दलित स्त्री कविता का स्वर भिन्न तरीके से प्रश्नवाची रहा है। इस स्वर ने दलितवादी प्रश्नवाचकता को बहुआयामी बनाया है। पितृसत्ता का क्रिटीक अब अनिवार्य रूप से इंटरसेक्शनलिटी से जुड़कर तैयार होता है। शोषण के सभी स्रोतों का न्यूनाधिक संज्ञान नए क्रिटीक की विशेषता है। दलित स्त्रीवाद ने आंबेडकरी आंदोलन की विकसित चेतना को जज़्ब किया और फिर उसे अपने अनुभवों समृद्ध किया। उसने असुविधाजनक सवाल भी पूछे। धर्मसत्ता से लेकर कॉर्पोरेट सत्ता तक सबको प्रश्नबिद्ध किया। उसके सवाल तीखे थे, तुर्श थे, अपने से थे और अपनों से भी थे। सवालों का यह तेवर इन दिनों थोड़ा शिथिल दिख रहा है। शिथिलता के कारण छिपे हुए नहीं हैं। एक उभरते हुए वैचारिक-साहित्यिक आंदोलन की सेहत के लिए यह शिथिलता ठीक नहीं। अभी दलित स्त्रीवाद को अपनी धार कुंद नहीं होने देनी है।
दो दशक को साहित्य में एक युग मानने का चलन है। बीस साल में एक पीढ़ी तैयार होती है। इस अवधि को अभी संक्षिप्त करने की ज़रूरत महसूस की जा रही है। नए अवतार में कृत्रिम मेधा के आगमन के बाद कालबोध और पीढ़ीबोध में अप्रत्याशित उथल-पुथल होना तय है। पारंपरिक सामाजिक शक्तियाँ अपना वर्चस्व मजबूत करने में कृत्रिम मेधा का यथासंभव उपयोग करने की कोशिश में हैं। शोषण ख़तम करने, बराबरी चाहने वाले लोग अगर समय रहते यथोचित प्रतिवाद नहीं करेंगे, भरपूर टक्कर नहीं देंगे तो जकड़न और तेज होगी, शिकंजा और कसेगा। जो रचनाकार यह ख़तरा पहचान रही हैं, उन पर ज़्यादा ज़िम्मेदारी आयद होती है।
डॉ. उपासना गौतम की प्रकाशित-अप्रकाशित कविताएँ मैं लंबे समय से पढ़ता आ रहा हूँ। उनकी कविताएँ बड़ी स्पष्ट, मुखर और तीक्ष्ण होती हैं। वे जोख़िम मोल लेकर वर्चस्व की पहचान कराती आ रही हैं। जयप्रकाश लीलवान ने दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद के हिंदुत्वमुखी संस्करण की अंतर्दृष्टिपूर्ण आलोचना करने वाली कविताएँ लिखी थीं। उनके बाद दलित कविता में यह सिलसिला ठहर-सा गया। कहानीकार टेकचंद अपनी रचनाओं में बेशक यह काम करते रहे। कवियों ने जैसे चुप्पी साध ली। उपासना गौतम में यह संभावना दिखाई दे रही है। वे जानती हैं कि राष्ट्रवाद तो महज़ मुलम्मा है। उसकी अंतर्वस्तु नई पूँजी है। यह पूँजी वैश्विक है। किन्हीं कॉर्पोरेट घरानों में स्थिर होते हुए भी अस्थिर है। इसे इसीलिए ‘आवारा’ कहा जा रहा है कि कॉर्पोरेट के हाथ अदृश्य हैं। उनकी कार्यप्रणाली दुर्ज्ञेय है। यह वैश्विक पूँजी दोहरे कवच में है। मात्र राष्ट्रवाद इसे आश्वस्त नहीं करता। तब यह धर्म नामक दूसरा कवच धारण करती है। दोनों कवच अपने-अपने तरीके से उन्माद पैदा करने में सक्षम हैं। दोनों मिल जाएँ तो उन्माद गाढ़ा हो जाता है। कॉर्पोरेटी पूँजी इस गाढ़े उन्माद को अभेद्य बना देती है। इसकी चपेट में आए लोग जब अपनी आसन्न अकाल मृत्यु का उत्सव मनाने में लगे हों तब इसकी शक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है। कविता तब भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ती। तमाम ख़तरे उठाकर रचनाकार उस कविता को शब्द और आकार देती है। उसे सार्वजनिक पटल पर लाती है। यह दायित्व उन्माद की गिरफ़्त में जाने से बच गए काव्यप्रेमियों का है कि वे इसे शेष जनता तक पहुँचाएँ।
