‘प्रगतिशील काव्यधारा में दलित स्त्री’ बजरंग बिहारी तिवारी का सुदीर्घ आलेख है जिसके 7 भाग लिखे जा चुके हैं और आगे के हिस्सों पर काम जारी है। कथादेश में छप चुके ये भाग क्रमशः, किंचित संशोधन-परिवर्द्धन के साथ नया पथ के पाठकों के लिए प्रस्तुत किए जा रहे हैं। भाग 1, 2 और 3 आप पढ़ चुके हैं। भाग 4 में पढ़िए शील, सर्वेश्वर, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, नंद चतुर्वेदी, रघुवीर सहाय, धूमिल और राजकमल चौधरी की कविताओं का विवेचन।

जन्मभूमि मंदिर आंदोलन के दूरगामी नतीज़ों को समझने वाले कवि शील (1914-1994) का वास्तविक नाम मन्नूलाल था। फिर वे मन्नूलाल शर्मा हुए। अंततः ‘शील’ उनका अभिधान बना। कानपुर के पाली गाँव निवासी सत्यनारायण कथा बाँचनेवाले अपने पिता शिवनंदन प्रसाद त्रिपाठी की राह पर चलते हुए शील ने कुछ दिन किसानी की। स्वयं हल चलाया। इससे गाँव के सवर्ण नाराज़ हुए। गाँव छोड़ना पड़ा। कुछ दिन दलितों के लिए खोले गए एक (हरिजन) स्कूल में पढ़ाया। ‘सुकवि’ के संपादक गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ से शील का जुड़ाव रहा। रेस्टोरेंट में, हॉकर के रूप में, ट्यूशन पढ़ाकर जीवनयापन करते हुए सरकार विरोधी जनजागरण के पर्चे बाँटने के कारण जेल गए। फिर लखनऊ रेडियो में नौकरी की। यह सन् 1937 का वर्ष था। सरकारी नौकरी में रहकर अँगरेज़ सरकार की आलोचना करना आफ़त मोल लेना था। शील को इसकी परवाह नहीं थी। उन्होंने रेडियो पर स्वरचित कविता ‘मजदूर की झोपड़ी’ पढ़ी।72 इस कविता में एक दलित स्त्री की पीड़ा का अंकन है। रात-दिन मेहनत करने वाले मजदूर की झोपड़ी में कंगाली है। मजदूरनी को अपने बच्चे और पति की भूख की चिंता है। वह थोड़ा-सा मटर इकट्ठे कर उसे चक्की में पीस रही है। कवि कहता है कि वह मटर के दाने नहीं, अपना हृदय पीस रही थी। कविता के अगले हिस्से में मजदूर को पुलिस ने पकड़ लिया है। उसका अपराध यह है उसने किसी खेत से थोड़ा-सा सीला बीन लिया था। कटाई के बाद खेत में गेहूँ की गिरी हुई बालियाँ सीला कही जाती हैं। यमदूतों-से लाल पगड़ी बाँधे सिपाहियों द्वारा थाने की ओर ले जाए जाते मजदूर की झोपड़ी से आवाज़ उठती है- “इन श्रीमानों ने हमें मिटाकर,/ अपने को आबाद किया।/ दाने-दाने को दीन किया,/ इस तरह हमें बरबाद किया।/ तुम न्यायी दण्ड विधान करो,/ है क्षमादान की चाह नहीं/ हम दीन-हीन कंगालों की,/ विपदा की भी कुछ थाह नहीं।/ इस मर्त्यलोक में धन-बल से,/ अब तक कितने हैं हुए अमर।/ यह हृदय पीसती थी अपना-/ या चक्की चलती घरर-घरर।”73 अंग्रेज प्रशासन को, न्याय व्यवस्था को प्रश्नांकित करना, दोषी ठहराना नौकरी से हाथ धोना था। शील ने और भी नौकरियाँ कीं लेकिन कहीं ठहरना न हुआ।
शील के लिए प्रगतिशीलता का अर्थ वर्ण-जाति के ममत्व का पिंडदान है।74 जिस कवि को अंगरेजी शासन ने जेल में डाला, उसने स्वतंत्र भारत की सरकार पर भी लगातार सवाल किए। प्रजातंत्र के आवरण में राजतंत्र का शासन कहा। सत्ता का विवेक न बदला। वह वर्णाश्रमी ही रहा। जातिवादी मानस वाले नकली प्रगतिशीलों ने बाज़ार को दुहा। कम्युनिस्ट मारे गए-
खूब रहा मायावी दर्शन ढोल बजे,
वर्णाश्रमी विवेक, नस्लवादी सिरजे।
प्रजातंत्र में राजतंत्र की खीर पकी,
राजनीति हो गई तस्करों के घर की
प्रगतिशीलता दुही गई बाज़ारों में
कम्युनिस्टों की हत्या हुई हज़ारों में।75
शील के लिए जाति का प्रश्न केंद्रीय है। यह विशेषता जनता से जुड़े हर प्रगतिवादी कवि में दिखाई देती है। जाति आधारित उत्पीड़न और सांप्रदायिक हिंसा को परस्पर सम्बद्ध माननेवाले शील अपने परवर्ती काव्यसंग्रह ‘लाल पंखों वाली चिड़िया’ में सनातन मिथक का यथार्थ उद्घाटित करते हुए ‘धूप में धुएँ की शख्सियत’ कविता में कहते हैं-
ब्रह्मा के मुख से ब्राहमण,
भुजा से क्षत्रिय,
पेट से वणिक,
पैरों से शूद्र पैदा होते रहे
चीखती रही सुराज की आत्मा
साम्प्रदायिक दंगों में
लहूलुहान।76
गाँव के विद्यालय से चौथी कक्षा और संस्कृत पाठशाला से प्रथमा करने वाले कवि शील ने निरंतर स्वाध्याय किया। वे धर्मोन्माद और जातिवादी हिंसा को बड़ी समस्या मानते हैं लेकिन पितृसत्ता की जकड़न को लेकर उस तरह गंभीर नहीं दिखाई देते। यह बात ज़रूर कहनी चाहिए कि उनके नाटकों के कई स्त्री पात्र संघर्षशील हैं और पुरुषवाद के दुश्चक्रों को समझती हैं। ‘तीन दिन : तीन घर’ नाटक की पात्र कमला एक अन्य पात्र श्यामा से कहती है- “…चाहे छोटे हों या बड़े, औरत हर जगह औरत ही है। उसे पशु की तरह जहाँ भी खूँटे से बाँध दो, बँधी रहेगी। वह बेज़ुबान है।”77 ‘एक पग’ काव्यसंग्रह में शामिल कविता ‘वेश्या’ की वाचिका को देह व्यापार में धकेला गया है। वह दुखी है, अवसादग्रस्त होने के क़रीब है। आत्महत्या का विचार उसके मन में आता है। फिर वह समाज व्यवस्था पर विचार करती है। जाति, कुल और धर्म के नाम पर किए गए अत्याचारों का स्मरण करके वह विद्रोह की भावना से भर उठती है- “नहीं, अभी जीना है,/ जिऊँगी/ समाज की बर्बरता पर/ थूकूँगी-/ हज़ार बार,/ धर्म को,/ जाति को,/ निठुर पाशविकता को,/ घृणा का,/ कुकर्म का/ गरल पिलाऊँगी।”78
नंद चतुर्वेदी (1923-2014) जाति समस्या की तह तक जाते हैं और बेलाग शब्दों में अपनी बात रखते हैं। वे ‘बेरहम ब्राह्मणवाद’ के ‘शातिर अध्यात्मवादी संवाद’ की फ़ितरत से वाक़िफ़ हैं। दलित जाति के व्यक्तियों के साथ होटल शेरेटन से लेकर पकौड़ी-चाट की दुकानों पर होने वाला यह आध्यात्मिक संवाद बराबरी की प्रतीति कराता है और आधुनिक होने का छल रचता है। यह छलना विशेषाधिकार प्राप्त लोगों का कवच बनती है। अध्यात्म से उपजा समताभास तब बिखर जाता है जब भौतिक संसाधनों में हिस्सेदारी की माँग होती है। एक लोटे पानी के लिए सवर्ण कुएँ पर आए दलित की हत्या कर दी जाती है- “तुम सिर्फ़ लोटे भर पानी के लिए/ हमारे कुएँ पर आते हो/ हज़ारों साल के पुराने कुएँ में/ तुम्हारी डोर उतर जाती है/ नीचे चट्टान तक/… तुम्हारा लोटा कुएँ की चट्टान पर बजता है/ एक हुंकार की तरह/ कुएँ की दाहिनी तरफ़/ खेत में तुम्हारा कटा हुआ सिर मिलता है”79। परिवर्तन का एक छद्म पाठ्यपुस्तकें रचती हैं। रैदास से लेकर ओमप्रकाश वाल्मीकि को पाठ्यक्रम में रखकर पढ़ने-पढ़ानेवाला समाज ऐन उसी समय घोर हिंसक जातिवादी व्यवहार कर रहा होता है। अपने जीवन-साथी के हत्यारों को न्याय के दायरे में लाने की कोशिश कर रही दलित स्त्री हर ठिकाने भटकती है। कहीं से भरोसा नहीं मिलता। इस अंतराल में हत्यारे सैलानी बनकर तफ़रीह कर आते है। हत्या का केस रफा-दफ़ा किए जाने की ज़मीन तैयार हो जाती है-
