लखनऊ में आयोजित, स्त्री लेखन : इतिहास, रचना प्रक्रिया और आलोचना पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला केवल स्त्री लेखकों की भागीदारी और उपस्थिति वाली एक अनोखी कार्यशाला थी। दो दिन की गतिविधियों की विस्तृत रिपोर्ट पेश कर रही हैं, जलेस लखनऊ की सचिव और कार्यशाला की संयोजक, शालिनी सिंह।

जनवादी लेखक संघ द्वारा लखनऊ के एक स्थानीय होटल में 3 और 4 अक्टूबर 2026 को ‘स्त्री लेखन : इतिहास, रचना प्रक्रिया और आलोचना’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।
इस कार्यशाला में कुल 9 राज्यों की 72 लेखिकाओं, शिक्षिकाओं और छात्राओं ने रजिस्ट्रेशन कराया था। 21 लेखिकाएं स्वास्थ्य या किसी अन्य कारणों से शामिल नहीं हो सकीं। इसलिए कार्यशाला में प्रतिभागियों की संख्या 51 रही।
3 अक्टूबर 2026 को उद्घाटन सत्र से कार्यक्रम आरंभ हुआ, जिसका विषय था स्त्री लेखन : परम्परा और इतिहास। स्वागत वक्तव्य राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान से सम्मानित कहानीकार समीना ख़ान ने दिया। उन्होंने शहर-ए-सुख़न लखनऊ में लेखिकाओं का स्वागत करते हुए शहर से रूबरू कराया। उन्होंने बताया कि यह अदीबों का शहर है, हुनर का शहर है और पकवानों का शहर है। बेगम हज़रत महल और ऊदा देवी के इस शहर को डॉ. रशीद जहां की कर्मभूमि बताते हुए उन्होंने कहा कि इसी लखनऊ की तासीर है जहां की रहने वाली रशीद जहां और उनके पति महमूदुज्ज़फर से फ़ैज़ अहमद प्रभावित होते हैं और उनकी सरपरस्ती इन्हें फ़ैज़ अहमद फैज़ बना देती है।
अपने वक्तव्य में समीना खान ने कार्यशाला में आने वाली सभी लेखिकाओं से कहा कि भले ही यह शहर आपका स्वागत करते हुए कहता है कि ‘मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं’, मगर एक लेखिका होने के हवाले से कर्तव्य कहता है कि मुस्कुराने से पहले सोचें जरूर कि अगर जरूरत विरोध दर्ज कराने की है तो कतई न मुस्कुराएं और एक लेखक का फ़र्ज़ निभाएं।
उद्घाटन वक्तव्य हरियाणा से आई हिंदी की सुपरिचित कवयित्री और एक्टिविस्ट शुभा ने दिया। उन्होंने कहा कि भावावेश में कविता लिखना स्थाई भाव नहीं है। स्त्रीद्रोही समाज में कविता लिखना बहुत कठिन है। बहुत सारे छद्म के बीच स्त्री के लिए कहानी, कविता लिखना पुरुषों की अपेक्षा दुगने श्रम का काम है। पुरुषों का महत्व हमेशा समाज में रहा है। चाहे पुरुष कितना ही गिरा क्यों न हो। वैसे पुरुष भी कई बार स्त्रियों के हीरो हो जाते हैं। हिंदी साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ऐसे उदात्त पात्रों को महत्व दिया है। स्त्रियों को पतिव्रता होना जरूरी बताया गया है। औरतें खुद की दुश्मन होती हैं। महिलाओं के जो बुनियादी कार्य हैं, वे होंगे लेकिन अपनी आत्म छवि भी होनी चाहिए। आपका नागरिक कर्तव्य, अधिकार भी होना चाहिए। संघर्ष का जामा पहनाकर उनके जोखिम को बंद करना छद्म है।सबको मनाने का कार्य करना ही औरतों का काम नहीं है। दिल्ली में पुरुष सत्ता विरोधी युवतियों के आंदोलन हो रहे हैं। कुछ पुरुषवादी उनकी भाषा और व्याकरण को ठीक करना चाहते हैं। लेकिन उन नारों के उत्साह को देखा नहीं जा रहा है। राजनीति की सत्ता संरचना रेपिस्टों का सम्मान करती है। बलात्कार परिचित या रिश्तेदार करते हैं। लड़कियों के नारों को ठीक करने की बात पुरुष करते हैं। 80 के दशक में हुए महिला आंदोलन ने बाद की लड़कियों के आत्म बल को बढ़ाया है। रचना कर्म में अपने अधिकारों के साथ जीवंत संबंध बनाने की जरूरत है। नारी रक्षा के लिए बने कानून उनके ही खिलाफ प्रयोग किए जाते हैं।
औरतों के समय की बात करें तो उनके पास अपना समय नहीं होता। सामाजिक रूप से औरतों का समय यह है कि आज कुछ पुरुष सकारात्मक हुए हैं। आप अपने समय की मालिक स्वयं बनें। आप अपना नियोजन स्वयं करें। बहुत कवयित्रियां अपने रूप सौंदर्य के प्रदर्शन पर ध्यान देती हैं। आप सुंदर हैं, सुंदर रहेंगी लेकिन आप अपने को स्वयं पर केंद्रित करें। रचना कर्म पर ध्यान केंद्रित करें। विरोधी ताकतें आपको त्रिया चरित्र कहेंगी, उसी में सारी गुत्थियाँ हैं लेकिन आप इस पर ध्यान दिए बिना आगे बढ़ें। मुक्तिबोध ने कहा है हमारे घरों में फासीवाद मौजूद है। लेखन के साथ घर परिवार के सुधार की जरूरत है। कोई कुएं से पानी न पीने दे तो अपना कुआं खुद खोदें। इसके लिए सामाजिक परिवर्तन में जो भी सहयोग करे, चाहे वह पुरुष ही क्यों न हो उनके साथ एलायंस बनाना पड़ेगा। छात्र, युवा, आदिवासी, दलित, गरीब, शोषित उनके साथ जो भी उत्पीड़न है, उनके उत्पीड़न को अभिव्यक्त करना आपके रचना कर्म का हिस्सा होना चाहिए। जो कवि एक्टिविस्ट नहीं है, उसकी संवेदना संदिग्ध है। अपना एक्टिविज्म और कविता लिखना और आत्म संघर्ष करना निरंतर जारी रखना चाहिए। आपको वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर नज़र रखते हुए उसकी समीक्षा भी करनी पड़ेगी। हमारी शब्दावली का अपहरण फासीवादी ताकतों ने कर लिया है। अपनी इच्छाओं का आदर करें। नारीवाद और मार्क्सवाद की बात होती रहती है। नारीवाद ने संस्कृति कर्म को प्रभावित किया है लेकिन नारीवाद कभी-कभी नारियों के विरुद्ध हो जाता है। हिंदी में नारीवाद नारियों को प्रायः दिग्भ्रमित करता है। इसी के तहत पुनरुत्थानवादी ताकतें सक्रिय हैं। पटना में हुए स्त्री लेखन वर्कशॉप में एक तथाकथित लेखक की करतूत उजागर हुई। दलित, शोषित स्त्री की पीड़ा को अभिव्यक्ति दें। परिवर्तन की दिशा में आप अपना लेखन करें। अंत में उन्होंने कार्यशाला के आयोजन के लिए जनवादी लेखक संघ के महासचिव नलिन रंजन सिंह का आभार व्यक्त किया।
