‘…हमारी नाकामी की सज़ा है फ़ासीवाद’ / संजीव कुमार
“कोई भी पलटकर पूछ सकता है कि हम अभी तक कौन-से स्वर्ग में रह रहे थे जिसको बचाने की फ़िक्र
“कोई भी पलटकर पूछ सकता है कि हम अभी तक कौन-से स्वर्ग में रह रहे थे जिसको बचाने की फ़िक्र
पत्रिकाओं में छप तो बहुत कुछ रहा है, पर क्या वह सब पढ़ा भी जा रहा है? विचार कर रहे
‘व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता के तमाम दावों के बावजूद अधिकांश लोग अपनी मानवीय संभावनाओं और क्षमताओं से कमतर जीवन ही
इरफ़ान हबीब का यह निबंध –दि नेशन दैट इज़ इंडिया–पहले पहल 10 जून 2003 को ‘दी लिटिल मैगज़ीन’ में प्रकाशित
‘इस ऐतिहासिक मोड़ पर हमें न केवल संविधान सभा की नैतिक दूरदर्शिता की ओर लौटना होगा, बल्कि बिपिन चंद्र, रजनी
मुख़्तार ख़ान का यह लेख जितना उर्दू क़वायद के बारे में है, उतना ही हिंदी-उर्दू के अटूट रिश्ते के बारे
दस्तावेज़ी फ़िल्मकार, बेहतरीन फ़िल्म संपादक और कवि तरुण भारतीय हमारे बीच नहीं रहे। दो दिन पहले दिल का दौरा पड़ने
हिन्दी सिनेमा की प्रख्यात अभिनेत्री शबाना आज़मी से यह बातचीत मार्च 2003 में की गयी थी। पिछले दिनों पुराने कागज-पत्र
अंग्रेजी के ख्यात कवि, कला-समीक्षक, कला-सिद्धांतकार, और लल द्यद का अंग्रेजी में अनुवाद करनेवाले रणजीत होसकोटे ने इंटरनेशनल सेंटर गोवा