चमारन तुम्हारे सिर को
कहाँ नहीं ले जाती
थाना, संसद, सड़क और चौराहे पर
गाँव में कुछ दिन लग जाते हैं
इस हत्या के पीछे की
कथा समझने में
कुछ दिन हत्यारे शहर में रह आते हैं
इम्तहान में रैदास की कविता-पंक्तियों का
अर्थ लिख कर
उनके लड़के पास हो जाते हैं
और आगे की कक्षा में चढ़ा दिए जाते हैं80
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (1927-1983) स्त्री जीवन की जटिलताओं को किसी विचार या सिद्धांत में घटाए बग़ैर अपनी कविता का विषय बनाते हैं। व्यवस्थागत विडंबनाओं को प्रस्तुत करते समय वे अपना विक्षोभ उस प्रस्तुति में घुला देते हैं। अलग से कोई रंग-रोगन करना कवि का स्वभाव नहीं है। उनके शुरुआती काव्य संग्रह ‘काठ की घंटियाँ’ (1959) में लोककाव्य की रंगत लिए ‘चुपाई मारौ दुलहिन’ कविता सात हिस्सों में विन्यस्त है। पूर्वी उत्तरप्रदेश में कही-सुनी जाने वाली लोकोक्ति ‘चुपाई मारौ दुलहिन, मारा जाए कौआ’ का अर्थ है कि स्त्री पर हिंसा करने वाले बच जाते हैं और न्याय का कर्मकांड भी पूरा कर दिया जाता है। सर्वेश्वर की यह रचना अपने समापन अंश (सातवीं कविता) में कामना करती है कि रात-दिन की हिंसा झेलने के ‘पवित्र’ अनुबंध पत्र (विवाह बंधन) पर सहमत होने, समर्पण करने के बजाए जीवनांत कर लिया जाए-
मरद गंड़ासा लेकर हो/ ग़र रोज़ खड़ा
चकला घूमै/ सुनै न औरत का दुखड़ा
जब-जब पान सुपारी दे/ तब-तब मुँह पर गारी दे
इससे अच्छा/ रचा बरिच्छा
डूब मरें गंगाजी में कह/ आया राम-बुलौआ81
‘कुआनो नदी’ संग्रह में संकलित आख्यानमूलक कविता ‘भुजैनियाँ का पोखरा’ में सर्वेश्वर असह्य ग़रीबी झेलती संघर्षशील (भुजइन) स्त्री की शोकांतिका पेश करते हैं। अपने छोटे-छोटे बच्चों समेत हाड़तोड़ मेहनत करती यह भुजइन आखिरकार अचल स्थितियों के सामने पस्त हो जाती है और पोखर में कूदकर प्राण दे देती है। इसके बाद पोखर उसी के नाम से जाना जाता है। पिछली सदी के सातवें दशक में लिखी गई यह कविता परतंत्र भारत की इस घटना को अतीत का वाक़या भर नहीं मानता। वह स्त्री आज भी उसी संत्रास में है। भाड़ के सामने काली भूतनी-सी बैठी है। उसके कुपोषित बच्चे अब भी नरई का साग खाने को मजबूर हैं-
चालीस साल पहले वह मरी थी/ यहाँ डूबकर …
भाड़ के सामने काली भूतनी-सी/ आज भी वह बैठी है
पसीने से चिपचिपाती देह लिए,/ चुप खामोश,/
एक-एक चने से अपना भाग्य जोड़ती/ दुखती रगें तोड़ती।
उसके अधनंगे बच्चे/ …दिन भर सूखी पत्तियाँ बटोरते हैं
और शाम को मक्के की रोटी/ नरई का साग अगोरते हैं।
साग के पोपले डंठलों में/ साँप के बच्चे होने का भय
खाने के साथ एक उदास संगीत-सा/ उनके दिलों में बजता रहता है82
सर्वेश्वरदयाल की रचनाओं के पात्र पूर्वी उत्तरप्रदेश के उनके इलाके में अभी भी दिख जाएँगे। यह क्षेत्र किसानों और स्त्रियों के जीवटपने के लिए जाना जाता है। दुसह्य और असह्य परिस्थितियों में जीवनाशा बनाए रखना ही जीवटता है। इससे ऊपर की अनिर्वचनीय स्थिति वह होती है जब स्त्रियाँ और किसान आत्महत्या करने पर विवश होते हैं। सर्वेश्वर के आख़िरी संग्रह ‘खूंटियों पर टंगे लोग’ में जीवनेच्छा समाप्त करने वाले हालात पर रोशनी डाली गई है। ‘हंजूरी’ शीर्षक कविता की दलित स्त्री हंजूरी अपने तीन भूखे बच्चों के साथ जीवन समाप्ति की चेष्टा करती है। वह सबको लेकर कुएँ में कूदती है। लाशें निकाली जाती हैं लेकिन हंजूरी ज़िंदा मिलती है। उस पर हत्या-आत्महत्या का मुकदमा चलता है। जेल होती है। सजा काटकर जेल से बाहर आई हंजूरी अपने अनुभव से जानती है कि सारी जगहें एक-सी हैं- कुएँ का पानी, बाहर की हवा, अदालत की दीवार, जेल का आकाश सब ठंडे हैं। जहाँ जीवन होगा वहाँ ऊष्मा होगी। जिस ठंडेपन का अनुभव हंजूरी ने किया है वह उन जगहों के सड़े होने से उपजा है। जो सड़ गया है उसका अनुप्राणन नहीं किया जा सकता। निस्तारण ही इसका उपाय है-
काम न मिलने पर/ अपने तीन भूखे बच्चों को लेकर
कूद पड़ी हंजूरी कुएँ में/ कुएँ का पानी ठंडा था।
बच्चों की लाश के साथ/ निकाल ली गई हंजूरी कुएँ से
बाहर की हवा ठंडी थी।
हत्या और आत्महत्या के अभियोग में/ खड़ी थी हंजूरी अदालत में
अदालत की दीवारें ठंडी थीं।
फिर जेल में पड़ी रही/ हंजूरी पेट पालती
जेल का आकाश ठंडा था
लेकिन आज जब वह जेल से बाहर है/ तब पता चला है
कि सब कुछ ठंडा ही नहीं था-
सड़ा हुआ था/ सड़ा हुआ है
सड़ा हुआ रहेगा/ कब तक?83
कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह (1928-1992) हत्या और आत्महत्या की विभेदक रेखा पर विचार करते हैं। नवार्जित जनतंत्र और गाँधी के समाजवादी भारत में दलितों पर हिंसा मुसलसल ज़ारी है। यह पुरानी हिंसा से भिन्न है। दलित अपनी आधी-अधूरी जागृति की कीमत चुका रहे हैं। ‘च व री’ शीर्षक कविता84 में कुमारेन्द्र जातिवादी हिंसा की घटनाओं की फेहरिश्त देते हुए कहते हैं कि चवरी में घटी नई हिंसा उसी की अगली कड़ी है। लेकिन, यह चवरी है कहाँ? यह जलियाँवाला बाग़ से कितनी दूर है, वियतनाम से कितनी नज़दीक है? जो सड़क चवरी से निकलकर दिल्ली को जाती है उसकी लंबाई क्या है? “चवरी की हरिजन टोली के नौजवानों के धुंधुआते पेट से/ खींचकर बाहर लाई गई अंतड़ियों की लंबाई क्या है?” इन्हीं मारे गए युवकों में एक लाल मोहर भी था। गौने में घर आई उसकी नवब्याहता रामकली इस जनतंत्र का और इसके गर्वीले स्तंभों का क्या करे-
जिसे कहते हैं/ मुल्क/ प्रशासन/ न्यायपालिका
उसका रामकली के लिए क्या अर्थ रह गया है?
