‘समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में स्त्री-अस्तित्व और उसकी चेतना का स्वर केवल पारंपरिक रूढ़ियों के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन गहन दार्शनिक और सत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती दे रहा है जिन्होंने सदियों से स्त्री को एक गौण ‘अदर’ (Other) या वस्तु के रूप में निर्मित किया है। सविता सिंह की कविता ‘ईश्वर और स्त्री’ इसी वैचारिक और संरचनात्मक वर्चस्व के विरुद्ध एक अत्यंत प्रखर और सूक्ष्म हस्तक्षेप है।’ –सविता सिंह की कविता पर अधीत आलोचक रवि रंजन, प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवा निवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय का सुदीर्घ आलेख।

सविता सिंह की समकालीन हिंदी कविता के विस्तृत परिदृश्य में एक बेहद विशिष्ट और बौद्धिक पहचान है। परंपरागत रूप से स्त्री-जीवन को जिस सीमित दायरे में देखा जाता रहा है, उनकी कविताएँ उससे आगे बढ़कर एक नया और गहरा वैचारिक विकल्प सामने रखती हैं। वे स्त्री से जुड़ी सामाजिक भूमिकाओं और सांस्कृतिक रूढ़ियों पर बेहद ख़ामोशी और मारक क्षमता के साथ सवाल खड़े करती हैं।
‘अपने जैसा जीवन’, ‘स्वप्न समय’, ‘नींद थी और रात थी’, ‘खोई हुई चीज़ों का शोक’, ‘प्रेम भी एक यातना है’ और ‘वासना एक नदी का नाम है’ जैसे महत्त्वपूर्ण कविता-संग्रहों के ज़रिए उन्होंने खुद को एक ऐसे कवि के रूप में स्थापित किया है, जिसका सरोकार सिर्फ सतह को छूना नहीं है। उनकी कविताएँ पहचान के अंतर्विरोधों, भाषा की बारीकियों, ख़ामोशी की मुखरता और समय के फिसलते हुए चरित्र को बहुत गहराई से खंगालती हैं।
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में स्त्री-अस्तित्व और उसकी चेतना का स्वर केवल पारंपरिक रूढ़ियों के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उन गहन दार्शनिक और सत्तात्मक संरचनाओं को चुनौती दे रहा है जिन्होंने सदियों से स्त्री को एक गौण ‘अदर’ (Other) या वस्तु के रूप में निर्मित किया है। सविता सिंह की कविता ‘ईश्वर और स्त्री’ इसी वैचारिक और संरचनात्मक वर्चस्व के विरुद्ध एक अत्यंत प्रखर और सूक्ष्म हस्तक्षेप है। यह कविता धर्म, ईश्वर और पुरुष-सत्ता के उस त्रिकोण को विखंडित करती है जो स्त्री की देह और उसकी कामनाओं को नियंत्रित करता आया है। जहाँ पारंपरिक रूप से ईश्वर को सृष्टि का नियंता और अंतिम सत्य माना गया, वहीं यह आलेख इस बात की पड़ताल करता है कि कैसे यह कविता उस केंद्रीय सत्ता का विकेंद्रीकरण (Decentralization) कर हाशिए पर धकेली गई स्त्री-आवाज़ को केंद्र में लाती है।
कविता की शुरुआती पंक्तियाँ—“जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण / देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को / बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को”—स्त्री की देह और चेतना के उस जागरण को रेखांकित करती हैं जहाँ वह अब पुरुष की ‘अधूरी कल्पना’ मात्र बनकर रहने को तैयार नहीं है। यहाँ ‘जागी हुई देह’ केवल जैविक जागरण नहीं, बल्कि अपनी स्वायत्तता और गरिमा की आत्म-स्वीकृति है। उत्तर-आधुनिक और उत्तर-संरचनावादी चिंतन के आलोक में, जहाँ जूडिथ बटलर और हेलेन सिक्सू जैसे विचारक पहचान की तरलता और ‘स्त्री-लेखन’ (Écriture féminine) के माध्यम से देह की स्वायत्तता की वकालत करते हैं, यह आलेख कविता के भीतर छिपे उन्हीं सत्ता-संबंधों (Power Dynamics) का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
