एक शहर, एक क़स्बा : 70 के दशक की कुछ यादें / संजीव कुमार


चार-पाँच साल पहले एक मित्र ने योजना बनायी कि कुछ लोगों के दस वर्ष की उम्र तक के संस्मरणों की एक किताब तैयार की जाए। यह संस्मरण उसी योजना के तहत लिखा गया था। किताब अभी आयी नहीं है। तब तक नया पथ  के पथिकों की राय जानने का लोभ संवरण करना मुश्किल था! वैसे इसे लिखे हुए तक़रीबन तीन साल चुके हैं। इसीलिए एक जगह संस्मरणकार ने अपने को 55 साल का प्रौढ़ बताया है जो कि आज के लिए तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है, पर संस्मरण में उल्लिखित गूगल सर्च की तारीख़ को ध्यान में रखते हुए सही है। उसे बदलना अनुचित होता। –सं. कु.

 

अगर आप गूगल में बिहारी साव लेन, पटना सर्च करें तो बारी पथ के लंगर टोली चौराहे से अशोक राजपथ को जोड़ती एक पतली-सी गली दिखेगी।

जन्म लेने के बाद से 22 साल पटना में गुज़ारने के बावजूद मैं नहीं जानता था कि इसी गली का नाम बिहारी साव लेन है। वह मेरे लिए एक बेनाम गली थी जिससे अक्सर तो नहीं, पर साल-छह महीने में एक बार गुज़रना ज़रूर होता था।

इस तरह से अगर मैंने दस-बारह दफ़ा भी उस गली को पैदल पार किया हो तो क्या यह संभव है कि उसके नाम से कभी साबका न पड़ा हो? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि 55 साल का एक प्रौढ़ दिल्लीवासी बिहारी साव लेन को गूगल करता है और उसे पता चलता है कि ये तो उसी गली का नाम है जिससे वह दसियों या शायद बीसियों दफ़ा गुजर चुका है? वह उस गली से भी परिचित है, और इस नाम से भी। परिचित नहीं है तो बस इस तथ्य से कि यह नाम उसी गली का है।

क्या ऐसा इसलिए है कि यह नाम उसके ज़ेहन में स्मृतिहीनता के पर्याय के रूप में बसा हुआ है? उसने माँ से पता नहीं कितनी बार बिहारी साव लेन वाले घर में अंजाम दिए गए अपने कारनामों के बारे में सुना है। ज़्यादातर का संबंध उस रसोईघर से है जहाँ गोयठे और कोयले वाले चूल्हे के आसपास सारी चीज़ें ज़मीन पर ही रखी होती थीं। वह अपने डगमगाते क़दमों से ऐन उस वक़्त रसोईघर में घुसता जब वहाँ कोई नहीं होता था, और जो भी बर्तन हाथ में आ जाए, उसे पहली मंज़िल से नीचे गली में फेंककर उस अलौकिक झनझनाहट का आनंद लेता। आनंद का सबूत यह है कि बर्तन को नीचे फेंकते ही वह प्रसन्न भाव से किलकारी मारता, ‘झन्न!!’

पर यह एक बड़ा रहस्य है कि ताज़ा बनी हुई सब्ज़ी की कड़ाही का ढक्कन हटाकर उसमें पेशाब करने में उसे क्या आनंद मिलता था। माँ की सूचना के अनुसार, यह भी उसके प्रिय कारनामों मे से एक था। ऐसी सूचनाएँ मिलने पर उसने उन क्षणों को याद करने की बारहा कोशिश की है और, ज़ाहिर है, असफल रहा है।

जब चलना सीख लेने के बाद के इन कारनामों को याद करना मुमकिन नहीं, तो उससे पहले के सबसे बड़े कारनामे को तो भला क्या ही याद किया जा सकता है! वह कारनामा था, जीवित रह जाना। बिहारी साव लेन के इसी घर में उसका जन्म हुआ था। सर्दियों के दिन थे और मकान एकदम नया। कमरे की दीवारों पर ताज़ा पलस्तर चढ़ाई गई थी जिसे मज़बूती देने के लिए रात-दिन भिंगोकर रखा जाता था। नतीजा, कमरा बर्फ़खाना बना रहता। माँ को भरोसा नहीं था कि नवंबर के तीसरे हफ़्ते में जन्मी उनकी यह संतान अगले साल का बसंत देख पाएगी। पर मौत से आँख-मिचौनी खेलते हुए उसने सर्दियाँ काट लीं और अपने जीवन में पहला बसंत ले ही आया — हालाँकि हजारी प्रसाद द्विवेदी के इस अमर वाक्य से उसका सामना 16-17 साल बाद होना था कि ‘बसंत आता नहीं, लाया जाता है।’

पता नहीं, यह गर्भ की सुरक्षा से बाहर आते ही जानलेवा ठंड का सामना करने का नतीजा था या कुछ और, मेरी यादों के खाते में शुरुआती पन्नों के अनेक इंदराज तपते बुखार से जुड़े हैं।

