‘स्टालिनग्राद’ : इतिहास की विराटता के बीच मनुष्य की खोज / महेश मिश्र


‘दोस्तोएव्स्की मनुष्य की आत्मा के भीतर उतरते हैं। ग्रॉसमैन उसी आत्मा को इतिहास, राज्य, युद्ध और विचारधारा के दबाव के बीच देखते हैं। उनके लिए व्यक्ति इतिहास से छोटा नहीं है। कई बार व्यक्ति ही इतिहास की अमानवीयता के सामने अंतिम नैतिक प्रतिरोध होता है।’–वसीली ग्रॉसमैन के उपन्यास स्टालिनग्राद पर महेश मिश्र का लेख। लगभग साल भर पहले (8 अगस्त 2025) का ग्रॉसमैन के उपन्यास लाइफ एण्ड फेट के एक पत्र के मर्म को खोलता उनका लेख नया पथ के पाठकों को याद होगा।

कुछ पुस्तकें अपने कथानक के कारण याद रहती हैं, कुछ अपनी भाषा के कारण और कुछ इसलिए कि वे पढ़े जाने के बाद हमारी स्मृति में किसी विचार की तरह बनी रहती हैं। वासिली ग्रॉसमैन की स्टालिनग्राद ऐसी ही पुस्तक है। इसे समाप्त करने के बाद युद्ध की घटनाओं से अधिक उसके लोग याद रहते हैं। उनके घर, उनकी आशंकाएँ, उनके छोटे सुख, उनके अधूरे संबंध और सबसे बढ़कर वह सामान्य जीवन, जो इतिहास की बड़ी घटनाओं के बीच अचानक सबसे मूल्यवान चीज़ बन जाता है।

स्टालिनग्राद को केवल युद्ध का उपन्यास कहना इसे बहुत सीमित कर देना होगा। युद्ध इसमें सर्वत्र है। सेनाएँ आगे बढ़ रही हैं, शहर खाली हो रहे हैं, कारखाने जल रहे हैं, सैनिक मर रहे हैं और यूरोप के इतिहास की सबसे निर्णायक लड़ाइयों में से एक धीरे-धीरे आकार ले रही है। लेकिन ग्रॉसमैन की वास्तविक रुचि युद्ध की रणनीति में उतनी नहीं है, जितनी उस मनुष्य में है जो इस पूरी ऐतिहासिक मशीनरी के भीतर फँसा हुआ है।

इतिहास हमें बताता है कि कितनी सेनाएँ थीं, किस दिशा से हमला हुआ, कौन-सा मोर्चा कब टूटा और कितने लोग मारे गए। साहित्य एक दूसरा प्रश्न पूछता है। उन लाखों लोगों में से जो एक आदमी मरा, मरने से पहले उसने क्या सोचा होगा? ग्रॉसमैन मूलतः इसी एक आदमी के लेखक हैं।

उन्होंने युद्ध को दूर बैठकर नहीं लिखा था। वे सोवियत सेना के युद्ध संवाददाता के रूप में लंबे समय तक अग्रिम मोर्चे पर रहे और स्टालिनग्राद की लड़ाई को उन्होंने बहुत निकट से देखा। शायद इसी कारण उनके यहाँ युद्ध कभी केवल दृश्य नहीं बनता। हर बमबारी के पीछे किसी घर का विनाश है। हर सैनिक के पीछे कोई परिवार है। हर मृत्यु के पीछे एक ऐसा संसार है जो उस व्यक्ति के साथ समाप्त हो जाता है। और यहीं यह पुस्तक इतिहास से साहित्य में प्रवेश करती है।

ग्रॉसमैन आरंभिक हिस्सों में प्रकृति और सामान्य जीवन के कुछ अत्यंत सुंदर दृश्य लिखते हैं। एक जगह वे कहते हैं,

“The world’s beauty had surpassed itself.”
(दुनिया की सुंदरता मानो स्वयं अपनी सीमा पार कर गई थी।)
और उसी अनुभव के बीच एक अत्यंत सरल वाक्य आता है,

“Life is a blessing.”
(जीवन अपने आप में एक वरदान है।)

सामान्य परिस्थितियों में यह वाक्य कुछ अधिक साधारण भी लग सकता है। लेकिन स्टालिनग्राद के निकट, उस समय, जब थोड़ी ही देर बाद यही धरती, यही पेड़, यही घर और यही लोग आग और विस्फोटों में घिर जाने वाले हैं, इस वाक्य का अर्थ बदल जाता है। शायद ग्रॉसमैन की पूरी दृष्टि का आधार इसी में है। मनुष्य, जीवन का मूल्य तब अधिक तीव्रता से समझता है जब उसके नष्ट हो जाने की संभावना सामने खड़ी होती है।

