फ्रांसिसी प्रकाशन संस्थान से अलग किया जिसका अभी तक फ्रांस के प्रकाशन जगत पर बोलबाला रहा है। इन बड़े लेखकों ने अपने साझा बयान में ऐलान किया कि ‘हम एक विचारधारात्मक युद्ध के बंदी नहीं बनना चाहते हैं’ (‘We refuse to be hostages in ideological war) (https://www.el-balad.com/16915113 ; https://www.theguardian.com/world/2026/apr/16/writers-quit-french-publisher-protest-against-billionaire-owner-vincent-bollore)

1907 में बर्नार्ड ग्रासेट ने इस प्रकाशन संस्थान की स्थापना की, जो फ्रेंच तथा विदेशी साहित्य, निबंध, उपन्यास, बच्चों की किताबें — सभी कुछ प्रकाशित करता आया है, वर्ष 1954 में उसके मालिक ने इस प्रकाशन संस्थान को हेचैट को बेच दिया। इस प्रकाशन संस्थान के स्तर और व्यापकता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि फ्रांसिसी साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान समझे जाने वाले Prix Goncourt  सम्मान पानेवालों में सतरह ग्रासेट से ही जुड़े रहे हैं, जो साल भर में एक बार दिया जाता है और उसके पाने की प्रक्रिया भी काफी लम्बी और जटिल होती है।

आखिर इन लेखकों ने – जिनमें वाम से लेकर उदार, सभी विचारधारात्मक छटाओं के लेखक शामिल रहे हैं – को यह क़दम उठाने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा। दरअसल इस प्रकाशन संस्थान के विन्सेन्ट बोलोर नामक मीडिया साम्राज्य के सम्राट द्वारा ख़रीदे जाने पर – जिसका टीवी, अख़बार आदि जगत में भी बोलबाला है और जिस पर यह आरोप है कि वह अतिदक्षिणपंथी विचारों को बढ़ावा देता है – इन बड़े लेखकों को आपत्ति रही है। उनका साझा निर्णय था कि दक्षिणपंथी विचारधारा को बढ़ावा देने की इस मुहिम के सहयात्री वह कभी नहीं बन सकते।

सत्ताधारी जमातें इतिहास के इस सबक को बखूबी जानती हैं कि विचारशील लोगों ने जब जब जनता से उसके अपने दुख पीड़ा के जड़ों की तरफ देखने का इशारा किया है, उसे समझाया है कि उसे इस गल्प से मुक्ति पानी चाहिए कि उसका वर्तमान उसके कथित पूर्वजन्म के पापों का फल है और उसे चाहिए कि वह बिना कुछ शिकायत करे, इसको क़बूल करे, उसका परिणाम एक न एक दिन विस्फोट की शक्ल धारण कर सकता है और सत्ताधारी जमातें रफ़ता रफ़ता इतिहास का हिस्सा बन जाएंगी। (‘Writers’ Police’, The Statesman and The Hindustan Times, New Delhi, 26 th September 2006 ; Books as Crime, https://www.countercurrents.org/hr-gatade301006.htm) हम याद कर सकते हैं कि मुसोलिनी के नेतृत्ववाले इटली में भले ही ऊपरी तौर पर अमन चैन दिखता रहा हो, मगर वह हुकूमत इस बात को भी जानती थी कि जब तक एंतोनियो ग्राम्शी जैसे विद्वान कार्यकर्ता – जिन्होंने वहां कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में अहम भूमिका निभायी थी – सलाखों के बाहर हैं, वह जनता की मुक्ति का रास्ता बता सकते हैं।

1925 में  उन्हें जेल की सज़ा सुनाते हुए अभियोजक पक्ष ने जो कहा था वह इतिहास में दर्ज हो गया है। एक तरह से वह सत्य के अन्वेषण में लगे विचारकों के बारे में, जो अकेले हो जाने की आशंका के बावजूद, हमेशा अपनी बात लोगों के बीच रखते रहते हैं, व्यवस्था के कर्णधारों के आकलन को पेश करता है। उन्होंने कहा कि आने वाले दो दशक तक हमें यह चाहिए कि ‘इस दिमाग को काम करने से रोक दे।’(“For twenty years we must stop this brain from functioning.”)

ध्यान रहे, 1925 से लेकर 1937 तक के कालखंड में – मृत्यु से कुछ माह पहले तक – ग्राम्शी जेल में ही रहे. मुसोलिनी के जेल में वे लगातार स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से परेशान रहे। जेलों की हालत बद से बदतर हो रही थी। इन सबके बावजूद जेल के उस भीषण कालखंड में ग्राम्शी हमेशा ही रचनात्मक तौर पर सक्रिय रहे और उन्होंने प्रिजन नोटबुक्स नाम से अपने निबंधों का संकलन तैयार किया। प्रिजन नोटबुक्स में उन्होंने जनता के संघर्षों को आगे बढ़ा सकने वाले वैचारिक औजारों को गोया धार दी। उनका कहना था कि किस तरह सत्ताधारी जमातें मेहनतकश अवाम पर अपनी पुलिस, अपनी सेना और अपने सुरक्षा बलों के आधार पर ही नियंत्रण क़ायम नहीं रखती हैं बल्कि अपने वर्चस्वशाली विचारों से भी इस नियंत्रण को गहरा करती हैं। उनकी बातों का निचोड़ था कि न केवल मज़दूरों को और अन्य शोषित तबकों को पूंजीवादी राज्य को ध्वस्त करना होगा बल्कि उन वर्चस्वशाली विचारों को भी जड़मूल से नष्ट करना होगा जो शोषण को जारी रखते हैं।

आज के दौर में भी सत्य के अन्वेषी विचारकों के समक्ष, व्यापक जनता की बेहतरी के लिए हमेशा सक्रिय रहनेवाले बुद्धिजीवियों के कंधों पर यही जिम्मा आ गया है कि वह न केवल भीड़ के पीछे या उसके साथ खड़े होने से इन्कार कर दें बल्कि इस पर अपना ध्यान केन्द्रित करें कि समूचे समाज की नैया अचानक इस भंवर में कैसे फंस गयी? वह इतिहास के गड़े मुर्दो को खोदने के सिलसिले पर रोक लगा दें और जनता को बताएं कि आपस में बंटकर बेहतरी नहीं आ सकती है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि विभिन्न जुबानों में, विभिन्न फार्म में सक्रिय लेखकों, कलाकारों, सांस्कृतिक  कर्मियों के लिए चुनौती न केवल यह होगी कि वह विचार के क्षेत्र में भी अपने स्तर पर सक्रिय हस्तक्षेप बनाए रखें बल्कि उनके सामने यह एक तरह से अतिरिक्त जिम्मा होगा कि वे अपने बेस्ट / अपने सर्वोकृष्ट  का सृजन करें ताकि जनता को यह समझ आए कि महज़ राज्याश्रय ही कला की ऊंचाइयों को तय नहीं कर सकता। उन्हें चाहिए कि वे अपनी सलाहियत / विशिष्टता के इलाक़े में नये परचम लहराएं, ऐसी रचनाओं का सृजन करें जो इस दौर के अन्तर्विरोधों को, उनकी विडम्बनाओं को, रक्तपिपासु शासकों के स्तुतिगान से ही धन्य होते मानस की गहराइयों तक पहुंचा सकें और वास्तविक सत्य, शिव और सुंदर को स्थापित करने के लिए इन्सानियत को प्रेरित करें।

लगभग सौ साल पहले जब नात्सीवाद-फासीवाद की समाप्ति के लिए इन्सानियत ने डग भरे थे, उस स्याह दौर में ऐसी तमाम विविधतापूर्ण और कालजयी रचनाओं ने जनम लिया था। कौन भूल सकता है कि बर्तोल्त ब्रेश्ट की तमाम अग्रणी रचनाओं को या उनका वह बहुचर्चित नाटक ‘द रेजिस्टेबल राइज़ ऑफ़ आरटुरो ली’ जिसमें शिकागो के एक माफिया सरगना आरटुरो ली के उदय के कहानी के ज़रिए हिटलर के आगमन को दर्शाया गया था!

यही वह समय था जब गुएर्निका जैसी पेण्टिंग के माध्यम से फासीवाद की जंगखोरी और मनुष्यता पर अन्तहीन कहर बरपा देने की उसकी क्षमता पाब्लो पिकासो ने उजागर की थी और ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ जैसी फिल्म के माध्यम से चार्ली चैप्लीन ने हिटलर के मनुष्यद्रोही प्रोजेक्ट को बेपर्द किया था । इस फिल्म में चैप्लीन ने घेट्टो में रहनेवाले एक यहूदी नाई और हिन्केल नाम से टोमानिया के तानाशाह की भूमिका निभायी थी। हिन्केल एक तरह से हिटलर का कैरिकैचर था।

इस फिल्म में चैप्लीन का अंतिम भाषण बहुत चर्चित हुआ था।

ऐसी अनगिनत रचनाओं   ने – सृजन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रस्फुटित इन विभिन्न स्वरों ने फासीवाद की आसन्न मौत की दुंदुभि बजा दी थी।

अपनी तटस्थता से तौबा कर अपना पक्ष तय करना, अपने रचनाकर्म में युगबोध को स्वर देना आदि के बाद हमें उस बेहद ज़रूरी वैचारिक हस्तक्षेप की अहमियत को समझना होगा जिसकी आज हमारे समाज को बेहद ज़रूरत है।

चार्ली चैप्लीन का ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ फिल्म का अंतिम भाषण

मुझे खेद है, लेकिन मैं सम्राट नहीं बनना चाहता। यह मेरा काम नहीं है। मैं किसी पर शासन या विजय प्राप्त नहीं करना चाहता। मैं हर किसी की मदद करना चाहता हूँ – यदि संभव हो तो – यहूदी, गैर–यहूदी, काला, गोरा। हम सब एक–दूसरे की मदद करना चाहते हैं। मनुष्य स्वभाव से ही ऐसे होते हैं। हम एक–दूसरे की खुशी से जीना चाहते हैं – एक–दूसरे के दुख से नहीं। हम एक–दूसरे से नफ़रत और घृणा नहीं करना चाहते। इस दुनिया में सबके लिए जगह है। और यह धरती उपजाऊ है और सबका पेट भर सकती है। जीवन स्वतंत्र और सुंदर हो सकता है, लेकिन हम रास्ता भटक गए हैं।

लालच ने इंसानों की आत्माओं को ज़हर से भर दिया है, दुनिया को नफ़रत से घेर लिया है, और हमें दुख और खून-ख़राबे की ओर धकेल दिया है। हमने रफ़्तार तो हासिल कर ली है, लेकिन खुद को ही बंद कर लिया है। प्रचुरता देने वाली मशीनों ने हमें अभाव में छोड़ दिया है। हमारे ज्ञान ने हमें संशयवादी बना दिया है। हमारी चतुराई ने हमें कठोर और निर्दयी बना दिया है। हम बहुत ज़्यादा सोचते हैं और बहुत कम महसूस करते हैं। मशीनों से ज़्यादा हमें मानवता की ज़रूरत है। चतुराई से ज़्यादा हमें दया और कोमलता की ज़रूरत है। इन गुणों के बिना, जीवन हिंसक होगा और सब कुछ नष्ट हो जाएगा। 

हवाई जहाज़ और रेडियो ने हमें एक–दूसरे के क़रीब ला दिया है। इन आविष्कारों का मूल स्वभाव ही मनुष्य के भीतर की अच्छाई को उजागर करता है — सार्वभौमिक भाईचारे को, हम सभी की एकता को। आज भी मेरी आवाज़ दुनिया भर में लाखों लोगों तक पहुँच रही है — लाखों निराश पुरुषों, महिलाओं और छोटे बच्चों तक, उस व्यवस्था के शिकार लोगों तक जो निर्दोष लोगों को यातना देने और क़ैद करने के लिए मजबूर करती है।

जो लोग मुझे सुन सकते हैं, उनसे मैं कहता हूँ  निराश मत होइए। जो विपत्ति हम पर आई है, वह केवल लालच का क्षण है  उन लोगों की कड़वाहट है जो मानवीय प्रगति के मार्ग से भयभीत हैं। मनुष्यों की घृणा समाप्त हो जाएगी, तानाशाह मरेंगे, और जो सत्ता उन्होंने जनता से छीनी है, वह जनता को वापस मिल जाएगी। और जब तक मनुष्य मरते रहेंगे, स्वतंत्रता कभी नष्ट नहीं होगी।

सैनिको! अपने आप को उन जाहिलों के हवाले मत करो जो तुम्हें तुच्छ समझते हैं, तुम्हें गुलाम बनाते हैं, जो तुम्हारे जीवन को नियंत्रित करते हैं, तुम्हें बताते हैं कि क्या करना है, क्या सोचना है और क्या महसूस करना है! जो तुम्हें प्रशिक्षण देते हैं, तुम्हें तय खान–पान पर रखते हैं, तुम्हारे साथ पशुओं जैसा व्यवहार करते हैं, तुम्हें तोप के चारे की तरह इस्तेमाल करते हैं। अपने आप को इन अस्वाभाविक पुरुषों के हवाले मत करो दृ मशीनी दिमाग और मशीनी दिल वाले मशीनी इंसानों के हवाले मत करो! तुम मशीन नहीं हो! तुम पशु नहीं हो! तुम इंसान हो! तुम्हारे दिलों में मानवता के लिए प्रेम है! तुम नफरत नहीं करते! केवल वही नफरत करते हैं जिन्हें प्यार नहीं मिलता दृ जिन्हें प्यार नहीं मिलता और जो अस्वाभाविक होते हैं! सैनिकों! गुलामी के लिए मत लड़ो! स्वतंत्रता के लिए लड़ो!

