‘उमैरा अहमद के लेखन में सामाजिक जटिलताओं में, नैतिक दुविधाओं में फँसी वे तमाम स्त्रियाँ हैं जो चुपचाप हर दिन अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती हैं। घर और परिवार व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए वे ख़ुद को खपाती हैं, अपने आप को अदृश्य-अनुपस्थित बनाए रखती हैं और उनके त्याग को सराहने वाला कोई नहीं होता। मध्यवर्गीय नैतिकता के दायरे में जीवन जीते चले आ रहे हमारे दक्षिण एशियाई समाजों का यह सबसे बड़ा यथार्थ है।’–उमैरा अहमद के कथा-साहित्य और उन पर आधारित पाकिस्तानी धारावाहिकों पर अदिति भारद्वाज का सुचिन्तित आलेख।
दक्षिण एशिया के समाजों की संरचना कुछ ऐसी है कि स्त्रियों के अनुभवों, संवेदनाओं और यातनाओं में एक गहरा साम्य दिखलायी पड़ता है। इसीलिए इस समान अनुभव-संसार या एक मिश्रित सामाजिकता की अभिव्यक्ति यहाँ के तमाम कला माध्यमों, चाहे वह कथा-कहानियाँ हों या सिनेमा और रंगमंच, इन सबमें प्रमुखता से होती है। डिजिटल वैश्वीकरण के इस युग में कलाओं की आवाजाही अपेक्षाकृत अधिक सरल हुई है और यह एक बड़ा कारण बना है कि कलाओं और अनुभवों के जिस साम्य की बात अभी हम कर रहे थे, उसकी दृश्यता बहुत बढ़ गयी है। हमें अपने समाज के साथ ही अन्य समाजों की झलकियाँ भी उसके कला माध्यमों के हवाले से मिल जाती है। इसी सिलिसिले में हाल ही में पाकिस्तानी लेखिका उमैरा अहमद द्वारा लिखित ड्रामा सीरीयल कफ़ील हमें हमारे दक्षिण एशियाई समाजों के सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ को समझ पाने का एक बड़ा फ़्रेम देता है जो राजनीतिक-भौगोलिक ध्रुवीकरण के बावजूद सतह पर ही नहीं, कहीं बहुत गहरे भी हमें मथता है।

उमैरा अहमद
उमैरा अहमद समकालीन पाकिस्तानी साहित्य का चर्चित नाम हैं। उन्होंने बीस से अधिक उपन्यास और नाटक लिखे हैं जिनमें से कई रचनाएँ पाकिस्तानी धारावाहिकों में रूपांतरित हुई हैं। पाकिस्तानी मनोरंजन जगत के कुछ बेहद चर्चित धारावाहिक जो अपने सामाजिक कथ्य के लिए आज भी जाने जाते हैं, उमैरा अहमद की ही कलम से लिखे गए हैं। अपने रचनात्मक अवदान के लिए उन्हें कई साहित्यिक पुरस्कारों से नवाज़ा गया है। स्त्रियों के जीवन को पाकिस्तानी समाज की पारंपरिकता, धर्म और संस्कृति के बर-अक्स रखकर उमैरा आधुनिकता और परंपरिकता के दबावों में खुद की तलाश करती स्त्रियों को कथा के केंद्र में रखती हैं। साल 2009 में आयी मेरी ज़ात-ज़र्रा-ए-बेनिशां में उन्होंने एक मध्यवर्गीय पारिवारिक सींखचों में जकड़ी स्त्री के शोषण को जब दिखलाया था, तो वह चित्रण दक्षिण एशिया के पितृसत्तात्मक परिवेश के कोई नया चित्रण नहीं था। साहित्य को अपनी ज़मीन समाज की वास्तविकताएँ ही देती हैं और पितृसत्ता द्वारा निर्धारित खाँचों में स्त्री की एक नियंत्रित-परिभाषित ज़िंदगी हमारे समाजों की सबसे समस्यापूर्ण वास्तविकता है। उस धारावाहिक में सूत्रधार, सबा, जो अपने पूरे ख़ानदान में एक अधिक प्रगतिशील और शिक्षित लड़की थी, के जीवन को त्रासद बनाने में उसके सगे-संबंधियों द्वारा किए गए शोषण का हाथ अधिक था। हालाँकि वहाँ वह चुपचाप अपने जीवन के साथ समझौता करके धैर्य के साथ जीवन गुज़ार देती है। पर इस साधारण से लगने वाले कथ्य में भी एक बात जो उमैरा रखांकित करती हैं, वह है– स्त्रियों का जीवट, उनकी जिजीविषा और संघर्ष-क्षमता। एक ऐसी आंतरिक शक्ति जो लाख गिराए जाने पर भी वापस धूल झाड़ कर उठ खड़ी होती है और यह वस्तुतः स्त्रियों के संसार की एक सार्वभौमिक वास्तविकता है। “प्रतिदिन अनुभूत की जाने वाली वास्तविकता” के अंकन में ही हम स्त्रियों के जीवट की शिनाख़्त कर सकते हैं।