हम सामान्य जीवन में उन चीजों को लगभग देखना बंद कर देते हैं जिनसे वास्तव में हमारा जीवन बना हुआ है। घर लौटना, किसी परिचित आवाज को सुनना, किसी पेड़ की छाया, शाम का भोजन, एक पत्र, परिवार की बातचीत, बच्चों का शोर। युद्ध अचानक इन साधारण चीजों को असाधारण बना देता है। इसी अर्थ में स्टालिनग्राद का एक गहरा विषय युद्ध नहीं, बल्कि सामान्य जीवन की अमूल्यता है।

ग्रॉसमैन कहीं दो छोटे सेब के पेड़ों के संदर्भ में लिखते हैं,

“If everyone had two little apple trees like this, there’d be no need for wars.”
(यदि हर व्यक्ति के पास ऐसे दो छोटे सेब के पेड़ होते, तो शायद युद्धों की आवश्यकता ही न पड़ती।)

यह पहली दृष्टि में लगभग भोली बात लग सकती है, लेकिन पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद इसका अर्थ कहीं अधिक गंभीर दिखाई देता है। जिस मनुष्य के पास देखभाल करने के लिए दो पेड़ हैं, एक घर है, किसी प्रिय व्यक्ति की प्रतीक्षा है, बच्चों का भविष्य है, उसके लिए संसार विजय किए जाने वाला नक्शा नहीं रह जाता। तानाशाहों को भूभाग चाहिए। विचारधाराओं को इतिहास चाहिए। साम्राज्यों को विस्तार चाहिए। मनुष्य को प्रायः केवल अपना छोटा सा जीवन चाहिए।

बीसवीं सदी की सबसे बड़ी त्रासदियों में एक यह भी थी कि बड़े विचारों ने छोटे मनुष्यों के जीवन को बहुत सस्ता बना दिया। राष्ट्र, क्रांति, नस्ल, इतिहास और भविष्य के नाम पर करोड़ों व्यक्तियों के वर्तमान को कुचल दिया गया। ग्रॉसमैन की दृष्टि धीरे धीरे इसी संकट के केंद्र तक पहुँचती है।

एक पात्र कहता है,

“There is one truth, not two.”
(सत्य एक होता है, दो नहीं।)

यह बहुत छोटा वाक्य है, लेकिन बीसवीं सदी की राजनीति के भीतर इसकी प्रतिध्वनि बहुत दूर तक जाती है। उस सदी में लगातार दो सत्यों के बीच संघर्ष था। एक वह जिसे व्यक्ति अपने अनुभव में देख रहा था और दूसरा वह जिसे सत्ता सत्य के रूप में प्रस्तुत कर रही थी। आदमी भूखा है, लेकिन आँकड़े समृद्धि की घोषणा कर रहे हैं। निर्दोष लोग गायब हो रहे हैं, लेकिन इतिहास की प्रगति का दावा किया जा रहा है। लाखों लोग मर रहे हैं, लेकिन किसी महान भविष्य की बात की जा रही है।

ग्रॉसमैन ने इस विभाजन को बहुत निकट से देखा था। स्टालिनग्राद में वे अभी उस अंतिम वैचारिक स्वतंत्रता तक नहीं पहुँचे हैं, जो बाद में लाइफ़ एंड फ़ेट में दिखाई देती है। इस पुस्तक में सोवियत राष्ट्रवाद और उस समय की वैचारिक भाषा के कुछ अंश हैं। कुछ पात्र आवश्यकता से अधिक आदर्श दिखाई देते हैं।

लेकिन यही बात स्टालिनग्राद को एक अतिरिक्त ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्त्व भी देती है। हम यहाँ केवल एक उपन्यास नहीं पढ़ रहे होते। हम एक लेखक की नैतिक चेतना को विकसित होते हुए भी देख रहे होते हैं। ग्रॉसमैन जहाँ विचारधारा की भाषा बोलते हैं, वहाँ पुस्तक अपने समय की लगती है। जहाँ वे मनुष्य को देखते हैं, वहाँ वह समय से बाहर चली जाती है। और यही महान लेखक की पहचान है। उसका अनुभव धीरे धीरे उसकी घोषित विचारधारा से बड़ा हो जाता है।