लूका के 17वें अध्याय में लिखा है: “परमेश्वर का राज्य मनुष्य के भीतर है” दृ किसी एक व्यक्ति या समूह में नहीं, बल्कि सभी मनुष्यों में! आप में! आप लोगों में शक्ति है दृ मशीनें बनाने की शक्ति। सुख उत्पन्न करने की शक्ति! आप लोगों में इस जीवन को स्वतंत्र और सुंदर बनाने की, इस जीवन को एक अद्भुत रोमांच बनाने की शक्ति है।

तो फिर लोकतंत्र के नाम पर आइए हम उस शक्ति का उपयोग करें आइए हम सब एकजुट हों। आइए हम एक नई दुनिया के लिए लड़ें  एक ऐसी सभ्य दुनिया जो लोगों को काम करने का मौका दे  जो युवाओं को भविष्य और बुढ़ापे को सुरक्षा दे। इन्हीं वादों के बल पर क्रूर सत्ता में आए हैं। लेकिन वे झूठ बोलते हैं! वे अपना वादा पूरा नहीं करते। वे कभी नहीं करेंगे!
https://janataweekly.org/charlie-chaplin-the-final-speech-from-the-great-dictator/)

(https://www.charliechaplin.com/en/articles/29-the-final-speech-from-the-great-dictator/)

5.

समस्याओं को सुलझाने के लिए उसी चिन्तन का सहारा लेने की जिद

 

अल्बर्ट आईनस्टाईन का मशहूर उद्वरण है ‘ We cannot solve our problems with the same thinking we used when we created them ’ ( अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए उसी चिन्तन का सहारा लेने की जिद जिसने उन्हें पैदा किया।)

सभी इस उद्वरण को जानते हैं , तबादले खयालात में इस बात पर जोर देते हैं कि हमें घिसे पीट रास्तों पर नहीं चलना है, नयी जमीन तोड़नी है… मगर ये संकल्प क़दमताल तक सीमित रहते हैं।

नया चिन्तन तब उभरता है जब हम पुराने स्थापित चिन्तन की, उसके अमल की पड़ताल करते हैं, उसे प्रश्नांकित करते हैं और अपनी नयी प्रस्थापना पेश करते हैं। हम नयी ज़मीन तब तक तोड़ नहीं सकते जब तक हम अपने आप को प्रश्नांकित करने की, अपनी स्थापित मान्यताओं को चुनौती देने की, अपने आप को कटघरे में खड़ा कर देने की जिद नहीं पालते।

पिछले ही साल दिल्ली के सुरजित भवन में प्रख्यात इतिहासकार इरफान हबीब ने हम सभी के सामने ऐसी ही बात कही थी जबकि वह कामरेड सीताराम येचुरी की याद में पहला व्याख्यान प्रस्तुत कर रहे थे (https://www.facebook.com/shamim.a.ali.9/videos/prof-irfan-habib-delivers-1st-sitaram-yechury-memorial-lecture-on-the-topic-the-/1686010795398302/)।

मालूम हो, प्रो इरफान हबीब (जन्म 1931) छह दशक से अधिक समय से कम्युनिस्ट पार्टी से सक्रिय रूप से सम्बद्ध रहे हैं। अपनी शुरुआती राजनीतिक सक्रियताओं में ट्रेड यूनियन मोर्चे पर भी सक्रिय रहनेवाले और यहां तक कि पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की बैठकों में भी शामिल होकर उसके नीतिनिर्धारण में अपनी गहन संलिप्तता को रेखांकित करते रहने वाले प्रोफेसर हबीब का फोकस किसी पार्टी विशेष पर नहीं था बल्कि समूचे वाम आंदोलन के रुख पर था और वह उस आंदोलन के इनसाइडर / अंतरंग सदस्य के तौर पर बात रख रहे थे।

अफ़सोस ही बात यह है कि उनकी बात पर भी विचारशील जनों के आपसी बहस-मुबाहिसे में कुछ बात आगे नहीं बढ़ सकी। प्रोफेसर इरफान हबीब की बात भुला दी गयी।

क्या कहा था प्रोफेसर इरफान हबीब ने?

उनके व्याख्यान का विषय था ‘राष्ट्रीय आंदोलन में वाम और उसकी विरासत’ (The Left in the National Movement and Its Legacy)।  निचोड़ के तौर पर कहें तो उन्होंने मार्क्सवादी इतिहासलेखन के एकांगीपन तथा वाम आंदोलन के अंदर व्याप्त लोकरंजकता जैसे तत्वों को बखूबी उजागर किया था।

अपने व्याख्यान में उन्होंने मार्क्सवादी  इतिहासलेखन में मॉडरेट  कांग्रेस नेताओं के प्रचंड योगदानों — दादाभाई नौरोजी (https://dinyarpatel.com/2011/10/10/dadabhai-naoroji-and-the-naoroji-papers-in-delhi) और आर सी दत्त (https://azimpremjiuniversity.edu.in/indian-economists/romesh-chunder-dutt) द्वारा ब्रिटिश हुकूमत द्वारा की जा रही भारतीय सम्पदा की लूट को पहली बार बेपर्द करने की हक़ीकत — को अनदेखा करने की बात कही थी। उनका सरल सवाल था कि ऐसी भूल हम लोगों से क्यों हुई, जब वैज्ञानिक समाजवाद के नज़रिये से हम हिन्दोस्तां का इतिहास लिखने लगे, हमें न दादाभाई नौरोजी का ख़याल आया और न ही रोमेश चंद्र दत्त के नाम पर हमने गौर किया।

वर्ष 1901 में दादाभाई नौरोजी की किताब प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था, ‘पॉवर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’( Poverty and UnBritish Rule in India) । भारतीय सम्पदा की लूट की बात पहली दफ़ा उन्होंने अपने पेपर ‘इंग्लैण्ड डेब्ट टू इंडिया’ में बयां की थी, जिसे लंदन में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन के सामने प्रस्तुत किया गया था (1867)। दादाभाई नौरोजी का मानना था कि कच्चे मालों को निर्यात करके और बने बनाए सामानों को आयात करके, अधिक दरों से करों को वसूलते हुए और तनखा, पेन्शन और मुनाफ़े के रूप में भारत की प्रचंड सम्पदा को बाहर भेज कर ब्रिटिश शासक भारत को लूट रहे हैं (https://vajiramandravi.com/upsc-exam/drain-of-wealth-theory)।

रोमेश चन्द्र दत्त (1848-1909) ने जहां अपनी कैरियर की शुरूआत ब्रिटिशों के मातहत इंडियन सिविल सर्विस से की, वह उन भारतीयों में पहले थे जिन्हें अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों के सुचारू ढंग से निभाने के चलते, विभागीय आयुक्त भी बनाया गया था ;  वह बहुश्रुत विद्धान भी थे, और राष्ट्रवादी नेता भी थे जिन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण और लूट को अपनी किताबों में बेपर्द किया। वह जाने जाते हैं ‘संपदा की लूट’के अपने सिद्धांत के लिए, जिसके तहत उन्होंने इस बात का विवरण पेश किया कि किस तरह ब्रिटिश नीतियां गुलाम भारत के अनौद्यिगीकरण को और दरिद्रता को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने अपनी बातों को प्रबुद्ध जनों तक पहुंचाने के लिए किताबें भी लिखी, जिनमें से ‘द इकानामिक हिस्टरी आफ इंडिया : भाग एक और भाग 2’ क्लासिकीय रचना मानी जाती है। आपने रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों को अंग्रेजी में अनुवाद भी किया तथा अपनी जनपक्षधरता के चलते वह 1899 में कांग्रेस अधिवेशन में उसके अध्यक्ष भी चुने गए।

अपने व्याख्यान में प्रोफेसर हबीब ने दूसरी बात वह उठायी जिसे लेकर खुद कम्युनिस्ट पार्टी और उसका नेतृत्व हमेशा बहस से बचता रहा है। उन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उस स्टैण्ड की हिमायत की जिसके लिए पार्टी लगातार आलोचना का शिकार होती रही है और अपने आप का ठीक से बचाव भी नहीं कर पाती रही है।

इतिहास बताता है कि 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की यही नीति थी कि इस दौरान ब्रिटिश हुकूमत पर दबाव डाल कर भारतीय जनता के लिए अधिक से अधिक सुविधाएं हासिल की जाएं। 1942 में जब सोवियत रूस नात्सी हमले का शिकार हुआ तब पार्टी ने आननफानन में अपना स्टैण्ड बदला था और ब्रिटिश हुकूमत के विरोध के बजाय उसका समर्थन करने का निर्णय लिया था। वजह साफ़ थी कि नात्सीवाद और कम्युनिज़्म की इस जंग में वह उस चुनौती को समझते थे कि आज की तारीख में सोवियत रूस के समाजवादी प्रयोग की हिमायत करना ज़रूरी है। (https://m.thewire.in/article/history/irfan-habib-sitaram-yechury-memorial-lecture)

प्रोफेसर इरफान हबीब का कहना था कि स्थितियां वाकई बेहद कठिन थीं, जापान भारतीय सीमा पर पहुंचा था और जब तक स्तालिनग्राद की ऐतिहासिक लड़ाई में – जिसमें 20 लाख से अधिक सोवियत नागरिकों ने अपनी कुर्बानी दी थी – हिटलर को शिकस्त नहीं मिली थी, तब तक उसका और उसके सहयोगियों मुसोलिनी आदि ताक़तों का तीसरी दुनिया के अन्य मुल्कों पर भी प्रत्यक्ष दबदबा क़ायम हो सकता था और फिर आज़ादी की लड़ाई कई दशक पीछे चली जाती।

याद रहे, वह भारत छोड़ो आन्दोलन  का दौर था और कांग्रेस ने ब्रिटिशों के खिलाफ़ व्यापक दबाव बनाया था। उन दिनों के बदलते हालात को लेकर कांग्रेस के अन्दर भी जबरदस्त उहापोह की स्थिति थी। खुद जवाहरलाल नेहरू – जो फासीवाद, नात्सीवाद के ख़तरे के प्रति पहले से सचेत थे – उन्हें भी यह संभावना नज़र आ रही थी कि फासीवाद के ख़िलाफ़ विश्वव्यापी संघर्ष अगर कमज़ोर पड़ा तो उसका भयावह साया तीसरी दुनिया के मुल्कों पर पड़ सकता है।

यह बात वाम के हिमायतियों को कभी नहीं भूलना चाहिए कि कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत रूस पर जर्मनी के हमले के बाद भले ही औपनिवेशिक सरकार के प्रति अपना स्टैण्ड बदला, लेकिन व्यापक जनता के साथ जुड़ाव को लेकर, उनकी समस्याओं को लेकर संघर्ष जारी रखने की उनकी मुहिम जारी रही। बंगाल के ऐतिहासिक अकाल – जिसमें लाखों लोग अन्न की कमी के चलते, धन्नासेठों द्वारा अधिक दाम पाने की लालच में की गयी जमाखोरी के चलते, मर गए थे ; उनकी त्रासदी शेष भारत के सामने नहीं आती, अगर उन्होंने ‘भूखा है बंगाल’ जैसी व्यापक मुहिम देश के अलग अलग हिस्सों में चलायी नहीं होती। मज़दूरों, किसानों और अन्य मेहनतकश तबकों में उनकी निरंतर जारी सक्रियता का ही आलम था कि दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के दौर में मज़दूरों, किसानों, आदिवासियों के ज़बरदस्त आंदोलन कम्युनिस्टों के नेतृत्व में खड़े हुए (https:/www.newsclick.in/communists-and-indias-freedom-struggle#)

