‘प्रगतिशील काव्यधारा में दलित स्त्री’ बजरंग बिहारी तिवारी का सुदीर्घ आलेख है जिसके 7 भाग लिखे जा चुके हैं और आगे के हिस्सों पर काम जारी है। कथादेश में छप चुके ये भाग क्रमशः, किंचित संशोधन-परिवर्द्धन के साथ नया पथ के पाठकों के लिए प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

हिंदी में मार्क्सवादी विचार के आगमन के बाद उसके प्रति साहित्य की अविरोधी धारा प्रगतिशील काव्यधारा मानी जाती है। शोषितों, वंचितों, दलितों के प्रति झुकाव इस काव्यधारा की बुनियादी पहचान है। प्रगतिशील काव्यधारा का आरंभ 1918 से मानना चाहिए। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के निर्माण के बाद इस काव्यधारा का दूसरा दौर शुरू होता है। पहले-दूसरे दौर में इस धारा में स्त्रियों की उपस्थिति नगण्य-सी है। शोषण से मुक्ति के प्रति जनजागरण का जो अभियान इस धारा ने प्रारंभ किया वह पूरे समाज के लिए शुभ एवं कल्याणकारी है लेकिन मजदूर और किसान उसके मुख्य संबोध्य हैं। इन दोनों अभिधानों को ‘न्यूट्रल जेंडर’ मानना चाहिए यद्यपि इनका प्रयोग पुल्लिंग में होता है। ‘मर्यादा’ पत्रिका के जून 1918 अंक में प्रकाशित ‘सनेही’ (गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’) की जिस कविता से प्रगतिशील काव्य का आरंभ माना गया है वह अत्याचार रोकने का संकल्प व्यक्त करती है और न्याय-पथ पर चलने का आह्वान करती है-
न होने देंगे अत्याचार।
लड़ जाएंगे न्याय पक्ष पर करके हृदय उदार।[1]
हृदय को उदार बनाने की कामना ‘स्वानुभव’ के तर्क से उपजी है। कवि यदि स्वयं अत्याचार झेल रहा होता तो वह ऐसी बात न करता। वह अत्याचार होते हुए देख रहा है। उसकी न्याय-भावना उससे निष्क्रियता त्यागने और अत्याचारियों से मुक़ाबला करने की प्रेरणा देती है- “अन्यायी अन्याय करें यों हाय! सारे बाजार। और खड़े चुप देखें हम तो नयनों को धिक्कार।।” वे कौन लोग हैं जो अत्याचार-अन्याय झेल रहे हैं? क्या वे नाम-रूप-पहचान विहीन हैं? कवि ने अनुमान की गुंजाइश नहीं छोड़ी है। अगली कविता में वह हिंसा के उन आधारों को स्पष्ट करता है-
‘सनेही’ कब फिरि वे दिन ऐहैं?