रामकली गुम होकर सोचती है/ और उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा है!
लाली गौने आई है/ और लाल मोहर उससे छीनकर मिटा दिया गया है
वह समय के सामने/ अकेली बुत बनी रहती है – उसकी बेबाक आँखों के लिए
दिन और रात में कोई फ़र्क नहीं रह गया है।
अँधेरे और उजाले का फ़र्क मिटना ही हत्या और आत्महत्या का एकमेक हो जाना है। दलितों की छान-झोपड़ी के नीचे सिर झुकाए बैठा जनतंत्र अपनी विफलता का शोक मना रहा है। कवि वैकल्पिक नामों पर विचार करना चाहता है। उसे श्रीकाकुलम और नक्सलबाड़ी बहुत छोटे नाम लगते हैं। जिस समाजवादी जनतंत्र को पाने के लिए इतने संघर्ष किए गए, इतने उत्सर्ग किए गए उसकी ट्रेजेडी बड़ी भीषण है। रामकली के ब्याज से कवि सत्ता-व्यवस्था से, पूज्य भारतमाता से प्रश्न करता है-
आत्महत्या के लिए सबसे माक़ूल वक़्त तब होता है
जब रोशनी से अंधकार का फ़र्क मिट जाता है
बोल, फिर क्या बात है- आत्महत्या कर लेगी?
या अँधेरे से घबराया हुआ कोई हाथ बढ़कर/ तेरा गला दबोच देगा?85
कुमारेन्द्र की ‘च व री’ शीर्षक कविता कवि की सूचना के आधार पर 26 मई, 1973 को लिखी गई थी। यह ज्ञात नहीं कि कविता पहले किस पत्रिका में छपी। भीष्म साहनी द्वारा राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ के लिए संपादित काव्यसंग्रह ‘रास्ता इधर है…’ में ‘च व री’ को शामिल किया गया। यह संग्रह दिसंबर 1978 में दिल्ली से छपा था। कुमारेन्द्र का अपना संग्रह इसके अगले साल जून, 1979 में ‘इतिहास का संवाद’ नाम से श्रीकला प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इसमें आलोच्य कविता के शीर्षक में तब्दीली करके ‘चवरी’ कर दिया गया है। इन दो रूपों में क्या अंतर है? कविता एक दलित नरसंहार पर लिखी गई है। आक्रोश की अधिकता स्वाभाविक है। यह आक्रोश ही संभवतः अक्षरों को अलग-अलग कर दे रहा है। ‘च व री’ से ‘चवरी’ में परिवर्तन पर कुमारेन्द्र ही रोशनी डाल सकते थे लेकिन संग्रह की भूमिका में इस पर कुछ लिखा नहीं गया है। भूमिका में कुमारेन्द्र बताते हैं कि उनके पुरखे भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बाबू कुँवरसिंह के पक्ष में अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े थे और उनका परिवार टूट-बिखर गया था। कुमारेन्द्र स्वयं 1942 में आज़ादी की निर्णायक लड़ाई में शामिल हुए। तब “घर वालों में से किसी ने कोई प्रतिवाद-प्रतिरोध नहीं किया था।”86 स्वाधीनता आंदोलन में संलग्नता से “मुल्क मुझमें और मैं मुल्क में जन्मने लगा था।” देश से एकमेक होने का नतीज़ा था कि “उसके संघर्षशील तबके से मेरा परिचय हुआ, और वह परिचय प्रगाढ़ आत्मीयता में बदलकर धीरे-धीरे अपना अर्थ-प्रसार करता गया…।”87 इस प्रगाढ़ता में निश्चित ही उस विचार-दृष्टि ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की होगी जिससे वे जुड़े थे और जो उनकी कविताओं को पढ़कर ही जानी जा सकती है। ‘इतिहास का संवाद’ संग्रह में दलित जीवन से जुड़ी कई कविताएँ हैं। ‘भंगी कोलनी (1)’ और ‘भंगी कोलनी (2)’ में कवि की दलित स्त्री दृष्टि विन्यस्त है। कविता का पहला भाग मई 1968 में तथा दूसरा उसके एक दशक बाद मई 1978 में लिखा गया था। पहले भाग का नैरेटर कवि से अभिन्न प्रतीत होता ‘मैं’ है और दूसरे की नैरेटर वह दलित स्त्री जिससे ‘मैं’ प्रेम करता है। इस तरह दोनों कविताएँ मिलकर दलित स्त्री के संबंध में दो भिन्न दृष्टियाँ पेश करती हैं।
‘भंगी कोलनी (1)’ के वाचक को उस दलित स्त्री से प्रेम है जो कभी सबकी प्रियपात्र थी और आज “मैं देखता हूँ,/ वे तुम्हें घसीटकर बाज़ार में डाल चुके हैं।”88 वाचक “अपने तमाम दुःख-दर्द भूलकर/ तुम्हारे फट रहे होठों पर कोई नई मुस्कान ला देना चाहता” है। नैरेटर चाहता है कि वह अपनी प्रेयसी के पास रहे “मगर हो नहीं पाता/ लोगों की आँखें मुझ पर लगी रहती हैं”। उसकी कामना है कि इस स्त्री के दिन बहुरें “तुम्हारा शरीर एक बार फिर से कलस उठे,/ चेहरा कुछ लाल हो जाये,/ आँखें नई रोशनी पाकर चमक उठें!” लेकिन ऐसा हो नहीं पाता “सहसा कोई कंकाल/ मेरी चेतना पर आकर गिरता है,/ और तुम्हारी बे-बसन रजस्वला हक़ीकत/ मेरी-/ मेरे वतन की बीमार नग्नता को/ लाकर सामने खड़ी कर देती है।” कुल 14 अंशों में लिखी इस कविता के आठवें अंश में कवि याद करता है कि जब ढलती रात उसे चीख सुनाई पड़ी थी तो वह बदहवास नींद से उठकर उस स्त्री के पास पहुँचा था। “तुम खून से लथपथ बेहोश पड़ी थीं/ और आँखें खुली की खुली रह गई थीं।” विडंबना देखिए कि नैरेटर पर ही रेप का आरोप मढ़ दिया गया। हाकिम ने भी उसे अपराधी समझा। उसकी मुश्कें कस दी गईं। कविता के अगले हिस्से में कवि उस स्त्री के पति को कठघरे में खड़ा करना चाहता है। उस स्त्री के गोद में एक बच्ची है। स्त्री सूप, बेना (पंखा) और दौरी (चटाई) बनाकर-बेचकर आजीविका का प्रबंध करती है। उसको नहीं मालूम कि उसका पति दारू-ताड़ी पीकर कहाँ पड़ा हुआ है। उसके साथ तीन-तीन बार बलात्कार हुआ है। तीन-तीन बार वह गर्भपात की यंत्रणा से गुज़री है। पति की हैवानियत अपनी जगह है- “तुम्हारा स्वामी/ जब भी आता है, तुम्हें छप्पर के नीचे से/ बाहर सड़क पर खींच लाता है/ बिजली की रोशनी से बाहर का अँधेरा/ उसे ज़्यादा माफ़िक लगता है।” यह एक ऐसी समाज संरचना है जहाँ नोचने वाले हाथ हर तरफ़ से बढ़े हुए हैं। सब अपनी बारी उस स्त्री को खसोटते हैं- “तुम जितने साल की नहीं उससे अधिक ज़ख्म/ तुम्हारे शरीर पर अंकित हैं/ और तुम्हारी आँखें/ अपनी बच्ची के अनिश्चित भविष्य को पढ़ पाने में असमर्थ/ एक खौफ़नाक अन्धकार से जूझती रहती हैं-/ अन्धकार, जिसका अर्थ होता है- भूख और बलात्कार!” गुलाम देश से स्वतंत्र मुल्क का अंतर और उससे उपजा सुख अन्य लोग जानते होंगे। दलित स्त्री से पूछिए तो एक अनजानी हक़ीकत पता चलेगी- “मुल्क की आज़ादी का/ तुम्हारे लिए कभी कोई और अर्थ नहीं रहा!” कवि इस स्त्री का प्रतिसाद चाहता है। अपनी भावनाओं पर उसकी प्रतिक्रिया जोहता है। प्रत्युत्तर में हर बार उसका मौन पार वह अपने को कठघरे में खड़ा देखता है। वह अनुमान नहीं लगा पाता कि उसकी ग़लती क्या है। उसकी “हर सुबह/ उन जगहों को सहेजने में खर्च हो जाती है/ जहाँ तुम पर बलात्कार हुआ है,/ या गर्भपात हो जाने पर तुम डूब-डूब गई हो।” ऐसा हिंसक और वीभत्स मुल्क कवि को स्वीकार नहीं। वह एक भिन्न मुल्क का तसव्वुर करता है। सामाजिक पदानुक्रम में सबसे नीचे अर्थात् दलित स्त्री के अवलोकन बिंदु पर स्थिर होकर ऐसे मुल्क का नक्शा बनाता है जहाँ हिंसा न हो, सुखपूर्वक जीवन निर्वाह किया जा सके- “और मेरा यह विश्वास है,/ कल अपने वतन के जिस्म पर/ उससे सही और ख़ूबसूरत नक्शा और कोई नहीं/ उतरेगा!”
