आषाढ़ का एक दिन : सिनेमाई रूपांतरण में प्रयोगशीलता / जवरीमल्ल पारख


‘मणि कौल के लिए साहित्यिक कृति फिल्म निर्माण के लिए कच्चे माल की तरह नहीं थी। साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाते हुए शायद उनके दिमाग में यह रहता होगा कि दर्शक उनकी फिल्म देखते हुए उस साहित्यिक रचना को न भूलें और न ही इस फिल्म को उस कृति से इस हद तक स्वतंत्र मानें कि साहित्यिक रचना फिल्म के संदर्भ में अप्रासंगिक हो जाये। इसके विपरीत वे यह चाहते थे कि दर्शक फिल्म देखकर साहित्य की तरफ लौटे। वह साहित्यिक रचना और उस पर आधारित फिल्म के बीच एक द्वंद्वात्मक रिश्ता कायम करने की कोशिश करते थे। यह द्वंद्वात्मक रिश्ता कई बार दोनों में तनाव की सृष्टि करता था और कई बार उनमें संगति भी पैदा होती थी।’–‘आषाढ़ का एक दिन’ के फिल्मान्तरण पर साहित्य और सिनेमा के वरिष्ठ आलोचक जवरीमल्ल पारख का आलेख।

एक फिल्मकार के तौर पर मणि कौल (1944-2011) का नाम अपरिचित नहीं रहा है। वे हिंदी के अकेले ऐसे फिल्मकार थे जिन्होंने साहित्यिक कृतियों, विशेष रूप से हिंदी कृतियों पर सर्वाधिक फिल्में बनायीं। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे होंगे जिन्होंने उनकी सभी फिल्में देखी होंगी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों और पुरस्कारों के बावजूद मणि कौल की फिल्मों का व्यावसायिक प्रदर्शन प्रायः संभव नहीं हुआ। वैसे भी फिल्मों के प्रदर्शन का जो पूरा ढांचा विकसित हुआ है, उसमें न सिर्फ मणि कौल बल्कि किसी भी ऐसे फिल्मकार के लिए अपनी फिल्मों का प्रदर्शन संभव नहीं रहा है जो सिनेमा को सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं मानते। सिनेमाघर उन फिल्मों को दिखाने से परहेज करते हैं, जिनके दर्शकों की संख्या सीमित हो सकती है। यह मल्टी कांपलेक्स के इस दौर में भी संभव नहीं हो रहा है। यही कारण है कि मणि कौल जैसे फिल्मकारों की फिल्में उन दर्शकों के लिए भी दशकों तक अनदेखी रह जाती हैं जो नयी तरह का रचनात्मक सिनेमा देखना चाहते हैं।

मणि कौल (1944-2011) ने अपनी पहली फिल्म 1969 में ‘उसकी रोटी’ नाम से बनायी थी। यह फिल्म मोहन राकेश की इसी नाम की कहानी पर आधारित थी। उन्होंने अपनी दूसरी फिल्म दो साल बाद 1971 में ‘आषाढ़ का एक दिन’ के नाम से बनायी थी। यह मोहन राकेश का बहुचर्चित नाटक था और जिसे मंच पर भी सफलतापूर्वक खेला जा चुका था, उसी नाटक को आधार बनाकर मणि कौल ने अपनी फिल्म बनायी थी। साहित्यिक कृतियों को आधार बनाकर फिल्म बनाने का यह सिलसिला निरंतर चलता रहा। उनकी तीसरी फिल्म ‘दुविधा’ राजस्थानी के प्रख्यात कथाकार विजयदान देथा की इसी नाम की कहानी पर आधारित थी। यह फिल्म 1973 में बनी थी। इसके बाद उन्होंने विजय तेंदुलकर के नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ पर 1979 में फिल्म बनायी और 1980 में उन्होंने हिंदी के महान कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कृतियों को आधार बनाकर ‘सतह से उठता आदमी’ नाम से फिल्म बनायी। उन्होंने रूसी कथाकार फ्योदोर दोस्तोव्स्की की रचनाओं पर ‘नज़र’ (1989) और ‘अहमक’ (द ईडियटः 1991) नाम से फिल्में बनायीं। 1999 में हिंदी के कवि और कथाकार विनोद कुमार शुक्ल के पहले उपन्यास ‘नौकर की क़मीज़’ पर इसी नाम से फिल्म बनायी। मणि कौल के अलावा शायद ही किसी अन्य फिल्मकार का साहित्य से और खासतौर पर हिंदी साहित्य से इतना गहरा संबंध रहा है।

