‘कोसल में विचारों की कमी है’ / जवरीमल्ल पारख
एक जागरूक और विचारवान राष्ट्र ही लोकतंत्र की रक्षा कर सकता है। क्या भारत के पास अपने लोकतंत्र को बचाने
एक जागरूक और विचारवान राष्ट्र ही लोकतंत्र की रक्षा कर सकता है। क्या भारत के पास अपने लोकतंत्र को बचाने
‘दरअसल, हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का कोई अंग ऐसा नहीं है जो इस सांप्रदायिक फ़ासीवादी सरकार के निशाने से बाहर है।’
‘धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय में यक़ीन करने वालों को नरेंद्र मोदी और भाजपा के सत्ता में आने को लेकर
18 वीं लोकसभा के लिए आम चुनाव 19 अप्रैल से शुरू होने वाले हैं। इस मौक़े पर पिछले लगभग पांच
‘इसे 11 मार्च, 2024 को लागू किया गया जब 2024 के संसदीय चुनाव कुछ सप्ताह दूर थे। भारत के पड़ोस
भाजपा सरकार ने 2017 में तमाम विपक्षी दलों के विरोध और चुनाव आयोग तथा रिज़र्व बैंक की मनाही के बावजूद
अगर वह आज़ादी एक आत्माहीन शरीर की थी, तो उसे आज़ादी कैसे कहा जा सकता है और अगर उस देह
आरएसएस की मूल अवधारणा ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ एक ऐसी निरंकुश सामाजिक सत्ता की कल्पना है जो हर तरह की असमानता और
आज़ादी के बाद के भारत के सामाजिक यथार्थ को समझने के लिए उस पहले सवाल से फिर जूझना ही पड़ेगा