बीज वक्तव्य दिल्ली के मिरांडा कॉलेज से आई प्रोफ़ेसर बलवंत कौर ने दिया। उन्होंने कहा कि लेखन अपने आपमें प्रतिरोध कर्म है। उन्होंने कहा कि बोलती हुई औरत भी अच्छी नहीं लगती और लिखती हुई औरत तो और भी अच्छी नहीं लगती। यहाँ तक कि पुरुष स्त्री के साथ सोना तो चाहता है, जागना नहीं चाहता। सार्वजनिक स्थलों पर हमारी जो उपस्थिति है उसको प्रतिबंधित किया जा रहा है और आज तो और भी ज़्यादा किया जा रहा है। सती सावित्री के दौर में पहुँचाने की कोशिश की जा रही है। हम क्या हैं ! ये हमें तय नहीं करने दिया जा रहा। हम क्या होने चाहिए, ये वो तय करते हैं। रशीद जहां की कहानी ‘दिल्ली की सैर’ की नायिका का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि नायिका पहले पहल रेल की यात्रा कर रही है। उसके भीतर भय भी है, आशंका और जिज्ञासा भी है।उस भय, आशंका और जिज्ञासा के बीच वो चलती है। लेखन भी इसी तरह से है। भय भी है जिज्ञासा भी है लेकिन जब लेखन अपनी रफ़्तार पकड़ लेता है तो फिर वह रुकता नहीं है। सवाल है कि हम अपने आपको किस रूप में देखते हैं, कैसे देखते हैं। ये नहीं कि कोई हमें कैसे देख रहा है।
इतिहास में क्या सिर्फ बंग महिला थी या मीरा ही थीं, बल्कि अब तो सगुण और निर्गुण कवयित्रियों की पूरी लिस्ट हमारे सामने है। सोशल मीडिया पर औरतें दो खेमों में बंट गई हैं- अच्छी औरत, बुरी औरत। सार्वजनिक जगहों पर हमारी स्थिति को प्रतिबंधित किया जा रहा है। इतिहास बनाता कौन है, इतिहास दर्ज कौन करता है। लेकिन स्त्रियों को लगातार लिखना पड़ता है। आवाज़ उठानी पड़ती है। लिखने से लिखना ही नहीं जीना भी आ जाएगा। कभी-कभी औरतें भी पितृसत्ता के साथ कदम ताल करती हैं।अधिकतर उपन्यास एक आदर्श संस्कारी छवि रचने के लिए लिखे गए। तमाम स्त्रियाँ अपनी पहचान को दबा कर लिखती रहीं। स्त्री के साथ समाज का जो रवैया रहा है, वही रवैया देश के इतिहासकारों का रहा है। राष्ट्र निर्धारित करता है औरतों का जीवन। वे पुरानी पारंपरिक छवि में क़ैद करना चाहते हैं, नए-नए क़ानून बन रहे हैं। सत्ता संबंध केवल नियंत्रित करते हैं और दुनिया के हर समाज में यह देखने को मिलता है। यहाँ गालियों और चरित्र हनन की बात की गई। जब तक हम जवाब देने की स्थिति में नहीं होंगे तब तक हमें इसी तरह निर्देशित किया जाता रहेगा। “अन्य” बनाये रखने की साज़िश चल रही है।उन्हें लगता है कि हम उन्हें दान दक्षिणा में कुछ मूल्य दे रहे हैं। इस तरह बलवंत कौर ने हिंदी साहित्य इतिहास की परम्परा और हमारे समय को जोड़ते हुए बहुत मूल्यवान बातें कहीं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही एडवा की मधु गर्ग ने कहा कि मानव सभ्यता के इतिहास से ही औरत सृजन करती रही है। समाज विकास के इतिहास में स्त्रियों को हाशिए पर धकेला गया है। ऋग्वेद की कई ऋचाएँ स्त्रियों द्वारा रची गई हैं। उन्होंने याज्ञवल्क और गार्गी के संवाद की चर्चा की, जिसमें गार्गी को दबाया गया है। बहुत कठिनाइयों को झेलते हुए महिलाएं रच रही हैं। पितृसत्ता की जकड़न के बावजूद स्त्रियां रच रही हैं।स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लगातार स्त्रियां रचती रही हैं। उन्होंने रशीद जहां की कहानी “दिल्ली की सैर”, इस्मत चुग़ताई की कहानियाँ, मन्नू भंडारी का उपन्यास “आपका बंटी” का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि आज सत्ता महिलाओं को नागरिक से प्रजा बना रही है।महिला आंदोलन पुरुषों के खिलाफ नहीं अपितु पुरुषवादी मानसिकता के खिलाफ है लेकिन महामानव को कल्चरल शॉक लगा है। आपसे अनुरोध है कि आप अपना रचना कर्म जारी रखें। अपने अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष करें और जिन्हें लगता है उन्हें कल्चरल शॉक देती रहें।
उद्घाटन सत्र में धन्यवाद ज्ञापन जनवादी लेखक संघ लखनऊ इकाई की उपाध्यक्ष आभा खरे ने दिया।

कार्यक्रम के प्रथम सत्र ‘जीवन, स्मृति और साहित्य : मैं क्यों लिखती हूँ?’ का संचालन करते हुए सीमा सिंह ने कुमार अम्बुज और प्रभात की कविताओं को पढ़ते हुए विस्तार से विषय की भूमिका रखी। स्मृतियाँ किस तरह से हमारे जीवन में प्रवेश करती हुई एक स्थायी जगह बना लेती हैं और जीवन जैसे-जैसे बीतता है, ये और प्रगाढ़ हो उठती हैं। लेखन में तो इनका और अधिक महत्व है। कोई कविता किसी बीत गई स्मृति की चाह में फूट पड़ती है, कोई कहानी किसी की याद का पीछा करती रहती है, उसके पात्रों में घट रहे जीवन को हम किसी की याद की तरह भी देख सकते हैं। जब कवि प्रभात ये कहते हैं कि मुझे मेरे पांव की याद आ रही तो यहाँ सिर्फ उनका पांव नहीं है उसके पीछे उनका बीत गया जीवन है ।
पहली वक्ता के रूप में हरियाणा से आई दीपा ने अपने लेखन और अपने जीवन संघर्ष से जुड़ी बातें साझा करते हुए कहा कि उनका परिवार पंजाब से हरियाणा आया। यहाँ आकर हम किसी से रिलेट नहीं कर पाते थे। समाज कैसा होना चाहिए तो लगता था कि कुछ तो कमी है। तो शुरुआत एक तरह से ऐसे हुई कि समाज में बदलाव होना चाहिए। मनुष्य को मनुष्य समझने की जो बात थी, ग़ैर बराबरी की जो बात थी वह बहुत परेशान करती थी। समाज में रहते हुए जो अलग-अलग तरह के अनुभव हुए तो उनसे लिखने की जरूरत महसूस हुई। दीपा जी ने अपने जीवन से जुड़े अनुभवों को साझा किया। उन्होंने बताया कि उन्हें परिवार में आगे बढ़ने के लिए हमेशा प्रेरित किया गया। किताबों से प्रेम था तो लाइब्रेरी में जाया करती थीं। कॉलेज में लड़कियों को दो चोटी करना अलाउ नहीं था और अगर किसी लड़के ने कुछ कह दिया तो लड़कियां अपने घरों में जाकर नहीं बताती थीं। उन्हें लगता था कि अगर उन्होंने बताया तो उनकी पढ़ाई बंद करवा दी जाएगी। अगर किसी के बेटियां ही पैदा होतीं तो लड़के के पैदा होने के लिए दूसरी शादी करने को समाज की सहज स्वीकृति हासिल थी। दलित ने अगर मज़दूरी बढ़ाने की बात की तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता था।इन परिस्थितियों में एक आशा भी थी कि समाज को बदला जा सकता है। इन्हीं परिस्थितियों में लिखना जारी रहा और साहित्य से जो मेरा लगाव था कम नहीं हुआ। हम महिलाओं के मन में हमेशा ये बात रहती है कि हम सभी के मापदंडों पर खरे उतरें लेकिन हर बार यह संभव नहीं होता। ‘मैं उठती हूँ और जाले साफ़ करती हूँ’ दीपा की इस कविता ने सभी पर गहरा असर छोड़ा।