उपासना गौतम धार्मिक आख्यानों, मिथकों और पौराणिक विश्वासों की भी मीमांसा करती हैं। उनकी मीमांसा किसी अतिवाद में चले जाने के बजाए ‘सार-सार को गहि रहै थोथा देय उड़ाय’ वाली होती है। सीता की अग्निपरीक्षा किसी त्रेतायुग का एक आख्यान भर नहीं है। आप इसे किसी भी वर्चस्ववादी, पुरुषवादी समय-स्थान-परिवेश में घटित होता हुआ देख सकते हैं। उपासना उन सभी दिशा-दर्शक विचारकों को कृतज्ञतापूर्वक याद करती हैं और उनकी प्रेरणाओं को एक परिप्रेक्ष्य में रखती हैं। ‘जय भीम’ और ‘कार्ल मार्क्स’ जैसी कविताएँ इसका सबूत हैं। वे कविता के एक अन्य महत्त्वपूर्ण काम स्वानुभूति-अन्वेषण में भी संलग्न होती हैं। ‘इस शहर में’ शीर्षक कविता भाव-संज्ञान की इसी गतिकी को सामने लाती है। ‘स्व’ और ‘पर’ की युगलबंदी की कोमल छवियाँ यहाँ लोकेशन-टाइम-इमोशन की पारस्परिकता में देखी जा सकती हैं।
बजरंग बिहारी तिवारी
उपासना गौतम की कविताएँ
राष्ट्रवाद
उनके हवाले से
राष्ट्रवाद की धुन
फिर नया प्रपंच
पर नया नहीं है ये जाल
वर्षों से बस यही चल रहा है
इस ओर
कभी उस ओर
कितने मरे
कितने मार डाले
एक लाशों का व्यापारी
होता है मज़बूत
खून से चलती है उसकी सत्ता
उसकी मर्ज़ी के बिना
इस राष्ट्रवाद का पत्ता भी नहीं हिलता ।
जय भीम
‘जय भीम’ महज एक शब्द नहीं
एक अनुगूँज है
एक उद्घोष है
त्वरित बदलाव की प्रक्रिया का
एक आग़ाज़ है
ज्योतिबा फुले से लेकर बाबा साहब तक
उनके पूर्व या उनके बाद से लेकर अबतक
कितने तल
कितने पल
कितने सवाल
कितने हल
लागू होने की चेष्टा में
पते रहे आधार
जब-जब
लोग हुए लाचार
तब
हर ज्ञान विचार बना एक प्रतिरोध से लेकर
जनप्रतिरोध ।
इस शहर में
इस शहर में
उस पहर में
जो तुम थे न
वह तुम अब नहीं रहे
तुम साथ हो
मगर नहीं हो
तुम पास हो
मगर कहीं और हो
तुमसे पूछना था मुझे
मैं जो थी
क्या मैं वहीं हूँ
या कोई और हूँ मैं
मैं हूँ तो यहीं
पर शायद कहीं और हूँ मैं
शायद वहाँ
जहाँ थे तुम
पहले-पहल
इस शहर में
उस पहर में ।
अग्निपरीक्षा
अग्निपरीक्षा की बात सुन
सीता सचेत हुई
ऐसा कोई अपराध भी उसने नहीं किया
और अग्निपरीक्षा ?
मर्यादा के नाम पर
उसे छोड़नी होगी कलम
छोड़ने होंगे सामाजिक काम
उसे छोड़ना होगा वह सब
जिससे उसकी पहचान है
उसे समेटनी होगी अपनी
इंसानी गतिविधियाँ
उसे रहना है बिल्कुल वैसे
किसी निरीह कामगार की तरह
घर की दीवारों के भीतर
जब चाहे राम
मर्यादा के नाम
कर सके हिंसा तक
इसे सामान्य घटना मानकर
खुश होते रहे ससुरालीजन
और आए-दिन
करते रहें अपमान
मारपीट तक
जब सचेत सीता
अपने जीवन के लिए
मुखर होकर लड़ी
तो लड़ने के बाद की जीत के लिए
सतयुगी सीता ने
कलयुगी सीता को
दूर से कहीं भेजी
शुभकामनाएँ …….।
कार्ल मार्क्स
मार्क्स ! तुम्हें बदलना पड़ेगा
क्योंकि तुम भारत में हो
भारत जहाँ जातिवाद का भयानक सच
और इसे जीवित रखने की
घिनौनी सोच
एक बड़ी मूल आबादी को
करती है दरकिनार
महज पूँजी से ही नहीं
मनुष्य होने के गौरव से भी
कुचलती है दलितों का सम्मान
क़दम-क़दम पर
कहीं प्रत्यक्ष
कहीं अप्रत्यक्ष
कहीं भयावह रूप लेकर
हज़ारों घटनाएँ
उदाहरण बनती हैं
रक्त-रंजित इतिहास का
क्रूर से क्रूरतम
एक क्रम
आज भी चल रहा लगातार
मार्क्स !
आज भी यहाँ
कहीं कोई अच्छे कपड़े नहीं पहन सकता
तो कहीं चप्पल पहनने की मनाही है
तो कहीं दलित होने के कारण
बुरी तरह पीटा गया
मार दिया गया
गाँव से निकाला गया
यहाँ रोंगटे खड़े करने वाली घटनाएँ
घटती हैं आए-दिन
मार्क्स ! क्या यहाँ वैसी क्रांति सम्भव है
जैसी तुम चाहते थे ?
मार्क्स ! तुम बात करते हो श्रमिकों की
लेकिन यहाँ तो सिर्फ़ जाति है
जाति से बनती है यहाँ अमीरी-ग़रीबी
जाति से बनते हैं तथाकथित उच्च और नीच
मार्क्स !
बाबा साहब की भाषा में
यहाँ श्रम विभाजन ही नहीं
श्रमिकों का भी विभाजन है ।
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