‘भंगी कोलनी (2)’ उस अनाम दलित स्त्री का बयान है जिससे कवि प्रेम करता है और जिसके अनुरूप नए वतन का तसव्वुर कर रहा है। स्त्री का बयान अपेक्षाकृत छोटा लेकिन सुगठित है। हिंदी कविता के इतिहास में कोई दलित स्त्री संभवतः पहली बार इतने विस्तार से अपनी बात रखने का अवसर पा रही है। रक्तिम जीवनानुभवों ने उसे यथार्थपरक, निर्मम और स्पष्टवादी बनाया है। वह कवि की तरह प्रेमिल भावनाओं की दुनिया में नहीं है। अपने बयान में वह कवि की भावना के प्रति आभार जताती है लेकिन उसे अपना संरक्षक (पैट्रन) मानने से इनकार करती है। उसके लिए कवि की चिंता निष्प्रभावी है क्योंकि “तमाम हो-हल्ला के बावज़ूद/ मुझे लोग ऐड़ी के नीचे मसलते रहते हैं।” कवि बेशक उसके दुख से दुखी होता है, उसे सुखी देखना चाहता है “मगर ई सब से क्या होगा-/ तुम्हारे दुःख का रिश्ता मेरे सुख से नहीं है।” स्त्री उस प्रकरण को भी याद करती है जब उसकी चीत्कार सुनकर कवि वहाँ पहुँचा था और उसे ही बलात्कारी ठहरा दिया गया था- “उस रात तुम्हें बहुत पीटा गया था/ और जब तुम खून से नहाये बेहोश पड़े थे,/ तुम्हें रस्सा लगाकर थाने पहुँचा दिया गया था।/ मुझे इसका दुःख है-/ बहुत दुःख है।” उस स्त्री का कहना है कि उसकी सुरक्षा का एक सिरा उसके घर से जुड़ा है- “जब तक मेरे घर की छत और दीवारें पोख्ता नहीं होतीं,/ तब तक तुम्हारे जान दे देने से भी मैं कहाँ बचूँगी!” सुरक्षा का दूसरा सिरा उसके ‘पुरुष’ की गति-मति से सम्बद्ध है- “जब तक मेरे घर वाले/ दारू की बोतल और ताड़ी की लबनी में/ क़ैद होने के लिए/ अपनी जबान और हाथ कटाते रहेंगे,/ तब तक मेरी खैर कहाँ है!” इसके बाद वह वर्चस्व की छानबीन करती है। वर्चस्व जाति का नहीं, संपत्ति का है, सत्ता पर अधिकार का है। “जिसकी जेब में पैसा,/ और हाथ में अधिकार होता है/ वह आदमी फिर दूसरा कैसे हो जाता है?” यह दूसरा ‘अन्य’ है। ‘अन्यीकरण’ में धन और अधिकार निर्णायक होते हैं। “बाबू, ई दूसरा आदमी,/ चाहे मेरी झोपड़ी में हो, चाहे तुम्हारे घर में,/ उसकी जात एक होती है।” अपने अनुभवों की रोशनी में सत्ता-विश्लेषण करने वाली यह स्त्री बयान के अंतिम हिस्से में उन सारे बिंदुओं को एक साथ रखती है जो उसकी, उसके जैसी अन्य स्त्रियों की स्थिति बदल सकते हैं। महत्त्वपूर्ण है कि स्त्री अपने अनुकूलन (कंडीशनिंग) की शिनाख़्त कर पाती है। अपनी स्वायत्तता/एजेंसी को अपने हाथ में रखने की माँग उसकी गहरी समझदारी का सबूत है-
बाबू, करना ही है तो पहले इस दूसरे आदमी का/ हिसाब करो।
और फिर मेरी छत और दीवारों को भी
अपनी-सी मजबूत करो-
किसी के भी सामने फैलने की
मेरे मुँह और हाथों की आदत को बदलो-
अपने ढंग से बोलने,
और अपने ढंग से उठने का
उन्हें मौका दो!89
‘गाँव’ इस काव्य-संग्रह की आख़िरी कविता है।90 कविता कथ्य और कलेवर दोनों में बड़ी है। इस आख्यानमूलक कविता में अभिधा और व्यंजना दोनों में अँधेरा व्याप्त है। सितंबर ’77 में लिखी यह कविता तीन दशक पहले स्वतंत्र हुए देश का लेखा-जोखा (सोशल ऑडिट) है। हिंदी की प्रगतिशील कविता इस ऑडिट के लिए पहचानी गई तो धिक्कारी भी गई। उसने साफ-साफ कहा कि आज़ादी अधूरी है। दलितों की जीवन-स्थिति ही वह कसौटी थी जिसके आधार पर यह अधूरापन पहचाना गया। आलोच्य कविता में कवि ने आत्मकथात्मक शैली में गाँव वापसी का चित्र खींचा है। इस वापसी में गाँव-मोह (नास्टैल्जिया) के तत्त्व हैं लेकिन मोह को दरकाने वाली मनःस्थितियाँ भी प्रबल हैं। कविता के बड़े हिस्से में अँधेरा है। इसी अँधेरे में वह गाँव पहुँचता है। सिवान (गाँव का बाहरी इलाका) में उसे बंदूक-भाले लिए लोग मिलते हैं। इनसे निपटकर वह खंडहर प्रतीत होते गाँव में प्रवेश करता है। यह सुबह का जाता हुआ अँधेरा है- उजड़ता हुआ – बसता हुआ, मरता हुआ – जनमता हुआ गाँव इस नीम अँधेरे क्रमशः भासमान हो रहा है। कवि भरोसा नहीं कर पाता है यह उसी का गाँव है। फिर उसे एक-एक कर वे आत्मीय लोग याद आते हैं जिनके कारण गाँव से टूटता-सा नाता पुनः जीवंत होने लगता है। इनमें सबसे पहले माँ है, फिर जमींदरवा बो है। उसके बाद जिरवा (धोबिन), रामगहना (डोम), तेनिया (मुसहर), कुर्बान मियाँ, हुसेन मियाँ, बलिया, भोलवा आदि हैं। माँ के तुरंत बाद जमींदरवा बो इसलिए याद आईं कि उन्होंने कवि को अपना दूध पिलाया था और उनके बच्चे की भी नार काटी थी। कवि की यह दूसरी माँ है जिससे उन्हें डांट और दुलार दोनों मिलते रहे हैं। जिस चमार टोली में कवि का बचपन में बहुत आना-जाना रहा वह अब पहचान में नहीं आ रही। टोला सिकुड़ गया है। कोठरियाँ बँट गई हैं। गलियाँ रुंध गई हैं। कवि बड़ी मुश्किल से जमींदरवा बो का घर खोज पाता है। जमींदरवा बो कवि को पहचान नहीं पाती। उसकी आँखों ने बहुत पहले साथ छोड़ दिया था। छोटा बेटा मजदूरी की लड़ाई में मारा गया। बड़ा अपनी पत्नी की हिफाज़त के लिए गाँव छोड़कर चला गया था। जिरवा की कहानी अलग नहीं थी। उसका बेटा बीतना ‘बड़की दालान’ पर पीटे जाने के बाद खून की उल्टी करके मर गया था। बाकी दलितों की ज़िंदगी भी ऐसे ठहरी-सी दुख और आक्रोश में डूबी है-
और इस तरह यह गाँव/ इस कोने से उस कोने तक धह-धह जलता रहता है।
जलता रहता है,/ कि कहीं चंदवा रूपसपुर जलता है
कहीं चंवरी जलता है, कहीं मधुबन जलता है,/ कहीं बेलछी और पिपरा जलता है!
