बजरंग बिहारी तिवारी के इस सुदीर्घ लेख के पांचवें भाग में : राजकमल चौधरी, परमानन्द श्रीवास्तव, विजेंद्र, कुमार विकल और चंद्रकांत देवताले।

मिथिलांचल में दलित स्त्री की स्थिति हिंदी प्रदेश के अन्य अंचलों से भिन्न नहीं रही है। रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ में पूर्णियाँ के कबीर मठ को लक्ष्मी नामक जो नाबालिक बच्ची दान में दी जाती है, वह किस जाति की रही होगी! तुलसीदास कृत ‘मानस’ में राजा जनक बारात विदा करते समय बहुत से सामानों, हाथी-घोड़ों-रथों के साथ हज़ारों दास-दासियाँ भी दहेज में अयोध्या भेजते हैं। इन दास-दासियों की जाति के बारे में अनुमान किया जा सकता है। मूलतः मैथिली में लिखी अपनी आख्यानपरक कविता ‘इजोरिया धनुकाइन’ में राजकमल चौधरी ने धानुक जाति की स्त्री इजोरिया की व्यथा, संघर्ष-कथा लिखी है। इजोरिया विदग्धा है लेकिन नायिका भेद वाली नहीं, पेट की ज्वाला से विदग्धा। वह बाढ़ में डूबे अपने खेत की मेड़ पर भग्न-हृदया बैठी है। पानी में डूब गए खेत ने उसके सारे सपने चूर-चूर कर दिए है। गाँव से सहृदयता की कोई उम्मीद नहीं। जब उसके अपने पति ने अकाल के समय दो दिन भी साथ नहीं दिया तो अन्यों से क्या आशा की जाए-
…दो सांझ से भूखी-प्यासी
इजोरिया धनुकाइन
(आज कहेगा गाँव पूरा ‘वेश्या’ कल कहेगा ‘डाइन’)
जिसके पति देवता भागे मोरंग
अकाल के समय दिया नहीं दो दिवस भी कुछ संग
विरहाग्नि नहीं, जठराग्नि से झरते हैं जिसके सब अंग
जिसकी जिंदगी पर उग रही है दूब
जैसे मरणकाल में मुस्कान लेती है अधरपुट को छू
झुलसी पकी दूब
जिस पर उग रही है पथिक चरण की छाप
युग का बहुत बड़ा पाप…117
परमानंद श्रीवास्तव (1935-2013) की काव्ययात्रा ‘उजली हँसी के छोर पर’ (1960) से आरंभ होती है। दूसरे संग्रह ‘अगली शताब्दी के बारे में’ (1981) तक वे जीवन के सामान्य कोरस में स्त्री संदर्भ लाते हैं। दलित जीवन या दलित स्त्री अभी उनकी काव्य-वस्तु का हिस्सा नहीं है। तीसरे संग्रह ‘चौथा शब्द’ (1993) में ‘स्त्री’ शीर्षक कविता शामिल है। यह स्त्री उनके यहाँ पहली बार आई है। उन्हें अचरज है कि निविड़ अंधकार में इस स्त्री ने रोशनी के कतरे किस जतन से बचा रखे हैं- “घने और असह्य अँधेरे में/ उस स्त्री ने/ बचा रखी थी/ ज़रा सी चमक/ वह कहाँ थी/ और कहाँ से आती थी/ कहना कठिन था/ साँवला रंग/ साधारण भाषा और/ सब कुछ साधारण जो/ एक कामगार स्त्री के पास/ हो सकता है/ अपने चरम उजाड़ में/ उससे कुछ भी कह पाना कठिन था/ इतना असह्य अँधेरा था/ उसके पास/ भूकंप था हादसे थे/ और गृहयुद्ध भी/ जो बिलकुल निजी किस्म के होते हैं/ क्या उजड़ना भी इसी को कहते हैं/ जो उसकी फीकी हँसी से प्रकट होता है/ कभी कभी”।118
तकनीकी रूप से भले ही न हो लेकिन दलित जातियाँ मुसलमानों में भी होती हैं। ऐसी ही एक दलित स्त्री को विजेन्द्र (1935-2021) अपनी लंबी कविता ‘तस्वीरन अब बड़ी हो चली’ का विषय बनाते हैं। यह आख्यानपरक कविता है। तस्वीरन का परिवार फूलों का धंधा करता है। शादी-ब्याह में फूल पहुँचाता है। उनके बनाए जयमाल से दो ज़िंदगियाँ जुड़ती हैं। तस्वीरन के अब्बा और भाई चौराहे पर दुकान लगाते हैं। तस्वीरन मोगरे का गजरा बनाती है। उसे अपने भाई को एक-एक गजरे का, एक-एक फूल का हिसाब देना पड़ता है। माँ लकवाग्रस्त हैं। छोटे भाई-बहनों को भी देखना पड़ता है। रोज़ ढाई किलो आटा सिकता है। अब्बा उदास हैं कि बेटी उनके क़द के बराबर हो गई है और उसके हाथ पीले करने का इंतज़ाम नहीं हो पाया है। बेटी की मुश्किल यह कि वह संवेदनशील है। लोगों के चेहरे देखकर उनके भाव-जगत का अनुमान लगा लेती है। हवा में घुली विषाक्त गंध सूंघ सकती है। उसका कुनबा दोहरी ‘दुर्योग्यता’ से घिरा है। वे मुस्लिम हैं, सुन्नी मुस्लिम- “यहीं पले जन्मे/ हम सब/ इस मिट्टी पानी में/ सने पुते/ खेले कूदे/ फिर भी हमसे/ आसपास के घिन करते हैं/ यों बागों में ‘हो-हो’ करवाते/ गजरे कंगन/ पूजा को गुलदस्ते बनवाते/ लेकिन हम सुन्नी हैं/ वे कहते/ खून हमारा ज़हरीला है/ …क्या है यह मुलुक अजूबा/ खून पात से सनी हुई है/ धरती/ कुनबे के कुनबे ग़ायब हैं”।119 दूसरी दुर्योग्यता यह कि उनकी पहचान ‘नीच जाति’ की है। वे उत्पादक वर्ग के हैं और इसलिए पदानुक्रम में नीचे ठेल दिए गए हैं-