जनता के हितों को लेकर पार्टी की इसी निरंतर संलग्नता का नतीजा था कि ऐतिहासिक तिभागा आन्दोलन, तेलंगाणा संघर्ष, पुन्नपा वायलार संघर्ष मुमकिन हो सके और इतना ही नहीं, जब  रॉयल इंडियन नेवी ने विद्रोह किया तो उसके हक़ में मुंबई, कलकत्ता या मद्रास की सड़कों पर मज़दूरों का सैलाब कम्युनिस्टों की सक्रियताओं के चलते ही मुमकिन हो सका था, जिसके लिए कइयों को अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ी थी।

क्या यह बात इतिहास के किताबों से कभी मिटा दी जा सकेगी कि  रॉयल  इंडियन नेवी के इन बाग़ी नाविकों ने, विद्रोहियों ने जहाजों पर झंडे फहराया तो उसमें कांग्रेस, मुस्लिम लीग के झंडों के साथ बराबरी से कम्युनिस्टों का लाल परचम भी लहरा रहा था।

प्रोफेसर हबीब के व्याख्यान का तीसरा अहम पहलू था, बंटवारे के दिनों कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा अख्तियार किया गया विवादास्पद रुख।

अपने व्याख्यान में प्रोफेसर हबीब ने बंटवारे के झंझावाती दिनों में कम्युनिस्ट पार्टी के इसी ‘विवादास्पद स्टैण्ड ’ की मुखालफ़त की जो उन्होंने बंटवारे को लेकर लिया था, जिसे ‘अधिकारी थीसिस’ के तौर पर जाना जाता है। (https://www.marxists.org/subject/india/cpi/pakistan-national-unity/nat-unity-now.pdf )

याद किया जा सकता है कि पाकिस्तान निर्माण की बात जब जिन्ना ने और उनके सहयोगियों ने उठायी, भारतीय उपमहाद्धीप को धर्म के आधार पर बांट देने की अपनी समझदारी को प्रस्तुत किया, तब जहां गांधी, नेहरू की अगुआईवाली कांग्रेस ने इसका विरोध किया, गांधीजी ने यहां तक कहा कि ऐसा बंटवारा मेरी लाश पर होगा, वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ने पाकिस्तान के निर्माण को राष्ट्रीयताओं की मुक्ति के संदर्भ में देखा था और उसकी हिमायत की थी।

सोवियत रूस में इन्कलाब सम्पन्न होने के बाद कामरेड स्तालिन ने राष्ट्रीयताओं की मुक्ति की थीसिस रखी थी, जहां विभिन्न राष्ट्रीयताओं को उजागर किया गया था, इस पद्धति को प्रस्तुत किया था कि किस आधार पर राष्ट्रीयताएं सम्बोधित की जाती हैं। उनकी इस थीसिस का भारतीय संदर्भ में बेहद गलत इस्तेमाल पार्टी की पाकिस्तान लाईन को लेकर सामने आया था। पार्टी के नेतृत्व  ने इस बात पर भी गौर नहीं किया था कि कम्युनिस्ट इंटरनेशनल से सम्बद्ध अग्रणी नेता रजनी पाम दत्त – जो भारतीय पार्टी के साथ नजदीकी सम्पर्क में रहते थे – उन्होंने भी राष्ट्रीयताओं की थीसिस के इस ग़लत इस्तेमाल को रेखांकित किया था और उसे सुधारने की सलाह दी थी।

यही वह दौर था कि जब मुस्लिम लीग जो सारतः एक सांप्रदायिक पार्टी थी, तथा कांग्रेस जो राष्ट्रीय आंदोलन के सूत्रधार के तौर पर संघर्षरत थी और जिसमें प्रगतिशीलों से लेकर रूढिवादियों तक सभी शामिल थे, दोनों को समकक्ष रखने की ज़िद तत्कालीन कम्युनिस्ट नेतृत्व ने पाली थी, और वह समूचे उपमहाद्वीप में उपहास का कारण बने थे।

आप जिन्ना के उन दिनों के साक्षात्कारों को पढ़ें तो पायेंगे कि वे तीन झंडों के साथ उनकी सभाओं में उपस्थित होने वाले कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं का खूब मज़ाक उड़ाते थे। याद रहे, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता लाल झंडा, कांग्रेस का तिरंगा झंडा और मुस्लिम लीग का झंडा थामे अलग अलग सभाओं में पहुंचते थे।

कोई भी पूछ सकता है कि इस क़िस्म का ग़लत स्टैण्ड कम्युनिस्ट नेतृत्व ने कैसे लिया और जब इस स्टैण्ड का दिवालियापन उनके सामने ही उजागर हुआ, तब उन्होंने इसको लेकर गहरी आत्मसमीक्षा क्यों नहीं की ?

चुप्पी बनाए रखना निश्चित ही विकल्प नहीं हो सकता है।

ख़ासकर तब जब इस दौर का घटनाक्रम कहीं न कहीं दक्षिण एशिया के तीन मुल्कों – भारत, पाकिस्तान और बांगलादेश – के वर्तमान को आज भी प्रभावित कर रहा हो! हिन्दोस्तां के किसी भी हिस्से में चाहे शरारती तत्वों की पहल पर या स्वतःस्फूर्त ढंग से सही सांप्रदायिक तनावों, दंगों की परिघटना (आज भी) सामने आती है, तो आप भले ही सुनना न चाहें, सांप्रदायिक वर्चस्ववादी ताक़तें इस बात को उभारना नहीं भूलतीं कि बंटवारे के वक़्त ही संप्रदाय के आधार पर आबादी का स्थानांतरण हो पाता तो आज बेहतर स्थिति होती।

अपने अतीत को लेकर हमारा आज भी चला आ रहा मौन भले ही हमें फ़ौरी तौर पर असुविधाजनक सवालों से बचा लें, लेकिन वह उस गतिरोध को नहीं तोड़ सकता जिसका शिकार वाम आंदोलन आज भी है।

6.

विचार की अहमियत

मार्क्स का ऐतिहासिक उद्धरण है, ‘विचार जब जनसमुदाय द्वारा ग्रहण किए जाते हैं, तब वह भौतिक शक्ति बनते हैं।’

ज़ाहिर है, यह बात सभी किस्म के विचारों पर लागू होती है, गलत विचारों पर और सही विचारों पर भी। फिलवक्त़ जो समाजी-सियासी मंज़र हमारे सामने है उसमें यह बात गलत, जनद्रोही बातों पर अधिक लागू होती दिखती है, हिन्दुत्व वर्चस्ववाद के विचारों पर अधिक लागू होती है, जिसका जादू लोगों के सिर पर चढ़ कर बोल रहा है।

अगर इस परिदृश्य  को बदलना है तो स्थापित सही विचारों की खामियों के बारे में बेबाकी से राय बनानी होगी और सही विचार सामने लाने होंगे। अपने पुराने विचारों को, अपनी पुरानी धारणाओं को परखना भी होगा कि हम कहां चूक गए ?

मेरे खयाल से लेखकों, विचारशील लोगों के सामने यह चुनौती है कि वह नए विचारों को सामने लाने के उद्यम में जुट जाएं।

मुझे तीन-चार ऐसे इलाके दिखते हैं, जहां नए किस्म के चिन्तन की या नयी जमीन तोड़ने की जरूरत दिखाई देती है।

एक, बंटवारे को लेकर हमारी समझदारी जिसमें लगभग 10 से 15 लाख लोग मारे गए थे और जिनका बहुलांश आपसी हिंसा में मारा गया था और एक से डेढ़ करोड़ लोग अपने अपने वतन से बेदखल कर दिए गए थे।
दूसरे, सांप्रदायिक फासीवाद के उदभव की या इस परियोजना को लेकर समय समय पर प्रगट प्रगतिशील तबकों की समझदारी और उन पर अमल को लेकर हमारी राय
तीसरे, आज जब हिन्दुत्व वर्चस्ववाद का विचार एक सहजबोध के तौर पर समाज में मौजूद है, हिन्दू आयडिया आफ इंडिया अर्थात ‘भारत की हिन्दूवादी संकल्पना बड़े हिस्से को प्रभावित की है तो प्रगतिशील ताकतों की तरफ से इसको लेकर क्या वैकल्पिक नज़रिया पेश किया जा सकता है ?

याद करें, विभाजन की विभीषिका को लेकर जब जब बात चलती है तो अक्सर यह बात पेश की जाती है जो दक्षिण एशिया में स्थित अवाम के मानस में गहराई में छिपी हिंसा को, उसकी संकीर्णताओं को, उसके पिछड़ेपन को उदात्त तरीके से पेश करती है, यहां तक इस खूरेंजी में लोगों की अपनी सक्रिय संलिप्तता को एक तरह से अनदेखा करते हुए सारा जिम्मा ब्रिटिशों के माथे पर डालती है। उनका कहना रहता है कि अंग्रेज भारत में आए और उन्होंने हमें बांट दिया , गोया ब्रिटिश-आगमनपूर्व भारत में लोग बड़े मेल मिलाप और आपसी सदभाव से रहते थे।

कुछ लोगों की तरफ से यह दावे भी किए जाते हैं कि ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स मिल ने जिस तरह ब्रिटिशकालीन भारत के इतिहास को बयां किया था, जिस तरह उन्होंने उसे हिन्दू भारत, मुस्लिम भारत और ब्रिटिश भारत के रूप में बांटा था, उसका दूरगामी असर भारतीय मानस पर पड़ा।

तय बात है कि यह समझदारी ब्रिटिशपूर्व भारत में पहले से समाजों में मौजूद विभाजक रेखाओं को (faultlines) अनदेखा करती है, आपसी रंजिशों पर परदा डालती है, अंतर-सामुदायिक कलहों पर मौन बरतती है। (https://www.jstor.org/stable/312153 ; The Pre-History of ‘Communalism’? Religious Conflict in India, 1700-1860, C. A. Bayly, Modern Asian Studies, Vol. 19, No. 2 (1985), pp. 177-203 (27 pages) Published By: Cambridge University Presschrome-extension ; https://www.bu.edu/cura/files/2018/11/VF_new15914.pdf )

इस रुख का नतीजा यही होता है कि बंटवारे जैसी विभीषिका को लेकर आज भी हमारी समझदारी बेहद एकांगी है और यांत्रिक है, जो जनता की एजेंसी / कर्ताशक्ति की बात को भी शून्य कर देती है और बताती है कि सब उनका अर्थात ब्रिटिशों का कराया हुआ है। क्या इसे सही कहा जा सकता है ? (https://scroll.in/article/809187/why-india-must-end-the-states-amnesia-about-the-horrors-that-accompanied-partition ; https://mainstreamweekly.net/article12776.html)

हम एक सामान्य-सी बात पर भी गौर नहीं करते कि वाकई ब्रिटिशपूर्व भारत में हर कहीं अमनचैन था, सभी बड़े मेलमिलाप से रहते थे तो मध्ययुग में कबीर इस पीड़ा को क्यों जुबां देते हैं कि

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी–लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।

समयाभाव के कारण इस पहलू पर अधिक बात करना मुमकिन नहीं है, जिस पर लम्बी बात फिर कभी की जा सकती है।

दूसरी बात, जैसा कि मैने पहले ही उल्लेख किया सांप्रदायिक फासीवाद के भारत में जड़मूल होते जाने की परिघटना को लेकर भी नए सिरेसे गुफतगू जरूरी है। ध्यान रहे हिन्दुत्व वर्चस्ववाद की परिघटना को आम तौर पर हिन्दू मुस्लिम बायनरी (द्धिविध) में ही देखा जाता रहा है, जिसका नतीजा यह है कि हमारा समूचा सांप्रदायिक संघर्ष लगातार सिकुड़ता जा रहा है। यह प्रश्न नहीं पूछा जाता कि इसकी वजह क्या है, कहीं हमारे चिन्तन में, हमारी प्रस्तुति में खोट तो नहीं है।

मिसाल के तौर पर, इस बात की पड़ताल आवश्यक है कि 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 20 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में हिन्दुत्व परियोजना को लेकर तीन बड़े हस्तक्षेप सामने आए, एक आर्य समाज का गठन ( 1875) , दूसरा हिन्दू महासभा की स्थापना (1915) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण (1925) क्या हमारे पास इसकी कोई व्याख्या है कि आखिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परियोजना – जो बाद में शुरू हुई थी, वही सफल क्यों हो गयी और बाकी परियोजनाएं सारतः उसके आनुषंगिक समूहों में परिणत हो गयीं ? क्या यह कहा जा सकता है कि संघ की सफलता इस वजह से हुई क्योंकि उसने हिन्दू समाज की संरचना में किसी भी किस्म के रैडिकल बदलाव – सामाजिक या सांस्कृतिक  बदलाव – की बात तक नहीं की और उसने एक तरह से वर्ण-जातिआधारित, मनुस्मृति  से प्रेरित हिन्दू समाज को उसी तरह 21 वीं सदी में ले जाने का – जातिवर्ण के उच्चनीचअनुक्रम को ज्यों का त्यों रखते हुए, स्त्रिायों की दोयम स्थिति को बनाए रखते हुए – आगे ले जाने का निर्णय लिया ?

