तीन कविताएँ / मनोज पाण्डेय


एक कवि जो बसंत को पेड़ों के सामूहिक संहार से विचलित होते देखना चाहता है। एक कवि जिसे धरती पर जीवन और जीवन में प्रेम को बचाए रखने के लिए सबके हिस्से की फ़िक्र है। एक कवि जो जानता है कि उसके जाने से होने वाली क्षति अपूरणीय नहीं होगी–उसका जाना असंख्य आम जनों की पूरणीय क्षति वाली मौतों की तरह ही होगा, जो दुनिया के दर्द के सबसे बड़े हिस्से को संभाल लेती हैं। नया पथ में इस बार मनोज पाण्डेय की कविताएँ।
क्या तुम बेहया हो बसंत?

 

जब तुम आते हो बसंत
खिल उठती है धरती,
पेड़ पौधे, नदियां
पहाड़, फूल, कलियां, रंग, आसमान
कवियों के शब्द, उन शब्दों के अर्थ,
और
प्रेमियों की मुस्कान

सबका खिल उठना ही
आना होता है बसंत का

जब तुम आते हो बसंत
खिल उठने के लिए
इंतजार करती है धरती
पेड़, पौधे, नदियां
पहाड़, फूल, कलियां, रंग, आसमान
कवियों के शब्द, उन शब्दों के अर्थ
और
प्रेमियों की मुस्कान

पहाड़ों, मैदानों, जंगलों का
बूढ़े से बूढ़ा ,जवान
यहां तक जिसके कल्ले फूटे
कल ही
हर एक पेड़
हर पेड़ की शाखाएं
उनकी जड़ें, उनके रेशे
उनके पत्ते और उनकी छाल
सब पहचान लेते हैं
तुम्हारी मनमोहक चाल
रिश्ता मजबूत है तुम्हारा
इन सबसे, बहुत मजबूत।
पहाड़ों, मैदानों, जंगलों का
हर एक पेड़
अपने पोर पोर में
तुम्हारा अपनापा भरता है।

अच्छा रिश्ता है, बसंत।

लेकिन
कैसा लगता है तुम्हें बसंत
जब नहीं मिलते हैं
सैकड़ों सालों से
छछाकर मिलने वाले
पहाड़ों, मैदानों, जंगलों
के पुराने नए पेड़
उनका हालचाल बताने वाला
कोई भी नहीं मिलता है
उनकी जगह छेक कर बिछी हुई
सड़कों, गेटेड कालोनियों और हीरे की खदानों में।

उस साल कहां जाकर
हुलसकर सबसे मिलते हो?
कैसा लगता है तुम्हें
पेड़ों के सामूहिक संहार की ख़बर जानकर
तुम्हारे वहां आने तक
वहां की मिट्टी में कितनी नमी बची रहती है ?

तुम्हारे दिल भी
कुछ लगता है धक से?

दूब होती है आसपास
तुम्हारे आंसुओं को अपनी कोरों पर संभाले हुए?

शायद नहीं

फिर कहां जाकर खिलते हो, बसंत ?

वैसे तो मैंने तुम्हें बेमौसम भी,
तुम्हारे अपनों के ही सामूहिक संहार की साज़िशों में शामिल
फ़ार्म हाउसों, निजी बागानों, शहरी नर्सरियों में
यहां तक कि गमलों में
तरह तरह से हाथ बांधे खिलते देखा है।

क्या तुम बेहया हो, बसंत?

000

 

पूरणीय क्षति वाली मौतें

 

इस अपूर संसार में
रोजाना होती हैं
पूरणीय क्षति वाली मौतें।

घर में, मकान में
खेत में, खलिहान में
बस-ट्रक की टक्कर में
सड़क पैदल पार में
निचाट बियाबान में

पूरणीय क्षति वाली मौतें
अक्सर
छेक लेती हैं स्टेशन पर प्लेटफार्म
कभी चूकती नहीं
ट्रेन के पायदान पर लटकने से

पूरणीय क्षति वाली मौतें
हिल मिल जाती है हर तरह की
जुलूसों में, भीड़ में
धार्मिक हो या कि साड़ी बंटने में
पूरणीय क्षति वाली मौतें
संख्या में बताईं जाती है, जैसे
दुर्घटना में बारह की मौत
भूख से हर साल मरते हैं बारह हजार
खदान में दब गए बारह लोग
इस तरह बारह महीनों में
रखे जाते हैं बहत्तर तरीके के आंकड़े।

पूरणीय क्षति वाली मौतों को
देश-काल परिस्थिति अनुसार
ओढ़ा दिया जाता है मुआवज़े का
काला कफ़न।

मेरे जैसे मास्टर, दिहाड़ी मज़दूर
बाबू, चपरासी, दर्ज़ी, पेंटर, घर की मेड
खेत में खटता किसान
उसका परिवार, नर्स, वार्ड ब्वाय
लाइनमैन, सीवर में उतरने वाले
नए लहजे में सैनेट्री स्टाफ
आदि आदि इत्यादि की
दुनिया में,
दर्द के सबसे बड़े हिस्से को
पूरणीय क्षति वाली मौतें
संभाल लेती है ।

पूरणीय क्षति वाली मौतें
नहीं ढोती पुण्यतिथि का बोझ

पत्थर फेंको पानी में
पानी में उठेंगी लहरें
उन लहरों के थिरने से पहले
पूरणीय क्षति वाली मौतों के बाद
थिर जाता है जीवन।

जीवन थिर जाने के बाद भी
नहीं ठहरतीं
पूरणीय क्षति वाली मौतें

मेरे कवि की होगी
पूरणीय क्षति वाली ही मौत

ऐसी या इतनी कविताएं नहीं लिखी है मैंने
कि मेरे मौत से कविता
अपूरणीय क्षति का शिकार हो जाए!

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देखिए क्या क्या बचा पाता हूं?

 

अपने हिस्से की धरती
अपने हिस्से का पानी
अपने हिस्से का आसमान
अपने हिस्से की हवा
अपने हिस्से की आग
अपने हिस्से के शब्द
अपने हिस्से का अर्थ
अपने हिस्से की रोटी
अपने हिस्से की दाल
अपने हिस्से का आंगन
अपने हिस्से की छत
अपने हिस्से की कविता
अपने हिस्से का प्रेम

अकेले नहीं बचा पाऊंगा कुछ भी
अपने हिस्से का सबकुछ बचेगा
साझे में
सबके हिस्से की धरती
सबके हिस्से का पानी
सबके हिस्से का आसमान
सबके हिस्से की हवा
सबके हिस्से की आग
सबके हिस्से के शब्द
सबके हिस्से का अर्थ
सबके हिस्से की रोटी
सबके हिस्से की दाल
सबके हिस्से का आंगन
सबके हिस्से की छत
सबके हिस्से की कविता
सबके हिस्से का प्रेम

सबके हिस्से में अपना हिस्सा
अपने हिस्से में सबका हिस्सा
इसके बाद ही बचेगा
धरती पर जीवन
और
जीवन में प्रेम
अब,
देखिए क्या क्या बचा पाता हूं?

संपर्क : 9868000221


1 thought on “तीन कविताएँ / मनोज पाण्डेय”

  1. मनोज जी की कविताएँ यथार्थ में प्रकति एवं मानवीय संबंधों में बड़ती असहजता की दस्तक बन हमारे दिल की साँकल खड़खड़ाती दिखती है
    अति सुन्दर अभिव्यक्ति,रचना,प्रस्तुति 👏🏻👏🏻👌💐💐

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