अगली वक्ता हरियाणा से ही आई हमारे समय की चर्चित कवयित्री विपिन चौधरी ने कहा जैसे- जैसे हम लेखन में ज़्यादा समय बिताते हैं ये सवाल कठिन होता जाता है कि हम क्यों लिखते हैं। इसका जवाब दिया भी नहीं जा सकता कि मैं क्यों लिखती हूँ, इसे सिर्फ़ जिया जा सकता है। विचार करने की सुविधा, मेरे कमरे की स्पेस मुझे मेरी माँ की वजह से मिली।मेरे मामा की 32 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई थी, इस घटना ने मुझ पर गहरा असर डाला और फिर मैंने किसी की मृत्यु के बारे में पढ़ा तो उस घटना ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया और मैंने तीन चार पंक्तियां लिख दीं, वहीं से शायद मेरा लेखन शुरू हुआ। लेखकों का व्यवहार देखकर मैं बहुत आश्चर्य में पड़ती हूँ। लेखन और व्यक्तित्व में फाँक को देखती तो मैं सोचती कि यह लेखक अपनी रचनाओं में जैसा अच्छा मनुष्य है, वास्तविकता में उससे भिन्न है। मुझे शुरुआत में मानवतावादी दृष्टिकोण बहुत अच्छा लगता था। तब तक मैंने फ़ेमिनिस्ट दृष्टिकोण नहीं पढ़ा था। पूरे वर्ल्ड का फेमिनिस्ट लिटरेचर जरूर पढ़ना चाहिए। हम जो लिख रहे हैं वो भी एक तरह का प्रतिरोध ही है। जीवन मेरे भीतर बहुत कुछ छोड़ जाता है, उसे समझने के लिए मुझे कविता में ज़रूरत पड़ती है, इसलिए शायद मैं लिखती हूँ।अक्सर जो तय करके बैठता है लेखक, लिखते-लिखते कहीं और पहुँच जाता है। मैंने अपनी माँ और उनकी सहेलियों के जीवन संघर्ष और उसके ताने-बाने से बहुत कुछ सीखा। किताबों का आकर्षण मेरे जीवन में सदा बना रहा। हरियाणा में जो रागिनी गाई जाती है, औरतें उनमें कल्पना के सहारे बहुत बड़ी चीजें कह देती थीं, क्लिंटन और बुश तक की बातें, जबकि वे कभी गाँव से बाहर भी नहीं गईं। उन्हें सुनकर मैं हैरान होती थी। मैं प्राणि विज्ञान की विद्यार्थी थी। फिर सिविल सेवा की तैयारी की। कई घटनाओं ने मुझे प्रभावित किया जिसने मुझे लेखन की तरफ़ मोड़ा। अतीत जितना पुराना होता है, उतना ही क़ीमती होता जाता है। स्त्री को जीवन में पलट कर देखने की घोर मनाही है। लिखना मेरे लिए उस मनाही को न मानने की परिपाटी भी रहा है। कविता की गहरी गुफा में बैठकर ही हम अपने भीतर झाँक पाते हैं। जीवन खूबसूरत नहीं होता उसे खूबसूरत बनाया जाता है। एक सवाल के जवाब में विपिन चौधरी ने कहा कि मेरे पिता चाहते थे कि मेरी शादी हो जाए, जबकि मैं नवीं क्लास में थी। मेरी माँ ने मेरी पढ़ाई में मुझे बहुत प्रेरित किया।अब स्थितियां बदल रही हैं कि लड़किया अब लड़कों से ज़्यादा पढ़ रही हैं। हरियाणा में मेरे समय में बहुत कम लड़कियां लिख रहीं थीं लेकिन अब समय बदल गया है।
इसके बाद दूसरा सत्र आरम्भ हुआ जिसका विषय था- ‘स्त्री दृष्टि : कौन बोल रहा?’ इस सत्र का संचालन ज्योति नंदा ने किया। ज्योति नंदा ने अपने संचालन की शुरुआत करते हुए कहा कि ‘एक जीरा दो अजवाइन, मर्द जात दो रिजाइन।’ क्या ऐसे नारे अब से पहले पुरुषों की कलम से निकले थे?… नहीं, सोचिए ऐसा क्यों हुआ? ये वे शब्द हैं जो रसोई से निकले हैं। वही जगह जहां सदियों से स्त्रियों की दुनिया को सीमित कर दिया गया है। प्रतिरोध भी वहीं से आयेगा। उसी अनुभव की भाषा में आयेगा। ये ही स्त्री दृष्टि है। हिंदी साहित्य के इतिहास में बहुत सी लेखिकाएं हुई हैं जिन्हें हम उनकी शैली से पहचानते हैं। अब हमें ये भी देखना होगा कि नैरेटर के रूप में स्त्री कहानीकार ने जो विचार प्रेषित किए वे शब्द उसके अपने हैं या पुरुष पोषित मानसिकता से निकले हैं। इस विषय को और विस्तार से समझने के लिए उन्होंने दो कहानियों- “वापसी” और “बोलने वाली औरत” का उदाहरण दिया।
गोरखपुर से आई रंजना जायसवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि शीर्षक पढ़ते ही मुझे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यह इंकलाबी नज़्म याद आई –
‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे,
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है।’
पर प्रश्न है कि स्त्री क्या बोले?क्या वही जो परम्परा से विरासत में मिला। पुरूष कृत ग्रन्थों से मिला या पितृसत्तामक समाज जो बोलने को कहता है? लब आज़ाद हैं फिर भी अधिकांश स्त्रियाँ वही तो बोल रही हैं, जो पुरुष बोलने को कह रहे हैं। पुरूषों की ही दृष्टि, उनके ही विचार, उनकी ही सोच, उनकी बनाई मान्यताएं, उनके ही निर्णय, उन्हीं की भाषा, उनके ही तेवर! स्त्री की दृष्टि कहाँ है? स्त्री की सोच क्या है? विचार क्या है? कहाँ है उसका अपना निर्णय! क्यों उसकी शिक्षा अच्छा जीवनसाथी पाने के लिए और तमाम खासियत दूसरों को लुभाने तक सीमित है? पुरुष अपने व्यक्तिगत नाम, काम, हुनर से पहचाना जाता है और स्त्री उसके नाम से जानी -पहचानी जाने के लिए व्याकुल है। राजनीति हो या समाज, बोल रही स्त्रियों की बातें सुनें, वे वही बोल रही हैं जो उनसे बोलने को कहा जा रहा। स्त्री सिर्फ देह नहीं है-इसका दावा करके भी देह बने रहना उसके व्यक्तित्व के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। कितनी स्त्रियाँ हैं जो किताबों में रूचि लेती हैं, देश दुनिया की खबरें देखती-सुनती हैं, उन पर विचार करती हैं। व्यवस्था से, समाज से, संसार से, खुद से प्रश्न पूछती हैं कि क्यों मैं देह के कारण जानी जाती हूँ? कहाँ है मेरा स्वतंत्र नाम, स्वतंत्र व्यकितत्व, स्वतंत्र पहचान? प्रश्न यह है कि सती होने का विरोध है तो सती स्थलों की परिक्रमा क्यों? पति जीवनसाथी है तो परमेश्वर क्यों? उसके लिए इतने तीज व्रत- क्यों? ढोंगी बाबाओं के चक्कर लगाने वाली सबसे ज्यादा स्त्रियाँ ही तो हैं। स्त्री आज़ाद देश की आज़ाद नागरिक है। वह सिर्फ एक स्त्री नहीं व्यक्ति है। उन्होंने कहा कि हमें सबको साथ लेकर चलना है और इस सफऱ में जागरूक पुरुष भी हमारा साथी है।