पहले इंदराज में सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखी है। पैर की तरफ़ से चारपाई ऊपर को उठती जा रही है और मैंने बहुत मुश्किल से अपने को सिर के बल गिरने से रोक रखा है। अकथ बेचैनी है। तीन-चार लोग सिरहाने बैठे हैं जिन्हें मैं बार-बार बता रहा हूँ कि मैं सिर की तरफ़ से फिसलकर गिरने वाला हूँ… कोई मदद नहीं मिलती। मैं थककर चूर हूँ, गिरने से खुद को बचाए रखने की इस मुसलसल कोशिश में।

बीच-बीच में नींद आती है तो बिल्कुल स्लो मोशन में बड़े-बड़े तपते हुए पत्थरों पर चलने लगता हूँ। कानों में लगातार माँ और पिता के बहस करने की आवाज़ें आ रही हैं, वैसे ही स्लो मोशन में। मानो हमारे एचएमवी फीएस्टा पॉपुलर पर 78 आरपीएम का रिकार्ड साढ़े 33 आरपीएम पर चला दिया गया हो। बहस में गुस्सा है, पर गुस्से में तेज़ी नहीं है — गुस्से में गुस्सा कम, हताशा ज़्यादा सुनाई पड़ती है।

लगता है, मैं हमेशा से इन्हीं पत्थरों पर चलता आ रहा हूँ, और अनंत काल तक चलता रहूँगा। लगता है, मैं अनवरत यही बहस सुनता आ रहा हूँ, और अनंत काल तक सुनता रहूँगा।

दूसरा इंदराज। कमरे में बल्ब की पीली रोशनी है और चाचा सिरहाने बैठे हैं। घर में और कोई नहीं है। अचानक, पता नहीं कहाँ से, बित्ते भर से भी कम लंबाई के दो तलवारबाज़ ठीक मेरी छाती पर आ खड़े हुए हैं। पूरी ग्रीक साज-सज्जा में। उनके हाथों में वह सीधी वाली तलवार है जिसे हम क्रीज़ कहते हैं। मेरी छाती उनका रणक्षेत्र बनी हुई है। चित्त लेटे-लेटे ही मैं चाचा को बताता हूँ कि देखो, ये दोनों लड़ रहे हैं। वे पूछते हैं, ‘कौन?’ उन्हें दिखाऊँ, इससे पहले वे दोनों लड़ाके उछलकर नीचे फ़र्श पर पहुँच जाते हैं। मैं उतरकर दिखाता हूँ, ‘देखो’। पर मेरे इशारे से पहले ही वे तलवार के पैंतरे दिखाते कोने में पड़ी मेज़ के नीचे पहुँच जाते हैं। मैं घुटनों के बल ही मेज़ तक पहुँचता हूँ। पीछे-पीछे चाचा भी। वे कहते हैं, ‘कुछ नहीं है।’ मेज़ के नीचे घुसते हुए मैं अपनी बात पर क़ायम हूँ कि ‘है।’

पर इस बार भी वे देखें इससे पहले दोनों योद्धा ग़ायब हो जाते हैं।

शायद लिलीपुट से आए थे, वहीं लौट गए।

और चाचा? वे मुझे वापस बिस्तर पर डालकर टेलीफोन की ओर दौड़ पड़े हैं। (उनकी उम्र बमुश्किल 18 रही होगी। वे मैट्रिक यानी ग्यारहवीं पास कर पटना आए थे और कॉलेज में उनका दाख़िला हुआ था।)

तीसरे इंदराज में मैंने रज़ाई ओढ़ रखी है। पसीना चलने का इंतज़ार कर रहा हूँ। बुखार उतारने का यही तरीक़ा है। कालपोल की गोली खाओ और पूरा बदन ढँककर रखो। पसीना चलने पर तो और भी सावधानी बरतनी है। बदन कहीं से उघड़ना नहीं चाहिए। पसीना चलने से बुखार उतरता है और उस पसीने पर हवा लग जाए तो दुगुने वेग से चढ़ता है।

बाबा (दादा जी) आए हुए हैं। वे पूछते हैं, ‘गोपाल जी, घाम लगता है?’ वे मुझे गोपाल जी बुलाते हैं और मेरे बड़े भाई को कन्हैया जी।

‘घाम मने?’ मैं पूछता हूँ।

बाबा हँस पड़ते हैं, ‘घाम मने नहीं जानते हैं? गर्मी। रौदा में जाने पर घाम लगता है ना!’

‘रौदा मने?’

फिर से उनकी हँसी फूटती है। ‘रौदा भी नहीं जानते हैं?’