मेरा मानना है कि जब तक हम दो अन्य पहलुओं की ठीक से व्याख्या नहीं करते तब तक हिन्दुत्व वर्चस्ववाद के खिलाफ भारतीय संविधान के सिद्धांतों और मूल्यों को स्थापित करने का हमारा संघर्ष कदमताल ही करता रहेगा।

उदाहरण के तौर पर पश्चिमी भारत – मुख्यतः आज का महाराष्ट्र  – जो शुरूआती दौर से हिन्दुत्व के विभिन्न विचारकों, पायोनियरों की जन्मभूमि क्यों बना हुआ है – चाहे सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर हों या बालासाहेब देवरस और बाल ठाकरे हों या आज के दौर में मोहन भागवत हों ! (RSS at 100: Caste, Savarkar, and the real roots of RSS | The Federalhttps://www.youtube.com/watch?v=tpgQi1LaRgo) सच्चाई यही है कि उस इलाके में मुसलमानों की तादाद हमेशा 10 फीसदी से कम थी और वहां मुसलमान राजनीतिक तौर पर भी कभी भी हावी नहीं हो सके थे – जबकि वहां छत्रपति शिवाजी महाराज का आगमन हुआ, जो सभी समुदायों को साथ लेकर चलते थे तथा जिनकी सक्रियताओं ने औरंगजेब को दक्षिण की मुहिम शुरू करनी पड़ी।

क्या संघनिर्माण को हम 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में सामने आये ज्योतिबा फुले-सावित्री-फातिमा के सांस्कृतिक विद्रोह की प्रतिकिया के तौर पर देख सकते हैं, जिसने पेशवाई के वैचारिक दबदबेवाले उस इलाके में ब्राहमणशाही और महाजनशाही (शेटजी और भटजी) के ख़िलाफ़ बग़ावत का ऐलान किया था? याद रहे, डा हेडगेवार, उनके अनुयायी चं प भिशीकर द्वारा लिखे उनकी जीवनी में संघ की स्थापना को लेकर साफ साफ बताते हैं कि एक तो यवनों (अर्थात मुसलमान) का जोर बढ़ रहा था और दूसरे, गैरब्राहमण आंदोलन तेज हो चला था। जानने योग्य तथ्य यह है कि 19 वीं सदी के आखरी दशक में गुजर गए फुले दंपति के बाद उनके आंदोलन ने गैरब्राहमण आन्दोलन का रूप धारण किया था और जिसने महाराष्ट्र के तत्कालीन सामाजिक वातावरण असंतोष की लहरें पैदा की थीं। (RSS at 100: Caste, Savarkar, and the real roots of RSS | The Federal ; https://www.youtube.com/watch?v=tpgQi1LaRgo&feature=youtu.be)

फुले की अपनी दृष्टि व्यापक थी, उन्होंने जिस सत्यशोधक समाज की स्थापना की, उसकी पहली संचालन कमेटी में उन्होंने एक यहुदी को भी स्थान दिया था, जो उनका सहयोगी था, उनके कामों में फातिमा शेख और उनके बड़े भाई उस्मान शेख नजदीकी से जुड़े थे, यहां तक कि जब सामाजिक कामों के चलते – जब उनके पिता गोविंदराव फुले ने अपने बेटे और बहुको घर से बाहर किया था – उन्हें उस्मान शेख के घर में ही शरण मिली थी। मगर फुले की मुहिम ने सनातनी तत्वों को बेचैन किया था, जिन्होंने आगे चल कर हेडगेवार के रास्ते को अपनाया था।

संघ निर्माण और विस्तार से जुड़े एक अन्य पहलू पर भी अधिकतर लोगों की निगाह नहीं जाती, जिसका सम्बन्ध संगठन निर्माण का उसका अपना नज़रिया और तरीका है। निश्चित तौर पर निरंतर चलनेवाली शाखाएं, बचपन से ही अपने सम्पर्क में लोगों को लाने की उनकी कोशिशें और संगठन विस्तार के लिए आनुषंगिक संगठनों का बिछाया उसका जाल – उसने उसके व्यापक विस्तार को आसान किया है। इतनाही नहीं रफ़्ता -रफ़्ता सामाजिक मानस को अपने हिसाब से ढालने की उसकी कोशिश – जिसके लिए उसने एकल विद्यालयों से लेकर बडे़ बड़े शिक्षण संस्थानों का जाल बिछाया है, समाजसेवा के नाम पर अलग अलग किस्म की योजनाएं चलायी है, उसने उसके विचारों को दूर तक पहुंचाने में मदद पहुंचायी है।

हाल ही में दिवंगत प्रख्यात इतिहासकार के एन पणिक्कर संघ की कार्यप्रणाली और प्रगतिशील ताकतों की कार्यप्रणाली में फरक करते हुए लिखते थे कि दोनों की धाराओं की तरफ से संस्कृति  के क्षेत्र में हस्तक्षेप किए गए, मगर दोनों हस्तक्षेपों को इस तरह अलग से देख सकते हैं, जिसे वह ‘संस्कृति  में हस्तक्षेप’ (Intervention in Culture) और ‘सांस्कृतिक हस्तक्षेप’ (Cultural Intervention) के तौर पर परिभाषित करते थे। अगर हम गहराई में जाएं तो यह महज शब्दों का खेल नहीं है, उसके पीछे मनुष्य के मानस को बदलने की एक अलग दृष्टि नज़र आती है। संघ जैसे हिन्दु राष्ट्र  के लिए समर्पित संगठन ने मानस को बदलने को, प्रभावित करने को एक निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया के तौर पर देखा, जिसे मार्क्सवादी विचारक ग्रामशी ( Gramsci) कुछ अन्य संदर्भ में चेतना के आणविक स्तर पर रूपांतरण (molecular transformation of consciousness) के तौर पर देखते हैं, वहीं प्रगतिशील ताकतों की समझदारी समय समय पर किए जाने वाले हस्तक्षेपों तक सीमित रही जिसे आप अच्छा नाटक, अच्छा गीत या अच्छी फिल्म के जरिए हासिल कर सकते हैं।

तुलनात्मक तौर पर देखें कि अगर आप कहीं एक छोटे स्कूल की नींव डालते हैं या वंचितों-पीड़ितों या जरूरतमंदों के इलाके में शाम के वक्त उन्हें निरंतर पढ़ाने का रास्ता अपनाते हैं, तो आप के लिए बच्चों के मानस को रफ़्ता – रफ़्ता ढालने का मौका मिल सकता है। इसके बरअक्स अच्छा नाटक, गीत, फिल्म या अन्य कोई प्रभावी प्रस्तुति उपस्थित जनों को क्षणिक तौर पर प्रभावित कर सकती है, वहीं वह असर धूमिल होने में अधिक वक्त नहीं लगेगा।

मिसाल के तौर पर संघ के एक कार्यकर्त्ता ने मुझे यह भी बताया कि हम समयदान भी करते हैं , मेरे यह पूछे जाने पर उसने बताया कि ‘अगर आप के पास सप्ताह में चंद घंटे संगठन को देने के लिए हैं , तो हम उन्हें इसी हिसाब से काम बताते हैं ‘ फलां अस्पताल में मरीजों से मिल आइये वगैरह – वगैरह

संघ की वैचारिक अन्तर्वस्तु से या भारत को हिन्दु  राष्ट्र बनाने की उसकी परियोजना से, अन्य समुदायों के प्रति दुराव, नफरत को बढ़ावा देने की उसकी सोच को हम हमेशा ही गलत मानेंगे, लेकिन क्या यह जानना उचित नहीं होगा कि इतना जनद्रोही विचार समाज के बड़े हिस्सों के लिए अचानक आकर्षक क्यों लगने लगा ?

एक क्षेपक के तौर पर बता दें कि दक्षिण एशिया के इस हिस्से में हिन्दु राष्ट्र  के लक्ष्य के लिए गठित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( स्थापना 1925) हो या 1941 में इसी उपमहाद्वीप मौलाना मौदूदी द्वारा स्थापित जमाते इस्लामी जैसे संगठन हों जो ‘इस्लामिक जीवनशैली को स्थापित करने और उसकी हिफाजत करने ’ के लिए समर्पित होने का दावा करते हैं उनकी कार्यप्रणाली में काफी समानता नज़र आती है। (देखें: परिशिष्ट ‘जमाते–स्वयंसेवक’ ??)

मेरा तीसरा प्रश्न ‘हिन्दू आयडिया आफ इंडिया’ के लोकप्रिय होते जाने से है।

भारत की एक व्यापक व्याख्या आज़ादी के आन्दोलन के दौरान टैगोर-गांधी-नेहरू ने पेश की थी – जिसे नेहरू ने अपनी ऐतिहासिक रचना ‘भारत एक खोज’ ( Discovery of India) के जरिए पेश किया था।

ज़ाहिर था कि भारतीय इतिहास, भारतीय सभ्यता की यह कल्पना, यह इमैजिनेशन उन दिनों प्रबुद्धजनों को ही नहीं बल्कि व्यापक जनता को आकर्षक लगी  – जो ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत के खिलाफ अपनी चटटानी एकता कायम करने में मुब्तिला थी और वाकई उसने इस एकता के लिए एक मजबूत सैद्धांतिक आधार प्रस्तुत किया। उन दिनों में ही हिन्दुत्व की जमातों की तरफ से भारत के हिन्दू इंडिया होने की बात कही जाती रही थी, लेकिन आज़ादी के आंदोलन से सचेत दूरी और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष के बजाय उन्होंने अपनाए समर्पण के रास्ते के चलते, उनकी यह संकल्पना व्यापक ढंग से लोकप्रिय नहीं हो सकी। ?

आज की तारीख में आज़ादी के सात दशकों बाद हिन्दुत्व ताकतों द्वारा की गयी भारत की संकल्पना – जिसके तहत वह भारत को हिन्दू भारत  के तौर पर प्रस्तुत करते हैं – लोगों के एक हिस्से को आकर्षक लगने लगी है। उनकी तरफ से यह तर्क पेश किया जाता है कि दुनिया में कई सारे मुस्लिम राष्ट्र हैं, ईसाई मुल्क हैं, बौद्ध देश हैं, फिर एक / अकेला / भारत अपने आप को हिन्दु राष्ट्र घोषित कर सके तो आपत्ति क्यों होती है , जो बात एक तरह से राष्ट्र के धर्म के आधार पर होने की सियासत पर आधारित है। ध्यान रहे आज़ादी के आंदोलन के अग्रणियों ने अपने विचारों, अपने व्यवहार से इस विचार को सिरे से खारिज किया था। 21 वीं सदी में धर्म के आधार पर राष्ट्र की संकल्पना किस किस्म का कहर बरपा कर सकती है, इसकी मिसाल हमारे पड़ोसी मुल्कों – पाकिस्तान, अफगाणिस्तान के अनुभव से हम खुद देख सकते हैं।

हमें सोचना चाहिए  कि भारत की हिन्दू आयडिया के बरअक्स हमारा अपना इमेजिनेशन (Imagination, कल्पना, तसव्वुर) क्या होगा ?

निश्चित ही  वह नया तसव्वुर होगा, बल्कि हमें उसकी नयी इमेजिनेशन गढ़नी होगी – जिसमें बुद्ध, अशोक भी हों, चार्वाक, पाणिनी, पातंजलि हों, – भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धियों को प्रतिबिम्बित करने वाले कालिदास, आर्यभटट और तमाम अनाम विदुषियां, विद्वान हों और मध्ययुग में आगे चल कर अकबर भी हों … जब फिर राजनीतिक सामाजिक आजादी के आधुनिक युग के अग्रणी भी हों।

बातें बहुत सी हैं, जिस पर अधिक गहराई से चिन्तन आवश्यक है।

मैं जानता हूं कि यह लम्बा नोट पढ़ते हुए आप थक गए होंगे, मुमकिन हैं ऊब भी रहे हों, लेकिन एक बेहद जरूरी पहलू पर ध्यान दिलाए बिना बात को अधबीच समाप्त करना उचित नहीं होगा।

प्रतिबद्ध विचारकों, समाज की बेहतरी के लिए सक्रिय जनों को, लेखकों, कलाकारों, सांस्कृतिक कर्मियों को इस पर अपनी साफ समझदारी बनानी ही होगी कि आज़ादी के बाद के इस लगभग अस्सी साला यात्रा में विचार को ही द्रोह समझने वाली ताकतें किस तरह हाशिये से केन्द्र में पहुंचती गयी, इसका क्या विश्लेषण उनके पास है ?