प्रस्तुत अध्ययन में इस बात का सूक्ष्म अन्वेषण किया गया है कि कैसे कविता में स्त्री अपनी वासना, कामना और संवेदनात्मक ऊर्जा के माध्यम से इतिहास की एक नई निर्माता के रूप में उभरती है। कविता का अंतिम निष्कर्ष—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही / ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका”—ईश्वर और पितृसत्ता की निष्क्रियता को उजागर करते हुए शक्ति (Power) के पारंपरिक स्रोतों के हस्तांतरण की घोषणा करता है। यह आलेख इस बात का गवाह है कि स्त्री-स्वायत्तता की खोज केवल सामाजिक अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि एक नए ब्रह्मांडीय और दार्शनिक सत्य के निर्माण की प्रक्रिया है, जहाँ स्त्री स्वयं एक स्वतंत्र ‘सब्जेक्ट’ (Subject) के रूप में संसार को बदलने की क्षमता रखती है।
ईश्वर और स्त्री
जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण
देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को
बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को
कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक
ले सकें जो उसे बाहों में
उनींदी आँखें बंद होने-होने को
खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े
जिन्हें बचा रखा है अब रात ने
लहराता अन्धकार मिल जाने देता है
अपने तम में एक और तम को
सारी वासना को जैसे स्त्री हो
चन्द्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर
सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता
बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही
ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका
-सविता सिंह
सविता सिंह की ‘ईश्वर और स्त्री’ कविता समकालीन हिन्दी कविता में स्त्री-अनुभव, देह, कामना और सत्ता-संबंधों पर एक गहन वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह कविता केवल स्त्री की स्थिति का वर्णन नहीं करती, बल्कि उन पारंपरिक संरचनाओं पर प्रश्नचिह्न लगाती है जिनमें ईश्वर, पुरुष और संसार की व्यवस्था लंबे समय तक एक-दूसरे के पूरक और समर्थक रहे हैं। कविता का स्वर प्रतिरोध का है, किन्तु यह प्रतिरोध घोषणात्मक या आक्रामक न होकर गहरी संवेदना, प्रतीकात्मकता और दार्शनिक चिंतन के माध्यम से व्यक्त होता है। कविता में स्त्री केवल एक सामाजिक अस्तित्व नहीं है; वह एक ऐसी चेतना है जो अपनी देह, अपनी इच्छाओं और अपने अस्तित्व की स्वतंत्रता के साथ उपस्थित है।
कविता की आरम्भिक पंक्ति—“जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण”—विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। यहाँ ‘जागी हुई देह’ केवल शारीरिक जागरण का संकेत नहीं है, बल्कि चेतना के जागरण, आत्मबोध और अपनी इच्छाओं के प्रति सजग होने की अवस्था का प्रतीक है। दूसरी ओर ‘आसमान’ व्यापकता, अनन्तता और सार्वभौमिक सत्ता का बोध कराता है। जब कवयित्री इन दोनों को ‘एक दर्पण’ कहती है, तो वह स्त्री की देह और ब्रह्माण्ड के बीच एक गहरे साम्य की स्थापना करती है। दर्पण का अर्थ यहाँ प्रतिबिम्बित करना भी है और आत्म-दर्शन का माध्यम होना भी। स्त्री की जागृत देह में जैसे सम्पूर्ण सृष्टि का सत्य प्रतिबिम्बित हो रहा है, और आसमान में स्त्री का अनुभव।
इसके बाद कवयित्री कहती हैं—“देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को।” यह पंक्ति ईश्वर की सर्वज्ञता की पारंपरिक अवधारणा को स्वीकार करती हुई भी उसके नैतिक उत्तरदायित्व पर प्रश्न उठाती है। ‘हाहाकार’ शब्द स्त्री के दीर्घकालिक दुःख, दमन, अपूर्णता और अस्तित्वगत पीड़ा का संकेत है। यह कोई क्षणिक वेदना नहीं, बल्कि सदियों से संचित अनुभव है। कवयित्री कल्पना करती हैं कि ईश्वर स्वयं इस पीड़ा को देख रहा होगा। यहाँ ईश्वर निष्क्रिय दर्शक की स्थिति में है, जबकि स्त्री पीड़ा की वास्तविक वाहक है। इस प्रकार कविता ईश्वर और स्त्री के बीच एक ऐसा संवाद रचती है जिसमें ईश्वर की सत्ता पहली बार कटघरे में खड़ी दिखाई देती है।
“बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को / कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक / ले सकें जो उसे बाहों में”—इन पंक्तियों में कविता का नारीवादी स्वर अत्यन्त तीक्ष्ण हो उठता है। यहाँ ‘अपनी ही कल्पना’ ईश्वर की सृष्टि-योजना का संकेत है। कवयित्री कहती हैं कि संभवतः ईश्वर को भी अब अपनी रचना पर पुनर्विचार करना पड़ रहा होगा, क्योंकि उसने ऐसे पुरुष नहीं बनाए जो स्त्री को उसके सम्पूर्ण मानवीय और भावनात्मक अस्तित्व के साथ स्वीकार कर सकें। ‘बाहों में लेना’ यहाँ मात्र शारीरिक आलिंगन नहीं है; यह प्रेम, समानता, आत्मीयता, सम्मान और साझेदारी का प्रतीक है। पुरुष स्त्री को भोग की वस्तु की तरह ग्रहण करते रहे हैं, किन्तु उसे उसकी सम्पूर्णता में स्वीकार नहीं कर पाए। इसलिए ईश्वर की सृष्टि भी अधूरी सिद्ध होती है। यह विचार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दोष स्त्री या उसकी इच्छाओं में नहीं, बल्कि उस पुरुष-निर्मित व्यवस्था में खोजा गया है जो स्त्री को समझने में असफल रही है।
कविता का अगला खंड एक स्वप्निल और रहस्यपूर्ण वातावरण निर्मित करता है—“उनींदी आँखें बंद होने-होने को / खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े।” यहाँ नींद और जागरण के बीच की अवस्था का चित्र है। यह एक संक्रमणकाल है, जहाँ पुरानी चेतना समाप्त हो रही है और नई चेतना जन्म लेने को तैयार है। ‘दरवाज़े’ संभावनाओं, अवसरों और निषिद्ध क्षेत्रों के प्रतीक हैं। वे बंद भी हैं और खुलने की तैयारी में भी। स्त्री का अस्तित्व इसी दहलीज़ पर खड़ा है—एक ऐसी स्थिति में जहाँ उसे अपनी मुक्ति का आभास तो है, परन्तु वह अभी पूर्ण रूप से साकार नहीं हुई।
“जिन्हें बचा रखा है अब रात ने”—इस पंक्ति में ‘रात’ केवल अंधकार नहीं है। भारतीय और विश्व साहित्य में रात अक्सर दबी हुई इच्छाओं, गोपनीय अनुभवों और आत्म-अन्वेषण का समय रही है। दिन की सामाजिक निगरानी से मुक्त होकर रात स्त्री को अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है। इसलिए रात यहाँ संरक्षण देने वाली शक्ति बन जाती है। वह उन दरवाज़ों को सुरक्षित रखती है जिन्हें समाज ने बंद कर रखा था।
“लहराता अन्धकार मिल जाने देता है / अपने तम में एक और तम को”—यहाँ अंधकार का बिम्ब अत्यन्त अर्थगर्भित है। सामान्यतः अंधकार को नकारात्मक अर्थों में देखा जाता है, किन्तु कविता में वह मिलन और समावेशन का माध्यम बन जाता है। एक अंधकार का दूसरे अंधकार में मिलना अलगाव के अंत और आत्म-विस्तार का संकेत देता है। यह स्त्री की उस भीतरी दुनिया की ओर इशारा करता है जिसे सामाजिक नैतिकता ने हमेशा दबाने का प्रयास किया। अंधकार यहाँ दमन का नहीं, बल्कि आत्मीयता और एकत्व का क्षेत्र है।
“सारी वासना को जैसे स्त्री हो”—यह कविता की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण पंक्ति है। पितृसत्तात्मक समाज ने अक्सर स्त्री को या तो कामना की वस्तु के रूप में देखा है या फिर उसे कामना-विहीन पवित्रता के आदर्श में बाँधने की कोशिश की है। सविता सिंह इन दोनों धारणाओं को उलट देती हैं। यहाँ स्त्री स्वयं वासना की सक्रिय और स्वायत्त सत्ता बनकर सामने आती है। ‘वासना’ शब्द का प्रयोग भी नकारात्मक अर्थ में नहीं है। यह जीवन-ऊर्जा, इच्छा, आकांक्षा और सृजनात्मक शक्ति का रूप ले लेता है। स्त्री अपनी कामना को स्वीकार करती है; वह उसे छिपाने या उससे शर्मिंदा होने के लिए बाध्य नहीं है। इस प्रकार कविता स्त्री की यौनिकता को वैधता और गरिमा प्रदान करती है।
कविता के अंतिम भाग में चन्द्रमा का बिम्ब उभरता है—“चन्द्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर / सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता।” चन्द्रमा भारतीय काव्य-परंपरा में प्रेम, सौन्दर्य और शीतलता का प्रतीक रहा है, किन्तु यहाँ वह एक दर्शक की भूमिका में है। वह सक्रिय हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि घटनाओं का साक्षी बना रहता है। यह स्थिति पहले उल्लिखित ईश्वर की भूमिका से मिलती-जुलती है। जैसे ईश्वर स्त्री के हाहाकार को देखता है, वैसे ही चन्द्रमा भी सब कुछ देख रहा है। दोनों देखने वाले हैं, पर परिवर्तन के वास्तविक स्रोत नहीं।