पास से देखो तो उनकी आँखें गीली-सी दिखती हैं। हल्की पनियल। इससे हँसी में एक आर्द्रता आ गई है। शुष्क नहीं, नम हास्य। (यह चेहरा मेरी स्मृति में अज्ञान पर उमड़ने वाले प्यार का स्थायी बिम्ब है।)

‘रौदा मने धुप्पा।’ बाबा बताते हैं।

धुप्पा मने धूप, इतना तो मैं जानता हूँ।

घाम लगना शुरू हुआ है। एक गीली परत पूरी देह पर चुहचुहा आई है। बुखार उतरने वाला है।

 

पर ये यादें बिहारी साव लेन वाले घर की नहीं हैं। वहाँ तो यादों का खाता खुला ही नहीं था। खाता खुला उस मुहल्ले में जहाँ मैंने तीन साल की उम्र से लगभग बीस की उम्र तक का सफ़र तय किया, बीच के डेढ़-दो सालों के व्यवधान को छोड़कर। यह पटना का राजेंद्र नगर मोहल्ला था जिसकी 1/बी नंबर की गली में हम किरायेदार थे। यह एक मध्यवर्गीय-उच्चमध्यवर्गीय रिहायशी इलाक़ा था/है। यहाँ खासे बड़े मकान थे/हैं। ऐसे ही एक मकान के तीन कमरे, दो बारामदे, एक आँगन और छोटी-सी लॉन वाले हिस्से में हम रहते थे। अगल-बगल भी उससे मिलते-जुलते स्थापत्य वाले  मकान थे जिनमें अपने दोस्तों के पास जाने के लिए हमने शायद ही कभी ‘मेन गेट’ का इस्तेमाल किया हो। बीच की चारदीवारी को फाँदकर बायीं और दाहिनी तरफ़ के घरों में जाने का चलन था, कम-से-कम हम बच्चों के बीच। वालदेन की मुलाक़ात ठिगनी-सी चारदीवारी के आर-पार हो जाती थी। उन्हें जब साथ बैठना हो, तभी ‘मेन गेट’ से जाने की ज़रूरत पड़ती।

मेरा पहला स्कूल इसी राजेंद्र नगर की सड़क संख्या 4 पर था, कोई पंद्रह मिनट पैदल चलने के फ़ासले पर, जिसे हम ‘बहुत दूर’ मानते थे। शुरुआती स्मृतियों में से एक इसी स्कूल से संबंधित है, वह भी उस दौर की जब मेरा दाख़िला नहीं हुआ था। बड़ी बहन और बड़ा भाई, जो मुझसे क्रमशः साढ़े पाँच साल और ढाई साल बड़े थे, उसी स्कूल में जाते थे। माँ बताती हैं कि मैं अक्सर उनके साथ स्कूल जाने की ज़िद किया करता। ऐसा ही कोई दिन रहा होगा जब ज़िद करके मैं बड़ी बहन और भाई के साथ उनके स्कूल चला गया होऊँगा। स्मृति में बस इतना है कि स्कूल के बाहर की सड़क पर मैं बहन और भाई के साथ खड़ा हूँ। दो और लोग हैं—एक, पिता के वह सहयोगी जिनके हिस्से हमें स्कूल तक ले जाने और वापस लाने की ज़िम्मेदारी है, और दूसरे, मेरे पिता के कोई परिचित जो हम बहन-भाइयों को स्कूल से निकलता देखकर रुक गए हैं। वे मुझसे पूछते हैं, ‘क्या नाम है?’ मैं बताता हूँ, ‘संजू।’ वे पूछते हैं, ‘पूरा नाम बताइये!’ मैं कहता हूँ, ‘आभा राजू संजू।’ (आभा मेरी बहन का और राजू भाई का नाम है।) वे हँसने लगते हैं। ‘बेईज़्ज़ती करा दी’ वाले अंदाज़ में झेंपती हुई बहन बताती है, ‘संजीव कुमार।’ मैं भी आज्ञाकारी भाव से दुहराता हूँ, ‘संजीव कुमार’, हालाँकि अंदर कहीं मैं असहमत हूँ; यह ‘पूरा नाम’ नहीं, ‘स्कूल का नाम’ है। ‘संजू’ घर का नाम, ‘संजीव कुमार’ स्कूल का नाम।

स्कूल के प्रति यह आकर्षण दाख़िले से पहले ही था। दाख़िले के बाद तो मुझे याद नहीं आता कि कभी मैंने स्कूल जाना पसंद किया हो। अक्सर जाने के ऐन वक़्त पर मेरे पेट में दर्द उठता और समय निकल जाने के बाद ठीक हो जाता। होम-वर्क, मास्टर की बेंत, इम्तेहान और नापास होने का डर—कुल मिलाकर स्कूल मेरे लिए दहशत का दूसरा नाम था। पटना के स्कूल की तो नहीं, पर मोकामा (पटना से 90 किलोमीटर दूर का एक क़स्बा), जहाँ माँ की नई-नई नौकरी की वजह से 70 के दशक के पूर्वार्द्ध में कोई डेढ़-दो साल रहना पड़ा था, के आनंदमार्ग स्कूल में डर के मारे पेशाब कर देने की एक घटना बहुत स्पष्ट रूप से याद है। तब शायद मैं दूसरी कक्षा में था। हमारे शिक्षक मोटी गर्दन वाले एक पहलवाननुमा शख्स थे। बीच क्लास में उनके लिए स्कूल का चपरासी लोटा-भर दूध लाता था जिसे वे वहीं एक साँस में पी जाते थे। उनके ऐसे कृत्य से कौन प्रभावित न होता! लिहाज़ा, उनकी अकूत शक्ति को लेकर हमें कोई संदेह नहीं था। उसी महाबली ने एक दिन पूरी क्लास को गाय पर निबंध लिखने को कहा। मैंने अपने निबंध में यह सब बताने के बाद, कि गाय एक चौपाया प्राणी है और वह हमारी माता है और हमें दूध देती है, यह भी लिख दिया कि वह कभी-कभी हमें सींग भी मारती है, इसलिए उससे बचकर रहना चाहिए। निबंध पढ़कर महाबली ने मुझे अपनी मेज के पास बुलाया और डपटकर पूछा कि ये क्या लिखा है? गाय कहीं मारती है? उसका पूछना था कि मैंने अपनी हाफ-पैन्ट के भीतर से जांघों पर चलकर नीचे आती गुनगुनी धार को महसूस किया। धार का लाभ यह हुआ कि मैं गोभक्त की सींग के हमले से बच गया, नहीं तो बीच कक्षा में लोटा-भर दूध पीनेवाले महाबली की भावनाएँ आहत करने का दुष्परिणाम कुछ भी हो सकता था।