स्टालिनग्राद पढ़ते हुए टॉल्स्टॉय की वॉर एंड पीस बार-बार याद आती है। वे उसे लगातार अपने बैग में लिए घूम रहे हैं, उसे पढ़ रहे हैं। यह समानता केवल इसलिए नहीं है कि दोनों विशाल युद्धों की पृष्ठभूमि पर लिखी गई हैं। दोनों रचनाओं का वास्तविक विषय इतिहास और व्यक्ति का संबंध है। वॉर एंड पीस में नेपोलियन रूस में प्रवेश करता है। स्टालिनग्राद में हिटलर की सेना रूस के भीतर बहुत दूर तक पहुँच चुकी है। दोनों जगह इतिहास बड़े पैमाने पर चल रहा है, लेकिन साहित्य बार बार परिवार, प्रेम, भय, भोजन, बीमारी, जन्म और मृत्यु के छोटे संसारों की ओर लौटता है।

फिर भी ग्रॉसमैन टॉल्स्टॉय नहीं हैं। टॉल्स्टॉय कई बार इतिहास के किसी बड़े नियम तक पहुँचना चाहते हैं। ग्रॉसमैन की चिंता अधिक नैतिक है। वे मानो यह पूछ रहे हैं कि इतनी बड़ी ऐतिहासिक शक्तियों के सामने उस एक मनुष्य को कैसे बचाया जाए, जिसकी कोई विशेष ऐतिहासिक महत्ता नहीं है। यहाँ वे कई बार चेखव के अधिक निकट दिखाई देते हैं।

इसी बिंदु पर ग्रॉसमैन रूसी साहित्य के एक पुराने और गहरे नैतिक प्रश्न को फिर से छूते हैं। स्टालिनग्राद में एक पात्र के संदर्भ में यह वाक्य आता है,

“They just don’t know how to reconcile love of humanity and love for an actual person.”
(वे मानवता के प्रेम और किसी वास्तविक मनुष्य के प्रेम के बीच सामंजस्य नहीं बिठा पाते।)

इस वाक्य को ग्रॉसमैन की बिल्कुल स्वतंत्र खोज की तरह पढ़ना ठीक नहीं होगा। इसे पढ़ते ही दोस्तोएव्स्की के द ब्रदर्स करामाज़ोव की याद आती है। वहाँ एल्डर ज़ोसिमा एक डॉक्टर की बात सुनाते हैं,

“The more I love humanity in general, the less I love man in particular.”
(मैं मानवता से जितना अधिक सामान्य रूप में प्रेम करता हूँ, किसी एक मनुष्य से उतना ही कम प्रेम कर पाता हूँ।)

दोनों वाक्यों के बीच की निकटता केवल शब्दों की नहीं है। यह रूसी साहित्य के एक बड़े नैतिक प्रश्न की निरंतरता है। दोस्तोएव्स्की के यहाँ यह मनुष्य की आत्मा का विरोधाभास है। हम मानवता से प्रेम का दावा कर सकते हैं, लेकिन अपने पास बैठे वास्तविक, अपूर्ण और कभी कभी परेशान करने वाले मनुष्य को सहन नहीं कर पाते। ग्रॉसमैन इसी प्रश्न को बीसवीं सदी के राजनीतिक अनुभव के भीतर रखते हैं, जहाँ यह विरोधाभास कहीं अधिक भयावह रूप ले चुका था।

मानवता से प्रेम करना अपेक्षाकृत आसान है। किसी वर्ग, किसी राष्ट्र, किसी क्रांति या किसी आने वाले सुंदर भविष्य से प्रेम करना भी आसान हो सकता है। कठिनाई उस वास्तविक मनुष्य से शुरू होती है जो हमारे सामने खड़ा है, अपनी कमजोरियों, स्वार्थ, भय और अपूर्णताओं के साथ। बीसवीं सदी की कई व्यवस्थाओं ने मनुष्य के भविष्य के नाम पर वर्तमान में जीवित मनुष्यों को ही खर्च हो जाने योग्य मान लिया। इसीलिए ग्रॉसमैन के यहाँ दोस्तोएव्स्की का पुराना नैतिक प्रश्न राजनीतिक भी हो जाता है। किसी विचार की महानता उसके दावे से नहीं, इस बात से परखी जानी चाहिए कि वह किसी एक वास्तविक मनुष्य के साथ क्या करता है।

यही बात ग्रॉसमैन को दोस्तोएव्स्की की परंपरा से जोड़ती भी है और उनसे अलग भी करती है। दोस्तोएव्स्की मनुष्य की आत्मा के भीतर उतरते हैं। ग्रॉसमैन उसी आत्मा को इतिहास, राज्य, युद्ध और विचारधारा के दबाव के बीच देखते हैं। उनके लिए व्यक्ति इतिहास से छोटा नहीं है। कई बार व्यक्ति ही इतिहास की अमानवीयता के सामने अंतिम नैतिक प्रतिरोध होता है।