और आसमान जब कभी भी बरसता है,/ सिर्फ़ पेट्रोल छिड़कता है-
आग जहाँ नहीं लगी रहती वहाँ भी/ धधक उठती है!
इस आगजनी में दलित मारे जा रहे हैं। किसी अग्निकांड में लालमोहर मारा गया है तो किसी में कैलाश, किसी में देवला तो किसी में गभीरा। कविताओं में आया हुआ जो ‘मैं’ है इन सबसे मिलकर बनता है। इस मैं पर जितना हक़ ‘मेरी माँ’ है उतना ही जमींदरवा बो का है, जिरवा का है, बलिया, रतना, तेनिया… का है। अँधेरे की ये आगजनी अँधेरा उगलती है। “और यह अँधेरा जो बिलकुल एक अलग किस्म का है/ मरा दुश्मन नहीं, अभी रहबर है-/ सूरज को मुक्त कर लेने तक मुझे इसका पीछा नहीं छोड़ना है।”91 कोई चाहे तो ‘शक्तिपूजा’ (निराला) की घन-अंधकार उगलती अमा निशा की याद कर सकता है लेकिन यह साम्य दूर तक नहीं चलेगा। स्वानुभूति और समानुभूति में अंतर रहेगा ही। कुमारेन्द्र ने अपने ‘प्रबंधात्मक निबंध’ ‘काव्यभाषा का वामपक्ष’ में अपने समय के कई कवियों की स्त्री-दृष्टि की आलोचना की है और दलित व ग़ैरदलित स्त्री को जीवन स्थितियों के आधार पर भिन्न-भिन्न माना है- “…स्थिति-भेद से एक संदर्भगत अंतर आ जाता है और फिर समान होते हुए भी धरती और/या आसमान का अर्थ सड़क पर झाडू देने वाली किसी भंगिन के लिए वही नहीं रह जाता जो किसी साधन-संपन्न और/या सत्तानसीन महिला के लिए हो सकता है।”92 कुमारेन्द्र की कविता ‘सतमी ख़ुश नहीं है’ की दलित बालिका (सतमी) हद दर्ज़े की जिज्ञासु, अकुंठ स्वभाव वाली है। प्रकृति के हर रूप-रंग-गंध से उसका परिचय है। वह अपने घर, मुहल्ले, गाँव को समग्रता में देखना चाहती थी। अपनी जिंदगी को “अपने हाथों से सँवारना चाहती थी।” मगर उससे उसके सपने छीन लिए गए। शादी कर दी गई। तीन-तीन बच्चे हुए। फिर उन बच्चों के भी बच्चे हुए। घर बँटा, आँगन बँटा। सतमी के हृदय के टुकड़े हुए। ये बच्चे “दुश्मन से कम/ मगर ज़्यादातर आपस में लड़ते रहे/ आज भी लड़ते हैं/ कटते और मरते हैं सतमी के बच्चे।” जो सतमी कभी राहुल सांकृत्यायन की कहानी में प्रकट हुई थी उसकी जिंदगी बदलनी थी, संवरनी थी। कहने को देश बदल गया। पराधीन से स्वाधीन हो गया। लेकिन,
सतमी जर-जर है,/ दिन गिन रही है
खंड-खंड सपनों को/ साँसों के धागों से बाँधती है
खड़ा कर रही है।/ सतमी ख़ुश नहीं थी
सतमी ख़ुश नहीं है93
निराला की पत्थर तोड़ने वाली श्रमिका अनाम थी। कुमारेन्द्र ने उसे नाम से पहचाना। उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित उनके काव्य-संग्रह ‘पत्थरों का गीत’ में वह नीमा नाम से उपस्थित है। नीमा पत्थरों की छाँह में जन्मी और सयानी हुई है। रास्ता बनाने के लिए पत्थर तोड़े जाते हैं या पत्थर खुद ही रास्ता देने के लिए टूट जाते हैं- यह कविजनोचित जिज्ञासा है। आदमी और पत्थर में मुक़ाबला चल रहा है। आदमी पत्थर और पत्थर आदमी होता जा रहा है। नीमा पत्थर जैसे आदमियों के बीच है।
नीमा पत्थरों की कारा में बंद है,/ पत्थर नीमा की आँच में तपते हैं,
गलते-पिघलते/ और टूटते हैं।
नीमा के हँसने से पत्थर हँस सकते हैं,
पत्थरों की मुक्ति में नीमा की मुक्ति है।94
इन पत्थरों से बाहर और किसी दुनिया का पता नीमा को नहीं है। उसे इन्हीं पत्थरों से काम है। इन्हीं के बीच रहना है। वह इन्हें ठीक से पहचानती है। अँधेरा इन पत्थरों से ज़्यादा खूँखार है। अँधेरे से लड़ने के लिए पत्थरों का साथ चाहिए। नीमा अपने-पराए पत्थरों का फ़र्क समझती है। एक काँटा पाँवों में गड़ता है। दूसरा काँटा उसे निकालने के काम आता है। ‘वाद से विवाद यह ठने/ काँटा काँटे से कढ़ाओ’ (‘अमीरों की हवेली’, निराला)। नीमा ‘अपने’ पत्थरों को एकजुट करना चाहती है लेकिन उन्हें समेट नहीं पाती। उन्हें एक आसमान के नीचे खड़ा नहीं कर पाती “इसलिए दुखी… संतप्त है।” वह हार नहीं मानती। उसे नया मनुष्य बनाना है। पुरुषों को उनके पाषाणत्व से मुक्ति दिलानी है। मन ही मन प्राथमिकता तय कर चुकी है। अपनों को पहले बदलना है, बाक़ियों से बाद में जूझेगी। वह अपनों से लड़ती है। इस लड़ाई में वे परिवर्तित होते हैं। परिवर्तितों से वह नया रिश्ता जोड़ती है। समय की धारा को इसी तरह मोड़ा जा सकता है। युगांतर की शक्ति नीमा में है। भविष्य को उसी से आशाएँ हैं-
नीमा मेरी कल्पना का सच है,
सच की कल्पना नहीं।
आज की हमारी लड़ाई का सच
उसके पसीने और खून में पलता है।95
कुमारेन्द्र का काव्य-संसार वैविध्यपूर्ण और विस्तृत है। वे जिस अपनेपन के साथ वियतनाम आदि देशों की संघर्षशील जनता से जुड़ जाते हैं उसी तरह अपने देश में ही निर्वासित आदिवासियों से, उनके जीवन-संघर्षों से तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। ‘बोलो मोहन गांजू’ (मरणोपरांत 2008 में प्रकाशित) काव्यसंग्रह में शामिल उनकी कविताएँ आदिवासी जीवन पर हैं। अपने ‘वक्तव्य’ में कुमारेन्द्र कहते हैं कि दलित और आदिवासी दोनों की मुक्ति सिस्टम में पैबंद लगाने से नहीं, सिस्टम की बुनियाद में परिवर्तन लाने से होगी। वे लिखते हैं कि शोषित-दमित तबकों का सवाल ‘अपने वाज़िब हल के लिए स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और अर्थव्यवस्था को लेकर एक बुनियादी परिवर्तन की मांग करता है। और अपने मुल्क की सामाजिक-आर्थिक संरचना में यह बुनियादी परिवर्त्तन तभी आ सकता है जब समाज में मनुष्य की हैसियत को पहले उसके खून और पसीने के वजन पर आँका जाए- बुद्धि और कार्य-कौशल को मनुष्य के खून-पसीने से अलग और ऊपर करके देखना स्वयं मानवीय विवेक का ही उपहास होगा।”96 कुमारेन्द्र इन सवालों को विश्व के पैमाने पर उठाने की आवश्यकता बताते हैं। वे कहते हैं कि “आदिवासियों के रोज-ब-रोज के संघर्ष का सच, उनके बीच अजनबी बनकर चलते रहने के क्रम में, मुझे अपनी कविता के बहुत करीब का सच लगा, और उस सच को स्वर देने का काम मैंने एक ज़रूरी कार्यभार के रूप में स्वीकार किया।”97 ‘बोलो मोहन गांजू’ संग्रह में आदिवासी स्त्रियाँ अपने व्यक्तिवाचक नामों के साथ आई हैं। इसे कवि का प्रतिवाद मानना चाहिए। मिथकीय पात्र शबरी से लेकर आधुनिक आख्यानों में आदिवासी स्त्री अधिक से अधिक अपने समूहवाची नाम से ही उल्लिखित होती रही है। ‘ख़ुश-बू’ शीर्षक कविता में कुमारेन्द्र इस प्रवृत्ति की तरफ़ ध्यान दिलाने के लिए ही आदिवासी स्त्री से प्रश्न करते है- “तुम्हारा नाम क्या है, चम्पाकली?” जाहिर है चम्पाकली कवि का दिया हुआ नाम है। स्त्री का जवाब है कि उसका नाम स्थिर नहीं। जब वह टेसू का फूल लेने जाती है तब सखियाँ उसे टेसू कहती हैं। जब वह महुआ बीनती है तब मादल उसे महुआ कहकर बुलाता है। नाम जानने की ज़िद करने वाले इस व्यक्ति से वह स्त्री डरी हुई लगती है। उसकी निगाह में वह पुरुष करैत (जहरीला साँप) है-