उस दिन यह शिक्षा मिली कि कुछ भी लिखना हो, लोगों की भावनाओं का ख़याल करके लिखें। आख़िर स्कूल शिक्षा देने के लिए ही तो होते हैं!

बहरहाल, स्कूल की दहशत का ही नतीजा था कि चौथी-पाँचवीं कक्षा तक मैं खासा भोंदू विद्यार्थी बना रहा। ये भी हो सकता है कि मामला उल्टा हो और मेरा भोंदूपन दहशत का नतीजा नहीं, उसका कारण हो। जो भी हो, मेरा भोंदू होना—जिसे शायद सभ्य भाषा में ‘स्कूली शिक्षा की अपेक्षाओं पर खरा न उतरना’ कह सकते हैं—एक तथ्य था, जिसके अनेक उदाहरण मुझे याद हैं। उनमें से एक विशेष रूप से उल्लेखनीय है। चौथे दरजे की विज्ञान की परीक्षा में एक सवाल आया, ‘प्रमाणित करें कि हवा दबाव डालती है।’ मेरी बगल में बैठे हुए विद्यार्थी ने सवाल पढ़ते हुए खुशी से कहा, ‘अरे, लड़ गया। इसमें तो कुछ नहीं है। पानी से ऊपर तक भरा हुआ एक गिलास लीजिए। एक साइड से एक पोस्टकार्ड को खिसकाते-खिसकाते गिलास को ढँक दीजिए। फिर गिलास को उलटिए। पानी नहीं गिरेगा। हो गया प्रूव!’ मैंने उसकी बात सुनी और सोचा, क्या बकबक कर रहा है बेवकूफ! मैंने बस एक वाक्य लिखा: ‘मैं प्रमाणित करता हूँ कि हवा दबाव डालती है।’ और नीचे अपना दस्तखत चेंप दिया जिसकी उन्हीं दिनों प्रैक्टिस की थी।

इस घटना में आप विज्ञान की जगह साहित्य की ओर मेरा रुझान होने के आरंभिक संकेत भी पढ़ सकते हैं।

पर उस ज़माने में लोग इतने समझदार न थे। उनकी प्रतिक्रियाओं (हालाँकि वे प्यार-दुलार से लबरेज़ होती थीं) और बातचीत ने मुझे अहसास करा दिया था कि मैं बौड़म हूँ और मेरा भविष्य उज्ज्वल नहीं है। आठ-नौ साल का ही रहा होऊँगा जब माँ की एक सखी के साथ मोकामा से पटना आते हुए मैंने यह चिंता साझा की थी कि ‘राजू भैया तो बहुत तेज है न! वो बड़ा आदमी बनेगा। पर मेरा क्या होगा? मेरे लिए शायद मम्मी-पापा कोई दुकान-उकान खोल देंगे!’ दुखद है कि उन्होंने अकेले में कही गयी इस बात की गोपनीयता का सम्मान नहीं किया और माँ समेत पूरे सखी-समुदाय के सामने भेद खोलकर मेरी निजी आस्तित्विक चिंता को सार्वजनिक हास्य का विषय बना दिया!

बड़े भाई का पढ़ाई में असाधारण होना मेरे लिए एक और ही मुसीबत थी। 12 साल की उम्र में वह वज़ीफ़ा पाकर पटना से बारह सौ किलोमीटर दूर बिड़ला पब्लिक स्कूल, पिलानी (राजस्थान) में पढ़ने चला गया। उससे पहले दो बार ऐसा हुआ था कि साल भर की पढ़ाई छह महीने में पूरी कर लेने के कारण उसे छमाही इम्तहान के बाद ही अगली क्लास में प्रोन्नत कर दिया गया। 11-12 साल का ही रहा होगा जब पिता के एक मित्र के कहने पर उसने कुररतुल एन हैदर की ‘आग का दरिया’ पढ़कर उस पर एक पेज की टिप्पणी लिख मारी थी। ऐसे पढ़ाकू का छोटा भाई होना एक मुसीबत तो है ही! उसके सीखने की बुलेट ट्रेन स्पीड के आगे मेरी खटारा गाड़ी तुलनात्मक अध्ययन के विशेषज्ञों को कुछ ज़्यादा ही खटारा जान पड़ती थी।