जैसा कि शुरूआत में मैंने जिक्र किया था 21 वीं सदी की तीसरी दहाई के उत्तरार्द्ध के आज के भारत की कल्पना तक न आजादी के कर्णधारों ने, सामाजिक मुक्ति के अग्रणियों ने और उनके नेतृत्व में रफ़्ता-रफ़्ता  गढ़ते जाते समाज के मनीषियों ने की थी और आज जब हम इस हक़ीकत से रूबरू हैं तो हमारे लिए अनिवार्य है कि हम सोचें कि क्या जम्हूरियत के इस कारवां को, लोकतंत्र के इस महान प्रयोग को क्या इसी अंधी गली में पहुंचना था ? क्या हमारा संविधान इतना कमजोर बना था कि उसी की छत्रछाया में हम उसके बुनियाद उसूलों को सिर के बल खड़ा कर पाते ? अगर विभाजन की प्रचंड हिंसा के बावजूद हम लोगों ने यह संकल्प लिया कि नागरिक बनने के लिए धर्म कोई पैमाना नहीं होगा, यहां पैदा हर व्यक्ति भारतीय है, फिर संविधाननिर्माण की 75 वीं सालगिरह के पहले ही यह उलटफेर कैसे हो सका कि धर्मविशेष के आधार पर लोगों को नागरिकता देने पर कानूनी मुहर लग गयी।

निश्चित ही डा अम्बेडकर ने ऐसी सम्भावना के बारे में हमें बार बार आगाह किया था कि संविधान के सिद्धांत, मूल्य अच्छे हैं , मगर वह गलत लोगों के हाथों में पड़ा तो उसे विकृत कर सकता है ; दूसरी बात उन्होंने सामाजिक नैतिकता और संवैधानिक नैतिकता के बीच मौजूद विशाल अंतराल की की थी और हमें बताया था कि संवैधानिक नैतिकता अपने आप नहीं आती बल्कि उसे गढ़ना पड़ता है, लोगों को शिक्षित करना पड़ता है।

क्या यह कहना उचित होगा कि भारत के सामाजिक मन को ठीक से पहचानने में हम असफल रहे या अपनी संकीर्ण समझदारी या फौरी राजनीतिक-सियासी लाभों के लिए हम (बकौल राममनोहर लोहिया)‘सांप को कुचलने के नाम पर शैतान से भी हाथ मिलाते रहे!’

इसका जवाब सभी को ढूंढना है जो संवेदनशील है, समावेशी है, मानवीय है, इन्साफपसंद है, प्रगतिउन्मुख हैं, गैरबराबरी की मुखालिफत करते है, शोषणविहीन – समतामूलक समाज का निर्माण चाहते हैं, गांधी-नेहरू-अम्बेडकर को चाहनेवाले हैं, लोहिया के मुरीद है, मार्क्स के विचारों के लिए प्रतिबद्ध कहलानेवाले उनके राही हैं।

7.

‘समाजवादियों ने हिन्दू राष्ट्र को किस तरह मुमकिन बनाया ?’

आज़ादी के आंदोलन से सचेतन दूरी और गांधी हत्या जैसी आपराधिक आतंकी घटना में हिन्दुत्व विचारों के वाहकों की संलिप्तता – यह दोनों ऐसे अहम पहलू थे कि हिन्दुत्व वर्चस्ववाद की जमात लम्बे समय तक राजनीतिक हाशिये पर रही  है ।

स्थूल रूप में देखें तो 1947 में मिली स्वाधीनता के बाद शुरू हुआ यह सिलसिला लगभग 30 साल तक जारी रहा, जब पहली दफा जनता पार्टी के नाम से एक गैरकांग्रेसी सरकार केन्द्र में कायम हुई। राजनीतिक हाशिये से राजनीति के केन्द्र में रफ़्ता-रफ़्ता  अपने आप को स्थापित करने की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों की यात्रा पर कई कोणों से लिखा गया है, लिखा जा रहा है। हाल के वर्षों में इस पहलू पर भी चर्चा शुरू हुई है कि विभिन्न राजनीतिक सामाजिक संगठनों  – जिनका चिन्तन स्थूल रूप में संघ के हिन्दुराष्ट्र के विचारों के प्रतिकूल दिखता है – की इस संदर्भ में भूमिका की भी पड़ताल हो।

दो साल पहले अग्रणी पत्रकार कुर्बान अली ने, जो खुद समाजवादी विचारों के करीबी समझे जाते हैं, इस मामले में एक नई जमीन तोड़ने की कोशिश की जिसमें उन्होंने भारत के समाजवादी आंदोलन के समूचे इतिहास को खंगालते हुए यह स्पष्ट किया कि किस तरह एक समय में विराट सम्भावना लिए पैदा इस आंदोलन ने बाद में अपने नेतृत्व की समझौतापरस्ती और अंध कांग्रेसविरोध के चलते हिन्दु राष्ट्र का रास्ता आसान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। [How Socialists Enabled Hindu Rashtra, https://caravanmagazine.in/history/socialists-enabled-hindu-rashtra] अपने आलेख की शुरूआत में उन्होंने जयप्रकाश नारायण के व्यक्तित्व पर भी रौशनी डाली है (http://www.insafbulletin.net/archives/5230)  और उनसे जुड़े दो प्रसंगों का विशेष उल्लेख किया है।

पहला प्रसंग 1948 में गांधी हत्या के तत्काल बाद का है जब भारत की सोशालिस्ट पार्टी के उन दिनों सेक्रेटरी रहे जयप्रकाश नारायण ने ‘जनता का आवाहन किया था कि लोगों को चाहिए कि वह सांप्रदायिक ताकतों को कोई स्थान न दें’ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दु महासभा को ‘शैतानी ताकतें’ forces of evil/ वही/ कहा था, आपने सरकार को साफ शब्दों में आवाहन किया था कि वह सभी सांप्रदायिक संगठनों को ‘कुचल दे’ उनके मुताबिक ‘बहुत ज्यादा दिनों से इन शैतानी ताकतों को जनता में दरारें पैदा करने की छूट मिली है।’ (Too long have evil men been permitted to preach civil strife.)

एक जमाने में अपनी रैडिकल छवि के लिए मशहूर वही जयप्रकाश नारायण 1975 तक आते आते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर 180 डिग्री पलटी मारते दिखते हैं। भारतीय जनसंघ– जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चुनावी शाखा रहा है – के सालाना अधिवेशन में अलग ही सुर अलापते हैं। वह भारतीय जनसंघ को कहते हैं कि ‘अगर आप को कोई फासिस्ट कहता है, तो मैं भी फासिस्ट कहलाना पसंद करूंगा’ “If you are a fascist,” he told the delegates, “then I, too, am a fascist. ”( वही)

और अगले ही अनुच्छेद में पत्रकार कुर्बान अली लोहिया की भूमिका की भी चीरफाड़ करते हैं। उनके मुताबिक

‘भारतीय जनसंघ के जरिए संघ के पुनर्वास को समाजवादी आंदोलन के एक हिस्से ने सुगम बनाया, जो आजादी के वक्त़ कांग्रेस से अलग हुआ था और राष्ट्रीय विपक्ष के तौर पर अपने आप को प्रस्तुत करना चाह रहा था। जयप्रकाश नारायण और लोहिया – जिन्होंने अग्रणी समाजवादी विचारक / नारायण/ के सर्वोदयी राजनीति की तरफ मुड़ने के बाद समाजवादी धारा की कमान संभाली थी, उस लोहिया ने भारतीय जनसंघ के साथ काम करते रहने के लिए तरह तरह की कवायद की, यहां तक कि उसे विभिन्न गठबंधनों का हिस्सा बनाया। इस बात से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि अतीत में उन्होंने किस तरह संघ की  जबरदस्त निंदा  की है और यहां तक उनके साथियों का एक हिस्सा इस गठजोड़ के खिलाफ था। ….विपक्ष को एकजुट करने के लिए बदहवास लोहिया ने लिखा, ‘‘कोलकाता में पार्टी के 1963 के सम्मेलन में उन्होंने कहा कि देश में यह धारणा बनी है कि कांग्रेस को सत्ता से कोई हटा नहीं सकता, इसलिए मैं शैतान से भी हाथ मिला सकता हूं इस सांप को कुचलने के लिए।’

अपने लम्बे आलेख में लेखक फिर लोहिया-जयप्रकाश नारायण की आज़ादी के वक्त कट्टर संघ विरोध, उसकी सांप्रदायिक राजनीति की सैद्धांतिक आधार पर मुखालिफत की भूमिका से शुरू करके उनके रूपांतरण पर रौशनी डालते हैं। लोहिया के संदर्भ में वह मुक़ाम जल्द आता है, जब 1962 में संपन्न लोकसभा के चुनावों में उनके नेतृत्ववाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी फिर कोई कमाल नहीं कर पाती है – जैसी कि वह लम्बे समय से उम्मीद पाले रहते हैं – और फिर वह गैरकांग्रेसवाद की रणनीति रचते है, जिसके बैनर तले वह दक्षिण से लेकर वाम की ताकतों को चुनावी मंच पर एकत्रित करने की योजना बनाते हैं।

गैरकांग्रेसवाद का पहला प्रयोग 1967 के चुनावों में दिखता है, जहां उत्तर भारत के कई प्रांतों में कांग्रेस के खिलाफ संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनती हैं, जो निश्चित ही स्थिर सरकारें नहीं दे पातीं, मगर उस बैनर तले कहीं वाम धारा के लोग भी गठबंधन की सरकार में शामिल होकर मंत्रीपद पाते दिखते हैं।

जयप्रकाश नारायण संसदीय राजनीति से पहले ही दूर सर्वोदयी राजनीति में सक्रिय रहते हैं, मगर वह भी अचानक 70 के दशक के पूर्वार्द्ध में राजनीतिक सक्रियता की नयी पारी शुरू करते हैं और कांग्रेस के खिलाफ गुजरात – बिहार में खड़े हो रहे आंदोलनों की हिमायत करते हैं और बिहार में तो इस आंदोलन का चेहरा बन जाते हैं। आप गौर करेंगे तो इसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रणनीति साफ दिखती है, जिसमें उनके ‘सेनापति’ के तौर पर संघ के वरिष्ठ प्रचारक नानाजी देशमुख मौजूद रहते हैं।

भारतीय राजनीति का बाद का इतिहास इस बात का गवाह है कि समाजवादी धारा और उसके तमाम अग्रणी चेहरे अपने अंध कांग्रेसविरोध के चलते पहले भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के साथ गलबहियां करने में संकोच नहीं करते हैं, चाहे वाजपेयी सरकार के संकटमोचक रहें प्रख्यात समाजवादी नेता जार्ज फर्नान्डीज हों , शरद यादव हों या मोदी सरकार में मंत्रीपद सम्भाले रामबिलास पासवान हों या अभी हाल में बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिए नीतिशकुमार जैसे लोग हों, इन तमाम लोगों ने संघ-भाजपा के असमावेशी एजेण्डा पर कभी भी सवाल नहीं उठाए और एक तरह से उसके लिए माकूल जमीन तैयार करते रहे।

21 वीं सदी की तीसरी दहाई में भी समाजवादी धारा विलुप्त नहीं हुई है, कई समाजवादी नेता संघ की असलियत से वाकीफ सक्रिय है, मुलायम सिंह यादव द्वारा स्थापित समाजवादी पार्टी भी उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार रखती है, मगर इस बात से कोई असहमत नहीं होगा कि समाजवादी धारा ने जितनी संभावना आज़ादी के बाद के दिनों में दिखाई थी, वह बहुत पहले विलुप्त हो चुकी है।

समाजवादी धारा की यह परिणति भारत की वाम शक्तियों के सामने भी कुछ सवाल निश्चित ही खड़े करती है।

अगर 60 के दशक में समाजवादी धारा के अग्रणी कांग्रेस को शिकस्त देने के लिए ‘शैतान के साथ भी हाथ मिलाने को तैयार होने’ की बात रख रहे थे, पहले उपचुनावों में और बाद में राज्य विधानसभा के चुनावों में भारतीय जनसंघ के साथ मंच साझा कर रहे थे, गठबंधन कायम कर रहे थे, उन उथलपुथल के दिनों में वाम की शक्तियों का क्या रूख था ?

क्या उन्होंने गैरकांग्रेसवाद के नाम पर संघ-भारतीय जनसंघ को वैधता दिलाने वाली सियासत का उसूली आधार पर विरोध किया या नहीं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि अस्पष्टता के चलते या urgency के भाव के चलते मौन ही रहे ,  उसी ‘सिद्धांत’ से हमकदम चलते रहे ?