इसीलिए कविता की अंतिम पंक्तियाँ अत्यन्त निर्णायक बन जाती हैं—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही / ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका।” यहाँ कविता अपने वैचारिक निष्कर्ष तक पहुँचती है। यह निष्कर्ष न केवल धार्मिक सत्ता के निषेध का है, बल्कि स्त्री की स्वायत्त शक्ति की घोषणा भी है। इतिहास में परिवर्तन की शक्तियाँ प्रायः ईश्वर, राजा, नायक या पुरुष के रूप में कल्पित की जाती रही हैं। सविता सिंह इस परंपरा को तोड़ते हुए कहती हैं कि अब संसार का रूपांतरण स्त्री की कामना से होगा। ‘कामना’ यहाँ केवल यौन इच्छा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता, आत्मनिर्णय और नए संसार की आकांक्षा का व्यापक रूपक है। स्त्री की इच्छा ही परिवर्तन का स्रोत बनेगी, क्योंकि वही जीवन के वास्तविक अनुभवों और संघर्षों से उपजती है। ईश्वर की भूमिका समाप्त होने का अर्थ यह नहीं कि आध्यात्मिकता का निषेध किया जा रहा है; बल्कि यह कि मुक्ति का मार्ग किसी बाहरी सत्ता से नहीं, स्वयं स्त्री की चेतना और उसकी इच्छाशक्ति से निकलेगा।
समग्रतः यह कविता स्त्री को दया या करुणा की पात्र के रूप में नहीं, बल्कि इतिहास-निर्माता और परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में स्थापित करती है। कविता में देह और आत्मा, कामना और चेतना, अंधकार और प्रकाश, ईश्वर और मनुष्य—इन सभी द्वंद्वों को नए अर्थ दिए गए हैं। सविता सिंह स्त्री की देह को उसके बंधन के रूप में नहीं, बल्कि उसकी शक्ति और आत्मबोध के केन्द्र के रूप में देखती हैं। यही कारण है कि कविता अंततः स्त्री की स्वतंत्र कामना को संसार के पुनर्निर्माण की आधारशिला घोषित करती है। यह दृष्टि समकालीन नारीवादी चिंतन की उस धारा से जुड़ती है जो मानती है कि किसी भी वास्तविक सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत स्त्री के अपने अस्तित्व, अपनी इच्छाओं और अपने अनुभवों को मान्यता देने से होती है।
‘ईश्वर और स्त्री’ ऐसी कविता है जो अपने अपेक्षाकृत छोटे कलेवर के बावजूद अनेक आलोचनात्मक, दार्शनिक और वैचारिक दृष्टियों से पढ़ी जा सकती है। इसकी सार्थकता इसी में है कि यह किसी एक अर्थ या एक विमर्श में सीमित नहीं होती। कविता का मूल केन्द्र स्त्री, उसकी कामना, उसकी देह, ईश्वर की अवधारणा और परिवर्तन की संभावना है; इसलिए इसके पाठ से अनेक विमर्शों के द्वार खुलते हैं।
इसलिए‘ईश्वर और स्त्री’ पर स्त्रीवादी, देह-विमर्श, कामना-विमर्श, धर्मालोचना, अस्तित्ववाद, मनोविश्लेषण, उत्तर-संरचनावाद, सत्ता-विमर्श, पारिस्थितिक-नारीवाद, भाषिक-सौंदर्यशास्त्र, उत्तर-आधुनिकता तथा भारतीय दार्शनिक परंपराओं जैसी अनेक दृष्टियों से सार्थक चर्चा की जा सकती है। इनमें से स्त्रीवादी आलोचना, देह-विमर्श, कामना-विमर्श, धर्मालोचना और सत्ता-विमर्श इस कविता के सबसे केंद्रीय प्रवेश-द्वार प्रतीत होते हैं, क्योंकि कविता का मूल तनाव स्त्री की स्वतंत्र चेतना और पितृसत्तात्मक-धार्मिक संरचनाओं के बीच स्थित है।
‘ईश्वर और स्त्री’ कविता का स्त्रीवादी पाठ हमें यह समझने का अवसर देता है कि कविता केवल स्त्री की सामाजिक स्थिति का बयान नहीं करती, बल्कि स्त्री-अस्तित्व, स्त्री-कामना, स्त्री-देह और स्त्री-स्वायत्तता से जुड़े उन मूलभूत प्रश्नों को उठाती है जिन्हें पितृसत्तात्मक संस्कृति ने लंबे समय तक नियंत्रित, विकृत अथवा मौन बनाए रखा। यह कविता स्त्री को किसी संबंधगत पहचान—जैसे पत्नी, प्रेमिका, माँ या पुरुष के पूरक—के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र सत्ता और चेतना के रूप में प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि इसका स्त्रीवादी महत्त्व केवल विषयवस्तु में नहीं, बल्कि उसके वैचारिक आग्रह और काव्य-दृष्टि में निहित है।