आश्चर्यजनक रूप से मेरे 9-10 साल के वय तक की स्मृतियों में भाई हर जगह मौजूद है। वह किसी घर की चारदीवारी पर चढ़कर पेड़ से अमरूद चुरा रहा है, मैं चारदीवारी के बाहर खड़ा घर के दरवाज़े पर नज़र गड़ाए हुए हूँ; वह किसी से उलझा हुआ है, मैं किनारे खड़ा उस उलझाव के सुलझने का इंतज़ार कर रहा हूँ; वह पिता की डाँट खा रहा है, मैं उसे डाँट खाता देख रहा हूँ; वह दिनकर चौराहे पर (तब पटना के उस चौराहे का यह नाम नहीं पड़ा था, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जीवित थे) पत्रिकाओं के एक स्टॉल से चिपका घंटों से कॉमिक्स और पत्रिकाओं में डूबा हुआ है, मैं झख मारता उसके उबरने का इंतज़ार कर रहा हूँ। इनसे पहले की एक बेहद धुँधली-सी स्मृति है जो शायद मेरी स्मृतियों में सबसे शुरुआती है। एक छोटी-सी घायल चिड़िया को हमारे घर के बारामदे से कोई चील या कौवा पंजे में दबाकर ले उड़ा है और भाई ऊपर ताकता, रोता-चिल्लाता, गली में उसके समानांतर दौड़ता जा रहा है। जहाँ वह हमलावर किसी डाल पर या ऊँची दीवार पर बैठता है, वहाँ भाई भी नीचे खड़ा हो जाता है अपना रोना-चिल्लाना जारी रखते हुए। मैं भी पीछे-पीछे हूँ, पर मेरी उस चील या कौवे से कोई लड़ाई नहीं है। मैं तो बस भाई के पीछे दौड़ रहा हूँ। मोहल्ले के लोग इस अनोखे विरोध-प्रदर्शन को देखकर हँस रहे हैं।

ये यादें पटना की हैं, पर मोकामा की यादों में भी भाई हर जगह है।

मोकामा, जैसा कि मैं बता चुका हूँ, पटना से 90 किलोमीटर दूर एक क़स्बा है जहाँ 1972-73 में मेरी माँ को एक बलिका विद्यालय में नौकरी मिली थी। पटना की रिहाइश को तो बने ही रहना था क्योंकि पिता वहाँ एक प्रकाशन में नौकरी करते थे, पर बच्चों को पिता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता था। लिहाज़ा हम तीनों भाई-बहन माँ के साथ मोकामा चले गए। माँ वहाँ लगभग चार साल रहीं। ये उनके बहुत कठिन संघर्ष के साल थे। तीन बच्चों के साथ एक नयी जगह पर रहते हुए छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए जूझते रहने के कारण उनमें लगभग स्थायी रूप से एक उदासी घर कर गयी थी। वे हँसती-बोलती कम हों, ऐसा नहीं था, पर मैं अनचेते यह महसूस कर सकता था—उनके शरीर का ही विस्तार होने के कारण—कि वे अन्दर से खुश नहीं हैं। वे सारे गाने जो वे मुझे गोद में लेकर सुनातीं, बेहद उदास गाने लगते थे, जबकि बहुत बाद में उन्हें याद करते हुए मैंने पाया कि वे उल्लास या आह्लाद के गीत थे। मेरे लिए अर्थ शब्दों में नहीं, स्वर में था। और वही अर्थ फिर सामान्य रूप से भी उन शब्दों के लिए निर्णायक हो जाता। जैसे ‘चन्दा है तू, मेरा सूरज है तू / ओ मेरी आँखों का तारा है तू’ गाने के बारे में मैं लम्बे समय तक यही समझता रहा कि यह जिस भी फिल्म का है, उसके किसी त्रासद प्रसंग में गाया गया होगा। किसी कॉमिक बुक में मैंने देखा कि एक बिल्ली एक चूहे को अँकवार में लेकर यह गाना गा रही है। इसके बाद वह मुझसे कॉमिक्स की तरह पढ़ी ही नहीं गयी। मैं उसे एक दुःख भरी भावनात्मक कहानी की तरह समझने की कोशिश करता रहा जो कि वह नहीं थी।