रंग, जाति, मत भेदभाव भ्रम कब तक हमैं भुलैहैं।
मानवीय समता की बातैं कब मन मध्य समैहैं।।[2]
भेदभाव के आधार हैं- रंग, जाति और मत। रंग चमड़ी का, आधार नस्लीय; जाति भारत की, आधार वर्ण व्यवस्था का; मत धर्म-मजहब का और सम्प्रदाय-विचार का भी। ये भेद प्राकृतिक नहीं हैं, कृत्रिम हैं। इन भेदों को मिटाए बिना साम्य नहीं आ सकता। साम्यवाद का ध्येय इन भेदों की पहचान करना, उनके टिकाऊपन का रहस्य खोजना और अंततः उनका उन्मूलन करना है। आरंभिक साम्यवादी रचनाकार राष्ट्रोन्नति के लिए वर्ण-जाति का उन्मूलन अपरिहार्य मानते थे। यह भाव बाद के दिनों में लगातार मजबूत होता गया। वर्ण-जाति के आधार पर ऊँच-नीच को अप्राकृतिक ठहराने के लिए प्राचीन बौद्ध कवि अश्वघोष ने गूलर और कटहल का उदाहरण दिया था। सनेही जी ‘प्रकृति संदेश’ शीर्षक कविता में यही तर्क नए संदर्भों के साथ दुहराते दिखाई देते हैं।[3] वे न्याय पथ पर चलने का आह्वान करते हैं। इसका अर्थ है ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ वाली व्यवस्था का त्याग करना और मनुष्य मात्र को समदृष्टि से देखना-
पावन परम प्रकृति नियमों का जहाँ निरादर होता है,
वहाँ राष्ट्र पछताता है, निज गत वैभव को रोता है।
पर इसके विपरीत जहाँ पर इसका पालन होता है,
होती वहाँ और ही गति है, काल नहीं विष बोता है।
राजा प्रजा वहाँ नज़रों में सदा एक-से रहते हैं,
नीति न्याय की वर्षा होती, स्रोत शांति के बहते हैं।
जार और राजाओं सुन लो, सच्चाई पर अटल रहो,
पशु बल का आधार छोड़कर, न्याय शक्ति से प्रबल रहो।
वर्ण-जाति से अनुशासित समाज व्यवस्था धर्म से पोषण और वैधता पाती रही है। प्रगतिशील कवियों ने इसीलिए धर्म की भूमिका को अनदेखा नहीं किया। ‘प्रताप’ पत्रिका के 12 अप्रैल, 1920 अंक में प्रकाशित ‘साम्यवाद’ शीर्षक कविता के आरंभ में सनेही ने धर्म की जकड़बंदी का संज्ञान लिया है। यह धर्म ही है जो किसी को पैदायशी पवित्र और पूजनीय बता देता है और किसी को अस्पृश्य एवं पापी-
घोर नारकी एक तो, एक स्वर्ग का दूत सा।
एक पुण्य का पूत अति, पापी एक अछूत सा।[4]
साम्यवादी आंदोलन इस समस्या से मुक्ति पाने का सबसे प्रभावी विकल्प है। धर्म की ज़मीन से संस्थाबद्ध धर्म की मूलगामी आलोचना करना कठिन है। साम्यवाद ही उस धरातल तक ले जा सकता है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति बराबर समझा जाए। संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा हो। सबकी गरिमा सुनिश्चित की जा सके- “समता सरि की बाढ़ में, ऊँच-नीच बह जाएगा। समतल जल ही की तरह, एक रूप रह जाएगा।।”[5] कर्मकांडी संस्थाबद्ध धर्म की तीखी आलोचना प्रगतिशील कविता बुनियादी विशेषता है। बहुधा उत्साही आलोचक यह कहते हैं कि इस विचारधारा ने धर्म और ईश्वर से किनारा कर लिया, उनके प्रति उदासीन हो गया। उपलब्ध रचनाओं से इस आरोप की पुष्टि करना संभव नहीं है। 1934 में प्रकाशित नरेन्द्र शर्मा के संग्रह ‘प्रभात फेरी’ की केन्द्रीय चिंता ईश्वरवाद की गिरफ़्त से मनुष्यता को आज़ाद करना है-
आओ हथकड़ियां तड़का दूँ, जागो रे नतशिर बन्दी।
अविनाशी की आशा मिथ्या, स्वयं समर्थ बनो बन्दी।
… … …
कर प्रकाश बन्दी दीपक में,/ तम में तुमने किया उजाला,
जैसे वन को, वैसे मन को/ फिर ईश्वर भी खोज निकाला,
