पत्रिकाओं में छप तो बहुत कुछ रहा है, पर क्या वह सब पढ़ा भी जा रहा है? विचार कर रहे हैं आदित्य विक्रम सिंह। बीएचयू के शोधार्थी रहे हैं और संप्रति रेलवे के एक उपक्रम में कार्यरत हैं।

पिछले दिनों अपने एक वरिष्ठ मित्र से साहित्य की बतकही के दौरान कुछ मौजूँ प्रश्न सामने आये। मसलन, उनका कहना था कि क्या जितनी कहानियाँ पत्रिकाओं में छप रही हैं, उतनी पढ़ी भी जाती हैं? या फिर उन पत्रिकाओं में सबसे ज़्यादा क्या पढ़ा जाता है? यह कठिन मगर गंभीर और महत्वपूर्ण प्रश्न है। साहित्य किसी भी भाषा का हो, उसके विकास में पत्र-पत्रिकाओं की एक अहम भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यह बात अलग है कि न पढ़ने का जो रोग आज की पीढ़ी में महामारी की तरह फैला है, उसके असर से साहित्य भी अछूता नहीं है।
साहित्य को कोर्स से इतर पढ़ने वाले लोगों में दो महत्वपूर्ण कारक बहुत काम करते हैं। पहला, रुचि; और दूसरा, समय। समय को हम पहले पर नहीं रख सकते क्योंकि रुचि होने पर आप गाहे-ब-गाहे समय निकाल लेंगे।
साहित्यिक पत्रिकाओं में जो छप रहा है, उसके न पढ़ने के कई कारण मुझे समझ में आते हैं। अगर हम थोड़ा पहले समय में जाएँ तो पाते हैं, ‘सरस्वती’, ‘हंस’, ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी पत्रिकाएँ न केवल साहित्यिक आंदोलनों की वाहक थीं, बल्कि उन्होंने पाठकों की वैचारिक दिशा भी तय की। परंतु आज स्थिति यह है कि हिंदी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं के पाठकों को खोजना मुश्किल है। यह केवल एक साहित्यिक समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संकट का संकेत है। आज की हिंदी साहित्यिक पत्रिकाएँ सीमित दायरे में सिमटकर रह गयी हैं। पिछले दिनों देखा गया कि बहुत सी पत्रिकाएँ या तो बंद हुईं या फिर प्रिंट फॉर्म भर ही उपलब्ध हो पा रही हैं। तद्भव, पहल, प्रगतिशील वसुधा, नया ज्ञानोदय, सदानीरा, कथादेश, हंस, लमही, परिकथा, पाखी, आजकल जैसी पत्रिकाएँ साहित्यिक विमर्श को आगे बढ़ा रही हैं, और इन पत्रिकाओं के गंभीर पाठक इनको खोज कर पढ़ते हैं। लेकिन एक सत्य यह भी है कि नये पाठक और विशेषकर युवा वर्ग इन पत्रिकाओं से दूर होते जा रहे हैं। एक समय था जब अधिकतर घरों में कोई न कोई पत्रिका आती थी चाहे वो साहित्य की हो या सामाजिक; आज यह परंपरा लगभग समाप्तप्राय है।
अब इस सवाल पर आयें कि जो चीज़ें छप रही हैं, उनके पाठक हैं या नहीं? यहाँ यह कहा जा सकता है अगर पाठक नहीं तो क्यों छप रही हैं? बात भी सही है, पर पूरी सही नहीं है| पत्रिका में ढेर सारी विधाओं की सामग्री छपती है, पर प्रमुख रूप से ध्यान कविता और कहानी पर ही जाता है। नब्बे के बाद की अधिकतर प्रसिद्ध कहानियाँ एवं कहानीकार पत्रिकाओं के माध्यम से ही पाठकों से रूबरू हुए हैं, तो ये ज़ाहिर है कि बिना पढ़े तो यह वर्ग बना नहीं।