मेरी ज़ात ज़र्रा-ए-बेनिशां
पर उमैरा के स्त्री पात्र भी समय के साथ बदले हैं। मेरी ज़ात… से शुरू हुआ वह सफ़र कफ़ील (2026) तक पहुँचते हुए एक लेखिका के तौर पर खुद उनके भी विचारों के सफ़र को पूरा करता है और स्त्री-जीवन के चित्रण में भी बहुआयामिता और बारीकियों को लाता है। है वहाँ भी वह सामाजिक बंधनों में जकड़ी हुई स्त्री ही, पर जीवन को लेकर वह अब समझौता करना नहीं स्वीकार करती और अपनी परिस्थितियों में गहरे धँसे होने के बावज़ूद वह जीवन का नियंत्रण ख़ुद अपने हाथों में लेती है। मेरी ज़ात… और कफ़ील इस अर्थ में समान हैं कि चूँकि कहानी में उमैरा, कालक्रम को वर्तमान से थोड़ा पीछे ले कर जाती हैं तो स्त्रियों के पास सामाजिक दायरों में बंधे रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। वह अपेक्षाकृत पुराने सालों की सामाजिकता का चित्रण कर रही होती हैं जहां आधुनिकता और प्रगतिशीलता जैसी शब्दावलियाँ कम प्रचलित हैं।‘एजेंसी’ वहाँ अभी भी स्त्रियों के संदर्भ में ज़रूरी समझी जाने वाली चीज़ नहीं है। मेरी ज़ात… में सबा अंग्रेजी में बी.ए. होने और पूरे ख़ानदान में सबसे अधिक प्रगतिशील और ज़हीन होने के बावजूद सामाजिक नैतिकता के दायरों में ही अपने जीवन को घुटता हुआ देखती रह जाती है। कफ़ील में ज़ेबा जो पढ़ी-लिखी है, उसके लिए भी जल्दी-से-जल्दी विवाह करवा दिए जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। इस अर्थ में देखा जाए तो उमैरा प्रायः उस मध्यवर्ग को कथा के केंद्र में रखती हैं जहां बेटी को शिक्षित तो किया जाता है, पर उसे सशक्त करने, उसके जीवन के निर्णयों में उसकी मर्ज़ी जानने पर बल नहीं दिया जाता। शादी और जल्द-से-जल्द उन्हें ‘अपने’ घर का कर देने में ही पूरे परिवार और समाज का ज़ोर रहता है। कफ़ील में ज़ेबा आगे पढ़ना चाहती है, पर वह नियति का फेर कहा जाए या उसके समय का दोष कि आगे पढ़ने देने के बजाय उसे जल्दी ब्याह दिया जाता है। हालाँकि उमैरा अहमद अपने ही एक अन्य धारावाहिक ज़िंदगी गुलज़ार है (2012) में कसफ़ मुर्तज़ा के रूप में एक ऐसा चरित्र गढ़ती हैं, जो जीवन और हालात से समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। सबा हो या ज़ेबा, जीवन के प्रति किया जाने वाला उनका विरोध मौन है, पर ज़िंदगी गुलज़ार है में कसफ़ का किरदार जीवन के सामने घुटने टेकना नहीं जानता। वह किसी भी प्रकार के यथास्थितिवाद के प्रति एकदम ही असहज है। सामाजिक बंधनों और विशेषकर पुरुषों के विशेषाधिकार को लेकर बेहद क्रिटिकल कसफ़ का, सामाजिक जीवन की असमानता के प्रति विद्रोह मुखर है। और इस अर्थ में उमैरा स्त्रियों की वे तमाम छवियाँ अपनी कहानियों में उभारती हैं जो बेहद साधारण और विश्वसनीय हैं।

ज़िंदगी गुलज़ार है