कविता की पहली पंक्ति—“जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण”—स्त्रीवादी दृष्टि से विशेष ध्यान की अपेक्षा रखती है। स्त्रीवादी आलोचना बार-बार इस तथ्य की ओर संकेत करती रही है कि पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की देह को उसके अपने अनुभव के क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि पुरुष-दृष्टि के उपभोग की वस्तु के रूप में देखा गया। स्त्री की देह पर सामाजिक, धार्मिक और नैतिक नियंत्रण स्थापित किए गए। ऐसे में ‘जागी हुई देह’ का बिम्ब एक राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेता है। यह देह अब निष्क्रिय नहीं है, न ही किसी बाहरी दृष्टि द्वारा परिभाषित है। वह स्वयं जागृत है, स्वयं को जानती है और अपनी उपस्थिति का बोध रखती है। स्त्रीवादी चिंतन में चेतना और देह का यह संबंध महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि स्त्री की मुक्ति केवल वैधानिक अधिकारों से नहीं, बल्कि अपने शरीर और अपने अनुभव पर अधिकार स्थापित करने से भी जुड़ी हुई है।
कविता में ईश्वर का उल्लेख भी स्त्रीवादी आलोचना के लिए विशेष अर्थ रखता है। “देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को”—यह पंक्ति केवल धार्मिक संवेदना का हिस्सा नहीं है, बल्कि उस पुरुष-केन्द्रित धार्मिक संरचना पर प्रश्न है जिसके भीतर स्त्री का अनुभव हमेशा गौण रहा। अधिकांश धार्मिक परंपराओं में ईश्वर की कल्पना पुरुषवाची रूपों में की गई है और सामाजिक नैतिकता का निर्माण भी पुरुष-हितों के अनुरूप हुआ है। स्त्रीवादी नज़रिए से धर्म की आलोचना (feminist theology) का एक प्रमुख तर्क यह रहा है कि धार्मिक संस्थाएँ और उनके प्रतीक अक्सर पितृसत्ता को वैधता प्रदान करते हैं। कविता में ईश्वर स्त्री की पीड़ा का साक्षी है, पर उसका समाधानकर्ता नहीं। यह स्थिति ईश्वर की नैतिक निष्क्रियता की ओर संकेत करती है और साथ ही यह भी बताती है कि स्त्री की मुक्ति किसी दैवी हस्तक्षेप से नहीं आने वाली।
कविता की सबसे महत्त्वपूर्ण स्त्रीवादी स्थापना उन पंक्तियों में दिखाई देती है जहाँ कवयित्री कहती हैं कि शायद ईश्वर अपनी ही कल्पना को बदलना चाहता होगा क्योंकि उसने ऐसे पुरुष नहीं बनाए जो स्त्री को अपनी बाहों में ले सकें। यहाँ ‘बाहों में लेना’ एक गहन रूपक है। इसका अर्थ केवल शारीरिक निकटता नहीं है। यह स्वीकार, सम्मान, समानता और भावनात्मक साझेदारी का संकेत है। स्त्रीवादी चिंतन लंबे समय से यह प्रश्न उठाता रहा है कि पुरुष-स्त्री संबंधों में प्रेम और समानता के दावे के बावजूद सत्ता का असंतुलन क्यों बना रहता है। कविता इसी असंतुलन को रेखांकित करती है। पुरुष स्त्री के शरीर के निकट आ सकता है, लेकिन उसके अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाता। वह संबंध स्थापित कर सकता है, पर समानता नहीं। इसलिए समस्या स्त्री में नहीं, बल्कि उस पुरुष-सत्ता में है जो स्त्री को मनुष्य के रूप में देखने में असफल रही है।
कविता का मध्य भाग स्त्री-कामना के प्रश्न को केन्द्र में ले आता है। स्त्रीवादी आलोचना का एक बड़ा हस्तक्षेप यह रहा है कि उसने स्त्री की इच्छा और यौनिकता को वैध मानवीय अनुभव के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्री की कामना को या तो दबाया, या उसे नैतिक भय और अपराध-बोध से जोड़ दिया। पुरुष की इच्छा को स्वाभाविक और स्त्री की इच्छा को संदिग्ध माना गया। कविता इस विभाजन को अस्वीकार करती है। “लहराता अन्धकार मिल जाने देता है / अपने तम में एक और तम को”—इन पंक्तियों में स्त्री की इच्छा को किसी अपराध या पतन के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक मानवीय अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ अंधकार दमन का नहीं, बल्कि उस आंतरिक क्षेत्र का प्रतीक है जहाँ स्त्री अपनी इच्छाओं के साथ निर्भीक होकर उपस्थित हो सकती है।