क्या है यह मुलक
ऊँच-नीच का सड़ता मलबा
घिन का गारा
यह बात अजूबी
चली आ रही जाने कब से
जो करता सजधज औरों की
उसको मिलता फटकन
लातें120
एक तीसरी दुर्योग्यता जो सिर्फ़ तस्वीरन के ज़िम्मे आई है, वह उसका युवती होना है, दलित स्त्री होना है। यह पूरी कविता उसी की ज़ुबानी है, उसी का हलफ़नामा है। फूलों के इस ‘कारोबारी’ परिवार की रिहाइश वहाँ है जहाँ ठीक दरवाज़े के सामने कूड़ा सड़ता है। पीछे अंधी गली है। जो लोग फूलों का भाव-ताव करने आते हैं, वे सजधज कर- “लखकर मुझको कोरों से/ कह जाते कही अनकही”।
‘काली माई’ भी आख्यानपरक कविता है। धीमर जाति की स्त्री है काली माई। यह इसका असली नाम नहीं। जब वह ब्याह कर आई, उसका नाम कस्तूरी था। उसके पति निक्का की एक दुर्घटना में ट्रक से दबकर मौत हो गई। कुनबे की निगाहों से बचती कस्तूरी सास के साथ जीवन काट रही थी कि उसका रागात्मक संबंध अलीबख्श के बेटे क़ादिर से हो गया। धर्म-रक्षकों को यह सब कैसे सहन होता। सांप्रदायिक दंगा भड़का। क़ादिर को पीट-पीट कर अधमरा-अपंग कर दिया गया। उसका घर जला दिया गया। “पर कस्तूरी सब झेल रही/ अलाय-बलाय जीवन की/ वह है बड़ी दिलावर/ झेल रही नफ़रत समाज की।”121 सांप्रदायिक हमले के समय कस्तूरी के पेट में भ्रूण पल रहा था। समय आने पर बच्चा पैदा हुआ। कस्तूरी ने बकरियाँ पालीं। कल्लू को बड़ा किया। कल्लू ने माँ को ही दोषी समझा। उसके कान भरे गए। उसने माँ को मारा-पीटा। दिल पर पत्थर रखकर माँ ने बेटे को माफ़ किया। कल्लू की शादी की। बेटा-बहू ने बेरुख़ी दिखाई। दोनों दिल्ली चले गए। कस्तूरी अब बूढ़ी काली माई थी। वह अकेली रह गई। गाँव आने पर कवि को हर बार दिखती थी। इस बार न दिखी। गाँव का कोई उसके बारे में बोलने को तैयार भी नहीं। कवि ने काली माई को अपनी रचना का विषय बनाकर अपना दायित्व पूरा किया। कवि को जहाँ भी लगा कि अन्याय है, उसे दर्ज किया। ‘मिस उर्मिल’ कविता में जाति और वर्ग का कंट्रास्ट व्यक्त हुआ है। संपन्न (सवर्ण) परिवार की मिस उर्मिल का जन्मदिन समारोह है। भाँति-भाँति के पकवान मँहगी क्रॉकरी में सजे हैं। अफसरों की पूरी जमात, ठेकेदार, मुनीम, सेठ-साहूकार, सजी-धजी स्त्रियाँ वहाँ मौजूद हैं। वहीं-
बाहर लॉन के कोने में
बैठी महतरानी थी
जहाँ फूला गेंदा/ कुम्हलाई रातरानी थी।122
इधर भाँति-भाँति के व्यंजनों का लुत्फ़ उठाया जा रहा था, गिफ्ट और रिटर्न गिफ्ट का आदान-प्रदान चल रहा था, उधर “बगल की खपरैल से/ हरदेई का घसीटा/ चबैने को बेजार रो” रहा था।123
सारी संवेदना और प्रतिबद्धता के साथ विजेन्द्र एक सौंदर्य-रसिया के रूप में भी अपनी कविताओं में मौजूद हैं। दलित स्त्री के प्रसंग में वे कई बार सौंदर्य-लोलुप और दिलफेंक पुरुष के रूप में दिखाई पड़ते हैं। ‘वसन्त पूर्वापर’ कविता में वे दिन भर खेतों में खटकर लौटी युवतियों को ‘क्वांरी कामकन्याएँ’ कहते हैं। “उनके उन्नत वक्षोज और स्पष्ट ललाट हैं/ छरहरा बदन/ अंग अंग सुगठ/ और पथ आगे तक शस्य और सपाट हैं”।124 ‘रेलवे पोस्टर’ कविता में कवि घने जूड़े में फूल खोंसती पोस्टर में छपी ‘साँवली औरत’ को देखकर कहता है- “वह एक जवान मछुवारिन का जिस्म है/ उसकी धोती का काला किनारा/ और लंबे बाल/ उसके नितंबों तक के ढलान की बंदिश सिडौल है।”125 ‘मैं शैली’ में रची एक अन्य कविता ‘गंगोली’ में वाचक रबी की कटनी कर रही सोलह वर्षीया गंगोली से परिचय करता है। गंगोली के पिता किसी सीरदार के यहाँ हलवाही करते हैं। माँ चौका-बासन करती हैं। इसके बावज़ूद पेट पालना मुश्किल है। उस श्रमिका से कवि मन ही मन ‘नाता’ जोड़ लेता है। उसकी कामना छुपी नहीं रहती- “हम पास पास हैं/ लेकिन दूरी है/ मन की/ तन की/ देह रूप अनुमान रही थी”। अनुमान तो गंगोली को भी है- “होगा कोई मनचला/ जाने कितने आते-जाते हैं/ भौंरे फूलों पर/ चख-चख कलियों का स्वाद/ चले गए हैं”।126