अगले वक्ता के रूप में दिल्ली से आई दिव्या तिवारी ने अपनी बातें रखीं। उन्होंने बताया कि यशपाल के उपन्यास “दिव्या” के नाम पर माता-पिता ने उनका नाम रखा। दिव्या ने कहा कि जब इस कार्यशाला के बारे में मुझे पता चला तो मेरे मन में पहला सवाल यही आया कि पुरुष तो नहीं होंगे? क्योंकि अधिकतर स्त्रीवादी सेमिनारों, कार्यशालाओं में पुरुष ही होते हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जनवादी लेखक संघ के निर्माण के इतने वर्षों बाद यह कार्यशाला क्यों हुई? यह आपके जनवादी होने पर भी सवाल है।इस कार्यशाला में पुरुष लेखकों के होने की ज़रूरत नहीं है, जैसा भी टूटा फूटा जैसा भी है, हमें बोलने की ज़रूरत है, हमें समझना है और हम केवल अपने अनुभव ही साझा करें तो भी कोई बात नहीं। देखना और स्त्री का देखना यह आपके अनुभव, आपके वर्ग से भी तय होता है।एक पुरुष के अनुभव, एक स्त्री के अनुभव से भिन्न होते हैं। वहीं से हमारी दृष्टि तय होती है। उन्होंने तीन किताबों और स्त्री दृष्टि के आधार पर अपनी बात रखी। चुनी गई किताबें थीं- यशपाल की “दिव्या”, नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक हैन कैंग की कृति “द वेजीटेरियन“ और जॉस्टिन गार्डर की किताब “सोफ़ी का संसार”। इन किताबों को केंद्र में रखकर बहुत विस्तार से, सिलसिलेवार ढंग से दिव्या ने अपनी बात रखी।
लंच के बाद तीसरा सत्र आरंभ हुआ। तीसरे सत्र का विषय ‘गीत और ग़ज़ल में स्त्री’ था।
इस सत्र में सबसे पहले शीला पांडे ने कहा कि गीत में आता है छंद। दोहा दो पंक्तियों में मुकम्मल है। गीत की जब हम बात करते हैं तो उसका एक अनुशासन है जिससे इतर हम नहीं जा सकते हैं। मुखड़ा, अंतरा, टेक। गीत एक ही भाव भूमि पर चलेगा। आख़िरी का वर्ण भी मिलान करना है। अगर बाक़ी सारे अनुशासन एक हैं तो गीत और नवगीत में अंतर कैसे हुआ है? गीत भावना प्रधान और परंपरावादी हैं लेकिन नवगीत में व्यापकता इतनी अधिक हो जाती है कि उसमें विचार और हमारे समय के सरोकार भी समाहित हो जाते हैं। जहाँ कहीं भी जीवन है नवगीत है। हम जिस जीवन को चुनते हैं। उसके ही आसपास का बिम्ब लेते हैं। नवगीत यथार्थ के बिल्कुल समीप होते हैं। नवगीत एक काल खंड को पहचानने और उसे दर्ज करने की कोशिश भी करते हैं। उन्होंने कहा कि नवगीत यथार्थ को साथ पकड़ कर चलता है। नवगीत में स्त्री की भूमिका को दो तरह से ले सकते हैं। स्त्रियों को लेखन में कैसे दर्ज़ किया और स्त्रियां क्या-क्या दर्ज कर रही हैं।मुख्य धारा के विषय की चुनौतियों को स्वीकार कीजिए और उसे दर्ज कीजिए। समष्टि की बात करनी पड़ेगी। मैंने कई मंचों से ये कहते हुए पाया कि कोई महिला लिख ही नहीं रही नवगीत। बहुत से मंचों से पुरुष नवगीतकारों का नाम लिया जाता है और स्त्री नवगीतकारों का नाम छोड़ दिया जाता है। मैंने चालीस स्त्री नवगीतकारों को ढूंढा और उनके नवगीतों का संकलन किया और उन पर टिप्पणियाँ लिखवाईं। उन्होंने अपने एक नवगीत की चार पंक्तियों का उल्लेख किया-
भीत ढहाकर नींव खोदते
ईंट बिछाते हैं,
नये मसीहा देश जोत
मजदूर उगाते हैं।
इसके बाद अपने वक्तव्य के लिए अनामिका सिंह मंच पर आईं।उन्होंने कहा कि मैं अपनी बात एक सवाल से करना चाहूँगी कि पुरुष ने कब स्त्री को ग़ज़ल में रखा और स्त्रियों ने कब अपनी बात ग़ज़ल में रखी है? समय बदला, समाज के सरोकार बदले तो ग़ज़ल की ज़मीन भी बदली।ग़ज़ल आज भूख, विस्थापन, मज़दूर, सत्ता के षड्यंत्र इन विषयों पर भी लिखी जा रही है।स्त्री को जीते जागते देख लेने भर की बात है। स्त्री के लिए विरोधाभास वाली बात है कि जो घर उनके लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है, वह घर उनके लिए सबसे ज़्यादा सताने वाली जगह है। विवाह के बाद स्त्री संबोधन भर की हो जाती है- चाची, मामी आदि। हमारी सामाजिक भाषा में बेटियों को बहुत कुछ कहा गया है लेकिन क्या सम्मान देने का अर्थ ये है कि उसके निर्णय लेने का अधिकार भी छीन लिया जाय।स्त्री को पूजने की ज़रूरत है या उसे बराबरी पर लाने की ज़रूरत है। हम स्त्री का चेहरा देखते हैं, उसके शरीर का भूगोल देखते हैं, लेकिन उसकी सहमति या असहमति से हमें सरोकार नहीं है। महिलाओं का समाज में योगदान उत्तरोत्तर बढ़ा है लेकिन घर से बाहर निकलना और पूरी तरह देह और मन से स्वतंत्र हो जाना अभी भी मुश्किल है। काम से लौटकर रसोई हमारा इंतज़ार कर रही होती है। स्त्री के बारे में बोलने और स्त्री के स्वयं के बोलने के अंतर को समझना होगा। स्त्री मुक्ति का सवाल अभी भी बना हुआ है। ग़ज़ल की ख़ूबसूरती है कि दो मिसरे और पूरा समाज कठघरे में। आज की ग़ज़ल सामाजिक चेतना की विधा भी बन गई है। आज हमें ऐसी ग़ज़ल की दरकार है जो स्त्री को किसी भूमिका में न बाँटे। इसमें सवाल जवाब का सत्र भी हुआ।
इस सत्र का कुशल संचालन जलेस लखनऊ की उपाध्यक्ष आभा खरे ने किया।
अंतिम सत्र में कविता पाठ हुआ जिसका संचालन शीला सिद्धांतकर सम्मान से सम्मानित कवयित्री शालू शुक्ला ने किया। इस सत्र में अनामिका सिंह (आगरा), शीला पांडे (लखनऊ), सरिता भारत (अलवर), गीता भारद्वाज (फर्रुखाबाद), रमा रानी वर्मा (आगरा), रंजना जायसवाल ( गोरखपुर), कल्पना उबाले (महाराष्ट्र), योगमाया सैनी (राजस्थान), आभा खरे (लखनऊ), विपिन चौधरी ( हरियाणा), सीमा सिंह (लखनऊ), शालू शुक्ला ( लखनऊ), श्री देवी (रायपुर), शालिनी सिंह (लखनऊ), यशोधरा यादव (आगरा), कल्पना महापुस्कर (महाराष्ट्र), अनुजा शुक्ला (लखनऊ), किरन ( झारखंड), सरिता यादव ( गोरखपुर), दीपा (हरियाणा) ने कविता पाठ किया।
दिन के अंत में धन्यवाद ज्ञापन आज़मगढ़ इकाई की संयुक्त सचिव कंचन मौर्य ने किया।

4 अक्टूबर 2026 दिन रविवार
दूसरे दिन के पहले सत्र का विषय था- ‘स्त्री होकर पढ़ना :पाठ पाठक और पुनर्पाठ।’ इस सत्र का माया मिश्रा ने संचालन करते हुए कहा कि आज के इस सत्र का विषय बहुत गहरा और प्रासंगिक है। जब हम कहते हैं ‘स्त्री होकर पढ़ना’ तो यह एक चेतना की सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा है। जब एक स्त्री पाठक बनती है तो वह केवल पंक्तियों को नहीं पढ़ती बल्कि उसके बीच छुपे वर्चस्व, लिंगभेद और सामाजिक संरचनाओं को भी चुनौती देती है।यह एक सांस्कृतिक यात्रा है। इस सत्र में योगमाया सैनी, अनुजा शुक्ला और लक्ष्मी कुमारी
वक्ता के तौर पर मौज़ूद थीं।