21वीं सदी का पाठक सोशल मीडिया, ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल, ब्लॉग और वीडियो कंटेंट का उपभोक्ता बन चुका है। उसे त्वरित जानकारी और मनोरंजन की आदत पड़ चुकी है, जो साहित्यिक पत्रिकाओं के गहन और धीमे साहित्यिक अनुभव से भिन्न है। ग्रामीण और क़स्बाई क्षेत्रों में जहाँ हिंदी के पाठक संभावित रूप से अधिक हैं, वहाँ इन पत्रिकाओं की पहुँच न्यूनतम है। वितरण व्यवस्था असंगठित है, जिससे पत्रिकाएँ पाठकों तक पहुँच ही नहीं पातीं। कई बार साहित्यिक पत्रिकाएँ जटिल भाषा और दुरूह विचारधारा में उलझी होती हैं, जिससे आम पाठक जुड़ नहीं पाता। इनकी प्रस्तुति भी आकर्षक नहीं होती, जबकि आज के समय में दृश्यात्मक सौंदर्य भी महत्त्वपूर्ण है।
हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं में छपने वाली कहानियों के पाठकों की संख्या में लगातार गिरावट एक गंभीर चिंता का विषय है। आज के पाठक तेज़ी से पढ़ने योग्य, लघु और रोचक सामग्री को पसंद करते हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानियाँ अक्सर गहराई से लिखी जाती हैं, जिनके लिए समय और मानसिक एकाग्रता की आवश्यकता होती है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स (जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब आदि) पर उपलब्ध सामग्री पाठकों को साहित्यिक सामग्री से दूर कर रही है। आज का युवा वर्ग अधिकतर फिल्में, वेब सीरीज़, और त्वरित मनोरंजन की ओर आकर्षित है। गंभीर साहित्यिक कहानियाँ पढ़ना उनके लिए ‘बोरिंग’ या ‘पुराना’ लगता है। वितरण की सीमाएँ बहुत असर डाल रही हैं, बहुत सी साहित्यिक पत्रिकाएँ अब प्रिंट फॉर्म में सिमट गयी हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उनकी उपस्थिति कमज़ोर है।
इसके बावजूद हमें एक दूसरे पक्ष की तरफ़ भी देखना होगा। पहले जितना साहित्य छपता था उसकी संख्या कम थी, और साहित्य के पाठकों के बीच एक वाद-विवाद और संवाद की प्रक्रिया थी। बहुत दूर न जाकर मैं छात्र-जीवन के अपने ग्रुप की बात करूँ, जिसका मतलब है हमारे बैच के या एक दो बैच ऊपर नीचे के शोध-छात्र। हम लोगों में साहित्यिक पत्रिकाएँ पढ़ने की होड़ थी, पर उनके संबंध में पता कैसे लगता था? तो इसका बड़ा कारण था हमारे विश्वविद्यालय का माहौल और हमारी चर्चाएँ। अब संवाद की स्थिति न के बराबर दिखायी पड़ती है।
दरअसल, समकालीनता पर बात करना एक दुरूह कार्य है क्योंकि उसके लिए आपको पढ़ना पड़ेगा। हम लोग राय बहादुर जैसे लोग है, दूसरे की राय पर हमारा तुरंत कॉपीराईट हो जाता है। खुद पढ़कर राय बनाना हिंदी समाज की सबसे बड़ी कमज़ोरी है। अगर समकालीन पढ़ भी रहे हैं तो उसकी आलोचना हमसे नहीं होती, हिंदी के अकादमिक सिस्टम में सबसे कमज़ोर कड़ी आलोचना है। एम ए हिंदी साहित्य की कक्षा में बात करिए तो पता चलेगा सबसे कमज़ोर पेपर उनका आलोचना और काव्यशास्त्र ही होगा, फिर भाषा विज्ञान। आपको आलोचना के टूल्स नहीं पता तो आपके पास सिर्फ़ बनी-बनायी राय होगी—या तो अच्छी है कहानी या कविता, या नहीं अच्छी; क्यूँ अच्छी, कैसे अच्छी, इस पर कोई बात नहीं। बस, इसी दबाव में आपका पढ़ा हुआ भी बाहर नहीं आता कि क्या बताएँगे कहानी या कविता के बारे में।