गंगोली की तरह मीना है। ‘मीना’ शीर्षक उसी मैं-शैली वाली कविता में वाचक इस युवती के सौंदर्य पर फ़िदा है- “मुझको वह वैसे ही/ अच्छी लगती/ जैसे भौंरा खरीफ में/ डह-डह कपास का फूल।/ इस कूड़े-कचरे में भी/ दमक रहा हो जैसे हीरा।”127 यह कूड़ा-कचरा क्या है? मीना सफ़ाई कामगार जाति की है। पिता परदेस में हैं। माँ बीमार है। भाई नानी के यहाँ। मीना घर का सारा काम संभालकर गली-मुहल्ले की झाडू-बुहारी करने निकलती है। कवि का मन मचलता है- “निखरा है/ गालों का रंग-/ जब पड़ी हल्दिया धूप सरल गालों पर”। “मन करता है चुंबन ले लूँ/ पर विवश बहुत हूँ।” यह विवशता यहाँ से जन्मी है- “लोग-बाग निग़ाह रख रहे/ क्या करता”। कवि अपने मनोभाव के साथ जाए या उन्हें नियंत्रित करे- “कवि-कर्म निभाना/ कठिन बहुत है।” ऐसे में कवि बीच का रास्ता निकालता है। वह चाहता है कि मीना स्वयं उसके मनोभाव समझ ले। उसे अपना भरोसेमंद (जीवन)साथी समझे। अपने अकेलेपन से मुक्त हो- “मीना को जब भी देखा/ आँखों में उभरी/ तस्वीर अनोखी-/ जीवित हिरनी की/ जो नहीं चीन्ह/ अपने साथी को/ उदास जा रही/ सिर्फ़ अकेले”।128 प्रश्न है कि क्या कवि मीना के साथ मोहल्ला कमाने जाएगा? उसके परिवार का सदस्य बनेगा और मीना की जिम्मेदारियाँ साझा करेगा? क्या इन दोनों में कोई मेल है? कविता से पता नहीं चलता कि मीना के जीवन की रेकी करने वाले कवि ने कभी उससे मिलकर बात की है, अपने मनोभाव उससे साझा किए हैं। यह आकर्षण मात्र दैहिक लगता है, अल्पकालीन भावोच्छलन। मीना अपने इस ‘आदर्श’ प्रेमी से अनजान है। या, वह जानती भी होगी तो उसके लिए इस एकतरफ़ा आकर्षण का कोई अर्थ नहीं।
हम कवि के बारे में कोई राय स्थिर करें उसके पहले कविता के उस हिस्से पर नज़र डाल लें जहाँ सवर्ण-पुरुष-ग्रंथि को रेखांकित किया गया है। मीना ‘अछूत’ है और कवि ‘कुलीन’। यह पहले से होता आया है कि कुलीन पुरुष अल्पकालिक आकर्षण के वशीभूत हुए हैं और उन्होंने दैहिक इच्छा की पूर्ति करके ऐसी युवतियों से मुँह फेर लिया है। राजतंत्र से लेकर जनतंत्र तक यह परंपरा क़ायम है। जनतंत्र के कथित समतावादी भी अपने पुराने संस्कारों से मुक्त नहीं हो पाए हैं। लगता है, यह व्यवहार उनके रक्त में घुलमिल गया है। कवि का यह आत्मालोचन वैचारिक परिपक्वता और साहस से उद्भूत है-
वह अछूत है/ जग को
उसका कर्म अपावन/ लगता मुझ कुलीन को
इस समाज में/ जान रहे सब/
मेरे अंदर भी पुरुषों का/ खून बह रहा
तन से/ मन से
अभी बना फिरता/ राजकुमार
दिखाने को/ कहने को/ जनतंत्र आ गया129
इसी तरह ‘गंगोली’ शीर्षक कविता की समापन पंक्तियाँ हैं- “बड़ी विकट है जीवनधारा/ ऊपर लगता इन्द्रधनुष जल में/ अंदर से सिसियाँदी कारा।”130 ‘सिसियाँदी कारा’ अजब दुर्गंध भरी जेल को कहा गया है। अपेक्षाकृत साधन-संपन्न विशेषाधिकार प्राप्त सवर्ण पुरुष और साधनहीन, अधिकारवंचित अभावग्रस्त दलित स्त्री के बीच इंद्रधनुषी-सतरंगी प्रेमसंबंधों की असलियत यही है- ‘अंदर से सिसियाँदी कारा’। कहने को जनतांत्रिक व्यवस्था है, संविधान लागू है, लेकिन शताब्दियों पुरानी मानसिकता अभी समाप्त नहीं हुई है।