क्या हमारे लिए यह आत्मपरीक्षण का विषय होना नहीं चाहिए कि आपातकाल के बाद जिन जयप्रकाश नारायण को दूसरा महात्मा कहा गया था, यहां तक कि आपातकालविरोधी संघर्ष को ‘दूसरी आज़ादी’ के नाम से महिमामंडित किया गया था, जिसने एक तरह से पहली दफा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वैधता दिलायी, नयी  स्वीकृति प्रदान की और केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी स्थान दिलवाया, उस जयप्रकाश नारायण को लेकर कम्युनिस्टों का रूख क्यों बहुत अस्पष्ट रहा ?

किसी परिघटना को समझने में हमारी भूल हो सकती है, किसी व्यक्ति-संगठन की असलियत जानने में हम गड़बड़ी कर सकते हैं, लेकिन यह बात समझ से परे है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, उसके पीछे की फासीवादी प्रेरणाएं या स्वाधीनतापूर्व आन्दोलन तथा स्वाधीनता के बाद के आंदोलनों में उनकी निरंतर विवादास्पद भूमिका पर विस्तार से तथ्य पेश किए जाते रहने के बावजूद (https://www.jstor.org/stable/4414523 ) बाद के दिनों में क्या फौरी राजनीतिक लाभ के नाम पर उसके आनुषंगिक संगठनों के साथ जुड़ने से परहेज करने में प्रगतिशील ताकतें, वाम की शक्तियां सचेत रह पायीं ?

अगर आप के पास तथ्यों की कमी हो तो आप विभाजन के दंगों के बारे में वाम आन्दोलन के अग्रणियों के अपने अनुभव पढ़ सकते हैं या उनके लिखित दस्तावेज देख सकते हैं – जिसमें बार बार विभिन्न धर्म से ताल्लुक रखने का दावा करनेवाले संगठनों की – फिर चाहे वह हिन्दु राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पित हों, मुस्लिम राष्ट्रवाद के हिमायती हों या सिख नेशन बनाने के पैरोकार हों – हिंसक भूमिका को बार बार रेखांकित किया गया हो ,इस संदर्भ में पाकिस्तान की पंजाब हिंसा पर केन्द्रित जोशी-धन्वतरि रिपोर्ट आंखें खोलनेवाली हो सकती है (https://www.sacw.net/article5921.html) या आप जिसकी डरावनी झलक महज दो साल पहले प्रकाशित चर्चित पत्रकार धीरेन्द्र झा की किताब ‘Golwalkar: The Myth Behind the Man, The Man Behind the Machine’ के पन्नों को पलटते हुए देख सकते हैं (https://thewirehindi.com/287387/dhirendra-k-jha-golwalkar-the-myth-behind-the-man-the-man-behind-the-machine-rss-bjp) ।

आप चाहें तो कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया के तत्कालीन सेक्रेटरी  अजय घोष – जो अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के सेक्रेटरी   थे – उनके द्वारा विजयवाडा कांग्रेस (1961) में प्रस्तुत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में विचारों को पलटें, जिसमें बार बार संघ जैसी जमातों से दूरी बनाए रखने का आवाहन किया जाता रहा है।

प्रश्न उठता है कि आजादी के बाद के सात दशकों में उभरे जनान्दोलनों में – खासकर जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या आनुषंगिक संगठन सहभागी थे या परदे के पीछे के संचालक बने हुए थे – प्रगतिशील ताकतों ने, वाम की शक्तियों ने आजादी के पहले और आजादी के डेढ़ दशक बाद तक जो उन्हें सबक मिलते गए थे, उसको कितना ध्यान में रखा।

हम सभी ने गौर किया होगा कि आपातकाल के पचास साल पूरा होने पर चली बहस में यह मुददा प्रमुखता से उभरा था। (https://www.mainstreamweekly.net/article15924.html  )

जयप्रकाश नारायण, जिन्होंने बिहार आन्दोलन के दिनों में भारतीय जनसंघ के अधिवेशन में जाकर ऐलानिया कहा था कि ‘अगर भारतीय जनसंघ फासिस्ट है तो मैं भी फासिस्ट कहलाना पसंद करूंगा’, उनके बारे में वाम की अस्पष्टता के बरअक्स हम सेक्युलर पत्रकारों, विद्वानों के अपने आकलन को देख सकते हैं।

The Tribune (द ट्रिब्यून ) के संपादक रहे हरिश खरे ने आपातकाल के पचास साल पूरे होने पर पिछले साल लिखे अपने आलेख में जेपी की विवादास्पद भूमिका की गहन चिकित्सा की थी

‘[h]ow could a man like JP, so learned and so well steeped in an understanding of global forces and ideas battling it out on the boulevards in Europe, fail to foresee how his ‘total revolution’ cookie would crumble? He had no foot-soldiers, no cavalry, no artillery of his own, no tank divisions; he mistook a motley crowd of various ‘vahinis’ that had staged tableaus of streets protests and chaos in Patna and Ahmedabad as the vanguard of a revolution. The only outfit that had disciplined cadres was the RSS, and, inevitably, it acquired an operational stranglehold on the “movement.” (https://thewire.in/politics/the-emergencys-true-legacy-how-jps-naivety-empowered-the-rss)

उन्होंने आगे लिखा था:

Not only did Jayaprakash Narayan choose to be oblivious of history abroad, he even jettisoned his own understanding of the Indian realities and the nature of the RSS’s spots. He insisted that he had tried to “decommunalise them by allowing them to join our movement for total revolution. Any impartial observer would agree that this has been a significant contribution of this movement to the ideal of religious tolerance or secularism as it is called. I have thus tried to strengthen the foundation of secularism by bringing Jana Sangh and the RSS into the secular fold of total revolution.”(-do-)

उनके मुताबिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने किस तरह जेपी द्वारा दी गयी प्रतिष्ठा को आधार बना कर अपनी नयी छवि गढी और किस तरह ‘हिन्दुत्व’ जमात ने उसके बाद लम्बी यात्रा तय की है और किस तरह  ‘राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ’ का एक सामान्य राजनीतिक ताकत के तौर पर पुनर्वसन करने के लिए इतिहास किस तरह जयप्रकाश नारायण की निन्दा करेगा’[e]qually rough, ..hand to Jayaprakash Narayan for rehabilitating the RSS as a normal political force…’ (-do-)

गौरतलब है कि प्रोफेसर अपूर्वानंद ने इसी किस्म का सवाल अपने पहले के आलेख में उठाया था जिसका शीर्षक था ‘1974 में जेपी ने आरएसएस को आंदोलन के साथ जोड़ा. भारत आज भी उसकी कीमत चुका रहा है।’ [n/article/1007465/in-1974-jayaprakash-narayan-included-the-rss-in-his-movement-india-is-still-paying-the-pri]

लेख में वह उजागर करते हैं कि

JP was as opposed to the RSS as Indira Gandhi. So why did he, a seasoned politician and someone who could have been a statesman, fail to resist the temptation of making a Faustian pact with the RSS in 1974? Had the situation in country become so precarious that there was no option but to overthrow the Congress government – and to go to any extent to achieve this?’ (-do-)

उनके मुताबिक, ‘जेपी आंदोलन का सच्चा इतिहास अभी लिखा जाना बाकी है ’..

‘An honest history of the JP agitation is yet to be written…country completely? Why did he repudiate the actions of his friend Jawaharlal Nehru? Why did he announce a movement that he ambitiously called “the second freedom struggle”? Why did he copy the methods adopted during the freedom struggle such as asking the students to boycott universities and colleges for a year, calling upon people to not cooperate with the government, even going to the extent of asking the police and security forces to not obey the government?’ (-do-)

8.

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और दक्षिणपंथ


The owl of Minerva spreads its wings only with the falling of the dusk. 

मिनर्वा का उल्लू तभी अपने पंख फैलाता है, जब शाम होने को होती है.

ग्रीक पुराणों में मिनर्वा को ज्ञान, विवेक या कला की देवी समझा जाता है, जिसका वाहन है उल्लू।

उन्नीसवीं सदी के महान आदर्शवादी दार्शनिक हेगेल का ‘फिलासाफी आफ राइट’ नामक किताब का यह चर्चित कथन है, ‘‘मिनर्वा का उल्लू तभी अपने पंख फैलाता है, जब शाम होने को होती है’’ – कहने का तात्पर्य दर्शन किसी ऐतिहासिक परिस्थिति को तभी समझ पाने के काबिल होता है, जब वह गुजर गयी होती है। यह बात हमें प्रेरित करनी चाहिए कि हम भारतीय राजनीति की इस विकासयात्रा में इस बात की गहन विवेचना करें कि  आखिर दक्षिणपंथ जो पहले भारतीय राजनीति के हाशिये पर था वह किस तरह केन्द्र में पहुंच गया और इस पूरी यात्रा में प्रगतिशील ताकतों की भूमिका क्या रही ?

निःसंदेह इस मामले में प्रगतिशील व्यक्तियों या उनकी तंजीमों को ही पहल लेनी होगी, मगर यह दिलचस्प है कि उदारवादी किस्म के बुद्धिजीवी / कार्यकर्ता इस मामले में बेहद ईमानदारी के साथ पहल लेते दिखे हैं, अपनी भूमिका की आत्मालोचना करते नज़र आए हैं कि किस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए 2011 के अण्णा आंदोलन में – जिसने भारत में हिन्दुत्व दक्षिणपंथ के उभार का रास्ता आसान बनाया – उनकी भूमिका गलत साबित हुई।

कुछ साल पहले की बात है अग्रणी वकील एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ता जनाब प्रशांत भूषण या सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव ने अपनी अतीत की गलतियों के लिए खुल कर पश्चाताप प्रगट किया। (https://www.newsclick.in/anti-corruption-movements-and-right) इंडिया टुडे से एक साक्षात्कार में प्रशांत भूषण ने‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’ आंदोलन जिसका चेहरा बन कर अण्णा हजारे उभरे थे – जिसकी नेतृत्वकारी टीम में खुद प्रशांत शामिल थे – को लेकर एक अनपेक्षित सा बयान दिया। उनका कहना था कि यह आंदोलन ‘संघ-भाजपा’ द्वारा संचालित था। ईमानदारी के साथ उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्हें अगर इस बात का एहसास होता तो वह तुरंत अण्णा आंदोलन से तौबा करते, दूर हट जाते।

आजादी के बाद भ्रष्टाचारविरोध के नाम पर खड़ा हुआ बिहार आन्दोलन – जिसे जेपी आन्दोलन भी कहा जाता है – जिसने पहली दफा राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ की असमावेशी राजनीति और संकीर्ण चिन्तन – जो भारत के संविधान के सिद्धांतों और मूल्यों के बिल्कुल प्रतिकूल था – को राष्ट्रीय  स्तर पर वैधता, स्वीकार्यता दिलायी, – ऐसा एकमात्र आंदोलन नहीं कहा जा सकता जिसने भ्रष्टाचार विरोध का नारा बुलंद किया।

हम पीछे मुड़ कर देखें तो 80 के दशक के उत्तरार्द्ध में वी पी सिंह की पहल पर बोफोर्स घोटाले के खिलाफ जनता सरगर्म हुई थी। या 21 वीं सदी की दूसरी दहाई की शुरूआत में अण्णा आन्दोलन के नाम पर एक बड़ी पहल शुरू हुई थी । यह सभी तंजीमें मुख्यतः लीडरों या उनकी अगुआई में जारी अनियमितताओं पर ही केन्द्रित रहती आयी है। उन्होंने उन संरचनात्मक कारणों की लगातार अनदेखी की है कि भ्रष्टाचार -जिसे आम जनमानस में भी ‘अवैध लूट’ का दर्जा हासिल है – का मुल्क की आर्थिक नीतियों से क्या रिश्ता हो सकता है।

लेकिन इन आन्दोलनों का साझापन यहीं खत्म नहीं होता।

इन तीनों आन्दोलनों ने भारतीय राजनीति में हिन्दुत्व दक्षिणपंथ को अधिकाधिक वैधता प्रदान करने का, उसके साफ–सुथराकरण / सैनिटाइजेशन का काम किया है। बिहार आंदोलन में संघ की सक्रियता से उसे अपने अतीत के तमाम पापों से – फिर चाहे आजादी के आंदोलन से दूरी रखने का सवाल हो या बकौल वल्लभभाई पटेल ‘गांधी हत्या के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने या मानस बनाने का सवाल हो’ – मुक्ति पाने में सहूलियत हुई थी, बोफोर्स के मसले पर संघ-भाजपा की सक्रियता ने तथा बाद में वीपी सिंह के शासन को एक तरफ से सहयोग देने से उसके संकीर्ण, एकांगी एवं नफरत भरे एजेण्डा को नार्मलाइज होने में / स्वीकार्य होने में सहायता मिली थी और अण्णा आंदोलन वह चरम मुकाम था, जब उसने ऐसी छलांग लगायी कि वह समूचे संविधान को ही फिलवक्त खोखला बना देने की स्थिति में पहुंच गया है।