पर कमोबेश अपनी सभी कहानियों में उमैरा जिस एक विचार से सबसे अधिक जूझती हैं, वह है- विवाह। उनका रचना संसार स्त्रियों के जीवन के इस एक अहम निर्णय के ग़लत हो जाने की स्थिति को माइक्रोस्कोपिक सधेपन के साथ उभारता है। उमैरा दिखलाती हैं कि कैसे एक ग़लत व्यक्ति से हुई शादी प्रायः स्त्री के जीवन का नक़्शा बदल कर रख देती है और यह दक्षिण एशिया के पारंपरिक समाजों की सबसे बड़ी वास्तविकता है। और उनका यह लेखकीय विज़न इसीलिए भी अधिक प्रामाणिक लगता है कि कफ़ील या मेरी ज़ात…, दोनों ही में चूँकि वह मध्यवर्गीय संवेदनशीलता को केंद्र में रखती हैं तो उस शादी से यूँ रातों रात निकल जाना उनकी कथा-नायिकाओं के लिए पहला विकल्प नहीं होता है। इसीलिए कफ़ील की ज़ेबा हो या मेरी ज़ात… की सबा, दोनों ही अपनी त्रासद शादियों में पड़ी रहती हैं। कफ़ील चूँकि अधिक समकालीन लेखन है, यहाँ लेखिका ज़ेबा को शादी के बीस-पच्चीस साल बाद भी कम-से-कम अपने जीवन की बागडोर अपने हाथों में लेता दिखलाती हैं।
संस्थाओं के निर्माण की सामाजिक ज़रूरत ही पितृसत्ता को ध्यान में रखते हुए महसूस की गयी है। इसीलिए इन संस्थाओं के नीति-निर्धारण से स्त्रियाँ अमूमन बहिष्कृत रही हैं। दक्षिण एशियाई समाजों में विवाह संस्था को स्त्रियों के अस्तित्व का ही एक अहम बिंदु बना दिए जाने के कारण इस संस्था पर भी बहुत दबाव पड़े हैं। लड़कियों के भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए विवाह को मानो कोई सुरक्षित गारंटी समझा जाता है। पर चूँकि यहाँ पर नियंत्रण की बागडोर एक अन्य इंसान के हाथों में भी होती है, तो उसके ज़रा भी आशा से विपरीत निकल जाने की दशा में वह सुरक्षा का आश्वासन टूट जाता है। उमैरा इसीलिए इस संस्था के अनिश्चित स्वरूप को अपने लेखन में एक्सप्लोर करती हैं। मेरी ज़ात… में सबा की पहली शादी, जो उसकी अपनी पसंद से हुई थी, उसके ससुराल पक्ष के लोगों ने उस पर इल्ज़ाम लगा कर तुड़वा दी और उसके शौहर से ज़बरन उसे तलाक़ दिलवा दिया गया। इसके प्रतिक्रिया स्वरूप अपने से दूने उमर के जिस शख़्स से उसकी दूसरी शादी करवा दी गयी, वह उसके लिए परिवार द्वारा मुक़र्रर की गयी सज़ा अधिक थी, जो उसके प्रति अन्याय था। वहाँ वह ताउम्र घुटते और घुलते हुए उस सज़ा को झेल जाती है।
पर कफ़ील में उमैरा ज़ेबा की शादी के द्वारा दूसरे मुद्दे उठाती हैं। वहाँ उसकी यूँ फ़ौरन हुई शादी के पीछे कारण ही यह था कि एक रिवायती परिवार में जब बेटी किसी लड़के को पसंद करे और रूमाल पर उसके लिखे पत्र के साथ सोती हुई दिखे तो माँ-बाप ग़ुस्से से अधिक डर की वजह से उसकी शादी अपनी मर्ज़ी के इंसान से कर देते हैं। और यहीं ज़ेबा के जीवन का त्रासद अध्याय शुरू होता है। जिस लड़के, ज़ामी का इंतिख़ाब उसके लिए किया गया है, वह भले ही एक ख़ानदानी परिवार का लड़का हो, पर वह खुद कुछ नहीं करता है और निहायत ही सतही और अय्याश क़िस्म का इंसान साबित होता है। उसके बड़े भाई-बहन जो विदेशों में अच्छी नौकरियाँ करते हैं, बूढ़े बाप की ज़िम्मेदारी उसके हवाले कर उसे खर्चे के लिए रुपए-पैसे भेजते रहते हैं। पुश्तैनी पुराना कारोबार सम्भालने की क़ाबिलियत ज़ामी में नहीं है, इसीलिए दिन-ब-दिन पुराने धंधे बिकते चले जाते हैं और वह, जो मुफ़्त की रोटियाँ तोड़ने का आदी है, बस इस फ़िराक़ में रहता है कि किसी भी तरह वह लोगों को ठग कर पैसे ऐंठ सके। ज़ेबा