शायद माँ की उदासी एक वजह थी कि मोकामा मुझे बिल्कुल नापसंद था। वजहें इसके अलावा भी थीं। वह पटना और हमारे गाँव मेहदा साहपुर, जहाँ हमारा जाना बहुत कम होता था, दोनों की अलहदा-अलहदा सभी ख़ूबियों से वंचित था। उसमें न शहर जैसी तरतीब थी, न गाँव जैसा स्वर्गिक खुलापन। उसकी गलियाँ गंदी, सँकरी और बदबूदार थीं जिनसे गुज़रते हुए अक्सर पाखाने की बदबू नथुनों में भर जाती थी। यह बदबू उन खुली ‘पिट’ वाली लैट्रीनों से निकलती थी जो ज़्यादातर घरों में पाई जाती थीं और जिनके ‘पिट’ का छोटा-सा दरवाज़ा गली में खुलता था, हाथ से मैले की सफ़ाई (‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’) करनेवालों के लिए। खैरियत है कि ऐसा सभी घरों के साथ नहीं था और हम लोग जिस घर में रहते थे, उसका पाखानाघर सामूहिक भले ही हो, कम-से-कम तसले में मैला ढोने वाला  नहीं था। बेशक, उसकी अपनी दिक़्क़तें थीं। मसलन यह कि दो पाखानाघरों में से किसी का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं होता था और उनमें घुसने से पहले खटखटाने का रिवाज़ था। अगर आपकी ठक-ठक का जवाब अंदर की ठक-ठक से मिला तो मतलब, कोई अंदर है। ग़रज़ कि अगर आप अंदर हैं और शौच करते हुए किसी गंभीर सोच में डूबे होने के कारण ठक-ठक का जवाब ठक-ठक से नहीं दे पाए, तो आपकी इज़्ज़त का फालूदा निकलना तय था। इसके साथ ही, एक आँगन के गिर्द बने हुए पाँचेक कमरों में रहनेवाले पंद्रह-बीस जनों के लिए वे दो ही पाखानाघर थे। हम बच्चों का क्या था, दबाव बढ़ने पर कहीं भी निपट लिए, पर बड़ों के लिए सुबह-सुबह प्रकृति की पुकार को सुना-अनसुना करते रहना कितना मारक होता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है।

मोकामा की कुख्याति वहाँ के बाशिंदों के उजड्डपन और लंठई को लेकर भी थी जो मेरी नापसंदगी का एक और सबब था। वहाँ सड़क पर अकेले निकलते हुए मैं डरता था। यह सिर्फ़ मेरे कानों तक पहुँची हुई उसकी कुख्याति की वजह से नहीं था। एक बार घर के पास की ही एक गली में एक घुड़सवार ने चाकू दिखाकर जेब में पड़ा दस पैसे का सिक्का मुझसे छीन लिया था। तब ये दस पैसे आज के पाँच रुपये के बराबर रहे होंगे। पाँच पैसे में पाचक की ख़ासी बड़ी पुड़िया आ जाती थी। जहाँ जेब में पड़ा दस पैसा भी लूट लिया जाए, और वह भी एक चाकूबाज़ घुड़सवार के द्वारा, ऐसी जगह को कौन पसंद कर सकता था!

पर मेरी आत्मा को थोड़ी शांति उस दिन मिली जिस दिन भाई ने उस घुड़सवार को मज़ा चखाया। हुआ यों कि मैं और भाई उसी गली से गुजर रहे थे जब दुबारा वह घुड़सवार मुझे दिखा। उस दिन किसी वजह से हमारे पास पैसे थोड़े ज़्यादा थे। मैंने भाई को दिखाया कि वही है जिसने मेरे दस पैसे छीने थे और खैरियत इसी में है कि हम रास्ता बदल लें। रास्ता बदलने पर तो भाई राज़ी हो गया, पर उससे पहले उसने अपनी जेब से दो रुपये का एक नोट निकाला और दो उंगलियों के बीच पकड़कर हवा में लहराते हुए उसने घुड़सवार को ललकारा। उसे चिढ़ाते और उसकी खिल्ली उड़ाते हम उलटी दिशा में भाग चले और उसकी नज़रों से ओझल हो गए।

भाई के ऐसे दुस्साहसी कारनामे मेरे बचपन की स्मृतियों में सबसे अधिक जगह घेरते हैं। शायद ये कारनामे ही थे जिन्होंने मुझे बचपन में सबसे अधिक भयभीत भी किया था और अंततः प्रभावित भी।