योगमाया सैनी ने मृदुला गर्ग की कहानी “हरी बिंदी” पर अपनी बात रखी। यह अस्सी के दशक की कहानी है। समय काल को भी अगर हम संदर्भ में रखेंगे तो ही हम कहानी का ठीक तरह से पुनर्पाठ कर पाएंगे। कहानी में एक स्त्री बँधी बँधाई जीवन चर्या में जी रही है। उसका पति एक दिन के लिए बाहर चला जाता है।अब वो उस एक दिन को अपने हिसाब से जीना चाहती है, बिना किसी उद्देश्य के। यह कोई बौद्धिक कहानी नहीं है लेकिन गहरा विमर्श छेड़ती है। एक सुंदर पेंटिंग को देखकर वह कहती है कि यह तो मेरे सूट जैसी पेंटिंग है और चली जाती है। बेवजह हँसती है। उसके लिए वह बँधी बँधाई दिनचर्या से मुक्ति के उत्सव का दिन था। समानता क्या बिना स्वाधीनता के आ सकती है? रास्ते में एक अपरिचित पुरुष से मुलाक़ात होती है। उससे बिना जजमेंटल हुए बात करती है, हँसती है और उसे अहसास होता है कि यह पुरुष उसे एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह देख रहा है।
दूसरी कहानी उषा प्रियंवदा की “वापसी” सत्तर के दशक की कहानी है। गजाधर बाबू रिटायर होने के बाद घर पहुंचते हैं। घर में उनके बरक्स एक दुनिया खड़ी हो चुकी थी। किसी के पास उनसे बात करने की फ़ुर्सत नहीं है। वे घर में अपनी जगह ढूँढते हैं। स्नेह के आकांक्षी होकर वे वापस आए और केंद्र में न रहकर हाशिये पर चले गए। अगर स्त्री विमर्श की दृष्टि से पड़ताल करें तो देखेंगे कि एक स्त्री जो घर की मालकिन है अपना अधिकांश समय रसोई में बिताती है। वह जानती है कि जब तक वह परिवार के लिए उनकी इच्छाओं का मान रखते हुए रसोई का काम काज संभालेगी तभी तक उसका घर में महत्व है। इस कहानी में ध्यान देने की बात है सत्ता का खिसकना और वो सत्ता खिसक कर गजाधर बाबू के पास से अमर के पास आ गई थी। यह एक मनोवैज्ञानिक कहानी है कि ख़ाली जगहें भरती रहती हैं।
अनुजा शुक्ला ने ‘बोलने वाली औरत’ और “त्रिशंकु” पर अपने विचार रखे। “त्रिशंकु’ मन्नू भंडारी की कहानी है। एक किशोरवय लड़की और उसकी माँ की कहानी है। पड़ोस में जो लड़के रहते हैं वे किशोर लड़की पर छींटाकशी करते रहते हैं। माँ का अपनी बेटी के साथ जो संबंध है वो बहुत से भ्रम और द्वंद से बना हुआ है। लड़की को अंत तक समझ नहीं आता कि माँ का विरोध कैसे करे। कभी उनकी छवि में माँ दिखाई देती है और कभी नाना दिखाई देते हैं। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में लड़कों को कभी निर्देश नहीं दिए जाते।
इस पूरी कहानी में जो भी बात करती है वो माँ करती है, पिता कहीं भी नज़र नहीं आते। माँ के ऊपर ही ज़िम्मेदारी है लड़की को हर असुरक्षा से बाहर निकाल लाने की। यह कहानी एक द्वन्द छोड़ती है। ‘बोलने वाली औरत’ एक ऐसी औरत की कहानी है जो बोलती है, बात करती है। स्त्री के लिए जो भूमिका सदियों से तैयार है, वह बहुत कमजोर है। स्त्रियों की सारी इच्छा-आकांक्षा को मार दिया जाता है। परंपरा से तमाम दकियानूसी मान्यताएं चली आ रही हैं।
लक्ष्मी कुमारी ने ‘सिक्का बदल गया’ और ‘मिशन जंगल और गिनीपिग’ पर अपने विचार रखे। ‘सिक्का बदल गया’ कृष्णा सोबती की कहानी है जो विभाजन की त्रासदी की ही नहीं एक स्त्री की पहचान की भी कहानी है। इस कहानी के केंद्र में बॉर्डर और युद्ध है। एक पोलिटिकल साइंटिस्ट होने के नाते अगर मैं इसका मूल्यांकन करूँ तो युद्ध को हम एक पुरुष की तरह नहीं देखते। महिलाएँ अगर स्टेट में होतीं तो स्थितियां दूसरी होतीं। ‘मिशन जंगल और गिनीपिग’ नमिता सिंह की कहानी है। इसमें उषा नाम की लड़की है।पुरुष साइंस लैब में इतना तल्लीन रहता है कि बाहर की दुनिया अगर कोई है तो वह केवल उषा है। विज्ञान और तकनीक विषय से जुड़ी कहानी में स्त्री भी पुरुष की कलीग है लेकिन लैब के अलावा भी उसकी एक दुनिया है।
इसके बाद प्रतिक्रिया और संवाद का सत्र चला।
गीता भारद्वाज ने ‘बोलने वाली औरत’ पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जब मैंने पहली बार ये कहानी पढ़ी तो मैं शॉक्ड रह गई। ‘बोलने वाली औरत’ पितृसत्तात्मक समाज से आहत है। काम कोई ग़लत करे, दोषी औरत ही है। शिखा की सास जो अंधविश्वासों और पुरानी घरेलू मान्यताओं से जुड़ी हैं, शिखा के तर्कशील स्वभाव से चिढ़ती हैं। लेकिन शिखा बोलना नहीं छोड़ती।
फर्रुखाबाद से आई प्रियम मिश्रा ने ‘हरी बिंदी’ पर अपनी प्रतिक्रिया दी। एक स्त्री पति के रूटीन के साथ बँधी हुई है। एक दिन की आज़ादी में वह चाँद छूने की कोशिश करती है।
शुभा जी ने इस संवाद में कहा कि ‘हरी बिंदी’ के माध्यम से एक स्त्री की आज़ादी का चित्र भी प्रस्तुत किया गया है। जब भी किसी पात्र का मूल्यांकन किया जाए तो उसकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को भी ध्यान रखकर पाठ किया जाए।
सोनी दयाल ने कहा कि “वापसी” कहानी को मैंने स्त्री विमर्श के तौर पर देखा तो रीडिंग अलग हो गई।गजाधर बाबू ने अपनी नौकरी के दौरान अपनी पत्नी को भावनात्मक रूप से अपना समय कब दिया? बसंती जो उनकी पुत्री के हवाले से कहा कि तुम अपनी सहेलियों के घर मत जाओ और बेटे को कहानी में कभी कहीं जाने की मनाही नहीं है। स्त्री की स्वतंत्रता को कंट्रोल किया जाता है और जब लड़की उनकी बात माने बिना भी सहेली के घर जाती है तो वे मन ही मन उसकी शादी करने का निर्णय लेते हैं जबकि संवाद से चीजें सुलझाई जा सकती थीं। सोनी ने अन्य संदर्भों से भी इस कहानी पर अपनी बात रखी।
सरिता ने ‘मिशन जंगल और गिनीपिग’ पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि सिक्स्थ सेंस औरतों में ज़्यादा होता है। हमें ये सोचना चाहिए कि हम यहाँ तक कैसे आए और हमें आगे जाना है। नायक यह क्यों नहीं देख पा रहा कि जो परीक्षण वह चूहों पर कर रहा है भविष्य में वही अगर मनुष्यों पर हो तो? स्त्री की दूरदृष्टि का पता भी यह कहानी देती है।
नवगीतकार यशोधरा यादव ने “त्रिशंकु” पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यह शीर्षक बहुत ही सार्थक है। कहानी की शुरुआत बहुत अच्छी है। तनु की माँ आधुनिक और पुराने दोनों खयालों के बीच में झूलती रहती है। एक द्वंद माँ के मन में और एक द्वंद बेटी के मन में लगातार चलता रहता है। नाना तो पूरी तरह से नाना थे लेकिन माँ तो कभी नाना और कभी माँ बन जाती है तो उनसे कैसे अपनी बात कहा जाए।
शुभम यादव ने ‘सिक्का बदल गया’ जो विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखी गई कहानी है, उस पर अपनी बात रखी।
दूसरे सत्र का विषय ‘भाषा, शिल्प और लेखकीय पहचान’ था।कानपुर इकाई की सचिव भावना मिश्रा ने इस सत्र के संचालन की शुरुआत ग़ालिब के एक शेर से की-
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े बयाँ और।