की शादी जिस जल्दी में निबटायी जाती है, उसमें लड़के की इतनी छानबीन और पूछ-ताछ नहीं की जाती है और इसका परिणाम यह होता है कि परिवार की माली हालत और ज़ामी के निठल्लेपन की भनक शादी होने के बाद लगती है। पर बात सिर्फ़ एक बेरोज़गार शौहर की होती तो भी कोई मसला नहीं था, कारण कि पुराना ख़ानदान है और रही-सही संपत्तियों से खाने-पीने के लाले नहीं थे। और जैसा कि ज़ेबा की दादी कहती है कि पहले ज़माने में लड़का क्या करता है यह नहीं देखा जाता था बल्कि ख़ानदान खाता-पीता ढूँढा जाता था, जिसमें लड़कियों का जीवन मज़े से कट जाता था। इस विचार पर तो सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों का असर है, जिस पर लम्बी बहस हो सकती है। पर उमैरा ज़ामी के चरित्र को भी थोड़ा कमज़ोर दिखलाती हैं। शादी के कुछ दिनों बाद ही ज़ेबा को पता चलता है कि पड़ोस की लड़की आसमाँ से दस सालों से उसका प्रेम प्रसंग रहा है और उन दोनों की शादी इसीलिए नहीं हो पायी कि ज़ामी के ग़ैर-ज़िम्मेदार और बेरोज़गार होने की सूरत में आसमाँ के पिता उस रिश्ते के पक्ष में नहीं थे। इस प्रकार उमैरा एक बेइंतिहाई ख़राब रिश्ते की सभी सामग्रियाँ जुटाती हैं। और इन सबमें सोने पर सुहागा स्वयं ज़ामी का झूठा होना और एक पुरुष के तौर पर एंटाइटल्ड होने की असंवेदनशीलता है। अपने इरादों और ग़लतियों को जिस चालाकी से वह ज़ेबा के मत्थे मढ़ कर अपने परिवार की नज़रों में अच्छा बना रहना चाहता है, दिखलाता है कि एक इंसान के तौर पर ही वह अच्छा नहीं है। और इस तरह ज़ेबा जैसी पढ़ी-लिखी, हर दृष्टि से बेहतरीन लड़की के जीवन को बर्बाद करने में एक ग़लत शख्स से हुई शादी की कितनी अहम भूमिका होती है, उमैरा इस पर ध्यान केंद्रित करती हैं।
पर कफ़ील में ज़ामी जैसे पुरुष पात्र का चित्रण कोई असामान्य बात नहीं है। शादियाँ, जिनकी पूरी कमान ही दक्षिण एशिया के पुरातनपंथी-धर्मभीरु समाज में नियति/क़िस्मत के हाथों सौंप दी जाती है, वहाँ पर शादी में ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न हो जाना कोई ताज्जुब की बात नहीं है। हालाँकि लड़की के परिवार वाले अगर थोड़ी अक़्लमंदी और धैर्य से काम लें तो बहुत सम्भव है कि इस प्रकार के हादसों से न केवल लड़की बल्कि पूरे परिवार को बचाया जा सकता है। पर क़िस्मत को हद से अधिक तवज्जोह देने की आदत ही कभी-कभी तर्क को, सावधानियों को एकदम ही ताक़ पर रख देती है। ज़ामी का चुनाव करते समय माँ-बाप द्वारा की गयी जल्दी या उनकी असावधानियों के बदले ज़ेबा की क़िस्मत पर दोष मढ़ना हमारे पारम्परिक समाजों के लिए एक बेहद आम बात है। कफ़ील में एक पंक्ति है जो कुछ पात्र बार-बार दुहराते हैं, वह भी इसी बात की पुष्टि करता है कि कैसे तक़दीर एक बंद मुट्ठी की तरह है और उसके खुलने पर क्या निकले कुछ पता नहीं होता है। तक़दीर या क़िस्मत या नियति, इन सब पर इंसानी फ़ैसलों का पूरा दारोमदार दे डालना कितना मुनासिब है, इस पर तो तर्क-वितर्क हो ही सकते हैं, पर अगर कफ़ील की बात करें तो यहाँ ज़ेबा के जीवन में आने वाले दुखों का पूरा श्रेय सिर्फ़ उसके तक़दीर पर नहीं मढ़ा जा सकता है। और इसके वाजिब कारण हैं।