साहित्यिक रचना को फिल्म में रूपांतरित करने का सिलसिला बहुत पुराना है। दुनिया के प्रख्यात फिल्मकारों ने साहित्यिक रचनाओं को आधार बनाकर फिल्में बनायी हैं। मणि कौल से पहले भी भारत में सत्यजित राय, मृणाल सेन, विमल राय, गुरुदत्त आदि कई फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों का फिल्मांतरण किया है। मणि कौल ने भी यदि यह परंपरा अपनायी तो इन महान फिल्मकारों का ही उन्होंने अनुकरण किया था। लेकिन इसके बावजूद मणि कौल का साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाना ठीक वैसा ही नहीं है, जैसा कि उनके पूर्ववर्ती फिल्मकारों का था। दुनिया के अधिकतर फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों विशेषकर कहानियों और उपन्यासों को ऐसे कच्चे माल की तरह ग्रहण किया जिसके आधार पर एक नयी रचना निर्मित की जा सके। भले ही वह रचना फिल्म के रूप में ही क्यों न हो। लेकिन मणि कौल के लिए साहित्यिक कृति फिल्म निर्माण के लिए कच्चे माल की तरह नहीं थी। साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाते हुए शायद उनके दिमाग में यह रहता होगा कि दर्शक उनकी फिल्म देखते हुए उस साहित्यिक रचना को न भूलें और न ही इस फिल्म को उस कृति से इस हद तक स्वतंत्र मानें कि साहित्यिक रचना फिल्म के संदर्भ में अप्रासंगिक हो जाये। इसके विपरीत वे यह चाहते थे कि दर्शक फिल्म देखकर साहित्य की तरफ लौटे। वह साहित्यिक रचना और उस पर आधारित फिल्म के बीच एक द्वंद्वात्मक रिश्ता कायम करने की कोशिश करते थे। यह द्वंद्वात्मक रिश्ता कई बार दोनों में तनाव की सृष्टि करता था और कई बार उनमें संगति भी पैदा होती थी। दरअसल, साहित्य में जहां शब्द की सीमा समाप्त होती है, मणि कौल की फिल्में उससे आगे का सफर करती है। इसे उनकी पहली फिल्म ‘उसकी रोटी’ से भी समझा जा सकता है। जहां फिल्म कहानी से आगे जाकर नायिका की जिंदगी के त्रासद अकेलेपन को सिनेमा की रूढ़ भाषा से बिल्कुल भिन्न ढंग से दिखाने का साहस करती है। जहां कैमरे की गति जिंदगी के ठहराव के साथ इस कदर एकमेक हो जाती है कि उन्हें महसूस ही किया जा सकता है व्याख्यायित नहीं।

एक अच्छे फिल्मकार की अभिरुचियां फिल्मों तक सीमित नहीं होती। नाटक की तरह सिनेमा भी सभी कलाओं के समुच्चय के बिना मुमकिन नहीं है। यह महज संयोग नहीं है कि सत्यजित राय की तरह मणि कौल भी एकाधिक कलाओं में पारंगत थे। उनकी फिल्मों को अलग-अलग कला रूपों के साथ जोड़कर भी देखा जाता रहा है। उनके वृत्तचित्रों में भी यही विविधता नज़र आती है। दरअसल, मणि कौल का फिल्म संसार फिल्म की विभिन्न विधाओं के प्रयोग की शाला भी है, जहां वे विभिन्न विधाओं में फिल्म बनाते हुए उनके परंपरागत ढांचे को तोड़ते और उसमें कुछ नया जोड़ते दिखायी देते हैं। मणि कौल की फिल्मों ने एक कला माध्यम के रूप में और सिनेमाई भाषा को विकसित करने की दृष्टि से क्या नया जोड़ा है और उनके प्रयोग किस हद तक सार्थक है, इस पर भी विचार करने की जरूरत है। इस आलेख में मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर मणि कौल की बनायी फिल्म पर विचार किया गया है।

मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ जिसकी रचना 1958 में हुई थी और जिसकी रंगमंच पर बहुत कामयाब प्रस्तुतियां हुई थीं, मणि कौल ने अपने दूसरे कथाचित्र के लिए चुना। ‘आषाढ़ का एक दिन’ मोहन राकेश का पहला नाटक है जो संस्कृत के महान कवि और नाटककार कालिदास के जीवन पर आधारित है। कालिदास के बारे में प्रामाणिक तौर पर कुछ भी बताना मुश्किल है। लेकिन आमतौर पर माना जाता है कि उनका जन्म हिमालय संभवतः कश्मीर या उसके नजदीक के किसी क्षेत्र में हुआ था। कालिदास उज्जैन में चंद्रगुप्त द्वितीय के राजकवि थे और उनका काल संभवतः चौथी-पांचवीं शताब्दी रहा होगा। उनके प्रख्यात ग्रंथों में ‘ऋतुसंहार’ और ‘मेघदूत’ (दोनों मुक्तक काव्य), ‘कुमार संभव’ और ‘रघुवंश’ (दोनों महाकाव्य) और ‘अभिज्ञानशांकुतलम्’, ‘विक्रमोर्वशीयम्’, और ‘मालविकाग्निमित्र’ (तीनों नाटक) गणना होती है। उनके जीवन के बारे में कुछ किवदंतिया ंतो प्रचलित हैं लेकिन कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए मोहन राकेश जिन्होंने उच्च शिक्षा संस्कृत में प्राप्त की थी, कालिदास के जीवन को आधार बनाकर जो नाटक लिखा, उसमें व्यक्त जीवन का वास्तविक कालिदास से भले ही कोई संबंध न हो, लेकिन वह इस दृष्टि से अयथार्थ नहीं है कि इस नाटक के माध्यम से जो प्रश्न उठाये गये हैं वह महत्त्वपूर्ण है, कालिदास से भी अधिक मोहन राकेश के अपने समय और समाज के लिए महत्त्वपूर्ण है और प्रासंगिक भी। नाटक की कथा भले ही कालिदास के समय के अनुसार गढ़ी गयी हो, लेकिन उसके पात्र, पात्रों की सोच और उनके द्वंद्व वे कालिदास से भी अधिक आज के समय के नजदीक है। कालिदास हो या मल्लिका या विलोम भी, वे आधुनिक चेतना संपन्न चरित्र हैं भले ही उन्हें एक विशेष ऐतिहासिक समय में क्यों न प्रस्तुत किया गया हो। जब मल्लिका अपनी मां को कहती है कि वह विवाह नहीं करना चाहती या जब वह कहती है कि “मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है” तो उसके मुख से एक आधुनिक स्वतंत्रचेत्ता नारी बोल रही होती है। रंगमंच पर इस नाटक की सफलता की एक प्रमुख वजह इसकी आधुनिक संवेदना है जिसका इसकी ऐतिहासिक अंतर्वस्तु के साथ कोई अंतर्विरोध नहीं है।