हम सीधे सीधे ये नहीं कह सकते कि पढ़ा ही नहीं जा रहा। हाँ, पढ़ने के मुक़ाबले लिखा ज़्यादा जा रहा है, यह साफ़ दिखायी देता है। साहित्य पढ़ने-समझने और जज़्ब करने के लिए थोडा ठहराव की ज़रूरत होती है, पर उसका अभाव हर जगह दिखता है। एक किताब लिखने के बाद लेखक को यह जानने में बहुत समय लग जाता था कि उसने कैसा लिखा है, इतने समय में वह खुद मूल्यांकन भी करता था। अब लिखे नहीं कि प्रतिक्रिया आना शुरू, और वो भी मुँहदेखी। फिर भी यह बात मैं कहूँगा पढ़ा जा रहा, रुचि के अनुसार, कम से कम, पर पढ़ा जा रहा |
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हम सीधे सीधे ये नहीं कह सकते कि पढ़ा ही नहीं जा रहा। हाँ, पढ़ने के मुक़ाबले लिखा ज़्यादा जा रहा है, यह साफ़ दिखायी देता है।
लिखने वाले निश्चित रूप से बड़े हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं को खरीदने वाले लेखक भी पूरी पत्रिका पढ़ते हैं? कहां नहीं जा सकता। लेखक एवं लेखन समाज के लिए यदि उपयोगी नहीं हैं, इस स्थिति में लेखक की जिम्मेदारियों को नकारना संभव नहीं है।
बिलकुल सही लिखा। कविताओं की तो बात छोड़ दीजिए, कहानियों के स्तर पर विचार करने योग्य है। सत्य तो कटु होता है।फिर पुराने रचनाकार और खासकर विदेशी कथाकार ही याद आते हैं।
अच्छे और जरूरी विषय पर बात हुई है। सार्थक और पठनीय।
आदित्य जी की बातों से सहमत हूं। पढ़ा जा रहा है। वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती युवा वर्ग को दिशा देने की है लेकिन क्या युवा वर्ग उस दिशा में चलने की बात तो बहुत दूर की है, देखने के लिए भी क्या तैयार है ? निस्संदेह यह संकट आज के डिजिटल युग की वजह से दिन ब दिन गहराता जा रहा है। आज के समय आदित्य जी का यह लेख बेहद आवश्यक मुद्दे पर बहस की मांग करता है।
ठीक सवाल उठाया है आपने ।
हमेशा की तरह बहुत ही शानदार लिखा है सर आपने..🙏🏻🙏🏻🙏🏻
इस लेख में आपने एकदम सही बात कही कि आज कल पढ़ने से ज़्यादा लिखा जा रहा है, क्योंकि पढ़ने के लिए एकाग्रता और चिंतन मनन की आवश्यता होती है। परंतु आज का युवा सोशल मीडिया के मनोरंजन का लुफ्त उठाने में मस्त है, जिसका कोई अर्थ नहीं..ये सिर्फ़ क़ीमती समय को बर्बाद करने का ज़रिया मात्र है…
आपसे बहुत कुछ सीखा है मैंने सर, और आज आपके इस लेख से भी एक सीख ली मैंने..कि अब लिखने के साथ साथ मैं पढ़ना भी शुरू करूँगी, हाँ वक्त जरा अब कम मिल पाता है मुझे पर जैसा की आपने अपने इस लेख में कहा की यदि रुचि हो तो समय निकाला जा सकता है ।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
ठीक बात है पढ़ने के मुक़ाबले लिखा अधिक जा रहा है ।एक और कारण है अधिक छपने के कि अब प्लेटफार्म पहले से अधिक हैं ।सोशल मीडिया ने जहाँ पढ़ने का रास्ता छीना है वहीं छपने के रास्ते क्रियेट भी किए हैं ।
अच्छा आलेख ।