ज़ेबा के प्रगतिशील और बेहद प्यार करने वाले पिता की भूमिका निर्णायक है। उमैरा जिस कालखंड और जिस सामाजिक संदर्भ में ज़ेबा की कहानी कहती हैं, वहाँ उसके जैसे प्रगतिशील पिता की उपस्थिति अच्छी तक़दीर नहीं तो और क्या है! पर बेटी के लाख हितैषी होने के बावजूद वे उसके जीवन की दिशा नहीं बदल पाते। एक रूमाल पर किसी लड़के द्वारा लिखे गए कुछ प्रेम भरे जुमलों को जिस तरह ज़ेबा अपने हृदय से लगा कर सोयी थी और जिसे देखकर ही माँ ने पिता पर जल्द-से-जल्द ज़ेबा की शादी के लिए दबाव डाल दिया, ऐसे में पिता की अपनी सूझ-बूझ कहीं काम करती नहीं दिखलायी पड़ती। बिना ज़ेबा से कोई पड़ताल किए, उस एक रूमाल की बिनाह पर ज़ेबा की आनन-फ़ानन में यूँ शादी कर देना, पहला ग़लत निर्णय था जिसमें वस्तुतः तक़दीर की कोई भूमिका नहीं थी। पर पिता शादी के बाद ज़ामी के ख़राब हालात और बदतर रवैयों के बारे में जब जानते हैं तो वह ऐसे दौर या ऐसे पारम्परिक परिवार में भी, जहां कभी किसी को तलाक़ नहीं हुई, ज़ेबा को ज़ामी से तलाक़ ले लेने की गुहार लगाते हैं। पर ज़ेबा जिसकी अपनी कंडीशनिंग ऐसी है कि तलाक़ को ख़राब या लड़की के ही किरदार पर एक प्रश्न की तरह देखती है, इसके लिए खुद को शुरुआत में राज़ी नहीं कर पाती है।
ज़ामी की तमाम कमियों और उसकी ज़्यादतियों को देख पाने के बाद भी वह उसे मौक़ा देना चाहती है और हर बार पिता उसे उसके ग़लत निर्णय के लिए आगाह करते हैं। पिता की प्रगतिशीलता वहाँ भी है जब ज़ेबा को वे तब भी, जब वह मां बनने वाली थी, ज़ामी से अलग हो जाने के लिए कहते हैं। वे समाज और ख़ानदान के तानों और हिकारतों के सामने अपनी औलाद की बेहतरी और ख़ुशी को ज़रूरी मानते हैं, पर दादी और माँ और स्वयं ज़ेबा भी इसके लिए राज़ी नहीं हो पाते। यहाँ पर यह कहा जा सकता है कि यह भारत-पकिस्तान या पूरे दक्षिण एशियाई समाजों की ही विडम्बना है कि व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पारिवारिक-सामाजिक नैतिकताओं के सामने घुटने टेकने पड़ते हैं। व्यक्ति बनाम समाज का द्वंद्व समय के पड़ावों को पार करने में अभी भी इन समाजों में अक्षम है। और यहाँ जब व्यक्ति कोई ‘स्त्री’ हो तो उसके ऊपर नैतिक मानदंडों को यूँ भी अधिक थोपा जाता है। स्वयं ज़ेबा तलाक़ की बात पर अपनी माँ से यह कहती है कि कोई भी यह नहीं कहेगा कि लड़की ने अपने शौहर को छोड़ दिया, बल्कि यह कि लड़की को उसके शौहर ने छोड़ दिया जिसके कारण सीधे सीधे उसके बद-किरदार होने से जुड़ सकते हैं। किरदार या चरित्र- यह एक और आयाम है जिसे उमैरा बार-बार अपनी कहानियों में उठाती हैं। स्त्रियों के किरदार या उनके चरित्र को कलंकित कर देना सबसे आसान होता है। एक हल्की-सी अफ़वाह और प्रेम का दावा करने वाला पुरुष भी उसे पूरे परिवार और समाज की तरह कटघरे में खड़ा कर देता है। मेरी ज़ात में सबा से प्रेम कर के शादी करने वाले आरफ़ीन ने भी लाख प्रेम होने के बावजूद अंततः अपनी माँ की ही बात का यक़ीन किया जिसने क़ुरान-ए-पाक़ पर हाथ रख कर सबा के बदकिरदार होने की झूठी क़सम उठायी थी। भले ही बाद में उसे अपनी इस बे-ऐतबारी का मलाल होता है और वह अपनी ग़लती ठीक भी करना चाहता है, पर सबा को पुरुष के प्रेम से ही भरोसा उठ जाता है। प्रेम का दावा करने वाले शौहर ने उसके चरित्र पर यक़ीन नहीं किया तो उसे इंसानी प्रेम की सीमा का अहसास हुआ। उसका यह कथन उसके इसी मोहभंग का प्रमाण है कि “आज तुम्हें मुझ पर यक़ीन आ गया तो तुम मुझे अपनाना चाहते हो, कल तुम्हें फिर मुझ पर ऐतबार नहीं रहा तो फिर से तुम मुझे छोड़ दोगे। इसीलिए मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकती। मैं रहूँगी उसी ख़ुदा के साथ जिसने मुझे तब नहीं छोड़ा जब सारी दुनिया ने मेरा साथ छोड़ दिया था”।