“सारी वासना को जैसे स्त्री हो”—यह पंक्ति स्त्रीवादी दृष्टि से कविता का सबसे क्रांतिकारी बिंदु कही जा सकती है। हिन्दी साहित्य और व्यापक सामाजिक चेतना में स्त्री को लंबे समय तक या तो ‘पवित्रता’ के आदर्श में कैद किया गया या पुरुष-वासना की वस्तु के रूप में चित्रित किया गया। दोनों स्थितियों में स्त्री की अपनी इच्छा अनुपस्थित रही। सविता सिंह इस अनुपस्थिति को समाप्त करती हैं। यहाँ स्त्री स्वयं वासना का रूपक बन जाती है। यह वासना केवल यौनिक अर्थों में नहीं, बल्कि जीवन की समस्त आकांक्षाओं, इच्छाओं और ऊर्जा का प्रतीक है। स्त्री अब इच्छा की वस्तु नहीं, बल्कि इच्छा की स्वामी है। स्त्रीवादी सिद्धांत की भाषा में कहें तो कविता स्त्री को ‘ऑब्जेक्ट’ से ‘सब्जेक्ट’ में रूपांतरित कर देती है। यह परिवर्तन स्त्रीवादी लेखन का एक केंद्रीय लक्ष्य रहा है।
कविता का अंतिम खंड स्त्रीवादी राजनीति के स्तर पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। “बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही / ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका।” इन पंक्तियों में कविता अपनी सबसे निर्णायक स्थापना करती है। स्त्रीवादी आंदोलन का एक मूल आग्रह यह रहा है कि स्त्री को इतिहास की सक्रिय निर्माता के रूप में देखा जाए, न कि केवल इतिहास की पीड़ित पात्र के रूप में। कविता इसी आग्रह को काव्यात्मक रूप में व्यक्त करती है। संसार का परिवर्तन अब किसी ईश्वर, मसीहा या पुरुष-नायक से नहीं होगा; वह स्त्री की कामना से होगा। यहाँ ‘कामना’ शब्द का अर्थ व्यापक है। इसमें स्वतंत्रता की इच्छा, समानता की आकांक्षा, आत्मनिर्णय का अधिकार और न्यायपूर्ण संसार का स्वप्न—सब कुछ समाहित है।
यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि कविता स्त्री को केवल पीड़ित के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। स्त्रीवादी आलोचना का एक संकट यह रहा है कि कभी-कभी स्त्री केवल उत्पीड़न की शिकार सत्ता बनकर रह जाती है। सविता सिंह की कविता इस सीमा को पार करती है। स्त्री यहाँ दुःख और हाहाकार की वाहक अवश्य है, लेकिन वह परिवर्तन की वाहक भी है। वह करुणा की पात्र नहीं, बल्कि इतिहास को बदलने वाली शक्ति है। इस दृष्टि से कविता स्त्री की सक्रियता और उसकी रचनात्मक क्षमता को रेखांकित करती है।
उदारवादी स्त्रीवाद की दृष्टि से देखें तो कविता स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व और उसके मानवीय अधिकारों की स्थापना करती है। उग्र स्त्रीवाद की दृष्टि से देखें तो यह पितृसत्तात्मक सत्ता-संरचनाओं और पुरुष-केन्द्रित धार्मिक अवधारणाओं पर प्रश्न उठाती है। उत्तर-आधुनिक स्त्रीवादी दृष्टि से देखें तो कविता स्त्री की देह, कामना और पहचान के उन अनुभवों को केन्द्र में लाती है जिन्हें मुख्यधारा के विमर्शों ने हाशिये पर रखा था। इस प्रकार कविता स्त्रीवादी चिंतन की विभिन्न धाराओं के साथ संवाद करती हुई दिखाई देती है।
देह-विमर्श के परिप्रेक्ष्य ‘ईश्वर और स्त्री’ कविता को पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता का केंद्रीय तनाव केवल स्त्री और ईश्वर के बीच नहीं है, बल्कि स्त्री-देह और उस पर स्थापित सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक नियंत्रणों के बीच भी है। कविता स्त्री की देह को जैविक सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव, चेतना, कामना और आत्मनिर्णय के ऐसे क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करती है जहाँ से प्रतिरोध और परिवर्तन दोनों की संभावनाएँ जन्म लेती हैं। यही कारण है कि इस कविता में देह कोई निष्क्रिय उपस्थिति नहीं है; वह विचार का स्रोत है, आत्मबोध का माध्यम है और सत्ता-संरचनाओं के विरुद्ध एक वैकल्पिक शक्ति भी है।