सृजनहार के सृजनहार तुम, तुम ही प्रतिपालक बन्दी।[6]
संग्रह की एक दूसरी कविता में नरेन्द्र शर्मा प्रश्न करते हैं- “कौन सुनता है करुण पुकार?/ किसे रुचता है हाहाकार?/ अरे निर्धन नादान!/ जिसे तुम कहते हो ‘भगवान’/ उठाते हो सत्ता का भार/ जो बरसाता है जीवन में/ रोग शोक दुख दैन्य अपार/ …उसे सुनाने चले पुकार?” 1934 ई. में ही प्रकाशित रामेश्वर करुण की ‘करुण सतसई’ में ईश्वर को इस तरह याद किया गया है- “करत न सुखी सनाथ क्यों, कोटिन दीन अनाथ। जानि परै तब नाथ हू, पूँजीवादिन हाथ।।”[7] साम्राज्यवाद, पूँजीवाद से लड़ना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है लेकिन धर्म से लड़ना कठिन है। जाति-वर्ण, ईश्वर, पुरोहिती आदि सारी दमनकारी सत्ताएँ धर्म की छत्रछाया में फलती-फूलती हैं। यह धर्म सत्ताधारियों का रक्षक है और पूँजीवादियों का पोषक-
जिसकी छाया के नीचे रक्षित है सत्ता सारी, जिससे निर्भयता पाकर पलती पूँजी हत्यारी।
नित बैर विरोध बढ़ाकर जो बीज विषैले बोता, जिसके बंधन में बँधकर कल्याण न कुछ भी होता
विज्ञान विरोधी बनकर जो रोके प्रगति हमारी, जंजाल पुरानेपन का अब तक है जिसमें जारी।[8]
रामेश्वर करुण का मानना है कि जो धर्मग्रंथ ऊँच-नीच का पाठ पढ़ाते हों, उन्हें जला देना उचित है- “मानव से मानव नीचा यदि वेद यही बतलाते,/ क्यों दीप शलाका लाकर स्वाहा न उन्हें करवाते?” ऐसे विषमता पोषक ग्रंथ जिन द्विजों के हितसाधक हैं अब उन्हें संसार से विदा कर देना आवश्यक है- “मानव-मानव सम समझो या जल्द जगत से जाओ,/ वैषम्य व्यथा बगरा कर द्विजदेव न अब दहलाओ।”
आरंभिक दौर की प्रगतिवादी कविताओं में न्याय, विप्लव, और दलित शब्दों की बहुत आवृत्ति मिलती है। न्याय का अर्थ सामाजिक न्याय से है, संग्रहीत संपदा और उत्पादन के प्राकृतिक संसाधनों तक सबकी पहुँच, सबकी हिस्सेदारी से है। विप्लव का आशय उस वर्चस्व को तोड़ने से है जो सदियों से सभी केंद्रों पर चला आ रहा है। दलित भारत का सर्वहारा है जिसे अस्पृश्य, अछूत कहा जाता रहा है। ध्यान देने की बात है कि प्रगतिशील धारा के रचनाकार सर्वहारा का प्रयोग न करके अक्सर ‘दलित’ शब्द का प्रयोग करते हैं और अर्थग्रहण में भ्रम की गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं। दलित का तात्पर्य ‘पंचम वर्ण’ है। ‘मनोरमा’ पत्रिका के अक्टूबर 1925 अंक में प्रकाशित दुर्गादत्त त्रिपाठी के गीत की ये पंक्तियाँ देखिए-
विजय ध्वजा फहरा दे विजये।
साम्य भाव का भारत में तू डंका आज बजा दे विजये। …
इस अछूत हिंसक समाज पर अस्पृश्यों की जय हो विजये।
अनाचारियों पर दलितों का आधिपत्य हो जाये विजये ।।[9]
‘सुकवि’ पत्रिका के दिसंबर 1928 अंक में दीनानाथ ‘अंशक’ की कामना पर नज़र डालिए-
दलित बन्धुओं को अपनाकर, उन्नति पथ पर लायेंगे।
निर्मल साम्य समीरण द्वारा, प्रेम सुरभि सरसायेंगे।[10]
इस धारा के एक अन्य कवि ठाकुर रघुनंदन सिंह को ‘दलित दलन’ का प्रश्न जटिल लगता है- “श्रमजीवी विकल सताए पूँजीपतियों के, दलित दलन की भी विषम पहेली है।”[11] श्याम बिहारी शुक्ल ‘तरल’ यशपाल द्वारा संपादित ‘विप्लव’ के फरवरी, 1939 अंक में ‘विप्लवकारी’ शीर्षक कविता प्रकाशित कराते हैं-
मैं विप्लव का संदेश लिए फिरता हूँ, मैं एक भयानक वेश लिए फिरता हूँ।