तीन अंकों में विभाजित यह नाटक मल्लिका के घर में ही चलता है। घर के बाहर की घटनाएं और प्रसंग सिर्फ सूचनाओं के रूप में ही सामने आते हैं। घर में जो झरोखा है, उसीसे बाहर के कुछ दृश्य पात्रों को दिखायी देते हैं। स्पष्ट है कि रंगमंच प्रस्तुति के लिए यह एक आदर्श स्थिति है जहां नाटक की पूरी कथा एक ही स्थान पर घटित हो। हालांकि तीनों अंक तीन अलग-अलग कालों से संबद्ध हैं और उनके बीच कई-कई वर्षों का अंतराल है। मुख्य पात्र भी वही हैं, मल्लिका, अंबिका, कालिदास, मातुल और विलोम। मल्लिका, मातुल और विलोम ही तीनों अंकों में मौजूद हैं जबकि अंबिका, कालिदास और निक्षेप दो-दो अंकों में आते हैं। नाटक के मंचन के लिए पहाड़ी गाँव के एक मामूली से घर को ही मंच का रूप दिया जाना पर्याप्त है लेकिन नाटक में उस गाँव और उसके आसपास के प्राकृतिक सौंदर्य का, पहाड़ों का, रास्तों का, बादलों का, बरसात का और उसके विभिन्न रूपों का, हरिणशावकों का बारबार उल्लेख आता है। इनमें से सिर्फ मंच पर घायल हरिणशावक और बरसात में भीगे पात्र ही आते हैं। नाटक के मंच के लिए संवादों के माध्यम से संकेत ही पर्याप्त हैं। लेकिन फ़िल्म इस बात का अवसर देती है कि वह उन घटनाओं को भी दिखा सके जिनका उल्लेख नाटक में किया गया है, या जिनका संकेत नाटक में किया गया है। मसलन, दूसरे अंक में निक्षेप का यह कहना कि उसने कालिदास को घोड़े पर गुजरते देखा है, उसे फ़िल्म में साक्षात दिखाया जा सकता था। फ़िल्म में बरसात के, अंधेरे के वे विभिन्न रूप दिखाये जा सकते हैं जिनका अलग-अलग अंकों में भिन्न-भिन्न प्रतीकार्थों के साथ मोहन राकेश ने उल्लेख किया है। साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फ़िल्मों में फ़िल्मकार साहित्यिक कृतियों के ऐसे वर्णनों और संकेतों को फ़िल्म की अपनी भाषा के अनुसार रूपांतरित करते हैं। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ फ़िल्म में कहानी में वर्णित संक्षिप्त से उल्लेख के आधार पर सत्यजित राय ने अवध को हड़पने की अंग्रेजों की कोशिश की एक समानांतर कहानी प्रस्तुत कर दी थी। लेकिन मणि कौल ऐसा नहीं करते। मणि कौल की कोशिश यह होती है कि साहित्यिक कृति पर फ़िल्म बनाते हुए उसकी स्वतंत्र ईयत्ता भी बनी रहे। वह कृति से इस हद तक स्वतंत्र रचना न बने कि कृति से उसका संबंध ही खत्म हो जाये। यह बात ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर बनी फ़िल्म पर भी लागू होती है। मणि कौल ने नाटक को रंगमंच की प्रस्तुति के अनुरूप निर्मित नहीं किया है, उसे फ़िल्म की तरह ही निर्मित किया है और यही वजह है कि फ़िल्म में निरंतर मिड शाॅट, क्लोज अप और उन सभी कोणों का उपयोग किया गया है जो फ़िल्म की विशेषता है, नाटक की नहीं। फिर भी फ़िल्म नाटक से इतनी स्वतंत्र भी नहीं होती कि दर्शकों को फ़िल्म में निहित नाटक का एहसास ही न हो। फ़िल्मकार नाटक में वर्णित परिवेश से बाहर अपनी फ़िल्म को नहीं ले जाता। यहां तक कि वह उस ग्राम में भी नहीं जाता, जहां कालिदास (अरुण खोपकर) पला-बढ़ा है। फ़िल्म का परिवेश भी मल्लिका (रेखा सबनीस) के घर और कभी-कभार उसके आसपास से ही निर्मित हुआ है। कहानी बिल्कुल वैसे ही आगे बढ़ती है जैसे नाटक में बढ़ती है, सिवाय फ़िल्म के आरंभ का वह छोटा सा दृश्य जिसमें एक नवजात बच्चे के छोटे-छोटे पैर, उसके नन्हे हाथ पर्दे पर दिखायी देते हैं, उसकी रोने की ध्वनि आती है और पृष्ठभूमि में मेघदूत का वह श्लोक सुनाई देता है जिसमें आषाढ़ के प्रथम दिवस का उल्लेख है। यह एक बच्चे के संसार में आने का सांकेतिक दृश्य है। लेकिन उसके बाद फ़िल्म नाटक के अंकों के अनुसार ही आगे बढ़ती है। वे ही पात्र, वे ही संवाद और वही परिवेश। फ़िल्म को भी नाटक की तरह तीन अंकों में विभाजित किया गया है और संवादों द्वारा बताया गया है कि अब दूसरा अंक आरंभ होता है और फिर तीसरा अंक आरंभ होता है। संवादों की भाषा तक वही है जो नाटक में है, हां कहीं-कहीं संवादों को छोड़ दिया गया है। संभवतः अनावश्यक विस्तार पाकर। दूसरे अंक में कालिदास की पत्नी प्रियंगुमंजरी (हेेमा सहाय) की दो सेविकाओं रंगिणी और संगिणी से संबंधित अंश को भी छोड़ दिया गया है जबकि अनुस्वार और अनुनासिक नामक दो पात्रों को रखा गया है क्यांेकि उनका उल्लेख उसी अंक में बाद में प्रियंगुमंजरी के प्रस्ताव के दौरान आता है जिन्हें वह मल्लिका के लिए योग्य वर के रूप में प्रस्तुत करती है। नाटक में ये चारों काॅमिक पात्र हैं लेकिन सांकेतिक रूप में ये राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाली नौकरशाही और शिक्षा व्यवस्था के प्रतीक भी हैं जिनका नाटक में मजाक उड़ाया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि मणि कौल को ये पात्र मूल कथा से विचलन प्रतीत हुए हैं इसलिए जिस अंश को हटाना मुमकिन था, उन्हें वे हटा देते हैं। इन कुछ अपवादों को छोड़कर फ़िल्म नाटक का पूरा अनुकरण करती है और फ़िल्मकार इस अहसास को बनाये रखता है कि यह एक नाटक का फिल्मांतरण है।