जंगल-जंगल/ इस तरह निश्शंक घूमने वाले/ वो करैत
दया करके/ अपना विष मुझ पर मत उतारना-
ठीक से पता करके कभी/ अपना नाम बता दूँगी।98
कवि चम्पाकली का शत्रु नहीं। वह तो उसका हितैषी है। वह चाहता है कि चम्पाकली अपने शत्रु को पहचाने। यह शत्रु इस जंगल के रस पर पल रहा है। शत्रु को नष्ट करना है तो फ़ौरी तौर पर जंगल का मोह छोड़ना होगा। दुश्मन से छुटकारा पाने के लिए जंगल को आग के हवाले करना होगा- “तुम्हारी तमाम हँसी-खुशी/ तुम्हारी किलकारियाँ छीन लेने वाला/ तुम्हारा शत्रु/ इसी जंगल में छिपा है।/ और आज/ किसी भी चीज़ से पहले/ तुम्हें आग की ज़रूरत है।/ मगर तुम अभी/ इस जंगल में आग लगाने से/ क्यों घबड़ाती हो?”99 चम्पाकली को यह स्वीकार नहीं। जिस जंगल में उसका सुवना है, मेमना है, मादल है, बंसी है उस में आग कैसे लगाई जा सकती है? स्त्री कहती है कि बाहरी आग से ज़्यादा कारगर उसके भीतर की आग है। वह उसी से जलाएगी। जंगल को लेकर दो दृष्टियाँ इस कविता में विन्यस्त हैं। जो बाहर से आया ‘हितैषी’ है उसे जंगल से कोई मोह नहीं। उसकी प्राथमिकता दुश्मन को जला डालने की है, भले ही उसके लिए जंगल को ही आग के हवाले कर देना पड़े। उधर चम्पाकली इस जंगल से आवयविक रूप से जुड़ी है। जंगल खाक हुआ तो उसकी सारी स्मृतियाँ, उसका पूरा वर्तमान बिला जाएगा।
सुरसती ओराँव जनजाति की थी। जब उसका बालक दसवा दूध पीता शिशु था तभी वह यौन हिंसा का शिकार हुई थी- “सुरसती को रौंदकर चील्ह-कौवों के लिए/ नंगे छोड़ दिया था दरिंदों ने, और दसवा ने पेड़ पकड़कर/ खड़ा होना सीखा था।”100 वह दसवा आज पत्थर तोड़ता है, कोयला काटता है। उसका पसीना मालिक के लिए सोना उगल रहा है मगर उसकी औकात मिट्टी की भी नहीं है। कवि मोहन गांजू को सलाह देता है कि वह धीरे-धीरे खड़े हो रहे दसवा को “अपने कंधे का सहारा” दे। नदी, पहाड़, जंगल को मिलजुल कर बचाए।
बानी मुंडा अपने कुनबे सहित उजाड़ दी गई है। उसे अपनी नदी से बहुत दूर रहना पड़ रहा है। उसका पति माधव शराबी हो गया है। उसकी हड्डियाँ गली जा रही हैं। बानी उसे बचाना चाहती है। वह अपने को, अपने परिवार को और स्मृतियों में सुरक्षित अपनी जगह को महफ़ूज़ रखना चाहती है- “बानी कभी-कभी नदी के और पहाड़ के सपने देखती है/ नदी में नहाती है, ताज़ा हो जाती है पहाड़ चढ़कर/ और झरना के किनारे/ खड़ी होकर उसमें आसमान खोजने लगती है।101” कवि इस बानी से मोहन गांजू का परिचय कराना चाहता है- “इस बानी को जानते हो महँ गांजू? बानी आग में/ पानी और पानी में आग है।”
फूलमनी गुन्नू की माँ है। वह कोयले से पत्थरों को अलगाने का काम करती है। जो समय उसके बच्चे को मिलना चाहिए वह मजदूरी की भेंट चढ़ जाता है। गुन्नू कोयला ढोने वाले ट्रकों की घरघराहट में बड़ा हो रहा है। गुन्नू की आँख में रोशनी का पैगाम भर रहा है- “कोई अँधेरा नहीं जो पस्त-हिम्मत दिमाग/ करे उसे, क़दमों को रोक ले वह बाधा नहीं। खून और कमाई का रिश्ता ठीक करते हुए अपना इतिहास खड़ा कर रहा है गुन्नू।”102 शाधला मीलों दूरी तय करके काम पर जाती है। उसके साथ और भी कई आदिवासी स्त्रियाँ हैं। इनके श्रम से राजधानी सज-संवर रही है। राजधानी और जंगल के बीच का रास्ता साफ करने में इन लोगों को लगाया गया है। राजधानी इससे बेखबर है। इस बेखबरी को बनाए रखने में ठेकेदार और मुंशी मुब्तिला हैं। कवि पूछता है- “शाधला और फूलमनी और वसंती की/ खुशबू को रौंदकर कब तक खड़ी रहेगी राजधानी,/ मोहन गांजू? शाधला माथा पर सारा मुल्क उठाकर/ चलती है,/ और जंगल के पास उसके पसीने का हिसाब है।”103 फूलमनी की कहानी हाट से जुड़ी है। हाट जाना उसकी मजबूरी है या बना दी गई है। उसे कल पूनो की रोशनी में नाचना है और आज उसकी बिंदिया हेरा गई है। हाट जाती फूलमनी को सेमल रोक लेता है। उसे बटमारों की चाल से, सेठ-साहूकार-ठेकेदार के जाल से आगाह करता है। फूलमनी सब समझती है लेकिन वह हाट जाने से बच नहीं सकती- “हाट जंगल को धीरे-धीरे चाटती जा रही है-/ बोली लगाने लगी है अब नदी और पहाड़ पर। जंगल के बाघ/ और मोर भी ग़ायब होने लगे हैं,/ फिर फूलमनी कैसे बच जाएगी!”104 रन्नो की ‘नियति’ फूलमनी से भिन्न नहीं। वह सुबह-सुबह काम पर निकलती है। डहर या जंगल की पगडंडी से उसका नाता इतना गाढ़ा कि वहीं उसे पहुँचा देता है और वापस ले आता है। डहर और रन्नो एकमेक हो गए हैं- “रन्नो को कभी-कभी डहर का ख़याल नहीं रहता, मगर/ डहर रन्नो के ख़याल में ही जगती और सोती है। रन्नो/ उसके सपनों में खड़ी रहती है, और जिस दिन घर से/ नहीं निकलती, या लौटने में देर हो जाती है, डहर के लिए/ न सूरज डूबता है, न चाँद उगता है, और जंगल/ ठंडा पड़ जाता है। … रन्नो डहर की भूख और आँखों की नींद है,/ आने वाली सदी/ इसी डहर के सपनों में खड़ी हो रही है।”105
कविता में जान और मायने कब पैदा होते हैं? यह प्रश्न सामने रखकर रघुवीर सहाय (1929-1990) ‘दूसरा सप्तक’ (1951) के अपने वक्तव्य में कहते हैं कि जब कवि की बौद्धिक चेतना जाग्रत होगी, यह जागरूकता निरंतर अद्यतन होती रहेगी, “दृष्टिकोण सामाजिक, वास्तविक, साम्यवादी और इसीलिए सही और स्वस्थ होगा। तभी कविता में जान और माने पैदा होंगे।”106 सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की तरह रघुवीर सहाय के यहाँ व्यक्तिवाची नाम के साथ दलित स्त्री नहीं है। वे ‘हंजूरी’ जैसी आख्यानपरक कविता भी नहीं लिखते हैं। उनकी कविता में दलित स्त्री के साथ कवि का जैसा वैयक्तिक नाता बनता है वह अवश्य उल्लेखनीय है। ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ’ (1989) संग्रह में शामिल उनकी ‘मेरी बेटी’ नामक कविता देखिए-
दुबली थकी हारी एक छोकरी काम पर जाती थी
दूर से मैंने उसे आते हुए देखा
पर जितनी देर में मैंने पहचाना वह मेरी ही बेटी थी
उतनी ही देर में कितनी बदल गई।107
आइडेंटिफिकेशन की यह संश्लिष्ट गतिशीलता जाति, जेंडर और क्लास के डायनामिक्स से निर्मित है। इसी तरह ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ (1967) संग्रह में ‘चढ़ती स्त्री’ कविता है-
बच्चा गोद में लिए
चलती बस में/ चढ़ती स्त्री
और मुझमें कुछ दूर तक घिसटता जाता हुआ108
स्त्री जीवन की दारुण अवस्थाओं के जितने चित्र रघुवीर सहाय के यहाँ मिलते हैं उतने अन्यत्र विरल हैं। ‘सीढ़ियों पर धूप में’ (1960) की ‘पढ़िए गीता’ अपने विडंबना बोध के कारण ख्यात है। दारुण अवस्था वाला चित्र ‘हँसो हँसो जल्दी हँसो’ (1975) की ‘सेव बेचना’ कविता में मिलता है- “मैंने कहा डपट कर/ ये सेव दागी हैं/ नहीं, नहीं साहब जी/ उसने कहा होता/ आप निश्चिंत रहें/ तभी उसे खाँसी का दौरा पड़ गया/ उसका सीना थामे खाँसी यही कहने लगी।”109