वह साल 1974 रहा होगा जब मेरा और भाई का दाख़िला वापस पटना के स्कूल में करा दिया गया। माँ और बहन मोकामा में ही थीं, पर राजेंद्र नगर, पटना वाले घर में पिता के साथ हमारे चाचा (पिता के सबसे छोटे भाई) भी रहने लगे थे जिनका उन्हीं दिनों पटना के एक कॉलेज में दाख़िला हुआ था, इसलिए हम पिता की तमाम व्यस्तताओं के बावजूद चाचा के अभिभावकत्व में वहाँ रह सकते थे। चचाजान का नाम जयप्रकाश है। देश में सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान देनेवाले जयप्रकाश नारायण का नाम उन दिनों फ़िजाँ में गूँज रहा था। वे जेपी कहलाते थे और मेरे चाचा भी जेपी। कुछ समय तक तो मैं ख़ासा दिग्भ्रमित रहा कि चाचा का नाम यूँ हर जगह क्यों सुनने को मिलता है! पर धीरे-धीरे बात समझ में आई, जो कि आनी ही थी, क्योंकि वह समय ऐसा था कि बच्चे तक उस राजनीतिक उथल-पुथल से नावाक़िफ़ नहीं रह सकते थे। हमसे भी छोटी उम्र के बच्चे, जिनकी अवस्था मछली-जल-की-रानी-है-जैसे राइम्स रटने की थी, ‘देवकान्त बरुआ, इंदू जी के भड़ुआ (भड़वा)’ दुहराया करते थे। मैंने अपने घर के पास के एक सिनेमा हॉल के बारे में संस्मरण लिखते हुए उस हलचल भरे दौर को लेकर कई अनुभव साझा किए हैं जिन्हें यहाँ दुहराऊँगा नहीं, पर इस बात का उल्लेख करना ज़रूरी है कि जयप्रकाश नारायण की रिहाइश हमारे घर के बहुत पास थी। जगत नारायण रोड पर स्थित महिला चरखा समिति का भवन, जहाँ जेपी रहते थे, उसकी कोई दस-बारह फीट ऊँची पिछली दीवार हमारी गली से जुड़ती थी। इस तरह हमारा मोहल्ला भौगोलिक दृष्टि से सम्पूर्ण क्रांति के अधिकेन्द्र/एपीसेंटर में शामिल था। जेपी के ही हमनाम मेरे चचाजान को छोड़कर पूरे मोहल्ले के अच्छे-बुरे, नेकनीयत-बदनीयत, हर तरह के युवक उस कथित क्रांति में लगे हुए थे। तमाम लफंगों ने भी अपने को क्रांतिकारियों में शुमार करा लिया था और प्रतिक्रिया में भद्र समाज का एक बड़ा हिस्सा तमाम क्रांतिकारियों को लफंगों में शुमार करने लगा था। अक्सर शहर के किसी हिस्से में पुलिस और आंदोलनकारियों की मुठभेड़ या आंदोलनकारियों द्वारा की गई आगजनी के क़िस्से सुनने को मिलते थे। ऐसे कारणों से जब भी स्कूल बंद होता, हम तहेदिल से आंदोलनकारियों के शुक्रगुज़ार होते थे।

इन हलचलों के बीच ही 1975 के शुरुआती महीनों में भाई पिलानी चला गया और मैं पटना में अकेला रह गया। शायद माँ-पिता ने तय कर रखा हो कि अगले मौक़े पर मुझे मोकामा में दुबारा दाख़िला दिला देंगे, माँ के पास, पर उससे पहले पटना में भीषण बाढ़ आई जिसे देखना शायद मेरी क़िस्मत में लिखा था।

बाढ़ आ सकती है, बाढ़ आने वाली है, ये चर्चाएं सुनकर मैं उस दृश्य की कल्पना करता था जब शोर और तोड़-फोड़ मचाता पानी हमारे मुहल्ले में दाख़िल होगा। मुझे बहुत निराशा हुई जब कदमकुआँ की ओर से पानी बहुत आहिस्ते, मानो चहलक़दमी करते हुए, राजेंद्र नगर रोड नंबर एक में आया और वहाँ से हमारी गली में। पचासेक लोग उसके आगे-आगे उसकी आगवानी करते-से चल रहे थे। इसी गति से वह धीरे-धीरे हमारे घरों में भरने लगा। मेरा घर भूतल पर था, इसलिए जल्दी-जल्दी सारे ज़रूरी सामान उठाकर हम पहली मंज़िल पर शरणार्थी बने। हाँ, देर शाम को मेरी कल्पना थोड़ी-बहुत साकार हुई। जयप्रकाश नारायण की रिहाइश वाले भवन ‘महिला चरखा समिति’ की दीवार ने ढेर सारे पाने को रोक रखा था। दबाव बढ़ने पर वह दीवार एक तेज़ आवाज़ के साथ टूटी और हरहराता हुआ एक रेला हमारी गली में घुसकर हमारे घरों के जलस्तर को अचानक कुछ फीट ऊपर कर गया। इस घटना ने बाढ़ को लेकर मेरी निराशा को किसी हद तक कम कर दिया और मुझे लगा कि हम एक बड़ी घटना के साक्षी हैं।

शायद हफ़्ते भर पानी रहा होगा। पानी के उतरने के बाद मैं पिता के साथ मोकामा के लिए निकला। मुझे उस दिन का अपना शहर अच्छी तरह याद है। पूरे शहर पर मिट्टी की एक गीली परत बिछी थी जिसे पुनपुन नदी का पानी लौटते हुए अपनी निशानी के तौर पर छोड़ गया था। हर जगह ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव किया गया था जिसकी तीखी गंध सड़ती हुई घास की बदबू के साथ मिलकर वातावरण में बस गई थी। गाँधी मैदान के पास से गुज़रते हुए यह बू और तीखी लगी। वह सुंदर और विराट मैदान, जिसकी कारीने से कटी घास पर बैठे मम्मी-पापा मूंगफली तोड़ते थे और हम बच्चे पकड़म-पकड़ाई का खेल खेलते थे, उस दिन इतना विवर्ण और लुटा-पिटा-सा दिख रहा था कि मैं सदमे में आ गया। मुझे अहसास हुआ कि बाढ़ बहुत बुरी चीज़ है। यह पटना को मोकामा बना सकती है।