यह इस बात से तो प्रमाणित होता ही है कि फ़िल्मकार नाटक के ढांचे से बाहर नहीं जाता, वह नाटक के संवादों के साथ बहुत कम छेड़छाड़ करता है। उनको यथावत रखा गया है, हां जहां जरूरी हुआ है वहां अनावश्यक संवादों को हटा दिया गया है। लेकिन जो संवाद शामिल किये गये हैं, उनमें एक-दो अपवादों को छोड़कर नाटक के संवाद ही रखे गये हैं। जैसे एक जगह नाटक में प्रयुक्त ‘सामना’ की जगह ‘साक्षात्कार’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, या एक अन्य स्थान पर ‘अनायास’ शब्द संवाद के बीच जोड़ा गया है। फ़िल्मकार ने उन शब्दों को भी नहीं बदला है जिनसे हिंदी का सामान्य दर्शक परिचित नहीं है और जिन्हें आसानी से उन शब्दों के साथ बदला जा सकता था, जो संवादों की मूल प्रकृति को बनाए रखकर भी दर्शकों के लिए अधिक संप्रेषणीय हो जाते। लेकिन फ़िल्मकार न सिर्फ ऐसा नहीं करता वरन वह संवादों में निहित जो नाटकीयता और भावावेश है, उसे भी बनाए रखने की आवश्यकता नहीं समझता। ‘एन्साइक्लोपीडिया आॅफ इंडियन सिनेमा’ में फ़िल्म पर की गयी टिप्पणी के अनुसार फ़िल्म के अधिकतर संवादों को पहले ही रिकाॅर्ड कर लिया गया था और शूटिंग के दौरान उन्हें पीछे से चलाया गया था। लगभग सभी संवादों को चाहे वे किसी भी पात्र द्वारा क्यों न कहे गये हों, उन्हें कमोबेश एक सी गति (पेस) और स्वर (टोन) में पढ़ा गया है (फ़िल्म में संवाद सुनते हुए किसी सस्वर पढ़ी जा रही किताब को सुनने का एहसास होता है)। पढ़ने के दौरान जितना न्यूनतम उतार-चढ़ाव आवश्यक है उतना ही रखा गया है। इस तरह फ़िल्मकार नाटक के संवादों की स्वतंत्र ईयत्ता को बनाए रखता है। ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक के संवाद नाटक की केंद्रीय शक्ति हैं। मल्लिका और कालिदास द्वारा कहे गये संवाद ही नहीं वरन अंबिका (अनुराधा कपूर), विलोम (ओम शिवपुरी), मल्लिका, निक्षेप और मातुल (पिंचु कपूर) के संवादों में भी जो अर्थ गांभीर्य, सांकेतिकता और पात्रों की चारित्रिक जटिलता का उद्घाटन होता है, वह इस नाटक को ऐसी रचनात्मक कृति में रूपांतरित कर देता है जिसे किसी मंच या फ़िल्मांकन की आवश्यकता ही नहीं रहती। इसका पढ़ा जाना ही इसकी शक्ति को उद्घाटित करने के लिए पर्याप्त है। शायद यही वजह है कि मणि कौल ने नाटक पर फ़िल्म बनाते हुए उसे पढ़े जाने, मंचित किये जाने और फ़िल्माए जाने की विशिष्टताओं को समानांतर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। यह एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम है। यह महत्त्वपूर्ण नहीं है कि मणि कौल इसमें कितने कामयाब हुए हैं, महत्त्वपूर्ण यह है कि यह ऐसी रचनात्मक चुनौती थी जिसका निर्वाह करना आसान नहीं था। फ़िल्मकार शायद यह चाहता है कि दर्शक फ़िल्म देखते हुए संवादों को ध्यान से सुने, उनके एक-एक शब्द को और ऐसा करते हुए न कलाकारों का अभिनय, न परिवेश और न ही पार्श्व संगीत और ध्वनियां उनमें बाधक बने। इन सभी पक्षों को निर्देशकीय नियंत्रण में रखा गया है। जिस प्राकृतिक सौंदर्य का उल्लेख नाटक में बारबार आता है, फ़िल्मकार उस सौंदर्य से साक्षात्कार कराने का प्रयत्न लगभग नहीं करता। पहले अंक में तो बिल्कुल भी नहीं, दूसरे और तीसरे अंक में भी बहुत कम। इसी तरह अभिनय में भी नाटकीयता के लगभग सभी अवसरों को छोड़ दिया गया है। अंबिका का गुस्सा, खीझ और असहायता, मल्लिका की हर अंक में बढ़ती वेदना और अपनी आंतरिक पीड़ा को हर क्षण दबाने की उसकी कोशिश में निहित विडंबना, कालिदास के चरित्र के अंतर्विरोध और अंतर्द्वंद्व और विलोम की कालिदास के प्रति ईर्ष्यागत  प्रतिद्वंद्विता- यह सब कुछ संवादों के माध्यम से ही सामने आता है और इनके अनुरूप अभिनय या संवाद अदायगी को इस हद तक संयमित रखा गया है कि उस दर्शक के लिए जो व्यावसायिक सिनेमा के लाउड और सतही अभिनय को देखने का आदी है, चीख-चीखकर बोले गये संवादों को सुनने का आदी है, उसके लिए मणि कौल की फ़िल्में लगभग ठहरी हुई प्रतीत हो सकती है।