युद्ध के वर्णन में ग्रॉसमैन की एक और विशेषता है। उनके यहाँ मृत्यु बहुत कम बार किसी वीरतापूर्ण चरम दृश्य के रूप में आती है। वह अचानक आती है। कभी लगभग दुर्घटना की तरह। कभी इतनी साधारण कि पाठक उसके लिए तैयार नहीं होता। उनके यहाँ यह विचार बार बार उभरता है कि युद्ध व्यक्ति को संख्या में बदल देता है।

दस हजार सैनिक मारे गए। एक लाख लोग मारे गए। हम संख्या पढ़ते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन साहित्य उस संख्या में से एक व्यक्ति को निकालकर हमारे सामने खड़ा कर देता है। उसके पास एक माँ थी। किसी से उसका प्रेम था। उसने लौटकर कुछ करने का वादा किया था। कोई किताब अधूरी छोड़ दी थी। किसी बात का पश्चात्ताप था। तभी संख्या अचानक असहनीय हो जाती है। ग्रॉसमैन इसी अर्थ में युद्ध के महान लेखकों में से हैं। वे संख्या को फिर से मनुष्य में बदल देते हैं।

एक और छोटा वाक्य है,

“There is no fear worse than a new fear.”
(नए भय से बड़ा कोई भय नहीं होता।)

युद्ध की स्थिति में यह बात तुरंत समझ आती है, लेकिन इसका अर्थ युद्ध से बहुत बाहर तक जाता है। पुराने भय से मनुष्य किसी प्रकार परिचित हो जाता है। वह उसके साथ रहने की कोई पद्धति खोज लेता है। नया भय सबसे अधिक आतंकित करता है, क्योंकि अभी उसका आकार स्पष्ट नहीं हुआ होता। स्टालिनग्राद में भय लगातार अपना आकार बदलता है। युद्ध, मृत्यु, विस्थापन, परिवार का बिछोह और राजनीतिक असुरक्षा एक दूसरे में घुलते जाते हैं।

लेकिन भय के समानांतर करुणा भी चलती रहती है। कोई घायल आदमी को पानी देता है। कोई किसी अनजान व्यक्ति के लिए रुकता है। कोई किसी दूसरे का पत्र बचाकर रखता है। कोई किसी मरते हुए व्यक्ति को केवल एक और मृतक बनने से बचाता है। ग्रॉसमैन के लिए ये बहुत छोटी घटनाएँ नहीं हैं। सभ्यता संभवतः इन्हीं छोटी घटनाओं पर टिकी हुई है।

एक जगह वे लिखते हैं,

“Time is always the enemy of opportunists.”
(समय अवसरवादियों का हमेशा शत्रु होता है।)

समय झूठी महानता के साथ बहुत निर्दयी व्यवहार करता है। अपने समय में तानाशाह लगभग इतिहास से बड़े दिखाई देते हैं। उनकी तस्वीरें हर जगह होती हैं, उनके नाम से शहर और संस्थाएँ जुड़ती हैं, लाखों लोग उनकी इच्छा से प्रभावित होते हैं। लेकिन समय बीतने के साथ वे छोटे होते जाते हैं और वे साधारण लोग, जिन्हें उस समय महत्त्वहीन माना गया था, साहित्य में बड़े होते जाते हैं। यह साहित्य का अपना न्याय है। तानाशाह स्मारक बनवाते हैं। लेखक उनके वास्तविक आकार को बचाकर रखते हैं।

इसी कारण स्टालिनग्राद को केवल युद्ध पर लिखे गए महान उपन्यासों में रखना पर्याप्त नहीं है। इसे बीसवीं सदी की उन महान पुस्तकों के साथ पढ़ा जाना चाहिए जिनमें अपने समय की पूरी बेचैनी प्रवेश कर गई है। प्रूस्त की ‘इन सर्च ऑफ़ लॉस्ट टाइम’, थॉमस मान की ‘द मैजिक माउंटेन’, पास्तरनाक की ‘डॉक्टर ज़िवागो’, शोलोखोव की ‘एंड क्वायट फ्लोज़ द दोन’, और ग्रॉसमैन की ही ‘लाइफ़ एंड फ़ेट’ जैसी रचनाओं में एक प्रश्न बार बार लौटता है। उस समय व्यक्ति का क्या होगा, जब इतिहास बहुत बड़ा हो जाए। जब राज्य बहुत बड़ा हो जाए। जब विचारधारा बहुत बड़ी हो जाए। जब युद्ध इतना विशाल हो जाए कि व्यक्ति नगण्य दिखाई देने लगे।