मैं अखिल विश्व में इन्कलाब के युग का, प्रलयंकारी आदेश लिए फिरता हूँ।। …
मैं चलता हूँ वैभव के अंगारों पर, मैं दौड़ लगाता हूँ असि की धारों पर।
मैं दलितों के उर में निवास करता हूँ, मैं टिका हुआ उन की हाहाकारों पर।[12]
शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ समाजवादी जनक्रांति को नवसंस्कृति का अगुआ और दलितों की उम्मीद बताते हैं- “नव संस्कृति के अग्रदूत हे पद दलितों की आस। एक तुम्हारी गति पर अटकी मानवता की श्वास।”[13] अपनी ओजस्वी वाणी में सोहनलाल द्विवेदी आवाज़ देते हैं- “ओ दुनिया के अभिमान उठो,/ पद दलितों के अरमान उठो,/ ओ लाल क्रांति के संचालक,/ युग परिवर्तन के गान उठो।”[14] प्रखर मार्क्सवादी चेतना के कवि बैजनाथ सिंह ‘विनोद’ 1941 ई. में प्रकाशित अपने संग्रह ‘अवरुद्धा’ में दलितों को कर्मफलवाद, भाग्यवाद की चकरघिन्नी से बाहर आने की सलाह देते हैं-
ओ प्रपीड़ित! ओ प्रवंचित, दलित तम में लीन।
उठ अब न कर जीवन क्षीण।
मूक रह, सब भाग्य वश कह, जठर ज्वाला यातना सह,
दैन्य की जलती चिता में, आज तक तन प्राण से रह,
ओ प्रपूरण प्राणधर्मा! बन न आज मलीन।[15]
धर्म की जकड़बंदी मानसिक अनुकूलन कर देती है। यही जाति-वर्ण की दीर्घजीविता का स्रोत है। प्रगतिशील कवियों ने इसीलिए धर्म और ईश्वर को लेकर लगातार लिखा। उन्होंने श्रमशील, दलित जनता पर धर्मसत्ता के गहरे सम्मोहन को पहचाना और लगातार प्रश्न किए। शिव दुलारे शर्मा ‘शिव’ ने लिखा-
‘कर्मों का फल दीन भुगतता’ यह कह देना चाल है।
मतलब के मतवालों का यह केवल माया जाल है ।।
तिनका भी चढ़ जाता ऊपर आता जब तूफ़ान है।
बंद पुजारी के मंदिर में पत्थर का भगवान है ।।[16]
धर्म-विशेष की आलोचना करने के स्थान पर इन रचनाकारों ने धर्म-मात्र की आलोचना की। जनप्रिय कवि ‘शील’ ने लिखा-
तुम कहते हो करूँ कल्पना, पूजूँ मानव से पत्थर,
तुम कहते हो करूँ साधना, होते साधक के ईश्वर।
हमें मिटाने की हलचल है, मंदिर मस्जिद के भीतर,
नाग-फाँस लेकर बैठे हैं, युग के जड़ शोषक ईश्वर।[17]
एक धर्मप्राण समाज में धर्म की आलोचना करना ख़तरा मोल लेना है। लेकिन, इसके बग़ैर शोषणकारी व्यवस्था से बाहर निकलने की राह नहीं बनती, जातितंत्र की प्राचीर पर खरोंच भी नहीं आती। आज से शताब्दी भर पहले प्रगतिशील रचनाकारों ने विषमतामूलक धर्मतंत्र के विरुद्ध जो अभियान छेड़ा था और उसका समाज पर जो असर हुआ वह सतत मूल्यांकन तथा अप्रिसिएशन का विषय है। तकलीफ़देह स्थिति है कि ऐसा न हुआ। अस्मितावादी धारा के उभार के बाद पारस्परिक संवाद की अस्मिताचेतस आंबेडकरी विचारधारा क्षीण-सी होती चली गई। अस्मितावादी धारा ने प्रगतिशील परंपरा के प्रति दुश्मनी भरा व्यवहार किया, उसे अपना प्रथम शत्रु माना। कालांतर में दुश्मन-दुश्मन दोस्त हो गए। अस्मितावाद दक्षिणपंथ का सहयोगी बन गया। प्रगतिशील आंदोलन की आवश्यक आलोचना करने के बजाए उस पर आक्रमण करना अस्मितावादी लेखकों की पहली प्राथमिकता लगने लगी। उदाहरण के लिए साल 2025 ई. में प्रकाशित वरिष्ठ दलित अस्मितावादी कवि असंगघोष के संग्रह ‘सवाल तो होंगे ही’ की यह कविता देखी जा सकती है-
सिगार-सिगरेट पीने से
क्रान्ति नहीं होती कॉमरेड
सिर्फ़ फ़ोटो खिंचाई का
छोटा सा उपक्रम भर होता है
… … …
बतोलबाज़ी तो बरसों से करते आ ही रहे हैं
इससे हासिल क्या हुआ?