अपनी अतीत की गलतियों की तहे दिल से आलोचना करना, साफगोई के साथ बात करना, यह ऐसा गुण है, जो सियासत में ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन में भी इन दिनों दुर्लभ होता जा रहा है।
अण्णा आंदोलन जब अचानक सूर्खियां बना, जब अलग अलग शहरों में ‘मैं भी अण्णा’ के पोस्टर लगने लगे और दिल्ली के रामलीला मैदान में भीड़ जुटने लगी और इस ‘अण्णा क्रांति’ में जनसमूह के नाम पर लोग जुड़ते गए, उसी वक्त़ ही कई दूरंदेश लोग जनता को आगाह कर रहे थे, मगर इतिहास ने साबित किया कि उनकी तमाम चेतावनियों को अनदेखा किया गया।

निश्चित ही यह बात पहली दफा नहीं उठी है।

गौरतलब है कि यह आंदोलन जब अपने उरूज पर था तब दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस के अग्रणियों ने, कई वामपंथी एवं अन्य सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने यहां तक कि कई पत्रकारों ने इसके बारे में खुलासे किए थे, मगर उनकी अनदेखी की गयी थी। मिसाल के तौर पर उन दिनों ‘तहलका’ में लिखते हुए इफ्तिखार गिलानी ने यह सवाल पूछा था कि क्या ‘इज आरएसएस रनिंग द अन्ना शो? -18 अगस्त 2011) उनके मुताबिक ‘अण्णा हजारे को मिल रहे समर्थन का बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के युवा कार्यकर्ताओं का है। यह कांग्रेस का आरोप नहीं है बल्कि भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज की स्वीकारोक्ति है। …उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हजारे की मुहिम में संघ की भूमिका के बारे में कोई सन्देह नहीं होना चाहिए।’

मेल टुडे (अगस्त 26, 2011) के अपने आलेख में राजेश रामचन्द्रन सिविल सोसायटी को संसद के ऊपर बताने की अण्णा आंदोलन से निःसृत प्रवृत्ति में ‘संविधान के पुनर्लेखन के संघ परिवार के एजेण्डे’ को फलीभूत होता देखे थे। उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया था कि वाजपेयी की अगुआई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन की सरकार के दौरान जब भ्रष्टाचार के एक-एक काण्ड उजागर हो रहे थे, मृत सैनिकों के लिए मंगाये गये ताबूतों में करोड़ों के वारे न्यारे हुए थे, सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का माटी के मोल निजीकरण किया जा रहा था, तब किस तरह आज के तमाम ‘योद्धा’ मौन थे .. मगर जब 2009 के चुनावों में भाजपा की दुर्गत हुई, उसके सीटों की संख्या 147 से 115 तक पहुंची,तब मुद्दों की तलाश में रहनेवाली पार्टी के हाथों भ्रष्टाचार का मुद्दा आया।

इस आंदोलन की जनतंत्र विरोधी प्रवृत्तियाँ तथा व्यक्तिविशेष को संसद से ऊपर स्थापित करने की जारी कवायद के बारे में बात करते हुए अम्बेडकरी विद्वान प्रो. सुखदेव थोरात ने ‘नायक पूजा’ को लेकर डॉ. अम्बेडकर की चेतावनी को साझा किया था। (अम्बेडकर्स वे एण्ड अन्ना हजारेज् मेथडस्, प्रो. सुखदेव थोरात, द हिन्दू 23 अगस्त 2011)

उनके मुताबिक डॉ. अम्बेडकर इस राजनीतिक संस्कृति को लेकर बेहद चिन्तित थे जहां लोग ‘‘महान लोगों के कदमों पर अपनी आजादियों न्यौछावर करते थे या उन पर इस तरह यकीन करते थे कि वह उनकी संस्थाओं को अन्दर से खोखला कर सकें।’’…यह चेतावनी अन्य किसी मुल्क की तुलना में भारत की जनता के सन्दर्भ में सबसे अधिक जरूरी थी क्योंकि यहां भक्ति, या जिसे भक्ति का मार्ग कहा जा सकता है, वह अन्य मुल्कों की तुलना में यहां की राजनीति में काफी काम करता है, ऐसा अम्बेडकर का कहना था। उन्होंने आगे कहा कि भक्ति या धर्म में नायक पूजा से आत्मा को मुक्ति मिल सकती है, मगर राजनीति में, भक्ति या नायक पूजा, पतन और अन्ततः अधिनायकवाद में ही परिणत हो सकता है।

इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि मार्क्सवादी अर्थशास्त्री एवं जानेमाने जन बुद्धिजीवी प्रो. प्रभात पटनायक ने भी उन्हीं दिनों ‘जनतंत्र जहां समाज के मामलों को आकार देने के लिए लोग कर्ता (subject  सब्जेक्ट) की भूमिका प्राप्त करते है’ के बरअक्स आंदोलन से प्रस्फुटित मसीहाई की विवेचना की थी। मेसियानिजम वर्सस डेमोक्रेसी’ (‘मसीहाई बनाम जनतंत्र’ द हिन्दू 24 अगस्त 2011) नामक आलेख में उन्होंने समझाया था कि किस तरह ‘मसीहाई एक तरह से सामूहिक कर्ता, पीपुल /अवाम, को व्यक्तिगत कर्ता से अर्थात मसीहा से प्रति स्थापित करता है। लोग भले ही अच्छी खासी तादाद में शामिल हों …लेकिन यह सब वे दर्शक के तौर पर करते हैं।’

मसीहाई राजनीतिक गतिविधि किस तरह लोगों को सुन्न बना देती है इसकी चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा था कि ‘जिस तरह बालीवुड की फिल्म में हीरो अकेले ही विलेन का खात्मा कर देता है, उसी तर्ज पर मसीहाई गतिविधि में ‘फाइटिंग’ का समूचा काम अर्थात कर्ता की भूमिका मसीहा को सौंपी जाती है, लोगों की उपस्थिति महज ताली पीटने के लिए होती है। …जब टीम अण्णा अपने आप को ‘‘पीपुल /अवाम’’ के तौर पर संबोधित करती है वह एक तरह से यही बात सम्प्रेषित करती है कि मसीहाई ही जनतंत्र है।’

वे लोग जो उपरोक्त आंदोलन में जनता की भागीदारी को लेकर गदगद थे उनको आगाह करते हुए उन्होंने लिखा था कि ‘…यह हमारे लिए गंभीर चिन्ता का विषय होना चाहिए, क्योंकि यह हमारे समाज की पूर्वआधुनिकता और हमारे जनतंत्र की जड़ों के खोखलेपन को ही रेखांकित करता है।’’‘

आंदोलन में मीडिया की भूमिका या इसमें इस्तेमाल प्रतीक भी – जो अब सरे आम हो गए हैं – आनेवाले दिनों का संकेत देते दिखे हैं, जिसमें ‘सच्चे भारतीय’ को गढ़ा जा रहा था।

अरुंधती रॉय ने उन्हीं दिनों लिखा था कि ‘‘अण्णा की क्रांति में नजर आनेवाली कोरियोग्राफी, आक्रामक राष्ट्रवाद और तिरंगे का इस्तेमाल सभी आरक्षण विरोधी आंदोलन, विश्व कप जीतने पर निकली झांकी और नाभिकीय परीक्षण के बाद हुए आयोजनों से आयातित दिखता है। वह हमें संकेत देता है कि अगर हम इस अनशन का साथ नहीं देते हैं, तब हम ‘सच्चे भारतीय’ नहीं हैं। ’7 घण्टे चल रहे चैनलों ने भी तय किया है कि इस मुल्क में अन्य कोई खबर नहीं है जिसको प्रसारित किया जाना जरूरी है।’

गौरतलब है कि मीडिया द्वारा अनुप्राणित इस ‘अण्णा क्रांति’ का सम्मोहन इस कदर था कि न किसी ने यह समझने की कोशिश की कि ‘दूसरे महात्मा’ के तौर पर पेश किए गए यह वही अण्णा हजारे हैं जिन्होंने कभी मराठी वर्चस्ववाद का समर्थन किया था और 2002 के निरपराधों के जनसंहार पर चुप्पी बरती थी इतना ही नहीं टीम अण्णा के अग्रणी सदस्यों में कुछ ‘यूथ फार इक्वालिटी’ – जो आरक्षण विरोधी आंदोलन रहा है – से सम्बद्ध रहे हैं तो कई ऐसे एनजीओ से जुड़े हैं जिन्हें कोका कोला, लेहमान ब्रदर्स जैसी अन्तरराष्ट्रीय कम्पनियों से उदारहृदय से फण्ड मिलते रहे हैं। (वही, व्हाय ए एम नॉट अण्णा, अरूंधति राय) प्रस्तुत आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने में संघ परिवार से सम्बद्ध लोगों, संगठनों की शुरूआत से सक्रियता को भी उन्होंने रेखांकित किया था।

जाहिर है, इसके बारे में अन्य तथ्य भी पेश किए जा सकते हैं।

लेकिन क्या संघ- भाजपा की सक्रियता, उसके लिए फैसिलिटेटर/उत्प्रेरक की भूमिका में संघ या उसके आनुषंगिक संगठन की मौजूदगी, आधिकारिक तौर पर भी संघ नेतृत्व द्वारा उज्जैन की बैठक में पारित ‘अण्णा के समर्थन’ का प्रस्ताव यही एकमात्र पहलू है जो इस आंदोलन के बारे में विवादास्पद था।

हम बारीकी से विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि वर्ष 2014 के बाद भारत में लिबरल जनतंत्र के बरअक्स हिन्दुत्व की जो बहुसंख्यकवादी सियासत हावी होती गयी, उसके कई तत्व इसी आंदोलन की सरगर्मी में मजबूती पाते गए हैं। ध्यान रहे कि लिबरल जनतंत्र का अर्थ यही निकलता है कि अल्पमत के अधिकारों को मद्देनजर रखते हुए बहुमत की इच्छा की बात की जाएगी, और ये ऐसे अधिकार होंगे जो संवैधानिक, न्यायिक एवं अन्य ढंग से सुरक्षित किए जाएंगे।

अगर अण्णा आंदोलन ने एक किस्म के झुण्डवादी जनतंत्र के विचार को वैधता लोकप्रियता नहीं दिलाई होती, अगर उसने जनतंत्राविरोधी प्रवृत्तियों को हवा देने का काम नहीं किया होता या उसने लोकतंत्र को किसी मसीहाई से प्रति स्थापित करने के विचार को लोकप्रिय नहीं बनाया होता तो तय बात है कि 2014 की मोदी की जीत नामुमकिन थी।

ध्यान रहे भ्रष्टाचार विरोधी विमर्श से दक्षिणपंथ को मिलती वैधता की परिघटना महज हिन्दोस्तां तक सीमित नहीं है।

ब्राजील इसका जीता-जागता उदाहरण है।

इतिहास इस बात का गवाह है कि किस तरह वहां सामाजिक न्याय की नीतियों की हिमायती वर्कर्स पार्टी की सरकार को किसी ‘लावा जाटो’ (car wash corruption investigation) भ्रष्टाचार की जांच के मामले को उछाल कर बदनाम किया गया था, कार्पोरेट मीडिया एवं उच्च मध्यम वर्ग की अगुआई में राजनीति को ‘शुद्ध’ बनाने की ऐसी मुहिम चलायी गयी थी, जिसकी परिणति न केवल वर्कर्स पार्टी की सत्ता से बेदखली में हुई थी बल्कि बोलसोनारो नामक कटटर दक्षिणपंथी विचारों के हिमायती विवादास्पद शख्स के सत्तारोहण में भी हुई थी।

अगर भारत में ‘दूसरे महात्मा’ के तौर पर प्रोजेक्ट किए गए अण्णा हजारे भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के आइकॉन बनाए गए थे तो ब्राजील में ‘लावा जाटो’ मामले में जज रहे सेर्गिओ मोरो, को भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का मसीहाई सुपरस्टार घोषित किया गया था।

9.

‘स्पार्टाकस, हम क्यों हारे ‘ ?

प्रगतिशील ताकतों को, वाम धारा के हिमायतियों को बहुत बेबाकी के साथ आजादी के बाद की इस यात्रा पर निगाह डालनी है कि वैज्ञानिक समाजवाद के क्रांतिकारी फलसफे को अपनाने के बावजूद, अपने आप को सोविएत रूस, चीन, क्यूबा, विएतनाम जैसी गौरवशाली क्रांतियों का वारिस कहलाने वाला हिन्दोस्तां का इन्कलाबी आंदोलन – आजादी के बाद जो कांग्रेस के बाद दूसरे नम्बर की ताकत के तौर पर समाज में उपस्थित था, वह किस वजह से उसी भारतीय राजनीति के हाशिये पर चलता गया।

क्या इसे वस्तुगत परिस्थितियों का ही परिणाम कहा जाएगा या मनोगत शक्तियों की सीमाएं, यांत्रिक चिन्तन ने भी इसमें योगदान दिया। क्या इसकी जड़ें लोकरंजकता के उसके स्वीकार और लगभग सभी स्थितियों में कांग्रेस के प्रति उसके बिल्कुल विमुखता / विरोध में ढूंढी जा सकती हैं ?