कविता की पहली पंक्ति—“जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण”—देह-विमर्श की दृष्टि से सबसे अधिक अर्थगर्भित है। सामान्यतः साहित्य और समाज में देह को आत्मा, बुद्धि या चेतना से निम्नतर माना जाता रहा है। विशेष रूप से स्त्री की देह को उसके व्यक्तित्व का पर्याय बना दिया गया, जबकि उसकी चेतना और वैचारिकता को गौण कर दिया गया। सविता सिंह इस विभाजन को अस्वीकार करती हैं। यहाँ देह ‘जागी हुई’ है। यह जागरण केवल इन्द्रियबोध का नहीं, बल्कि आत्मबोध का संकेत है। देह स्वयं अपने अस्तित्व के प्रति सजग है। वह किसी दूसरे की दृष्टि द्वारा पहचानी जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानने वाली सत्ता है। देह और आसमान का ‘एक दर्पण’ होना इस अनुभव को और व्यापक बना देता है। स्त्री की देह यहाँ सीमित, बंद या संकुचित नहीं है; वह विराटता और अनंतता से संवाद करती है। इस प्रकार कविता देह को संकुचन नहीं, विस्तार का रूप देती है।
देह-विमर्श का एक प्रमुख तर्क यह है कि सत्ता केवल राजनीतिक संस्थाओं के माध्यम से कार्य नहीं करती, बल्कि शरीरों को नियंत्रित करके भी अपना प्रभाव स्थापित करती है। स्त्री की देह पर नियंत्रण पितृसत्तात्मक समाज की सबसे पुरानी रणनीतियों में से एक रहा है। विवाह, शील, मर्यादा, पवित्रता, नैतिकता और धार्मिक आचार-संहिताएँ अक्सर स्त्री-देह के नियमन के उपकरण बनती रही हैं। कविता में जब ईश्वर स्त्री के ‘हाहाकार’ का साक्षी बनता है, तब यह हाहाकार केवल मानसिक या सामाजिक पीड़ा का नहीं है; इसके भीतर वह ऐतिहासिक अनुभव भी समाहित है जिसमें स्त्री की देह को उसकी इच्छा से अलग करके नियंत्रित किया गया। देह-विमर्श की दृष्टि से यह हाहाकार उस दमनकारी व्यवस्था का परिणाम है जिसने स्त्री के शरीर को उसका अपना नहीं रहने दिया।
“बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को / कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक / ले सकें जो उसे बाहों में”—इन पंक्तियों का देह-विमर्श के संदर्भ में विशेष महत्त्व है। ‘बाहों में लेना’ यहाँ केवल शारीरिक स्पर्श नहीं है। यह उस संबंध की खोज है जिसमें देह को वस्तु बनाकर नहीं, बल्कि व्यक्तित्व के विस्तार के रूप में स्वीकार किया जाए। पितृसत्तात्मक संरचना में पुरुष स्त्री की देह के निकट तो आता है, पर उसकी अनुभूति, उसकी इच्छा और उसकी स्वतंत्रता के निकट नहीं पहुँच पाता। इसलिए कविता का संकेत यह है कि स्त्री की देह को वास्तव में स्वीकार करने के लिए उसे उसके संपूर्ण आत्म-अनुभव के साथ स्वीकार करना आवश्यक है। देह को केवल उपभोग की वस्तु मानने वाला संबंध अंततः मानवीय संबंध नहीं रह जाता।
कविता का मध्य भाग देह और कामना के संबंध को एक नए अर्थ में प्रस्तुत करता है। “उनींदी आँखें बंद होने-होने को / खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े”—इन पंक्तियों में देह की एक ऐसी अवस्था का चित्रण है जो जागरण और निद्रा के बीच स्थित है। देह-विमर्श के भीतर यह स्थिति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह उस आंतरिक अनुभव की ओर संकेत करती है जिसे सामाजिक भाषा प्रायः व्यक्त नहीं कर पाती। स्त्री की देह केवल बाहरी अनुशासन का विषय नहीं है; उसके भीतर स्मृतियाँ, इच्छाएँ, संवेदनाएँ और आकांक्षाएँ भी निवास करती हैं। ‘दरवाज़े’ इन संभावनाओं के प्रतीक हैं। वे ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें समाज ने बंद रखना चाहा, किन्तु जो खुलने की तैयारी में हैं। इस अर्थ में कविता स्त्री-देह के भीतर दबे हुए अनुभवों के उद्घाटन की प्रक्रिया को रूपायित करती है।