कुमार विकल (1935-1997) गुजरात के वजीराबाद इलाक़े में जन्मे थे। बँटवारे के बाद यह पाकिस्तान के हिस्से में चला गया। उनका बचपन रावलपिंडी में गुजरा। विभाजन के बाद परिवार लुधियाना आ गया। कुमार विकल इंटरमीडिएट के छात्र रहे लेकिन परीक्षा नहीं दी। 1953 में देश भ्रमण के लिए निकले और तीन वर्ष घूमते रहे। कई छोटी-छोटी अल्पकालिक नौकरियाँ कीं। फिर पंजाब विश्वविद्यालय के प्रकाशन विभाग में नौकरी मिली जहाँ वे 1962 से ’95 तक रहे। 1992 में उन्हें पहल सम्मान दिया गया। कुमार विकल के कुल तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए।
अपनी कविता को संथाल बच्ची की तरह देखने वाले कुमार विकल ‘रंग भेद’ कविता में लिखते हैं- “जी, मेरी कविता गौरवर्णा नहीं/ ज़रा साँवली-सी है/ एक संथाल बच्ची की तरह खुरदरी/ जो बड़ी होकर/ गुलाबी फ्रॉक नहीं पहनेगी/ आइसक्रीम नहीं खाएगी/ तितली नहीं कहलाएगी/ नंगे पाँव ही अपने लोगों के बीच भाग जाएगी।”131 ‘वापसी’ कविता में वे राजपथ की ‘वनतंत्री व्यवस्था’ से घबराए हुए लगते हैं। यहाँ खुद को ‘मिसफिट’ पाते हैं और ‘अपने लोगों’ के बीच दलित बस्ती में लौट जाना चाहते हैं।132 ‘खिड़कियाँ’ में उन्होंने घुटन भरे मकानों के भीतर झाँका है- “जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं/ वहाँ पर कोई लोरियाँ नहीं गाता/ चाँद को चंदामामा नहीं कहता/ पियक्कड़ पिता की आवाज़ ही बच्चों को सुलाती है/ और किसी औरत के सिसकने की आवाज़/ चौकीदार के ‘जागते रहो’ स्वर में खो जाती है।”133
निम्नमध्यवर्गीय दुविधाओं की अभिव्यक्ति के कवि कुमार विकल ने अपने पुरखे और समकालीन कवियों का स्मरण करते हुए कई कविताएँ लिखी हैं। उनकी व्यक्तिवाचक कविताओं में एक कविता ‘जगीरो’ शीर्षक से है। जगीरों चार बच्चों की माँ है। इस आख्यानपरक कविता की शुरुआत में जगीरो कोटे की दुकान पर केरोसीन लेने की लाइन में खड़ी दिखाई देती है। पिछले पाँच दिनों से वह 5 लीटर मिट्टी का तेल लेने की कोशिश कर रही है। आज भी लाइन जिस मंथर गति से खिसक रही है उससे उम्मीद नहीं बंधती। इंतज़ार कर रही जगीरो की सूनी आँखों में कवि चित्रपट चलता देखता है। वहाँ एक स्टोव जल रहा है। पतीली में चावल उबल रहा है। अदहन पर उबला चावल (बॉयल्ड राइस) है यह जानकार बड़ा (बेटा) उबल पड़ता है। उसे दाल खाने की इच्छा है। उसके बग़ैर वह स्कूल नहीं जाएगा। जगीरो चाहती है कि बेटा यह शिकायत अपने बापू से करे, केवल उसे न नोचे। लड़के के बापू ख़याल ही डरावना है। उसे वह भेड़िया के रूप में याद करती है। तब बच्चे उसके लिए खरगोश हैं। नोचना भेड़िये का रोज़ का काम है- “ ’नोचना’ जगीरो के लिए मात्र एक शब्द नहीं-/ उसकी व्यथा गाथा का मर्म भाव है,/ उसकी जिंदगी का सबसे गहरा घाव है/ जिसे उसने भेड़िये से लेकर खरगोश तक से पाया है/ किंतु घर की बूढ़ी दीवार तक से छिपाया है।”134 जगीरो का आदमी शक्की है। इस किस्म का शक जब हिंसा में बदलता है तो वह व्यक्ति असहनीय हो जाता है। बड़े का बापू ऐसा ही है। केरोसीन मिलने में हो रही देरी पर उसकी प्रत्याशित प्रतिक्रिया कविता में यों प्रतिबिंबित होती है- “बिल्ली बूढ़ी हो जाती है,/ छीछड़ों के ख्वाब देखने से बाज़ नहीं आती है-/ रांड कहीं मटक रही होगी/ किसी से चटक रही होगी।/ आज उसको ऐसा चटकाऊँगा,/ हड्डियाँ तोड़ डालूँगा/ माँस नोच खाऊँगा…”135 दर्द और दहशत के अनुभव की यह स्मृति जगीरो को जकड़ लेती है। आज वह “घर नहीं जाएगी/ स्टोव नहीं जलाएगी” । उसमें अपना माँस नुचवाने की हिम्मत नहीं। जड़ीभूत जगीरो जहाँ की तहाँ है। कतार डिब्बे के साथ आगे बढ़ रही है। एक बच्ची के रोने से उसकी जड़ता टूटती है। किसी ने बच्ची का डिब्बा उठा लिया है। उसके भाई को मारकर भगा दिया है। उस बच्ची को गोद में उठाए हुए जगीरो का निर्णय बदल गया है। उसे सांत्वना देते हुए जगीरो कहती है-
“सुन! छोटी जगीरो के दुख छोटे होते हैं,
बड़ी जगीरो के दुख बहुत-बहुत बड़े होते हैं।”136