इसीलिए देखा जाए तो स्त्री और पुरुष के लिए दुहरे मानदंड वस्तुतः पूरे तीसरी दुनिया के ही समाजों की अपनी विशिष्टता हैं। कफ़ील में इसीलिए क़दम-क़दम पर लगता है कि अगर उमैरा ज़ेबा को अपनी उस त्रासद शादी से निकल जाने का विकल्प पहले ही दे देती तो कहानी कैसा रुख़ लेती या ज़ेबा की ज़िंदगी क्या राह पकड़ती। पर सम्भवतः यही उमैरा अहमद के अपने विशिष्ट मार्के की कहानी कला है, जहाँ वह तलाक़ जो कमोबेश आसान विकल्प है, उसका चयन ना करते हुए, अपने सूत्रधार का उस शोषणपरक (अब्यूसिव) रिश्ते में रहना दिखलाती हैं। और यह चित्रण वस्तुतः एक विश्वसनीय चित्रण है क्योंकि तलाक़ का विकल्प विशेषकर एक निम्न या निम्न-मध्य वर्गीय परिवार में पारम्परिक समाजों की स्त्रियों के पास इतनी सुलभता से उपलब्ध नहीं होता। कभी परिवार या ख़ानदान की प्रतिष्ठा के नाम पर तो कभी आर्थिक सुरक्षा के नाम पर स्त्रियों के लिए एक यंत्रणादायी विवाह से निकल जाना प्रायः बेहद मुश्किल होता है। इसीलिए उमैरा की कहानी की यह विशेषता कही जा सकती है कि वह उन स्त्रियों को ले कर आती हैं जिनके लिए एक ग़लत शादी में रह जाना सामाजिक-व्यक्तिगत नियति बन जाती है। यहाँ प्रायः ऐसी स्त्रियाँ हैं जो एक अनचाहे रिश्ते में रहकर मानसिक-शारीरिक दुःख उठाते हुए भी रहना स्वीकार करती हैं।
यह चित्रण कितना भी समस्यामूलक क्यों न हो, अविश्वसनीय बिलकुल नहीं है। यह करोड़ों स्त्रियों के जीवन की हर दिन झेली जाने वाली ज़िंदगी है। हालाँकि कफ़ील में उमैरा अपने पिछले चित्रणों से आगे बढ़ती हैं। ज़ेबा शादी के बाइस-तैईस साल बाद ज़ामी से खुला लेने (अलग हो जाने) का निर्णय लेती है और ज़ामी की ज़्यादतियों से तंग आकर घर छोड़ देती है। चार बच्चे होने के बाद और उन बच्चों के ख़ुद अपने पैर पर खड़े होने के बाद ही उसमें इतना साहस आ पाता है कि ज़ामी को छोड़ सके तो केवल इसीलिए कि ज़ामी इतने बड़े बच्चों के होते हुए भी ज़ेबा को जान से मारने की धमकी देता है। एक शौहर के नाते ज़ेबा पर वह अपना आधिपत्य इतना एकछत्र समझता है कि उसके जीवन को ख़त्म कर देना भी उसे अपना ही अधिकार लगता है। उमैरा ने अगर ज़ामी जैसा पात्र रचा है तो कुछ ऐसे पुरुष पात्र भी गढ़े हैं जो नकारात्मक छवि लिए पुरुषों का सबल प्रतिपक्ष हैं। मसलन, ज़ेबा के पिता, उसके भाई, जमाल (जिसे ज़ेबा प्रेम करती थी) और अंततः उसका बेटा सुबुक– ये सब उसके जीवन में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। कफ़ील की प्रगतिशीलता वहाँ दिखती है जहाँ उमैरा ज़ेबा को न केवल ज़ामी से अलग होता हुआ दिखलाती हैं बल्कि उसे जीवन में आगे बढ़ने और अपनी पसंद का साथी चुनने का दूसरा मौक़ा मिलता हुआ दिखाती हैं। वह प्रेम जिसकी सुखद संभावनाओं से उसे वंचित कर दिया गया था, एक बार फिर उसके जीवन में आता है और परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि वह उसका चुनाव कर सके। पर ऐसा लगता है कि इस प्रगतिशीलता के लिए भी लेखिका को वजाहत देनी पड़ी हैं। दूसरे विवाह का निर्णय ज़ेबा के सहज अधिकार या अपने स्वयं के जीवन पर उसके इख़्तियार के कारण नहीं लिया गया है, बल्कि उसके भाई और बेटे (एक बार फिर से पुरुषों को इस बात में एजेंसी दी गई है) के प्रयासों से संभव हो सका है। यह ज़ेबा के भाई और बेटे के समझाने की बदौलत है कि न केवल ज़ेबा को दूसरे विवाह के लिए राज़ी किया गया है, बल्कि उसकी बूढ़ी माँ को भी ज़ेबा के जीवन के साथ परिवार द्वारा की गई ज़्यादतियों का हवाला देते हुए, दूसरे विवाह के लिए मानसिक रूप से तैयार किया गया है। पर इसके बावजूद यह अवश्य कहा जा सकता है कि उमैरा कफ़ील में स्त्री के लिए एक संभावना (चाहे वह कितनी ही सीमित क्यों न हो) खोलती हैं। कफ़ील का अर्थ होता है, वह जो संरक्षण दे और दक्षिण एशियाई समाजों की पारंपरिक सामाजिकता में इस शब्द को एक स्त्री के लिए अधिक ज़रूरी समझा जाता है, न कि एक पुरुष के लिए। प्रायः एक स्त्री के लिए अनिवार्य और अपेक्षित है कि उसका एक कफ़ील हो, संरक्षक हो। पर संरक्षण को एक सामाजिक ज़िम्मेदारी से अधिक एक नैतिक और व्यक्तिगत जवाबदेही के रूप में अगर लिया जाए, जहाँ स्त्री और पुरुष दोनों ही एक दूसरे के भावनात्मक और भौतिक हितों के संरक्षक हों, तो इस शब्द की गरिमा लिंग विशेष के लिए रूढ़ न रह कर वस्तुतः एक संवेदनात्मक ज़रूरत के रूप में हो सकती है। ज़ेबा तलाक के वक़्त जज की सामने, जो स्वयं एक स्त्री है, यही तर्क रखती है कि ज़ामी को एक शौहर होने के नाते अपने परिवार की किफ़ालत करने का जो दायित्व मिला था, वह उस पर खरा नहीं उतर सका। परिवार की किफ़ालत, चाहे वह भौतिक हो या मानसिक, अकेले ज़ेबा की जिम्मेदारी रही। और यहीं पर कहानी अपने बहुआयामी लेखन का एक और स्तर खोलती है जो विवाह जैसी सामाजिक संस्था की बुनियाद में साझेदारी और समानता जैसे तत्त्वों को रेखांकित करती है।
कफ़ील ज़ेबा के संघर्षों की कहानी है। उमैरा का लेखन सशक्त है क्योंकि वह विस्तार में , सूक्ष्म ब्यौरों में खुद को न खर्च करके साहित्यिक प्रविधियों को बड़े कारगर तरीक़े से एक साथ बहुत कुछ अभिव्यक्त करने के लिए उपयोग में लाती हैं। ज़ेबा की शादी से चार बच्चों तक परिवार बढ़ने की पूरी यात्रा को बीस साल बाद कहानी को आगे बढ़ा कर वह दिखलाती हैं। इस तरह रोज़ रोज़ के अनुभवों के ब्यौरों में न पड़ कर वह मनःस्थिति की सघनता को ही टाइम ट्रैवल करता हुआ दिखलाती हैं। ड्रामे में कई बार दिखलाया जाता है कि ज़ेबा जब ज़ामी से हताश और उपेक्षित-तिरस्कृत होती है और जब उसे अपना जीवन बेहद नारकीय लगने लगता है तो वह कमरे की आलमारियाँ सहेजने लगती है। सारे कपड़ों को नीचे गिराकर, आलमारी ख़ाली कर वह फिर से उन्हीं कपड़ों की तहें लगाकर आलमारी ठीक करने लगती है। उमैरा द्वारा प्रयुक्त आलमारी का यह रूपक बहुत सशक्त है। यह ज़ेबा के मन के चक्रवात को, दमित इच्छाओं, कुंठाओं और अवसाद को शांत करने का एक माध्यम तो बनता ही है, पर आलमारी को ख़ाली करने और फिर से उसे समेटने का कार्य इतना निरुद्देश्य है कि वह अभ्यासवश अँधेरे में भी कपड़ों की तहें लगा सकती है। यह ठीक उसके अँधेरे जीवन की तरह है जिसे वह बंद आँखों के साथ ही जी सकेगी। जहाँ जीवन के दुखों को अभ्यासवश ही गुज़ार लिया जाता है। स्त्रियों की ज़िंदगी भी अपने-आप में उन आलमारियों की तरह हैं जिनमें उन्होंने अपनी इच्छाओं और कामनाओं को कहीं गहरे में दफ़न कर दिया है।