भाषा के भीतर हमारे सामाजिक अनुभव हैं और इसी भाषा के भीतर हमारी चुप्पियाँ भी हैं।
भावना मिश्रा ने सबसे पहले कल्पना उबाले को मंच पर आमंत्रित किया। कल्पना उबाले ने निर्मला पुतुल की कविता ‘अख़बार बेचती लड़की’ का उदाहरण देते हुए कहा कि इस कविता को पढ़िए जो पाठकों के सामने सीधे- सीधे अपनी बात कहती है और सारी संघर्षशील लड़कियों की कविता बन जाती है। उनकी कविताओं में व्यक्तिगत भाव नहीं बल्कि सामाजिक अनुभव भी महत्वपूर्ण होते हैं।अखबार दुनिया संसार की सारी ख़बरें बताता है लेकिन अख़बार बेचती लड़की के जीवन की ख़बर किसी को नहीं है। वह अपने अनदेखे श्रमिक जीवन के बारे में बात करती है। निर्मला पुतुल की ही अगली कविता ‘बाबा उतनी दूर मत ब्याहना’ पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि लोकजीवन से जुड़े विषय से जुड़ी कविता है।बेटी की चिंता में अपने जंगल, मिट्टी, परिचित संसार से जुड़े रहने की इच्छा है और यह इच्छा सामूहिक स्वर में बदल जाती है। वह व्यवस्था का हिस्सा बनने वाली लड़की नहीं बल्कि अपनी व्यक्तिगत पहचान की इच्छा को भी रखती है। एक बेटी की भविष्य की चिंता की बात भी करती है। इसे केवल बेटी की विदाई के गीत के तौर पर न पढ़ें।
सुशीला टाकभौरे की कविता पर वक्तव्य रखने के लिए कल्पना महापुस्कर मंच पर आईं। उन्होंने “घर की चौखट के बाहर” और “स्त्री” इन दो कविताओं पर बात रखी। मायका, ससुराल दोनों दायरे में स्त्री का जीवन केवल ओट तक ही सीमित है। घर की चौखट से उसके भीतर लादे हुए बंधन की कविता है। “स्त्री” कविता में कवि ने स्त्री के प्रति अपनी भावना स्पष्ट रूप से रखी है। पुरुषों पर निर्भर स्त्री, अपनी सुविधाओं के अनुसार बोतल में उतारी गई स्त्री के संकट इस कविता में व्यक्त होते हैं।
उनके बाद लोकभाषा पर अपनी बात रखने के लिए रूपम कुमारी आईं। उन्होंने कहा कि मैं अंगिका भाषी प्रदेश से आती हूँ। लोक में ऐसी क्या चीजें थीं जिन्हें अपनी भाषा के माध्यम से हमारी पुरखिने रखती रही हैं। स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती है-सिमोन द बऊआ का यह वाक्य बहुत महत्वपूर्ण है। जन्म के साथ ही लड़की के साथ पॉलिटिक्स शुरू होती है। अंगिका प्रदेश में एक सोहर गाया जाता है-
बेटा के जन्मते हो बाबा
देला खिलौना,
बेटी के जन्मले गहना गुइयाँ।
झूमर गीतों में स्त्रियां पितृसत्ता को कोसती हैं। उन्होंने विवाह गीत के माध्यम से बताया कि लड़का और लड़की एक ही कोख से पैदा होते हैं लेकिन स्त्रियों को शादी करके दूसरे घर भेज दिया जाता है।उनकी परवरिश ही उन्हें दूसरे घर का मान कर की जाती है। उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है। उन्होंने कहा कि हमारी मीडिया भी पितृसत्तात्मक है।
अगली वक्ता अल्का तिवारी ने स्त्री भाषा की निर्मिति पर अपनी बात रखी। उन्होंने शुभा की कविता गैंगरेप का उदाहरण दिया। जिस तरह की भाषा इस कविता में आई है क्या वैसी भाषा शुरुआत से हमारे पास थी? स्त्रियों ने लड़कर अपना हक़ हासिल किया है। ताराबाई शिंदे हैं, रमाबाई अंबेडकर हैं जिनके जीवन संघर्ष के उदाहरण हमारे सामने हैं। महादेवी जी को नीर भरी दुख की बदली कहकर भावुक कवयित्री के रूप में पहचाना गया। उनकी श्रृंखला की कड़ियाँ का कहीं उल्लेख नहीं होता। भाषा को अलगाया गया। ये भाषा सदियों के बाद हमें मिली है। थेरी गाथाओं पर इतनी सदियों के बाद हम बात कर रहे हैं जब कि बौद्ध साहित्य बहुत पहले से प्रकाश में आ गया था। स्त्रियों को अनपढ़ बनाए रखने की साज़िश चली। चीन की संस्कृति भी पुरुष प्रधान रही है। स्त्रियों को पढ़ने लिखने की आज़ादी नहीं थी तो स्त्रियों ने अपने संवाद के लिए एक लिपि ईज़ाद की जिसे नुशू कहा जाता है। स्त्रियों को अपनी भाषा लिखने पर राजदंड मिलता था। उन्होंने जो लिपि ईज़ाद की थी उसी में वे संवाद करती थीं और पुरुष समझ ही नहीं पाते थे।
प्रतिक्रिया / संवाद सत्र में अपनी बात रखने के लिए अंशिका भदौरिया को बुलाते हुए भावना मिश्रा ने कहा कि कितनी ही पीड़ाएँ हैं जिनके लिए ध्वनि नहीं है और वे शब्द स्त्रियों को ईज़ाद करने हैं।
अंशिका भदौरिया ने ‘यही सच है’ कहानी पर अपनी बात रखी।उन्होंने कहा कि एक स्त्री सुरक्षा चाहती है और दूसरा वह आवेग भी चाहती है। पारंपरिकता से आधुनिकता के बीच का जो संक्रमणकाल है, वहाँ अपने आपको स्थापित करती है। जिस समय यह कहानी लिखी गई तो उस समय एक स्त्री का अपने मन की बात कहना बहुत बड़ी बात थी। एक ही समय पर अपने आपको स्थापित भी करती हैं और निर्वासित भी करती हैं। मन्नू भंडारी जी अपनी हर कहानी में समस्या के साथ उसका हल निकालने का कोना भी निकालती हैं।
संवाद की अगली वक्ता श्री देवी ने कहा कि सारा साहित्य अनुभूतियों का साहित्य है। निर्मला पुतुल की कविता के माध्यम से उन्होंने अपनी बात रखी। शादी के समय आपको अपने गहने, साड़ी ख़रीदने की पूरी आज़ादी होती है लेकिन जिसके साथ जीवन निभाना है उसके चयन के लिए कोई स्वतंत्रता नहीं होती।
इसी कड़ी में रमा वर्मा जी अपनी बात रखने के लिए आईं और उन्होंने कहा कि आज की नारी बहुत बदल रही है। उन्होंने सुशीला टाकभौरे की कविताओं को केंद्र में रखकर कहा कि उसकी आवश्यकताएं, भावनाएं बदलते हुए समाज में खुद को स्थापित कर रही हैं। इसी प्रयास का नतीजा है कि हम यहां इकट्ठा हुए हैं। दरवाजे के पीछे की ओट से झांकती आंख अब दरवाजे के बाहर आ चुकी हैं। अब की महिलाएं दायरे का अतिक्रमण भी करती हैं। आने वाली लड़कियों का भविष्य बहुत उज्ज्वल दिख रहा है।
अर्चना यादव ने लोक विमर्श के माध्यम से अपनी बात रखी। उन्होंने भिखारी ठाकुर के नाटक ‘बेटी बेचवा’ का उदाहरण दिया।स्त्रियों के साथ पुरुषों की भी ज़िम्मेदारी है कि वे भी समाज के बनाए नियमों का पालन करें।