थोड़ी देर बाद मैं मोकामा की ट्रेन में था। इस बार मुझे बिना भाई के वहाँ रहना था। तब मैं नहीं जानता था कि कुछ ही महीनों बाद माँ को पटना के एक स्कूल में नियुक्ति मिल जाएगी और साल 1976 से हम वापस यहाँ रहने लगेंगे।

[email protected]

 


6 thoughts on “एक शहर, एक क़स्बा : 70 के दशक की कुछ यादें / संजीव कुमार”

  1. बचपन की स्मृतियों का खज़ाना अनमोल है। आपने बहुत रोचक ढंग से बयां किया है।

    Reply
  2. मजा आ गया। लगा जैसे इसमें कहीं कहीं मेरी समृतियों की भी झलक है। खासकर, स्कूल वाले प्रसंग में। अगले पोस्ट का इंतजार है।

    Reply
  3. बहुत ही रचनात्मक भाषा और शैली में बहुत ही रोचक ढंग से लिखा संस्मरण। लेकिन यह सिलसिला चलते रहना चाहिए। आपके परिवार के शेष चारों सदस्यों के प्रति और जानने की उत्सुकता बढ़ गई है।

    Reply
  4. यह रचना स्मृतियों का ऐसा सुंदर सफर है जो पढ़ते हुए इंसान अपने ही बचपन, अपने शहर और पुराने दौर में लौट जाता है। लेखक ने बिहारी साव लेन जैसी एक अनाम सी छोटी गली से कहानी शुरू की है, जिससे वह जीवन भर कई बार गुजरा, पर उसका नाम कभी ज़ेहन में नहीं बैठा — यह बात हर शहरी,कस्बाई व्यक्ति से जुड़ी हुई लगती है, जो रोज़ ऐसे रास्तों से गुजरता है पर उनके नाम और इतिहास से अनजान रहता है।

    बुखार के दौर की अव्यक्त यादें, स्लो मोशन में चलते तपते पत्थर, छाती पर उतरे लिलिपुट तलवारबाज़, बाबा के साथ बोली जाने वाली ग्रामीण बोली की मधुर बातें — ये सब ऐसी सूक्ष्म स्मृतियाँ हैं जो आम लेखन में बहुत कम देखने को मिलती हैं। लेखक ने बचपन की उन अस्पष्ट, अकथ बेचैनियों को भी शब्द दिए हैं जिन्हें हम सब महसूस तो करते हैं, पर लिख नहीं पाते।

    स्कूल का डर, शिक्षकों का रौब, निबंध लिखने का मजेदार किस्सा, अपने नाम को लेकर बचपन की भोली समझ — ये प्रसंग बेहद यथार्थ और मनोरंजक हैं। बड़े भाई की पढ़ाई में ताकत और अपनी खटारा रफ्तार का तुलनात्मक दर्द, बचपन की असुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंता को लेखक ने बिना किसी बनावट के बयान किया है।

    पटना का राजेंद्र नगर, मोकामा का नीरस और बदबूदार माहौल, वहाँ की संकीर्ण गलियाँ, लूटपाट का डर, माँ की अंदरूनी उदासी और संघर्ष के दिन — सबका चित्रण इतना सजीव है कि मानो हम भी उसी दौर में घूम रहे हों। 70 के दशक की जेपी आंदोलन की राजनीतिक हलचल, मोहल्ले का माहौल, स्कूल बंद होने पर बच्चों की खुशी और बाढ़ का भीषण मंजर — ऐतिहासिक और सामाजिक परिवेश को भी स्मृतियों के साथ बखूबी जोड़ा गया है।

    बाढ़ के बाद पटना का वीरान, मिट्टी से भरा मंजर, गाँधी मैदान का लुटा-पिटा दिखना पढ़कर दिल पर असर पड़ता है। लेखक की यह बात बिल्कुल सच है कि बाढ़ किसी भी शहर को गाँव-कस्बे जैसा बना सकती है, उसकी शान और संवार को एक पल में छीन सकती है।

    यह सिर्फ आत्मकथात्मक संस्मरण नहीं, बल्कि 70 के दशक के बिहार, पटना-मोकामा के सामाजिक जीवन, मध्यम वर्ग के संघर्ष, परिवार के रिश्ते और बचपन की कोमल स्मृतियों का अनमोल दस्तावेज़ है। भाषा सरल, बोलचाल की है पर गहराई बहुत ज्यादा है। हर पंक्ति में सच्चाई है, भावना है और पाठक को अपनी यादों से जोड़ने की शक्ति है। ऐसी साहित्यिक रचनाएँ दिल को छूती हैं और लंबे समय तक ज़ेहन में बनी रहती हैं। बहुत ही सुंदर, मर्मस्पर्शी लेखन .

    Reply

Leave a Comment