मणि कौल ने बहुत सावधानी से कैमरे और पार्श्व संगीत का उपयोग किया है। नाटक में मोहन राकेश ने मंच पर खेले जाने के लिए विस्तृत रंग संकेत दिये हैं। फ़िल्म के लिए उन संकेतों का बहुत उपयोग नहीं है। इसलिए प्रायः फ़िल्मकार ने उनका उपयोग नहीं किया है। लेकिन फ़िल्मकार ने जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विचलन रंगमंच से किया है, वह है कैमरे का उपयोग। रंगमंच पर खेले गये नाटक को दर्शक समान दूरी से और मंचित पूरे दृश्य को एक साथ देखता है लेकिन फ़िल्म में दर्शक वही देखता है जो फ़िल्मकार उसे दिखाना चाहता है और उतना ही देखता है जितना उसे दिखाया जाता है। यही वह क्षेत्र है जहां फ़िल्मकार अपनी भाषा में अपनी बात कहने की कोशिश करता है। कैमरा ही उसकी भाषा है और इस भाषा का ही हिस्सा है, पार्श्व संगीत जिसमें ध्वनियां भी शामिल हैं। फ़िल्म में लाॅन्ग शाॅट का इस्तेमाल बहुत कम हुआ है ज्यादातर मिड शाॅट और क्लोजअप का। कैमरा तेजी से एक आॅब्जेक्ट से दूसरे आॅब्जेक्ट पर नहीं जाता। उसकी गति धीमी और उदासी भरी प्रतीत होती है। श्वेत-श्याम में बनायी गयी फ़िल्म में चटख और उजलापन प्रायः नहीं है। एक उदासी भरा मटमैलापन हर कहीं फैला हुआ दिखायी देता है। यहां तक कि दूसरे अंक में जब प्रियंगुमंजरी और उनके सेवकों का आगमन होता है तब भी वह उदासी टूट नहीं पाती। उनके श्वेत और रेशमी वस्त्र और आभूषण कंट्रास तो पैदा करते हैं लेकिन उदासी को तोड़ने में वह कामयाब नहीं हो पाते। यहां तक कि हास्य का प्रसंग भी विद्रुपता में बदलता दिखायी देता है। पहले अंक के आरंभिक दृश्य में जब उत्साह और उमंग से भरी मल्लिका अपने घर में प्रवेश करती है तब इस उत्साह और उमंग को अंबिका की बातें काफी हद तक इसे उतार पर ले आती है। कालिदास का घायल हरिणशावक को लाना और मल्लिका द्वारा उसे दूध पिलाना उस भावी का संकेत है जिसकी सूचना घोड़ों की टापों के साथ सुनायी देती है और धुंधली आकृतियां दिखायी देती हैं  जिन्हें देखकर उसकी मां कहती है कि जब भी “ये आकृतियाँ यहां दिखाई देती हैं…कोई न कोई अनिष्ट अवश्य होता है, कभी युद्ध की सूचना आती है, कभी महामारी की”। लेकिन फ़िल्मकार नाटक में वर्णित इन संकेतों तक ही अपने को सीमित नहीं रखता, वह अपनी तरफ से भी स्थितियों की विकरालता को संकेतों से अभिव्यक्त करता है। पहले ही अंक में जब अंबिका और विलोम बात कर रहे हैं और विलोम अंबिका को कहता है कि “तुम्हारा तो जीवन ही पीड़ा का इतिहास है” तो चूल्हे की तेज आग पूरे पर्दे पर आच्छादित हो जाती है। विलोम जिस जलती मशाल को लेकर मल्लिका के यहां आया था, वह मशाल तेज हवा के कारण धधक कर जलने लगती है क्योंकि मल्लिका निक्षेप के बताने पर कालिदास को इस बात के लिए मनाने गयी है कि वह आचार्य वररुचि के साथ उज्जयिनी चला जाए और राजकीय सम्मान को ग्रहण करे। अंबिका जानती है कि यह सूचना कालिदास के लिए भले ही कितनी भी महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, मल्लिका के लिए इसका एक ही अर्थ है कालिदास से हमेशा-हमेशा के लिए बिछोह। तेज जलती हुई मशाल इसी भावी तूफान का संकेत है। इसी प्रकार जब पहले अंक में मल्लिका कालिदास को उज्जयिनी जाने के लिए प्रेरित करते हुए कहती है कि “विश्वास करो कि तुम यहाँ से जाकर भी यहाँ से अलग नहीं होओगे।…” तो इस दृश्य में मल्लिका कालिदास की ओट में चली जाती है और पूरा संवाद जिसमें “यहाँ की वायु, यहाँ के मेघ और यहाँ के हरिण इन सबको तुम साथ ले जाओगे” तब मल्लिका नहीं सिर्फ उसकी आवाज सुनाई देती है इस प्रकार वह अपने को कालिदास से छुपा लेती है जैसे वह कालिदास के रास्ते का अवरोध नहीं बनना चाहती। और संवाद पूरा होने पर ही वह कालिदास के सामने आती है और उसके कंधे पर हाथ रखती है, जैसे उसे आश्वस्त कर रही हो। नाटक में दिये रंग-संकेत के अनुसार यहाँ कालिदास और मल्लिका को एक दूसरे का हाथ पकड़े होना चाहिए था, लेकिन फ़िल्म में ऐसा नहीं होता, हाँ यह अवश्य है कि पृष्ठभूमि में बादल के गरजने की ध्वनि सुनाई देती है। नाटक में भी इसका संकेत है। स्पष्ट है कि उन दोनों की मनोदशा तो वैसी ही है जैसी नाटक में वर्णित है लेकिन उसकी दृश्यात्मक अभिव्यक्ति फ़िल्म में बदल जाती है। ऐसे कई रूपांतरण नाटक के फ़िल्मांतरण में देखे जा सकते हैं।