भाषा में पितृसत्ता के ऊपर राधिका रावत ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भाषा में पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था और सोच है जहाँ भाषा के नियम, शब्द और प्रतीक पुरुषों को प्रधान और महिलाओं को दोयम या कमज़ोर रूप में दिखाते हैं। जहाँ पुरुषार्थ को वीरता और पराक्रम का बड़ा रूपक माना जाता है, वहीं इसके विपरीत स्त्रैण चरित्र कहकर किसी भी पुरुष के मान-मर्दन या उसकी कमज़ोरी को दर्शाने के लिए ताना दिया जाता है। जब कोई पुरुष रोता है तो कहा जाता है कि लड़कियों की तरह मत रोओ या चूड़ियां पहन लो। अधिकांश गालियाँ भी मां-बहन को केंद्र में रखकर दी जाती हैं। यहाँ तक कि हमारा यानी स्त्रियों का व्याकरण भी अलग है। इसी बात को और स्पष्ट करने के लिए राधिका रावत ने शुभम श्याम की कविता पढ़ी थी जिसकी पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं –
व्याकरण रचने वालों ने,
भाषा की व्याख्या करने वालों ने
जब नाज़ुक पंखुड़ियों को स्त्रीलिंग कहा
और नुकीले काँटों को पुल्लिंग
जब पानी मीठा रहा तो नदी स्त्रीलिंग रही
जब पानी आसमान में रहा,
पहुँच से बहुत दूर
तो बादल पुल्लिंग रहे
जब पानी बरसने लगा धरती पर
तो बारिश स्त्रीलिंग हो गई।
युद्ध होता है, शान्ति आती है
हवा चलती है, तूफान आता है
व्याकरण की रचना करने वालों ने हर उस चीज़ में जिसमें नाज़ुकता देखी उनको उसमें स्त्रीत्व दिखा। आज जब हम भारतीय समाज से जातिसूचक, कार्यसूचक, रंगसूचक, वर्णसूचक, क्षेत्रसूचक, शब्दों को समाप्त कर रहे हैं फिर हमें स्त्रियों को अलग-थलग कर लिंग का बोध करवाने वाले शब्दों को गढ़ने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? जब तक हमारी भाषा में पितृसत्तात्मक प्रतीक बने रहेंगें तब तक समाज में वास्तविक समानता आना कठिन है। भाषा को समावेशी और बराबरी का संवाहक बनाने की आवश्यकता है।
भोजनावकाश के बाद तृतीय सत्र आरंभ हुआ जिसका शीर्षक था- ‘आत्मकथ्य और रचना।’ इस सत्र का संचालन कवयित्री शालू शुक्ला ने किया।
पहली वक्ता के रूप में झारखंड से आईं किरन ने अपने आत्मकथ्य में अपनी कहानी “वंशवृक्ष” की रचना प्रक्रिया के संबंध में बात करते हुए कहा कि समाज में, परिवार के वंश वृक्ष में स्त्रियों का कोई स्थान नहीं है। जब मैं अपनी दोस्त के साथ कच्छ गुजरात घूमने गई, वहीं पर घटी एक घटना ने मुझे यह कहानी लिखने को उद्वेलित किया। वहाँ पर मेरी सहेली के चाचा का वंश वृक्ष में नाम नहीं था क्योंकि उनके दो बेटियां थीं और कोई बेटा नहीं था। औरतों के हिस्से में नहीं आई कोई ख़ानदानी ज़मीन। औरतों के हिस्से आया चूल्हा जिसमें फूलती रहीं साँसें और वे जलाती रहीं उम्र। औरतों के डॉक्टर-इंजीनियर होने पर भी परिवार का ठेका उन्ही के ज़िम्मे होता है। पुरुष व स्त्री दोनों को घरेलू काम बाँटने चाहिए। किसानी का काम करने के बावज़ूद स्त्री कभी किसान नहीं मानी गई। सुरक्षा के नाम पर स्त्रियों को पिंजरे में डालने का प्रयास किया जाता है।
अगली वक्ता के तौर पर समीना ख़ान ने अपनी बात रखी। अपनी कहानी ‘राकिया की अम्मा’ की अंतर्वस्तु को केंद्र में रखते हुए स्त्री विमर्श के आईने में समीना खान ने अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि किस तरह अपने संघर्ष के दिनों में एक प्रेरणा के रूप में वह राकिया की अम्मा को देखती हैं और यह देखना ऐसा होता जाता है कि उस अकेली और वृद्ध महिला का किरदार उनके दिमाग़ में एक कहानी का रूप लेता जाता है। संघर्ष और हुनर के साथ उस वृद्धा के जीने के अंदाज़ की बारीकियों पर बढ़ता फोकस कहानी की कई परतों को समेटता है। यह कहानी समीना के ज़ेहन में जगह बना लेती है मगर नौकरी और ज़िम्मेदारियों के बीच इसे लिखने का वक़्त नहीं मिलता और छह वर्षों तक कहानी उनके दिमाग़ में पकती रहती है। समीना बताती हैं कि इसे लिखते वक़्त उनके दिमाग़ में कोई वृद्ध या स्त्री विमर्श जैसा मुद्दा नहीं था। उनके लिए यह एक इंसानियत और इन्साफ की कहानी थी जिसे हंस ने न सिर्फ अपनी पत्रिका में जगह दी बल्कि पाठकों और जजों ने भी इसे सराहा।
अलवर से आई सरिता भारत ने अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बताया कि स्त्री का कोई अपना देश नहीं होता। उन्होंने कहा कि आत्मकथ्य और लेखन दो अलग-अलग बातें हैं। आत्मकथा में समस्त स्त्री जाति की पीड़ा, उनके संघर्ष, पितृसत्तात्मक समाज की चुनौतियाँ एवं दर्द छुपा होता है। उन्होंने पश्चिमी लेखिका वर्जिनिया वुल्फ़ एवं सिमोन द बउआ का उदाहरण देते हुए लेखन में स्त्री यौनिकता, दोयम दर्जे एवं स्त्रियों का कोई देश नहीं होता जैसे उदाहरण पेश कर भारतीय समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे को तोड़ते हुए जन संघर्षों में बेबी हालदार, सुशीला टाकभौरे सहित कई लेखिकाओं की आत्मकथाओं का जिक्र किया।उन्होंने कहा कि दलित, वंचित हाशिए की, ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्कर स्त्रियों की आत्मकथा में दोहरे संघर्ष और दर्द होंगे। सरकार एवं बाजार बड़ी चालाकी से स्त्रियों से वो लिखवा रहे हैं जिससे उनका मार्केट फले-फूले। स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों में यौनिकता देह पर केंद्रित है जबकि समाजों के भीतर एक घरेलू कामगार, मजदूर महिला का आर्थिक संघर्ष भी है। “तमाशेवाली” कहानी की अंतर्वस्तु प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि यह सिर्फ प्रेम कहानी नहीं है बल्कि हाशिए की घुमंतू स्त्री की ऐसी कहानी है जो कला के श्रम के बल पर मानवीय मूल्यों को स्थापित करती है। पंचायती व्यवस्था को तोड़ती है। जाति व्यवस्था एवं गरीबी की पीड़ा झेलती है जबकि माधव का संघर्ष साथ-साथ चलता है।
कुसुम लता पांडेय ने अपनी कहानी के बारे में बताया कि यह तृष्णा से तृप्ति तक की नामुकम्मल यात्रा की कहानी है “तुमने कहा था”।
इक्कीसवीं सदी में भी सामाजिकता के फ्रेम में सम्बन्ध का अक्स बेहद है। प्रेम के उगने के ढेरों संकेत दिखाई पड़ते हैं। उन्हें दुर्भाग्यवश परिवेश का अनुकूलन नहीं मिलता है। नतीजा तृप्ति के मकाम के बगैर खत्म…। मुझे नहीं पता है, यहां पर कहना चाहिए या नहीं। साहित्य के आसमान में ध्रुवतारा की मानिंद चमकती कहानी के शीर्षक उसने कहा था से प्रेरित होकर कहानी का शीर्षक “तुमने कहा था” रखा है। कहानी में “तुम” पुरूष है जिसका संवेदनात्मक पैरामीटर जीवन स्थितियों के आधार पर अपने ही प्रेम को लेकर कैसे-कैसे उतार चढ़ाव से गुजरता है, इसे कहानी में देख सकेंगे। इसका केंद्रीय-स्वर स्त्री जीवन है। एक ही प्रेम के दो अलग-अलग परिणाम क्योंकि सामाजिक व्यवहार दोनों के लिए अलग-अलग हैं। कहानी के पात्र स्वाति और मलय प्रतीक भर हैं।