भारतीय लोकतंत्र की विडंबनाओं पर ध्यान दिलाने वाले कवियों में रघुवीर सहाय अग्रणी हैं। वे जानते हैं कि सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं हुआ है, जनता में उसका भ्रम अवश्य फैलाया गया है। सत्ताधारी पुराने हैं। उनका पहनावा नया है। इस लोकतंत्र से असंतुष्ट लोगों के लिए विरोध का एक काउंटर खोलकर उन्होंने आवाज़ उठाने का मौका तो दिया है लेकिन इसी से पुराने स्नायुतंत्र को सुरक्षित भी कर दिया है। दमन का प्रतिरोध करने वाली दलित जनता जब ‘अपने’ प्रतिनिधियों को सत्तातंत्र में आसीन होते देखती है तो वह इसे अपने संघर्षों की विजय मानती है। कवि इस बोध को प्रश्नांकित करता है। ‘लोग भूल गए हैं’ (1982) संग्रह में ‘भविष्य’ शीर्षक कविता का समापन अंश देखिए-
जब दलित लोग दमनकारी के तंत्र की
उनहार करते है अपने को सान्त्वना
देते हैं हम जीते सबसे बड़ी जीत
दमन की होती है उस पर दलित को
बधाइयाँ देती है दमनतंत्र की प्रजा110
जिस स्त्री को निराला ने ‘इलाहाबाद के पथ पर’ पत्थर तोड़ते देखा था उसे उनकी परंपरा के कवियों ने अन्य जगहों पर खटते देखा। मध्यप्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े मलय (1929-2024) ने उस स्त्री को भरी दोपहरी तमतमाते घाम में सिर पर टोकनी रखे अंगूर बेचते पाया। ‘इच्छा की दूब’ (2011) संग्रह की ‘टोकनी भर छाया’ कविता में इस स्त्री की संघर्ष-कथा है। साहित्य के उद्देश्य पर बोलते हुए प्रेमचंद ने कवियों से जिस मेयार को बदलने की अपील की थी उसका स्मरण कराती यह कविता ‘भूख के लय’ से संवलित, ऊँची आवाज़ में लोरियों के रूखे, अकड़े, गड़ते टुकड़े टेरती, उफनती आँच से गीले बोरे की तह के नीचे अंगूरों के गुच्छे बचाती आशंका-बोझिल किंतु स्वाभिमान पूरित स्त्री की अविस्मरणीय प्रोफाइल है। ‘तोड़ती पत्थर’ वाली स्त्री दिवा की तमतमाती दोपहरी में छायाहीन पेड़ के नीचे हथौड़ा चलाती सामने तरु-मालिकाओं से घिरी अट्टालिका पर नज़र डाल लेती है इधर मलय की कविता में-
तपी कड़ाही में से जैसे/ सड़क खौलकर निकली और बिछ गई
गली-गली दूर-सुदूर तक/ जैसे आग भरे रास्ते!
बाजू में/ या उधर बंगलों के अंदर
कूलर हैं, फ्रिज हैं/ ए सी में हैं
बैठे हुए जज111
अपनी कई अन्य कविताओं में भी मलय ने दलित स्त्री के स्वाभिमान, संघर्ष और स्वप्न को वाणी दी है। ‘खेत में’ नामक ऐसी ही कविता में अपने इकलौते खेत पर फसल काटने आई स्त्री की यह छवि उल्लेखनीय है- “इकलौते खेत की/ फसल काटती/ माँ ने/ गले और कमर में/ गमछे के छोरों को/ बाँधकर/ बच्चे के लिए/ झोली को/ पालना बनाया/ और पीठ पर लटका लिया/ झूलते चाँद से चेहरे से/ हिम्मत के हौसले में/ खेत क्या/ खाली घर भर गया/ दुखों में डूबे हुए/ चीथड़ों ने थाह पाई!/ प्रसन्न हवाओं में/ उड़ने का अवसर यह/ मिल ही गया/ माँ ने रूककर/ कमर सीधी की/ कुछ सोचा…/ नज़र डाली/ फसल पर/ खेत में!”112
जातिवादी, सूदखोर, पुरुषवादी समाज से परिचित लोग जानते हैं कि अपनी तैयार फसल पर निगाह डालकर स्त्री के ‘कुछ सोचने’ में कितना अर्थ समाया हुआ है। मलय ऐसी श्रमिक स्त्रियों की दुश्वारियों को शब्द देते हैं। उनकी लंबी कविता ‘निर्मुक्त अधूरा आख्यान’ के चौथे हिस्से की कुछ पंक्तियाँ हैं-
दिहाड़ी मजबूरी की भी मजबूरी/ भुखमरी की अबाध बिखरी हुई सेनाएँ
चबाती हुई आकाश खदानों से खेतों तक/ मालिकों के घर में भी घुसें तो
झुकी नज़रें झाडू से बुहारती स्वयं को भी/ फिर पोंछती चीज़ों को इस तरह
बिना छुए रहने का काँपता-सा अहसास।113
राजकमल चौधरी (1929-1967) की रचनावली में शामिल एक कविता पढ़ते हुए हमारा ध्यान प्रगतिशील कवियों के एक अनचीन्हें पक्ष पर जाता है। यह कविता दलित स्त्री का नकारात्मक-आपत्तिजनक चित्रण करती हैं। ऐसी ही कविता रघुवीर सहाय और धूमिल की भी है। पहले इन कवितांशों पर नज़र डाल लें-
राजकमल चौधरी-
भाव की वर्षा से भीगी स्मृति/ एक तरफ़ दरभंगा के अपने गाँव की
सुखद याद और दूसरी तरफ़/ अलस्सुबह दरवाज़े के पास पटने की राजनंदिनी
कानी मेहतरानी की कर्कश ध्वनि114
धूमिल-
रात/ एक भंगिन की/ काली कलूटी
अनब्याही बेटी है/ जो झाडू सिरहाने रख/ सो गई
और सुनहली आँखों वाली/ असंख्य नीली मक्खियाँ
उसके चारों ओर/ भनभना रही हैं।115
रघुवीर सहाय-
टोकरी सिर पर उठाए हुए
कठोर कुचों को उभारे
गोरे बदन पर पान की पीक और मैल धारे
मेहतरानियों से लड़ते-लड़ते बचा116
इन तीनों कविताओं को आधार बनाकर प्रगतिशील काव्यधारा की अब तक बनी समझ की समीक्षा की जा सकती है, की जानी चाहिए। दलित स्त्री के इस चित्रण को आपत्तिजनक नहीं मानेंगे तो और क्या मानेंगे? हाँ, समीक्षा या भर्त्सना करने से पूर्व इनके संबंध में ज्ञात साझी विशेषताओं को समझ लेना उचित होगा-
- ये आलोच्य कवियों की आरंभिक दौर की कविताएँ हैं।
- ये अप्रकाशित हैं।
- इन्हें रचनावली के संपादकों ने कवियों की मृत्यु के पश्चात संकलित-प्रकाशित किया है।
राजकमल चौधरी रचनावली के संपादक देवशंकर नवीन की टीप है कि संदर्भित कविता एक कहानी ‘धर्मप्रिया तर्कनिष्ठा’ प्रो. रामदेव झा के पास प्रकाशनार्थ भेजी गई थी। कविता के रचनाकार के रूप में शशि चौधरी का नाम था। शशि चौधरी राजकमल की पत्नी थीं और वे लेखिका नहीं थीं। राजकमल चौधरी कई छद्म नामों से लिखा करते थे। उनमें एक नाम शशि चौधरी भी था। कविता प्रकाशित नहीं हुई। रघुवीर सहाय रचनावली के संपादक सुरेश शर्मा के अनुसार उक्त कविता 1952 में लिखी गई थी और “संभवतः अप्रकाशित” है। धूमिल समग्र का संपादन करते हुए डॉ. रत्नशंकर पाण्डेय ने संदर्भित कविता को ‘असंग्रहीत कविताएँ’ खंड में रखा है। अनुमान किया जा सकता है तीनों आलोच्य कवि संदर्भित कविताओं को अपने किसी संग्रह में स्थान देने को लेकर आग्रही नहीं थे। ज़ाहिरन, इन्हें रचनावली में शामिल करने का निर्णय संबंधित संपादकों का था। इस बिना पर आलोचक चाहें तो इन कवियों के प्रति थोड़े उदार हो सकते हैं। यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि ऐसी कविताओं का अनिवार्यतः संज्ञान लेना चाहिए। समग्र मूल्यांकन में इन संदर्भों का उचित विनियोग भी करना चाहिए। कह सकते हैं कि इन कवियों को जो संस्कार परिवेश-परिवार से मिले थे उससे आत्मसंघर्ष करते हुए ही इन्होंने अपनी चेतना का विकास किया था।
संदर्भ
72. ‘धार काफ़ी है’ (प्र.सं. 2004) संपादक ललित शुक्ल, अशोक तिवारी, लेखनी, वाणी विहार, दिल्ली, , पृ. 29.