‘आषाढ़ का एक दिन’ एक ऐतिहासिक नाटक है। इसका मुख्य चरित्र कालिदास एक ऐतिहासिक चरित्र है जो संस्कृत के श्रेष्ठ कवि और नाटककार के रूप में प्रख्यात हैं। लेकिन इस नाटक की कथावस्तु जिन घटनाओं पर आधारित हैं, उनकी सत्यता के बारे में किसी तरह का दावा नहीं किया जा सकता। कालिदास के जीवन के बारे में तरह-तरह की किंवदंतियां प्रचलित हैं जिनकी सत्यता के बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है और साहित्य के लिए यह आवश्यक भी नहीं है। साहित्य और सिनेमा में ऐतिहासिक चरित्रों को काल्पनिक घटनाओं और प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत करने की सुदृढ़ परंपरा रही है। मोहन राकेश का नाटक भी इसी परंपरा की देन है। संस्कृत के ही एक अन्य महत्त्वपूर्ण कवि बाणभट्ट को केंद्र्र में रखकर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ नामक उपन्यास लिखा था जिसमें बाण और हर्ष के अलावा अधिकतर पात्र द्विवेदीजी की अपनी सृष्टि थे। यही बात ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर भी लागू होती है। दरअसल घटनाओं और चरित्रों की ऐतिहासिकता नहीं बल्कि उनके माध्यम से उठाये जाने वाले सवाल महत्त्वपूर्ण होते हैं। क्या वे सवाल जिस देशकाल के माध्यम से रचना में प्रस्तुत किये जा रहे हैं, उस देशकाल के संदर्भ में सत्य प्रतीत होते हैं, यथार्थ भले न प्रतीत हों और क्या आज के संदर्भ में भी वे सत्य और प्रासंगिक हैं?