जगीरो का सहारा पा बच्ची की बुझी आँखों में चमक आई। स्वयं जगीरो की “आँखों में/ कई स्टोव एक साथ जल उठते हैं।” दो दुखों ने मिलकर एक संकल्प रचा। घोर प्रतिकूलता में भी हिम्मत नहीं हारनी है। “अब जगीरो मजबूत हाथों से/ अपने डिब्बे को आगे सरकाती है”। रोज़मर्रा के ऐसे मामलों में बड़ी लड़ाइयों के सूत्र छिपे होते हैं। छोटे प्रतीत होने वाले ये संघर्ष और संकल्प निर्णायक प्रभाव डालते हैं।
चंद्रकांत देवताले (1936-2017) मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में पैदा हुए थे। इंदौर से हिंदी में एम.ए. और सागर विश्वविद्यालय से मुक्तिबोध पर 1984 में पीएच. डी. की। मुक्तिबोध के बाद हिंदी की प्रगतिशील कविता को आगे ले जाने में चंद्रकांत देवताले की अग्रणी भूमिका है। उन्होंने दलित और आदिवासी स्त्रियों की पीड़ा, संघर्ष और जिजीविषा को हृदयहीन सत्तातंत्र के समांतर चित्रित किया है। पहचानी जा सकने वाली स्थानिकताओं की ज़मीन पर रूपाकार लेने वाला उनका चित्रण अपनी विश्वसनीयता के बूते बड़ा मारक, दाहक और द्रावक है। सतत पर्यवेक्षण, पीड़ितों के साथ अकृत्रिम लगाव, निष्कवच आक्रोश से निर्मित काव्यवस्तु देवताले के काव्यजगत को ख़ास बनाते हैं। ‘मज़दूर’ (1953) शीर्षक कविता से अपनी सृजनयात्रा आरंभ करने वाले कवि की प्रतिबद्धता बक़ौल रघुवीर सहाय “कविता पर गिलाफ़ की तरह” चढ़ाई गई विचारधारा नहीं है।137 वैसे इस कसौटी पर तमाम प्रगतिशील कवि खरे उतरेंगे।
हिंसा की वास्तविक घटनाओं को काव्यवस्तु बनाने के अपने ख़तरे हैं। बहुधा कविता अपनी व्याप्ति खो देती है, सपाट हो जाती है। चंद्रकांत यह जोख़िम उठाते हैं। उनकी बहुत-सी कविताएँ ऐसी हैं। इनमें दर्ज घटनाएँ उस समय के अख़बारों में भी छपी मिल सकती हैं। ऐसी भी घटनाएँ हैं जिन्हें कवि ने अपनी रचना का विषय बनाया, किंतु वे मीडिया बाज़ार में प्रवेश न पा सकीं-
तो फिर भाषाखोरों के/ इस फ़रेबी बाज़ार में
क्या करे कवि?
इतने दरख़्त और कहीं/ पत्ता तक नहीं खड़कता138
‘लकड़बग्घा हँस रहा है’ (1980) देवताले के शुरुआती संग्रहों में है। शीर्षक-कविता139 डोम जाति के पुरुषों की हत्या पर केंद्रित है। शोक के इस समय जबकि विधवा हुई चार औरतें “अपने तेरह बच्चों के साथ/ छाती कूटती/ फोड़ती हुई चूड़ियाँ/ अपने रुदन से/ भय की छाया को गाढ़ा कर” रही हैं, ‘लकड़बग्घा हँस रहा है’। यह लकड़बग्घा सत्ताधारी है, हत्यारी समाज व्यवस्था है। उसने न्याय का फ़ौरी इंतज़ाम कर दिया है। पीड़ित परिवारों के लिए महीने भर राशन की व्यवस्था कर दी है। दलित हत्या की क्षतिपूर्ति के लिए क्या यह पर्याप्त नहीं? इस व्यवस्था के बाद लकड़बग्घे का हँसना बनता है, भले ही इस हँसी से बच्चों में दहशत फ़ैल जाती हो। नदी, पठार, पहाड़ जो हत्याकांड के बाद अवसन्न थे, लकड़बग्घे का इंतज़ाम देखकर सहज होने लगते हैं। सहज होने की यह प्रक्रिया अबाधित रहे इस हेतु अचूक उपाय अपनाया जाता है- “घिग्घी बंध गई थी जो नदियों की/ खुल गई/ दिल का दौरा पड़ा था देश के पहाड़ों को/ हुआ दुरुस्त/ कितनी बड़ी राहत की साँस ली/ अवसन्न पड़े पठारों ने…/ लाशों की राख को/ ठिकाने पहुँचा/ अब इस सगर्व राहत उपचार के बाद/ प्रश्न उठा क्या विलायत के गोरों को/ हरा देंगे हॉकी में भारत के शूरवीर?” शोकाकुल करने वाले हत्याकांड को रोमांचकारी खेल चर्चा से ढँक देने की कला लकड़बग्घा संचालित व्यवस्था अच्छी तरह जानती है। न्यायतंत्र को पूरा अवकाश मिलता है कि वह अपराधियों की रिहाई के सभी विकल्पों पर तैयारी की मोहलत दे। आखिर इन अपराधियों को हत्याकांड का सिलसिला बनाए रखने की छूट देना है-
फिर से तपते हुए दिनों की शुरुआत
हवा में अजीब-सी गंध है
और डोमों की चिता/ अभी भी दहक रही है
वे कह रहे हैं/ एक माह तक मुफ़्त राशन
मृतकों के परिवार को
और लकड़बग्घा हँस रहा है