ग्रॉसमैन का उत्तर बहुत स्पष्ट है। व्यक्ति कभी नगण्य नहीं होता। सरकारें उसे संख्या में बदल सकती हैं। सेनाएँ उसे एक इकाई मान सकती हैं। इतिहासकार उसे आँकड़े में लिख सकते हैं। लेकिन उसके भीतर स्मृतियों, प्रेम, भय, ईर्ष्या, दया, मूर्खता, आशा और अपूर्ण इच्छाओं का एक पूरा संसार होता है। वही संसार मनुष्य की वास्तविक गरिमा है।

और शायद यही कारण है कि ‘स्टालिनग्राद’ पढ़ लेने के बाद उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि हिटलर की सेना की पराजय भी नहीं लगती। स्टालिनग्राद की लड़ाई ने दूसरे विश्वयुद्ध की दिशा बदल दी। यह इतिहास का निर्विवाद तथ्य है। लेकिन ग्रॉसमैन हमें एक दूसरी विजय भी दिखाते हैं। इतनी हिंसा के बीच भी मनुष्य के भीतर दूसरे मनुष्य के लिए कुछ बचा रहा। किसी ने किसी अनजान को पानी दिया। किसी ने किसी घायल को उठाया। किसी ने किसी पेड़ को देखा। किसी ने प्रेम किया। किसी ने घर लौटने की आशा नहीं छोड़ी। और शायद मनुष्य की सभ्यता अंततः ऐसी ही साधारण चीजों के सहारे जीवित रहती है।

‘स्टालिनग्राद’ पूर्ण पुस्तक नहीं है। इसमें विस्तार है, कुछ दोहराव हैं और अपने समय की वैचारिक सीमाएँ भी हैं। कहीं कहीं सोवियत राजनीतिक भाषा पुस्तक के साहित्यिक प्रवाह पर भारी पड़ती है। लेकिन महानता और पूर्णता एक ही चीज नहीं हैं। महान पुस्तक शायद वह है जिसमें जीवन की मात्रा इतनी अधिक हो कि उसकी कमियाँ अंततः छोटी दिखाई देने लगें। ‘स्टालिनग्राद’ ऐसी ही पुस्तक है।
लगभग हजार पन्नों से गुजरने के बाद हमें स्टालिनग्राद की लड़ाई के बारे में अवश्य अधिक पता होता है। लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम मनुष्य के बारे में कुछ ऐसा महसूस करने लगते हैं, जिसे शायद पहले भी जानते थे। और अंत में फिर वही छोटा सा वाक्य लौटकर आता है,

“Life is a blessing.”
(जीवन एक वरदान है।)

इतने सैनिकों, इतनी मृत्यु, इतने ध्वस्त घरों और एक जलते हुए शहर के बीच यह वाक्य कुछ अधिक गहरा हो जाता है। जीवन शायद बहुत बड़ी चीजों से नहीं बना होता। एक घर। किसी की प्रतीक्षा। बारिश के बाद एक पेड़। दो छोटे सेब के पेड़। किसी प्रिय व्यक्ति का पत्र। और यह विश्वास कि अगली सुबह फिर आएगी।

इतिहास इन्हें बहुत आसानी से नष्ट कर देता है। महान साहित्य इन्हें फिर हमारे सामने रखता है और हमें याद दिलाता है कि वास्तविक जीवन इन्हीं में था।

और शायद इसी कारण ‘स्टालिनग्राद’ बीसवीं सदी की उन अद्भुत पुस्तकों में है, जिन्हें हम केवल पढ़ते नहीं हैं। वे हमारे भीतर कुछ समय तक जीवित रहती हैं।


1 thought on “‘स्टालिनग्राद’ : इतिहास की विराटता के बीच मनुष्य की खोज / महेश मिश्र”

  1. अंतर्दृष्टिपूर्ण मीमांसा। स्तालिनग्राद की अपूर्णता उसके यादगार बन जाने में सहायक है।

    महेश जी की यह विवेचना देखिए-
    “मानवता से प्रेम करना अपेक्षाकृत आसान है। किसी वर्ग, किसी राष्ट्र, किसी क्रांति या किसी आने वाले सुंदर भविष्य से प्रेम करना भी आसान हो सकता है। कठिनाई उस वास्तविक मनुष्य से शुरू होती है जो हमारे सामने खड़ा है, अपनी कमजोरियों, स्वार्थ, भय और अपूर्णताओं के साथ।”

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