अक्सर ऐसे अन्वेषण की बात चलती है तो मुझे बरबस 1848 में सनातनियों के गढ़ पुणे में अपनी जीवनसंगिनी सावित्राीबाई और उनकी अनन्य सहयोगी फातिमा शेख के साथ मिल कर वंचितों, शोषितों, हाशिये पर डाल दिए गए तबकों की बेटियों के लिए स्कूल खोलने वाले महात्मा फुले याद आते हैं, जिन्होंने उस औपनिवेशिक समाज में सांस्कृतिक विद्रोह का बिगुल फूंका था। आप को याद होगा कि अपनी पहली किताब ‘गुलामगिरी’ को गुलामों की मुक्ति के लिए संघर्षरत अब्राहम लिंकन को समर्पित करनेवाले फुले ने अपने संगठन का नाम ‘सत्यशोधक समाज’ रखा था।

दुनिया की मुक्तिकामी जनता के लिए 1848 की एक और व्यापक अहमियत है, यही वह साल है जब कार्ल मार्क्स-फ्रेडरिक एंगेल्स ने अपनी कालजयी रचना ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ का प्रकाशन किया था और ‘सर्वहारा के पास खोने के लिए जंजीरों के सिवा कुछ भी नहीं और जीतने के लिए सारी दुनिया का ऐलान किया था’ एक युगीन सत्य को जुबां दी थी !

अपने राजमहल के सुख चैन का परित्याग करते हुए, अपनी सन्तान एवं अपनी जीवनसंगिनी के बिरह को लम्बे समय तक सहन करते रहने का संकल्प लेते हुए, दुख का कारण ढूंढने यायावरी पर निकले सिद्धार्थ गौतम जिन्हें बाद में दुनिया ने बुद्ध के तौर पर सम्बोधित किया, की खोज क्या इसी तरह अपने युगीन सत्य को ढूंढने के लिए नहीं थी !

इतिहास कई बार बेहद कमजोर कंधों पर बड़ा जिम्मा सौंपता है, आज हिन्दोस्तां के बेहतर मुस्तकबिल के लिए, भारत और उसकी अवाम के बेहतर भविष्य  के लिए  फिक्रमंद हम सभी को मिल कर सत्यान्वेषण की इस नयी मुहिम का सहभागी बनना है, अपने समय का सत्यशोधन करना है।

[email protected]

000000

 

परिशिष्ट

जमाते – स्वयंसेवक ??
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने विस्तार के लिए आनुषंगिक संगठनों का विशाल नेटवर्क बनाया है, उसके विस्तार के बारे में हालही में विस्तृत अध्ययन सामने आए हैं। अभी पिछले ही साल Sciences Po से सम्बन्धित Centre for International Studies (CERI)  की तरफ से तैयार विस्तृत डाटाबेस में पहली बार संघ से जुडे उस वैश्विक नेटवर्क का खुलासा हुआ, जिसमें दुनिया भर में फैले 2,500 ऐसे संगठन चिन्हित किए गए जो संघ से जुड़े हैं। https://rssproject.caravanmagazine.in/press-release  भारत में उपरोक्त अध्ययन को The Caravan पत्रिका ने प्रकाशित किया था।
 प्रस्तुत चर्चा के साथ इस बात का प्रत्यक्ष ताल्लुक नहीं है, लेकिन यह जानना महत्वपूर्ण है (और भविष्य के अध्ययन के लिए भी हमारे लिए दरवाजे खोलता है ) कि दक्षिण एशिया के इस हिस्से में हिन्दु राष्ट्र के लक्ष्य के लिए गठित राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ ( स्थापना 1925 ) हो या 1941 में इसी उपमहाद्वीप स्थापित जमाते इस्लामी जैसे संगठन हों जो ‘इस्लामिक जीवनशैली को स्थापित करने और उसकी हिफाजत करने ’ के लिए समर्पित होने का दावा करते हैं https://jamaateislamihind.org/eng/our-objective-and-methodology और जो आज की तारीख में पड़ोसी मुल्कों के सामाजिक राजनीतिक जीवन में काफी दखल रखता है, उनकी कार्यप्रणाली में काफी समानता नज़र आती है।
कुछ साल पहले अग्रणी अंग्रेजी पत्रिका ‘मेनस्टीम’ ने बांगलादेश की ढाका विश्वविद्यालय में उन दिनों प्रोफेसर के तौर पर कार्यरत रहे अब्दुल बरकत का एक लेख प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक ही था Political Economy of Fundamentalism in Bangladesh,Sunday 24 March 2013 (https://mainstreamweekly.net/article4071.html)। 
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जिस तरह आनुषंगिक संगठनों का नेटवर्क तैयार किया है, जो पितृसंगठन के मुख्य उददेश्य के इर्दगिर्द सक्रिय रहते हैं, उसी तर्ज पर जमाते इस्लामी का भी विस्तार है। बांगलादेश जमाते इस्लामी से जुड़े ऐेसे ही तथ्य हम भारत में तथा पाकिस्तान तथा अन्य मुल्कों में उसके हमनाम संगठनों के नाम से जुड़े संगठनों के संदर्भ में खोज सकते हैं।
‘…The economics of fundamen-talism, in the narrow sense of the term, can be explained in terms of enterprises ranging from large financial institutions to household level micro credit, from mosques and madrasas to news media and IT, from nationwide trading enterprises to local level NGOs. The estimated amount of annual net profit generated by these enterprises would be US $ 250 million. All these economic enterprises are run by ideologically motivated and professionally competent persons. At least 10 per cent of their net profits are being used to finance the political organi-sation, which is sufficient to fund the salary of 500,000 full-timers in Islamic fundamentalist politics. Taking advantage of their economic as well as political power, they set their own representatives in key strategic positions in the government and autonomous bodies. The relative strength of the economics of fundamentalism in Bangladesh can be traced to the fact that its annual net profit is equivalent to six per cent of the government’s annual development budget, and the annual growth rate of the economy controlled by the fundamentalists is higher (7.5 per cent to nine per cent) than that of the national economy (five per cent to six per cent). Therefore, Islamist fundamentalism in Bangla-desh, as a beleaguered tradition and embattled faith, is a refusal of dialogue in a globalising world that asks for reasons and whose peace and continuity depend on it. ‘ ( -do-)

6 thoughts on “सत्य के अन्वेषी और ‘अंधेरे की आदत’ वाला समाज / सुभाष गाताडे”

  1. यह लेख अत्यंत महत्वपूर्ण, गंभीर और वक्त की मांग के अनुरूप है। लेखक ने समकालीन सामाजिक-राजनीतिक संकट, वाम आंदोलन की सीमाएं, समाजवादी धारा की कमजोरियां और दक्षिणपंथ के बढ़ते प्रभाव को बेहद गहराई से विश्लेषित किया है। शेली की पंक्ति ‘अगर सर्दी आती है, तो क्या बसंत दूर हो सकता है?’ के माध्यम से उम्मीद के स्वर को ग्राम्शी, ब्रेख्त, चार्ली चैप्लीन जैसी वैचारिक विरासत के साथ सार्थक रूप से जोड़ा गया है।

    लेकिन लेख काफी लंबा होने के कारण पाठकों को इसे पढ़ने में कठिनाई हो सकती है। बेहतर होता इसे दो भागों में प्रकाशित किया जाता, जिससे इसके गंभीर विचार, ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक आलोचना को अधिक सुगमता से समझने और आत्मसात करने में आसानी होती ।समाज, लेखकों और बुद्धिजीवियों की भूमिका पर यह चिंतन हर पाठक के लिए जरूरी है।

    Reply
    • प्रस्तुत लम्बे लेख को पढ़ कर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया साझा करने के लिए बहुत शुक्रिया।
      एक लेखक – वाम कार्यकर्त्ता के तौर पर मुझे यह जान कर ख़ुशी है कि आलेख के पीछे के सरोकार और व्यापक वाम आंदोलन – जिससे हम सभी जुड़े हैं और जो आज बंटा हुआ और लगभग हाशिये पर नज़र आता है – की हिन्दोस्तान जैसे मुल्क में नज़र आ रही सीमाओं की बात सम्प्रेषित हो रही है

      आप की यह सलाह भी काबिले गौर है कि लेख लम्बा हो गया है और अच्छा रहता कि उसे ‘दो हिस्सों में जाता ‘. इस सिलसिले में मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि हिंदी / हिंदुस्तानी के पाठक को लेकर इससे एक खास किस्म की छवि नज़र आती है ( जैसी बात अक्सर सुनाई देती है )

      2001 के आसपास ‘संधान’ पत्रिका के प्रकाशन के दौरान ( जिस प्रयोग को काफी सराहना भी मिली, मगर अपनी सीमाओं के चलते जिसे हम जारी नहीं रख पाए ) भी उसके कई आलेखों की लम्बाई और कभी कभी भाषा की कथित दुरूहता को लेकर कई आत्मीयजन ही शिकायत करते ( सलाह देते ) नज़र आते थे।

      आप कह सकते हैं कि हिंदी – उर्दू पट्टी के इस विशाल भूभाग के इस ‘अमूर्त पाठक’ की इस छवि का आधार मुझे समझ नहीं आता , क्या यह किसी व्यापक सर्वेक्षण पर आधारित है या एक किस्म का सहजबोध ( common sense ) है जो प्रबुद्ध लोगों में भी व्याप्त है

      मेरी बात को अन्यथा ना लें लेकिन मुझे अक़्सर लगता है कि ‘इस सहजबोध ‘ को प्रश्नांकित करने की जरूरत है।

      Reply
  2. निर्मम आत्मालोचना की ज़रूरत को रेखांकित करने वाला सुभाष गाताडे का यह लेख उस अंधबिंदु को फोकस में ले आता है जिस पर बात करने से जाने-अनजाने बचा जाता रहा है।
    लेख पढ़ते हुए कई जगह बड़ी मायूसी होती है कि हमने अपनी भयंकर भूलों का लगातार संज्ञान क्यों नहीं लिया, क्यों हम कचोट भरी स्वसमीक्षा से कतराते रहे ?

    अब हमारे पास इन प्रश्नों से बचने का समय नहीं है। अपनी बिखरी शक्ति को बटोरकर जनता के जाग्रत हिस्से से सघन संवाद क़ायम करते हुए बसन्त को बुला लाने की आवश्यकता है। इस जानलेवा सर्दी का अंत होना ही चाहिए।

    Reply
  3. एक बहुत ही जरूरी आलेख जिसे उन सभी को पढ़ना चाहिए जो मौजूदा सांप्रदायिक फासीवादी दौर में लेखकों, बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिकर्मियों को न केवल एकजुट होने की जरूरत है बल्कि मौजूदा सत्ता के विरुद्ध सक्रिय होने की भी जरूरत है बिल्कुल उसी तरह जैसे 1935-3 6के दौर में हुए थे।

    Reply
  4. व्यापक पड़ताल, आज के समय का जरूरी लेख, इसे पुनः सीरियल के रूप में प्रशाशित होना चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोगो तक पहुँचे।

    Reply
  5. स्वाधीनता प्राप्ति के बाद के पूरे दौर में सांप्रदायिक फासीवाद के उभार और उनके केन्द्रीय सत्ता तक आसीन होने की कामयाब मुहिम में किन-किन कथित महान विभूतियों और संगठनों ने प्रत्यक्ष और परोक्ष मदद की है, उसे समझने में सुभाष गाताड़े का यह लेख बहुत मदद करता है। लेकिन समजवादियों के साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टियों के भी अप्रत्यक्ष रणनीतिक भूलों का भी योगदान रहा है, इस पर भी ईमानदारी से विचार करने की जरूरत है। यहाँ सवाल उस दौर में काँग्रेस के समर्थन या विरोध का नहीं है बल्कि गैरकोंग्रेसवाद के आवरण में वामपंथी ताकतों को कमजोर करने के आरएसएस की दूरगामी परियोजना को भी समझने की जरूरत है। जॉर्ज फर्नांडीस जैसे कट्टर कम्युनिस्ट विरोधी नेताओं की भूमिका पर भी गौर करने की जरूरत है। निश्चय ही, सुभाष गाताड़े का यह लेख आजादी के बाद के हमारे राजनीतिक घटनाचक्र को समझने में बहुत मदद करता है।

    Reply

Leave a Comment