ऐसे ही एक अन्य दलित हत्याकांड की ‘रिपोर्टिंग’ ‘रोशनी के मैदान की तरफ़’ (1982) में दर्ज है। हत्याकांड के बाद रस्मी जाँच के लिए सरकारी टीम भेजी गई है। इसमें सिपाही हैं, पटवारी है, डॉक्टर हैं और उन सबके ऊपर एक हाकिम। लाशें पड़ी हुई हैं और डॉक्टर हाथ बाँधे खड़े हैं। उनकी प्राथमिकता में अभी घायल नहीं, मृतक हैं। और जो मर चुके हैं उन पर ध्यान देने से क्या होगा! लिहाज़ा, डॉक्टरों को कोई काम नहीं। पटवारी के पास कागज़ों का पुलिंदा है। इस पुलिंदे को उलटते-पलटते हाकिम ‘सत्य’ तक पहुँच जाता है कि यह ज़मीन का पुराना झगड़ा है। ‘सत्य’ तक पहुँचना मात्र दायित्व का निर्वाह है। सरकारी अमला वापस लौटे उसके पहले मुआवज़ा देने की रस्म भी अदा की जानी है- “तभी आ गया छाती-कुट्टा करती औरतों का झुंड/ विलाप करते/ हाकिम के मातहत ने रजिस्टर खोला/ मातहत के मातहत ने काला संदूक/ अँगूठा लगाने लगीं एक के बाद एक औरतें/ और रुपयों की एक छोटी-सी गड्डी को/ गिनवाने देखने लगीं दाएँ-बाएँ”।140 हत्याकांड अंजाम देने वाले न्याय की लंबी सुरंग में सुरक्षित हैं। वे जब चाहें बाहर निकल सकते हैं और फिर से वैसी घटना दोहरा सकते हैं। उन हत्यारों की “कल की हँसी के समर्थन में/ अभी लकड़बग्घा हँस रहा है”। यह हँसी उस चीख को दबा देती है जो कवि को अभी-अभी सुनाई पड़ी है- “सिपाही बीड़ी के लिए/ माचिस माँगने गया/ इसी हत्याकांड की एक बेवा के घर/ और सिपाही नहीं/ झोंपड़ी से एक चीख निकली/ चीखती हुई लगातार/ और गिद्ध और कौवे/ फिर से डरकर/ आकाश में ऊपर उड़ने लगे”।141
दलित स्त्री के दुखों के बहुत-से प्रसंग चंद्रकांत देवताले की कविताओं में मिलते हैं। कवि उन दुखों का द्रष्टा ही नहीं, साझीदार भी है। यह साझेदारी संवेदना के स्तर पर है। ‘सुबह’ शीर्षक कविता की स्त्री बर्तन माँजने चली गई है। उसका बालक भूखा है, “वह खाली कटोरदान में/ मुँह घुसेड़ पेट बजाते/ सड़क पर आ निकला/ अज्ञात भय की पगडंडी से लुढ़कते हुए”।142 ‘उस औरत का दुख’ कविता में कैंसर पीड़ित स्त्री को ज़िलाबदर कर दिया गया है। न्याय लफंगों का है और न्यायमूर्ति इसे प्रक्रियागत निर्णय कह रहे हैं। लड़की की माँ का खून जमकर पत्थर हो गया है। दमाग्रस्त बाप ने आक्रोश में आकर पीतल की मूर्तियाँ कुएँ में फेंक दीं। अभिजन तबके ने सारी चर्चा ईशनिंदा पर केंद्रित कर दी “और ज़िलाबदर उस औरत का दुख/ नेपथ्य में पड़ा रहा/ किसी टूटे साज़ की तरह”।143 ‘एक नीबू के पीछे’ कविता की दलित स्त्री का दुख कवि का पीछा करता है। वह स्त्री दिहाड़ी पर किसी अधिकारी के लॉन की सफ़ाई करने, घास काटने आई है। दोपहर रोटी खाने के समय वह लॉन में लगे पेड़ से एक नीबू तोड़ लेती है। घर की मालकिन इस पर आग-बबूला हो जाती हैं। घर के दोनों नौकर भी उस अधेड़ मजदूरन पर कुत्तों की तरह झपट पड़ते हैं। उसी समय वाचक वहाँ से गुज़रा। तमाशाई लोगों ने उसे फलों से लदा नीबू का पेड़ दिखाया और उस स्त्री की मुट्ठी से बरामद नीबू भी। स्त्री तो बुत बनी खड़ी थी। वाचक की अंतरात्मा ने आवाज़ दी तो उसने हस्तक्षेप में इतना कहा कि, “क़ानून को हाथ में क्यों ले रहे आप”। बाई साहब उस पर बरस पड़ीं। उसे मच्छर कहा। धमकी दी। नौकरों ने उस मजदूरन के साथ वाचक के संबंध जोड़े…। वाचक अपने घर आ गया। नींद न आई। मच्छरों को ज़िम्मेदार ठहराया। असल वज़ह उसके नैतिक बोध में पैदा हुई कचोट थी-
तब से बीच-बीच में
रात मेरी नींद पर गिद्ध की तरह झपट्टे मारती है
और उस नीबू से हज़ार गुना बड़ा नीबू
गिरता है मेरीआत्मा पर144