73. वही, पृ. 236
74. ‘कर्मवाची शब्द हैं ये’ (प्र.सं. 1980), वाणी प्रकाशन, दिल्ली, ‘मुक्ति के लिए उठो’ शीर्षक कविता, पृ. 11.
75. वही, पृ. 16.
76. ‘लाल पंखों वाली चिड़िया’ (प्र.सं. 1992), राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, पृ. 17.
77. ‘शील ग्रंथावली’ (प्र,सं. 1979), यूनाइटिड बुक हाउस, चाँदनी चौक, दिल्ली, पृ. 17.
78. ‘प्रगतिवादी काव्य-साहित्य’ (संस्करण 1971), डॉ. कृष्णलाल ‘हंस’, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, पृ. 216-17.
79. ‘नंद चतुर्वेदी रचनावली’ (प्र.सं. 2024), संपादक पल्लव, राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, पृ.279-80
80. वही, पृ. 280.
81. ‘सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ग्रंथावली’ खंड : एक (प्र.सं. 2004), सं. वीरेन्द्र जैन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.
82. वही, खंड : दो, पृ. 42-43. नरई तालाब के किनारे उगने वाली वनस्पति है जिसे अति ग़रीब लोग साग की तरह खाते हैं। साग की फुनगी में कीड़े होते हैं और इसके पोले डंठलों में कभी-कभी साँप के बच्चे छिपे मिलते हैं।
83. वही, खंड : दो, पृ. 208.
84. ‘रास्ता इधर है’ : विभिन्न कालखंडों के प्रमुख प्रगतिशील कवियों की प्रतिनिधि कविताएँ (प्र.सं. 1978), राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ का प्रकाशन, चयन और संपादन- भीष्म साहनी और अन्य, नई दिल्ली, पृ. 14-16.
85. वही, पृ. 16.
86. ‘इतिहास का संवाद’ (प्र.सं. 1979), कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, श्रीकला प्रकाशन, सोहनगंज, सब्जीमंडी, दिल्ली, पृ 8. कुमारेन्द्र द्वारा लिखी भूमिका ‘कविता के बारे में’ से उद्धृत.
87. वही, पृ. 8.
88. वही, पृ. 33.
89. वही, पृ. 39.
90. वही, यह ‘गाँव’ नामक कविता 10 पृष्ठों (पृ. सं. 143-152) की है।
91. वही, पृ. 152.
92. ‘कविता का संघर्ष’ (2016), कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, प्रस्तुति एवं भूमिका- गोपेश्वर सिंह, पृ. 18. नए संस्करण का परिचय कराते हुए गोपेश्वर सिंह बताते हैं कि यह पुस्तक कुमारेन्द्र की 1986 में प्रकाशित ‘काव्यभाषा का वामपक्ष’ का ही “किंचित संवर्धित-परिवर्तित रूप है।”
93. ‘कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह की कविताएँ : प्रतिनिधि संकलन’ (प्र.सं. 2019), चयन एवं भूमिका- आनंद प्रकाश, लोकमित्र प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली, पृ. 81.
94. ‘पत्थरों का गीत’ (प्र.सं. 2005), कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, संपादन एवं भूमिका- आनंद प्रकाश, वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, पृ. 27. संदर्भित कविता कुल 12 पृष्ठों (पृ. सं. 21-32) की है।
95. वही, पृ. 32.
96. ‘बोलो मोहन गांजू’ (संस्करण 2008), कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, संपादन एवं भूमिका- आनंद प्रकाश, लोकमित्र प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली, पृ. 22.
97. वही, पृ. 24.
98. वही, पृ. 36.
99. वही, पृ. 39.
100. वही, पृ. 47-48.
101. वही, पृ. 49.
102. वही, पृ. 52.
103. वही, पृ. 54.
104. वही, पृ. 55.
105. वही, पृ. 71-72.
106. ‘रघुवीर सहाय रचनावली-1’ (प्र.सं. 2000), संपादक- सुरेश शर्मा, राजकमल प्रकाशन, पृ. 38.
107. वही, पृ. 277.
108. वही, पृ. 107.
109. वही, पृ. 162
110. वही, पृ. 213.
111. ‘इच्छा की दूब’ (प.सं. 2011), मलय, परिकल्पना प्रकाशन, निरालानगर, लखनऊ, पृ. 72-74.
112. ‘मलय रचनावली’ दूसरा भाग (2020), सं. उमाशंकर सिंह परमार, असंगघोष और संजुल शर्मा, शिल्पायन, शाहदरा, दिल्ली, पृ. 146-7.
113. वही, तीसरा भाग, पृ. 248.
114. ‘राजकमल चौधरी रचनावली’ खंड-1 (प्र.सं. 2015), सं. देवशंकर नवीन, राजकमल प्रकाशन, पृ. 51-52.
115. ‘धूमिल समग्र-1’ (संस्करण 2021), संकलन-संपादन डॉ. रत्नशंकर पाण्डेय, ‘असंग्रहीत कविताएँ’ खंड, ‘पुच्छल तारा’ शीर्षक कविता. संपादक ने कविता का रचनाकाल 13.03.1962 दर्ज़ किया है।
116. ‘रघुवीर सहाय रचनावली’-1, ‘तुर्कमान गेट- 1952’ शीर्षक कविता, पृ. 512.







बहुत बढ़िया। बेहतरीन जानकारी।
कवियों , लेखक आदि की प्रकाशित सार्वजनिक रचना से पहले वो निजी रचना होती है जो किसी भी कवि के स्व को बिना फिल्टर के दिखाती है।
एक आलोचक किसी को कथनी और करनी दोनों में तराशकर कुछ आइन पेश करता है तब दिन रात का अंतर बचा रहता है
निःसंदेह जिसमें आप सफल प्रतीत होते है क्रमवार विश्लेषण और अनेक में से एक ठोस पक्ति “अध्यात्म से उपजा समताभास तब बिखर जाता है जब भौतिक हिस्सेदारी की माँग होती है”
साथ ही कवि शील का अपने तरीके से जीवन जीना, अग्रेजों की मनसा को जाना पर पितृसत्ता की जड़ों से बच ना सके ।
प्रगतिशील धारा के कवियों पर एक अच्छी समीक्षा।