ख़ाक …
कुछ मिला?
नहीं
फिर क्या उखाड़ लिया?
झाँट…
उसे आज तक नहीं उखाड़ पाए!
…बकवास, कोरी बकवास
हो सके
तो वर्ग से आगे की सोचो
कॉमरेड।[18]
संदर्भ सूची
1. हिन्दी काव्य में मार्क्सवादी चेतना, (प्र.सं. 1974), जनेश्वर वर्मा, ग्रन्थम, रामबाग, कानपुर, पृ. 234.
2. वही, पृ. 238.
3. सनेही की यह कविता 1918 में प्रकाशित उनके काव्य संग्रह ‘त्रिशूल तरंग’ में शामिल है। ‘त्रिशूल’ सनेही जी का एक और उपनाम था। जनेश्वर वर्मा द्वारा पूर्वोक्त ग्रंथ में उद्धृत, पृ. 237.
4. वही, पृ. 238.
5. ‘साम्यवाद’ शीर्षक कविता की अंतिम पंक्तियाँ। वही, पृ. 240.
6. वही, पृ. 318.
7. करुण सतसई, रामेश्वर करुण, प्रकाशक- सहदेव जी ‘भगवान’, लाहौर, संवत् 1991. जनेश्वर वर्मा द्वारा उद्धृत, पृ. 312.
8. वही, पृ. 415. रामेश्वर करुण शुरू में ब्रजभाषा में कविता करते थे। उनकी ‘सतसई’ इसी भाषा में है। इसके बाद वे खड़ीबोली में लिखने लगे। उद्धृत पंक्तियाँ उनके दूसरे संग्रह ‘तमसा’ से हैं। ‘तमसा’ का प्रकाशन लाहौर के सामयिक साहित्य सदन से 1944 में हुआ था।
9. वही, पृ. 276. दुर्गादत्त त्रिपाठी की कामायनीकार जयशंकर प्रसाद से निकटता थी। देखें, सत्यदेव त्रिपाठी लिखित प्रसाद जी की जीवनी ‘अवसाद का आनंद’, सेतु प्रकाशन, नोयडा, 2022.
10. वही, पृ. 280.
11. कानपुर से प्रकाशित पूर्वोद्धृत ‘सुकवि’ पत्रिका के नवंबर, 1929 अंक में प्रकाशित ‘रोटी’ शीर्षक लंबी कविता की पंक्ति। वही, पृ. 280.
12. ‘विप्लव’, फरवरी, 1939, लखनऊ, पृ. 71; जनेश्वर वर्मा द्वारा उद्धृत, पृ. 354.