देवताले की कविता में आई दलित स्त्रियाँ मजबूत हैं। वे हिम्मत भर संघर्ष करती हैं। कभी परिस्थितियों से तालमेल बैठाती नज़र आती हैं और कभी प्रतिरोध करती तनाव को जीती रहती हैं। ‘चूर-चूर बिखर रहा माँ का कलेजा’ की स्त्री गहन निराशा में अपनी तीनों बेटियों सहित कीटनाशक खा लेती है। कवि इसे आत्महत्या नहीं, हत्या मानता है- “अफ़सोस कहीं भी दर्ज़ नहीं हो रहीं ये हत्याएँ…” “राष्ट्रपति भवन, सर्वोच्च या छोटे-छोटे क़ानूनघरों और/ पवित्र थानों के जहाँ भी होते हैं कान/ उन पर जूँ तक नहीं रेंगी”। उस स्त्री का पति ग़रीबी झेलता, नशापत्ती में फँसा मर गया। बेटियाँ इतनी छोटी नहीं हैं। बड़ी वाली दो घरों में झाडू-पोंछा के लिए जाने लगी है। उससे छोटी दोनों गोबर बटोरने, कंडा थापने के काम में लग गई हैं। फिर भी माँ ने खाने में कीटनाशक मिलाकर खाया-खिलाया तो अवश्य ही स्थितियाँ जटिल और बेकाबू रही होंगी। स्त्री के निर्णय पर प्रश्न करने वालों से कवि प्रतिप्रश्न करता है-
नहीं तो क्या अमर फल खाती
कीड़े-मकोड़ों से बदतर ज़िंदगी
और विस्थापित करने – नोचने वाले
भेड़ियों के बीच…
आरी की तरह चीरने लगता है मुझे
जब तब नहीं अक्सर होते रहता ऐसा हादसा
खून मेरा सूख गया है बहता नहीं
शायद बदरंग भी या पानी145
आत्मालोचन का भाव देवताले की कविताओं में प्रबल है। कहीं-कहीं यह भाव आत्म-भर्त्सना और आत्म-धिक्कार तक पहुँचता नज़र आता है। कठोर स्थितियों के लिए वे नरम शब्दों के प्रयोग के पक्षधर नहीं हैं। भदेस को तत्सम से ढँकने की कला को वे कपट कहते हैं। वे छली मध्यवर्ग और पाखंडी धर्मधुरीणों की हक़ीकत बार-बार उजागर करते हैं। ‘उजाड़ में संग्रहालय’ संग्रह में शामिल एक धर्मनगरी के दो दृश्य ग़ौरतलब हैं। पहली कविता ‘पवित्र स्नान के दिन धर्मनिष्ठ मरण’ में ज़मीन समतल करने वाला मंगू मानवमल खाती गाय को खदेड़ने दौड़ा था और गौ रक्षकों ने उसे गाय सताने वाला समझ लिया। उनसे प्राणरक्षा के लिए मंगू जान छोड़कर भागा और एक पत्थर से टकराकर प्राण गंवाए। धर्मज्ञों ने इसे मंगू के संचित शुभकर्मों का फल बताया। बिना कल्पवास किए उसे कल्पवासी पुण्यात्मा माना गया और उसकी सद्गति का ऐलान हुआ।146 इसी तरह ‘इस मामले में भी यही बताया गया’ कविता में एक आदिवासी स्त्री के गैंगरेप और हत्या को धर्मनगरी के वासियों ने कोई महत्त्व नहीं दिया। जिन घरों में वह गर्भवती स्त्री काम करती थी वे अवश्य ही थोड़ी देर के लिए बेचैन हुए।147
दलित-आदिवासी उत्पीड़न की पहचान करने वाले, इन प्रश्नों को बराबर अपनी कविता का विषय बनाने देवताले न्याय व्यवस्था की विडंबनाएँ अच्छी तरह समझते हैं। न्यायतंत्र पर उनसे ज़्यादा शायद ही किसी आधुनिक हिंदी कवि ने कविताएँ लिखी हों। स्त्री, आदिवासी और दलित से जुड़े मुक़दमों में न्याय व्यवस्था अक्सर आँखें बंद कर लेती है। अदालती फैसले के पहले न्यायिक प्रक्रिया रुक जाए या प्रक्रिया विधिवत पूरी हो, दोनों ही स्थितियों में अपराधी अक्सर छूट जाते हैं। संदेह का लाभ देकर या संदेह का निवारण करके उत्पीड़कों को बाइज्ज़त बरी कर दिया जाता है। ‘पत्थर फेंक रहा हूँ’ संग्रह में शामिल उनकी कविता ‘इस तरह मुक़दमे चले’148 को न्यायिक प्रक्रिया की ‘निष्पक्षता’ और ‘नेकनीयती’ के प्रतिनिधि उदाहरण के रूप में रखा जा सकता है। कविता बताती है कि न्याय की संभावना मुख्यतः पुलिस द्वारा जुटाए साक्ष्यों और गवाहों पर निर्भर करती है। सबूत संदर्भ-सापेक्ष होते हैं और उनकी स्वायत्तता जाँच एजेंसियों द्वारा अनुकूलित होती है। तब, न्याय का सारा दारोमदार साक्षियों के कंधों पर आ जाता है। जाँच एजेंसी न चाहे तो वह ऐसा वृत्तांत तैयार कर सकती है कि तथ्यों को साँस लेने की जगह न बचे और गवाह पहली पेशी में ही बेमतलब के साबित हो जाएं। फिर भी अगर पुलिस की भाषा में गवाह ‘ज़्यादा ही बाहर निकल रहे हों’ तो उन्हें ‘फर्ज़ी गवाही के आरोप में’ अंदर कर दिया जाए। इसके बावज़ूद बचे और खड़े रह जाने वाले “कातर और पैनी चीत्कारों की परछाइयों/ और मौत के मंजरों का बोझ लिए” गवाह जो “हत्यारों के चेहरों-नामों को” अदालत के समक्ष रखना चाहते हों उन्हें सरकारी वकील तोड़ने में जुटते हैं। जो नहीं टूटते और हत्यारों के नाम गिनाने पर अडिग रहते हैं “वे अदालत से निकलने के बाद/ दुबारा नहीं देखे गए इलाके में” । तब