उमैरा अहमद के लेखन में सामाजिक जटिलताओं में, नैतिक दुविधाओं में फँसी वे तमाम स्त्रियाँ हैं जो चुपचाप हर दिन अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती हैं। घर और परिवार व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए वे ख़ुद को खपाती हैं, अपने आप को अदृश्य-अनुपस्थित बनाए रखती हैं और उनके त्याग को सराहने वाला कोई नहीं होता। मध्यवर्गीय नैतिकता के दायरे में जीवन जीते चले आ रहे हमारे दक्षिण एशियाई समाजों का यह सबसे बड़ा यथार्थ है। यहाँ स्त्रियों का संघर्ष मौन है पर प्रतिरोध की चिंगारी भी कहीं पास ही दबी है और जब वह अपना सर उठाती हैं तो उनके वक़्त और हालात दोनों ही बदलते हैं। सबा और ज़ेबा की ज़िंदगियाँ उसी बदलाव की बानगियाँ हैं। उमैरा उस मौन क्रांति को साहित्य के माध्यम से सतह पर लाती हैं और पाकिस्तानी समाज की कहानी होकर भी वह स्त्रियों के सार्वदेशिक-सार्वकालिक संघर्ष को स्वर देती हैं।
पर उमैरा के लेखन से हटकर अगर पाकिस्तानी धारावाहिकों को एक समग्र दृष्टि से देखें तो एक समस्या जो महसूस होती है, वह यह कि आज भी इन धारावाहिकों की कहानियाँ स्त्रियों की अस्मिता पर एक आधुनिक रवैये से विचार नहीं करतीं। वह स्त्री को, चाहे वह कितनी भी सफल क्यों न हो जाए, एक सामाजिक शब्दावली में ही गढ़ कर देखने की हिमायती है और वह शब्दावली कुछ रूढ़ संज्ञाओं में बँध कर रह गई है, मसलन, विवाह, संतान, एक पत्नी और माँ की उत्कृष्ट भूमिका निभाती हुई स्त्री-छवि इत्यादि। आज भी इन कहानियों के केंद्र में विवाह ही एक प्रमुख मुद्दा है। उनके रोजाना के संघर्ष, बाहरी दुनिया से उनके आदान-प्रदान इन सबको कहीं नेपथ्य में रख दिया जाता है और एक सफल शादी की चिंता जीवन की सबसे बड़ी परियोजना में तब्दील होती दिखायी पड़ती है। ये कहानियाँ पाकिस्तानी समाज की रोज़मर्रे की वास्तविकता, ज़मीनी अनुभवों के बदले कुछ पात्रों के जीवन में विवाह और उसकी सफलता और असफलता के बीच झूलती नियतियों को रेखांकित करने में ही अपनी रचनात्मक ऊर्जा का एक बड़ा अंश लगाती है। इसीलिए बहुत हद तक यह जो रिप्रेसेंटेशन है, वह सीमित और सतही है। वैश्विक परिवर्तनों और आधुनिक संवेदनशीलता के प्रचार-प्रसार से पाकिस्तानी समाज भी अछूते नहीं रहे हैं, पर उन पक्षों को समग्रता से दिखलाने के बजाय अगर उन कहानियों का कथ्य केवल स्त्री के जीवन के एक पक्ष विशेष तक सीमित रहेगा तो इन धारावाहिकों की समकालीन प्रासंगिकता और उद्देश्य सीमित हो जायेंगे। इन धारावाहिकों के माध्यम से उमैरा अहमद की संवेदनशीलता स्त्रियों के जीवन के आंतरिक संघर्षों को दिखलाने में रमी है, पर वस्तुतः जरूरत है कि मानवीय संबंधों की जटिलताओं पर या स्त्रियों के ही प्रतिनिधित्व पर अन्य दृष्टियों से भी विचार किया जाए। सशक्तिकरण का प्रत्यक्ष लक्ष्य न रखते हुए भी जीवन जीने के अनुभवों की विविधताओं को अगर ये कथ्य समेट सकें तो ही धारावाहिक जैसी दृश्यविधाएँ अपने छोटे कलेवर में भी कुछ मानीख़ेज़ कह सकेंगी।