13. ‘हिन्दी काव्य में मार्क्सवादी चेतना’, पृ. 424. उद्धृत काव्य पंक्तियाँ ‘सुमन’ जी के ‘युग का मोल’ काव्यसंग्रह से हैं। यह संग्रह जनप्रकाशन गृह बम्बई से 1945 में छपा था।
14. वही, पृ. 437. विचारों से गाँधीवादी सोहनलाल द्विवेदी ने फासिस्ट ताकतों के विरुद्ध सोवियत की लाल सेना के अभियान का समर्थन करते हुए ‘सोवियत रूस’ नामक एक काव्य पुस्तिका की रचना की थी।
15. वही, पृ. 447. ‘अवरुद्धा’, बैजनाथ सिंह ‘विनोद’, साधना मंदिर, इलाहाबाद, प्र.सं. संवत् 1998 वि.
16. वही, पृ. 429.
17. वही, पृ. 480. मुन्नूलाल शर्मा ‘शील’ का संग्रह ‘उदयपथ’ पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, मुंबई से 1953 ई. में छपा था। उद्धृत कविता इसी संग्रह से है।
18. ‘सवाल तो होंगे ही’ (प्र.सं. 2025), असंगघोष, सेतु प्रकाशन, पेपरबैक, नोयडा.







ये कैसा लेख है? इसमें तो वर्ग का कोई नज़रिया
ही नहीं है। वर्गीय शोषण के जरिए अपने वर्गीय हितों को कायम रखने के लिए व्यवस्था धर्म को बनाए रखती है। और धर्म व्यवस्था को बनाए रखता है। मूल मकसद है श्रम का शोषण। और सर्वहारा में सिर्फ दलित नहीं हैं।
यह लेख आखिर क्या हासिल करता है? प्रगतिशील आंदोलन वर्गीय और सम्राज्यवादी शोषण से मुक्ति को लेकर चला था। जिन कायांशों के सहारे पूरा लेख तैयार किया गया है वे उस दौर की सबसे कमजोर कविताएं हैं।
प्रेम जी,
लेख का संज्ञान लेने के लिए धन्यवाद।
आपने सही जगह उँगली रखी कि
1. इसमें वर्ग का कोई नज़रिया ही नहीं है।
2. लेख आख़िर क्या हासिल करता है?
3. लेख में उद्धृत कविताएँ उस दौर की सबसे कमज़ोर कविताएँ हैं।
आपके मंतव्य के संबंध में मुझे निवेदन करना है-
1. इस लेख का पूर्वपक्ष अस्मितावादी आरोप है कि प्रगतिशील साहित्य ने वर्ग तक अपने को सीमित रखा, जाति का संज्ञान नहीं लिया, दलितों को अनदेखा किया। लेख के लिए इसी मक़सद से उद्धरण जुटाए गए। जाति के संदर्भों तक लेख को महदूद रखा गया।
2. यह लेख दस लेखों की माला का पहला पुष्प है। अभी यह न जाँचें कि लेख क्या हासिल करता है। लेखमाला के अंत में इस मुद्दे पर विचार करना उचित होगा। लेकिन, अगर जाँचने ही चलें तो यह देखें कि प्रगतिशील लेखन के शुरुआती सरोकार मात्र वर्ग तक सीमित नहीं थे। दलित लेखन के उभार के पहले दलित शब्द का व्यवहार प्रगतिशील कवि कर रहे थे।
3. इस समय हिंदी कविता में छायावादी युग चल रहा था। छायावादी कवि हो पाना सबके बस की बात नहीं थी। हम ले-देकर 4-6 छायावादी कवियों के नाम जानते हैं। इधर प्रगतिशील धारा में शोषण को समझने वाला, असमानता के अंत के लिए बेचैन कोई भी कवि-रचनाकार हो सकता था। केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर और नागार्जुन पहले दौर में नहीं आते।
बढ़िया शुरुआत है। लेखमाला की यह शृंखला जारी रखिए। प्रासंगिक और आवश्यक हस्तक्षेप! लेखमाला की अगली कड़ी का बेसब्री से इंतजार रहेगा। इस लेखमाला के लिए बधाई और शुभकामनाएँ स्वीकार करें।