कालिदास का साहित्य इस बात की गवाही देता है कि उसका गहरा संबंध ऐसे पर्वतीय परिवेश से रहा है जिसे वे कभी भुला न सके और जिसकी स्मृतियां उनके काव्य और नाटकों में तरह-तरह से अभिव्यक्त हुई हैं। स्पष्ट है कि उज्जयिनी का राजकीय परिवेश और अपने उस भूमि जहां कालिदास का बचपन बीता है, उसको लेकर उनके मन में द्वंद्व रहा होगा। क्या ‘मेघदूत’, ‘अभिज्ञानशाकुंतल’ आदि में इसी द्वंद्व की अभिव्यक्त हुई है। इसका कोई ठोस उत्तर देना मुश्किल है लेकिन इसी संभावना ने ही नाटक की कथा को जन्म दिया होगा, इसे सहज ही समझा जा सकता है। परिवेश केवल प्राकृतिक ही नहीं होता, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि भी उसके हिस्से होते हैं। उनकी स्मृत्तियां ही मल्लिका और कालिदास के प्रेम प्रसंग के रूप में सामने आती है और उसकी सत्यता का प्रमाण है, ‘मेघदूत’ में जहां कवि ऐसे यक्ष की कल्पना करता है जो अपनी पत्नी से दूर है और मेघों के माध्यम से वह उस तक अपना संदेश पहुंचाना चाहता है। नाटक मंे कालिदास का मल्लिका से दूर होना, उसका राजकवि बनकर उज्जयिनी जाना और बाद में मातृगुप्त के रूप में काश्मीर का शासक बनना और अंततः अपनी उसी भूमि पर लौट आना जो प्रेरणा के रूप में सदैव उसके साथ रही है। लेकिन जिसे कवि ने अपनी कल्पना में सदैव जीवित रखा, वह वास्तव में उसी रूप में बना नहीं रहा। समय ने यदि कवि के जीवन में बहुत कुछ बदला था, तो उस बदलाव से वह परिवेश भी अछूता नहीं रहा था। न वह ग्राम और न ही मल्लिका, उसकी प्रेयसी। कालिदास को उज्जयिनी ने बहुत कुछ दिया था, सम्मान, समृद्धि और सत्ता। लेकिन क्या इन उपलब्धियों ने कवि की रचनात्मकता को भी समृद्ध किया?

नाटक में कवि के मुख से ही कहलाया गया है कि उसे “अधिकार मिला, सम्मान बहुत मिला, जो कुछ मैंने लिखा उसकी प्रतिलिपियाँ देश भर में पहुँच गयीं, परंतु मैं सुखी नहीं हुआ”। कालिदास इसे व्याख्यायित करते हुए कहता है कि “किसी और के लिए वह वातावरण और जीवन स्वाभाविक हो सकता था, मेरे लिए नहीं था। एक राज्याधिकारी का कार्यक्षेत्र मेरे कार्यक्षेत्र से भिन्न था”। दरअसल यह अंतर्द्वंद्व ही इस नाटक का केंद्रीय प्रश्न है। एक लेखक के लिए क्या उचित है? सत्ता, समृद्धि और सम्मान लेखक के जीवन को सुविधा संपन्न और उसको लोकप्रिय तो बना सकता है लेकिन वह उसकी रचनात्मकता को नष्ट भी कर सकते हैं। कालिदास नाटक में कहता है कि उसने “जो कुछ लिखा है यहाँ के जीवन का ही संचय था…और जब उससे हटकर लिखना चाहा, तो रचना प्राणवान् नहीं हुई”। कालिदास सामंती दौर के कवि थे और उस दौर में कवियों को राजकवि बनाकर, उनको दरबार में आमंत्रित कर, उन्हें धन-दौलत देकर सम्मानित किया जाना बहुत स्वाभाविक था। लेकिन भक्ति और रीतिकाल इस बात के उदाहरण हैं कि राज्याश्रय ग्रहण कर कवि देव, बिहारी और पद्माकर तो बन सकता है, लेकिन कबीर, सूर और तुलसी नहीं बन सकता। लेकिन मोहन राकेश एक ऐसे दौर के लेखक हैं जब लेखक के लिए राज्याश्रय ही एकमात्र विकल्प नहीं है, वह अधिक स्वतंत्र है और राजसत्ता के दबाव से स्वतंत्र रहकर भी वह रचनारत रह सकता है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? क्या आज के लेखक को भी सत्ता पथभ्रष्ट नहीं करती? मोहन राकेश इस नाटक के माध्यम से यही कहते प्रतीत होते हैं कि सत्ता आज भी लेखक को पथभ्रष्ट कर सकती है और उसकी रचनात्मकता को नष्ट कर सकती है। हां, बचने का मार्ग यही है कि वह कालिदास की तरह सत्ता से जुड़कर भी रचना के स्तर पर उससे विलग रहे। लेकिन यही वह द्वंद्व है जिसकी कीमत किसी मल्लिका को चुकानी पड़ती है। मल्लिका सिर्फ प्रेयसि नहीं है, वह कालिदास की प्रेरणा भी है और प्रतिभा भी। वह उस परिवेश का प्रतिनिधित्व करती है जिसने कालिदास को कालिदास बनाया। उससे अलग होकर एक कवि के रूप में उसकी कोई हैसियत नहीं है। कालिदास जब मल्लिका से दूर चला जाता है और उज्जयिनी के सुख-वैभव का हिस्सा बन जाता है तब भी उसका रचनाकार मानस रूप में उसी परिवेश से और मल्लिका से जुड़ा रहता है। वह कभी भी अपने को उससे अलग नहीं कर पाता। यही कालिदास का अंतर्द्वंद्व है और यह अंतर्द्वंद्व कालिदास से ज्यादा आज के रचनाकार का अंतर्द्वंद्व है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि मल्लिका का वजूद कालिदास के संदर्भ में ही सत्य है, उससे अलग क्या उसका कोई महत्त्व नहीं है। इस नाटक में आरंभ से अंत तक मल्लिका अपने होने को एक स्वतंत्र स्त्री के रूप में प्रमाणित करती है। वह कालिदास के लिए भले ही प्रेरणा हो, लेकिन वह उसके पीछे-पीछे चलने वाली अनुचर दासी नहीं है और इसी अर्थ में वह एक आधुनिक स्त्री है। वह अपने बारे में निर्णय स्वयं लेती है। जिस राजकीय वैभव के जाल में कालिदास आसानी से फंस जाता है, मल्लिका अवसर मिलने पर भी उसे आसानी से ठुकरा देती है, क्यांेंकि वह उसके स्वाभिमान को चोट पहुंचाने वाला है। स्त्री को अंततः समझौते करने पड़ते हैं और मल्लिका को भी करना पड़ता है। इसका प्रमाण है, विलोम से उसका विवाह। लेकिन विवाहित होते हुए भी वह कालिदास के प्रति अपने प्रेम को लेकर लज्जित नहीं है। तीसरे अंक में जब कालिदास एक नये जीवन की शुरुआत का प्रस्ताव लेकर आता है, तब वह अपने विवाहित होने या मां होने का वास्ता देकर ठुकराती नहीं, अलबत्ता जानती है कि उसका मातृत्व उसके जीवन की बेड़िया हैं। विलोम नहीं, बल्कि उसकी वह बच्ची जो उसकी गोद में पल रही है और जिसे वह भविष्य की मल्लिका कहती है, उससे अलग अब उसके जीवन का कोई मकसद नहीं है। इस अर्थ में भी कालिदास के प्रति उसका अनुराग भावना से भावना का वरण ही है जिसको लेकर उसके मन में न अपराध बोध है और न ही पश्चाताप। इसके विपरीत कालिदास निरंतर अपराधबोध से ग्रस्त रहता है और प्रायश्चित की भावना से प्रेरित होकर ही वह मल्लिका के सामने एक नये जीवन की शुरुआत का प्रस्ताव करता है।