भी कौंधती ईमानदारी लिए कुछ गवाह शेष रह जाते हैं। ऐसे गवाहों पर न्यूनतम पाँच बार मौत की सज़ा के योग्य हत्यारों ने बड़ी कृपा की। गवाहों को आखिरकार कहना पड़ा “कि अँधेरे और धुएँ में वे/ कुछ नहीं देख पाए।” ऐसे मुक़दमों में अपराधियों को सज़ा मिलना अचरज ही होगा। कुछ अपराधियों को इतना अधिक निर्दोष पाया गया कि उन्हें निगमों, आयोगों के मुखिया के पद पर बैठाना पड़ा। अचरज की पराकाष्ठा तब दिखी जब सन्नाम हत्यारों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाने का पेंच फँसा। इसके लिए बाद में अलग से अदालत बैठी। अदालत का मंतव्य था कि-
दरअसल वे अपराधी नहीं हथियारबन्द शांति सैनिक थे
सद्भावना-मार्च की व्यवस्था में जुटे
इसके बाद भी न्याय हुआ/ तोड़फोड़ आगजनी के आरोप में
कुछ लोगों पर जुर्माना ठोंका गया/ जिसकी भरपाई राहत फंड से कर
उन्हें भी छुट्टा छोड़ दिया गया
फिर जज का तबादला हो गया
बाद में ख़ुद सरकार ने भंग कर दिया अपने को
सिंहासनों-रथों से उतरकर हत्यारे सड़क पर आ गए
और जो सड़क पर थे/ वे अंधेरिया मोड़ की झाड़ियों के उस पार खिसक गए
स्याह दिनों में इस तरह मुक़दमे चले149
संदर्भ
117. ‘राजकमल चौधरी रचनावली’ खंड-1, मैथिली कविता खंड से, अनुवाद देवशंकर नवीन, पृ. 71.
118. ‘चौथा शब्द’ (1993), परमानंद श्रीवास्तव, राजकमल प्रकाशन, पृ. 39-40.
119. ‘उठे गूमड़ नीले’ (1983), विजेन्द्र, शारदा प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 62. इस संग्रह में कुल चार लंबी कविताएँ हैं। ‘तस्वीरन अब बड़ी हो चली’ दूसरे स्थान पर है।
120. वही, पृ. 62.
121. ‘घना के पाँखी’ (2000), विजेन्द्र, सार्थक प्रकाशन, गौतम नगर, नई दिल्ली, पृ. 131-144.
122. वही, पृ. 123.
123. वही, पृ. 124
124. ‘ये आकृतियाँ तुम्हारी’, (प्र.सं. 1980), विजेन्द्र, कोणार्क प्रकाशन, कमला नगर, दिल्ली, पृ. 9.
125. वही, पृ. 44.
126. वही, पृ. 88-91.
127. ‘घना के पाँखी’, विवरण पूर्वोक्त, पृ. 129.
128. वही, पृ. 129.
129. वही, पृ. 130.
130. ‘ये आकृतियाँ तुम्हारी’, विवरण पूर्वोक्त, पृ. 91.
131. ‘कुमार विकल : सम्पूर्ण कविताएँ’ (प्र. सं. 2024) , राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 132. इससे पहले कुमार विकल की सम्पूर्ण कविताएँ आधार प्रकाशन, पंचकूला से वर्ष 2013 में प्रकाशित हुई थी.
132. वही, पृ. 53.
133. वही, पृ. 125.
134. वही, पृ. 114.
135. वही, 114.
136. वही, पृ. 115.
137. यह वाक्यांश रघुवीर सहाय के ‘दूसरा सप्तक’ (1951) में संकलित वक्तव्य से है। संदर्भित वाक्य हैं- “शमशेर बहादुर का यह कहना मुझे बराबर याद रहेगा कि ज़िंदगी में तीन चीज़ों की बड़ी ज़रूरत है- ऑक्सीजन, मार्क्सवाद और अपनी वह शक्ल जो हम जनता में देखते हैं। मगर मार्क्सवाद को कविता पर गिलाफ़ की तरह चढ़ाया नहीं जा सकता।” ‘रघुवीर सहाय रचनावली-1’, पृ. 38.
138. ‘ख़ुद पर निगरानी का वक़्त’ (प्र.सं. 2015), चंद्रकांत देवताले, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 47.
139. ‘जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा’ चंद्रकांत देवताले की चयनित कविताएँ (प्र.सं. 2008), संवाद प्रकाशन, मुंबई, मेरठ, पृ. 48-51.
140. ‘रोशनी के मैदान की तरफ़’ (प्र.सं. 1982), चंद्रकांत देवताले, राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली, पृ. 36.
141. वही, पृ. 37.
142. वही, पृ. 9.
143. ‘उजाड़ में संग्रहालय’ (प्र. सं. 2003), चंद्रकांत देवताले, राजकमल प्रकाशन,पृ. 78.
144. ‘पत्थर फेंक रहा हूँ’ (प्र.सं. 2010), चंद्रकांत देवताले, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 82.
145. वही, पृ. 73.
146. ‘उजाड़ में संग्रहालय’, पृ. 46-47.
147. वही, पृ. 82-83.
148. ‘पत्थर फेंक रहा हूँ’, पृ. 142-144.
149. वही, पृ. 144.