कानपुर से आई उत्तर प्रदेश जनवादी लेखक संघ की उपाध्यक्ष अनीता मिश्रा ने अपनी कहानी ‘ड्रामा क्वीन’ के बारे में कहा कि यह स्त्री के वैवाहिक जीवन, यौनिकता, धार्मिक पाखंड, घरेलू हिंसा, सामाजिक प्रतिष्ठा और स्त्री की अस्मिता के प्रश्नों को एक साथ उठाती है। कहानी की नायिका सरिता केवल एक प्रताड़ित पत्नी नहीं है, बल्कि वह उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें स्त्री की शिक्षा, इच्छा, शरीर, आवाज और निर्णय लेने की स्वतंत्रता पर पुरुष तथा परिवार का नियंत्रण है। इसमें स्त्री की पीड़ा को केवल करुणा के स्तर पर प्रस्तुत नहीं किया गया है बल्कि उसके माध्यम से समाज की नैतिकता और धार्मिक आडंबरों के अंतर्विरोधों को उजागर किया गया है।
संवाद सत्र में दिल्ली से आई अर्पिता यादव ने समीना खान की कहानी ‘राकिया की अम्मा’ पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ‘राकिया की अम्मा’ अकेली तो हो जाती हैं लेकिन वे किसी की संवेदना लेने, असहाय समझने, समाज के सामने हाथ फैलाने के बजाय खुद को समेट लेती हैं। कला को ढाल बनाकर वे अपनी दुलायी बनाने के हुनर को अपनी आजीविका बनाती हैं। वे समाज पर निर्भर नहीं होना चाहती हैं। यह उनकी कमजोरी नहीं है बल्कि मौन विरोध है। वे इस पितृसत्तामक समाज से आजाद होकर रहना चाहती हैं। यह मौन उनकी अपनी शर्तों में जीने की आजादी है। स्त्री दृष्टि से ‘राकिया की अम्मा’ धैर्य, स्वाभिमान और मौन सशक्तिकरण का प्रतीक हैं जो हर विपरीत परिस्थिति में अपनी रीढ़ सीधी करना चाहती हैं।
संवाद की अगली कड़ी में भाग्यवती पाल ने कुसुम लता पांडेय की कहानी “तुमने कहा था” पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कुछ प्रेम कहानियाँ अपने अंत से समाप्त नहीं होतीं। वे स्मृति बनकर जीवन भर चलती रहती हैं। इसी प्रकार ‘तुमने कहा था’ प्रेम-कथा से आगे बढ़कर स्मृति, स्त्री-अस्मिता, सामाजिक मर्यादा और मानवीय मन के उस अंतर्द्वंद्व की कथा बन जाती है, जहाँ व्यक्ति अपने अतीत को भुलाना चाहता है, किंतु उससे पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता। अंत में उन्होंने कहा कि ‘तुमने कहा था’ प्रेम के मिलन की नहीं, प्रेम की स्मृति की कहानी है; यह प्राप्ति से अधिक अप्राप्ति की कथा है; और शायद इसीलिए इसकी संवेदना पाठ समाप्त होने के बाद भी हमारे भीतर बनी रहती है।
इसके बाद श्रद्धा यादव ने सरिता भारत की कहानी ‘तमाशेवाली ‘ पर अपनी बात रखी। यह कहानी स्त्री अस्मिता के साथ-साथ एक नए मार्ग की ओर दिशा देती हुई दिखाई देती है। इस कहानी में सदियों से चली आ रही पितृसत्तात्मक मान्यताओं, विचारों, भावनाओं को माधव के द्वारा नकारा गया है। माधव अपनी पत्नी बिजली की स्वाधीनता, स्वतंत्रता और कला को सर्वोपरि मानता हुआ अपने ही समाज की रूढ़ियों और मान्यताओं का खंडन करता है और समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारी परंपराएं और मान्यताएं किसी भी नारी या व्यक्ति की स्वाधीनता, स्वतंत्रता और पहचान का हनन न करें और यदि ऐसा है तो उनको समाज से निकाल कर बाहर फेंकना चाहिए।
प्रिया सिंह ने अनीता मिश्रा की कहानी “ड्रामा क्वीन” पर संवाद किया। उन्होंने कहा कि यह कहानी समाज में धर्म की आड़ में छिपी नामर्दी, घरेलू हिंसा और स्त्री के दोहरे उत्पीड़न को बेहद संजीदगी से उजागर करती है। जहाँ एक पुरुष अपनी तथाकथित ‘नामर्दी’ का कलंक मिटाने के लिए आश्रम के महाराज द्वारा अपनी पत्नी के शोषण पर भी मौन स्वीकृति दे देता है। यह कहानी धर्म और पुरुषवादी अहंकार के बीच पिसती औरत की एक कड़वी हकीकत है।
श्रुति मिश्रा ने किरन जी की कहानी “वंश वृक्ष” पर अपनी बात रखते हुए कहा कि कहानी का जो शीर्षक है “वंश वृक्ष” वह एकदम ठीक है। कहानी में केंद्रीय पात्र “वंशिका” द्वारा विभिन्न घटनाओं के माध्यम से स्त्रियों के जीवन के विभिन्न पहलुओं को बड़ी ही मार्मिकता और यथार्थता के साथ दर्शाया गया है। जब वंशिका अपनी मित्र के गाँव जाती है तो कुलदेवता के मंदिर में उसे सब घुमाने ले जाते हैं… वंशिका की मित्र अपने 100 साल के वंश को बड़े ही ताव और तारीफों के पुल बांधते हुए कहती है कि ये देखो मेरे पर दादा, मेरे पिता , मेरे भाई …. तभी वंशिका धीरे से एक प्रश्न करती है कि – “अरे! इस वंश वृक्ष में बेटियों का नाम ही नहीं!फिर एक दूसरा प्रश्न – “इस वंश वृक्ष में तो बहुओं का भी नाम नहीं है”! हृदय को झकझोर देने वाला यह दृश्य वास्तव में पितृसत्ता पर गहरी चोट करता हुआ हम लड़कियों को अपने अस्तित्व और अस्मिता के प्रति सोचने को विवश कर देता है।
समापन सत्र में दिल्ली से आई इस कार्यशाला की सबसे छोटी प्रतिभागी काव्या तिवारी ने दो दिवसीय कार्यशाला की अपनी आंखों देखी और महसूस की गई रिपोर्ट प्रस्तुत की। काव्या ने बड़ी बारीक़ नज़र से इस कार्यशाला के हर सत्र और हर वक्ता पर दो-दो पंक्तियों के माध्यम से अपनी बात रखी।
इस कार्यशाला में प्रतिभागिता करने वाली आठ राज्यों से आई 51 लेखिकाओं को कवयित्री शुभा के हाथों प्रमाण पत्र और स्मृति चिह्न दिया गया।

कार्यशाला में जलेस के केंद्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह, राज्य सचिव ज्ञान प्रकाश चौबे, पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित बिहार के राज्य सचिव कुमार विनिताभ, कहानीकार अमरीक सिंह दीप, माधव महेश, राजेंद्र वर्मा, नूर आलम, आजमगढ़ जलेस इकाई के अध्यक्ष अरुण मौर्य, सुधांशु साहिल, राजीव प्रकाश गर्ग भी समय-समय पर उपस्थित थे।
समापन वक्तव्य प्रदेश उपाध्यक्ष अनीता मिश्रा ने और धन्यवाद ज्ञापन सीमा सिंह ने दिया। इस सत्र का संचालन कार्यक्रम की स्थानीय संयोजक शालिनी सिंह ने किया।







शानदार प्रोग्राम
स्त्री लेखन पर कार्यशाला आयोजित करना बड़ा सराहनीय कार्य है
तफ़्सीली रिपोर्ट पढ़कर अच्छा लगा
सीमा सिंह को बधाई