मल्लिका के समानांतर दो स्त्री चरित्र और हैं। एक मल्लिका की मां अंबिका और दूसरी कालिदास की पत्नी प्रियंगुमंजरी। अंबिका उस अकेली मां की तरह है, जो बिना किसी बाहरी सहारे के अपने बच्चों का पालन-पोषण करती है और जिसकी चिंता के केंद्र में अपने बच्चे होते हैं, और अगर बेटी हो तो उसकी चिंता कई गुना बढ़ जाती है। अपने अनुभवों से वह जानती है कि पुरुष वर्चस्व वाले समाज में एक युवती के लिए जीवनयापन कितना चुनौतीपूर्ण और खतरनाक है। अपनी बेटी के भविष्य के प्रति चिंताओं के कारण ही वह कालिदास के व्यक्तित्व की कमजोरियों को सहज ही पहचान लेती है। वह जानती है कि कालिदास की महत्त्वकांक्षाओं के मार्ग में अवरोध बनकर उसकी बेटी खड़ी नहीं होगी, वह सहज ही अपने को रास्ते से हटा लेगी, लेकिन उसको अपने इस त्याग की जो कीमत चुकानी पड़ेगी, उसे महसूस कर वह अंदर ही अंदर दहल जाती है और इसी वजह से वह कालिदास के प्रति आरंभ से अंत तक कटु बनी रहती है। अंबिका की यही यथार्थ चेतना उसे एक ठोस चरित्र बनाती है जबकि प्रियंगुमंजरी अपेक्षाकृत एक कमजोर चरित्र बनकर उभरती है। वह मल्लिका और कालिदास के संबंधों को जानती है और उसको लेकर आशंकित रहती है। इसी आशंका से प्रेरित होकर वह मल्लिका को अपनी सत्ता और वैभव से आतंकित करना चाहती है, ताकि या तो वह उसकी अनुचर बनकर रहे या उसके मार्ग में अवरोध बनकर उपस्थित न हो। स्पष्ट है कि प्रियंगुमंजरी मल्लिका के व्यक्तित्व को समझने में असमर्थ है। लेकिन मल्लिका के लिए प्रियंगुमंजरी को समझना मुश्किल नहीं है और इसीलिए वह आसानी से उसके प्रस्ताव को ठुकरा देती है।

‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक और फ़िल्म अपनी अर्थवत्ता की अभिव्यक्ति के मामले में पूर्णतः एक हैं।  साहित्यिक रचना पर आधारित फ़िल्में न सिर्फ कथावस्तु के स्तर पर बल्कि उसमें निहित संदेश के स्तर पर भी मूल रचना से काफी भिन्न हो जाती हैं। और यह कोई दोष नहीं है। लेकिन मणि कौल यह मार्ग नहीं अपनाते। वह न सिर्फ कथावस्तु के स्तर पर कोई भेद नहीं करते वरन उसके संदेश के साथ भी कोई छेड़छाड़ नहीं करते। हां, जिस प्रकार पाठक और मंचित नाटक के दर्शक के लिए इसके अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, वैसी ही संभावना फिल्म के संदर्भ में भी बनी रहती है।

फिल्म का नाम : आषाढ़ का एक दिन; प्रदर्शन : 1971; मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर आधारित; अवधि : 114 मिनट; भाषा : हिन्दी; निर्देशन : मणि कौल; छायांकन : के के महाजन; संगीत : जयदेव।
अभिनय : रेखा सबनिस (मल्लिका), अरुण खोपकर (कालिदास), हेमा सहाय (अंबिका), अनुराधा कपूर (प्रियंगुमंजरी),  ओम शिवपुरी (विलोम), पिंचु कपूर (मातुल)

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