“जिन्हें बचा रखा है अब रात ने”—यहाँ रात एक महत्त्वपूर्ण सांकेतिक भूमिका निभाती है। दिन सामाजिक निगरानी का समय है, जबकि रात अपेक्षाकृत निजी और आत्मीय अनुभवों का। स्त्री-देह पर जो सार्वजनिक नियंत्रण स्थापित किए गए हैं, उनसे कुछ क्षणों की मुक्ति रात में संभव होती है। इसलिए रात यहाँ केवल अंधकार नहीं, बल्कि संरक्षण का रूपक बन जाती है। वह स्त्री की उन इच्छाओं और अनुभवों को सुरक्षित रखती है जिन्हें सामाजिक नैतिकता ने अस्वीकार किया है।
“लहराता अन्धकार मिल जाने देता है / अपने तम में एक और तम को”—इन पंक्तियों में देह और इच्छा का संबंध किसी नैतिक अपराध की तरह नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक मानवीय प्रक्रिया की तरह चित्रित हुआ है। देह-विमर्श का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह शरीर को शर्म, अपराध-बोध और निषेध के घेरे से बाहर निकालने का प्रयास करता है। कविता में अंधकार का बिम्ब इसी दिशा में काम करता है। यहाँ अंधकार दमन का नहीं, बल्कि आत्मीयता का क्षेत्र है। वह भिन्नताओं को अपने भीतर समाहित कर लेता है। इस प्रकार देह का अनुभव किसी सामाजिक निर्णय का विषय नहीं रह जाता; वह आत्म-अनुभूति का क्षेत्र बन जाता है।
कविता की सबसे अधिक चर्चित पंक्ति—“सारी वासना को जैसे स्त्री हो”—देह-विमर्श के संदर्भ में विशेष विश्लेषण की माँग करती है। भारतीय समाज में स्त्री-देह को लेकर दो परस्पर विरोधी धारणाएँ एक साथ मौजूद रही हैं। एक ओर उसे आकर्षण और इच्छा का केन्द्र माना गया, दूसरी ओर उससे पवित्रता और संयम की अपेक्षा की गई। दोनों स्थितियों में स्त्री की अपनी इच्छा अनुपस्थित रही। सविता सिंह इस विरोधाभास को तोड़ती हैं। यहाँ स्त्री स्वयं वासना का पर्याय बनती है। यह वासना किसी नकारात्मक अर्थ में नहीं है। यह जीवन की ऊर्जा, आकांक्षा और सृजनशीलता का रूप है। देह-विमर्श की दृष्टि से यह पंक्ति इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह स्त्री को पुरुष-कामना की वस्तु से बदलकर स्वयं कामना की स्वायत्त वाहक बना देती है। अब देह पर अर्थ आरोपित नहीं किए जा रहे; देह स्वयं अर्थ उत्पन्न कर रही है।
इस कविता में देह और चेतना के बीच कोई विरोध नहीं है। पश्चिमी दार्शनिक परंपरा में लंबे समय तक शरीर और मन को दो अलग-अलग तत्त्वों के रूप में देखा गया। स्त्री को अक्सर शरीर के साथ और पुरुष को बुद्धि के साथ जोड़ा गया। इस विभाजन ने स्त्री की सामाजिक स्थिति को कमजोर करने में भूमिका निभाई। सविता सिंह की कविता इस द्वैत को अस्वीकार करती है। ‘जागी हुई देह’ वास्तव में जागी हुई चेतना है। देह यहाँ सोचती है, अनुभव करती है और संसार को बदलने की क्षमता रखती है। इस प्रकार शरीर और आत्मबोध एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
कविता का अंतिम कथन—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही”—देह-विमर्श की दृष्टि से इसका सबसे बड़ा वैचारिक निष्कर्ष है। यहाँ परिवर्तन का स्रोत किसी अमूर्त विचारधारा, किसी धार्मिक सत्ता या किसी पुरुष-नायक को नहीं बनाया गया। परिवर्तन की शक्ति स्त्री की कामना में निहित है। चूँकि कामना देह से जुड़ी हुई है, इसलिए कविता अप्रत्यक्ष रूप से यह कहती है कि स्त्री की देह को नियंत्रित करने वाली संरचनाएँ ही उसके ऐतिहासिक दमन का आधार रही हैं, और उसी देह की स्वीकृति उसके मुक्तिकामी भविष्य का आधार बनेगी। देह अब बंधन नहीं है; वह मुक्ति का क्षेत्र है।
समग्रतः देह-विमर्श की दृष्टि से ‘ईश्वर और स्त्री’ एक ऐसी कविता है जो स्त्री-देह को वस्तु, प्रतीक या पुरुष-दृष्टि के उपभोग्य क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि आत्मानुभूति, इच्छा, चेतना और प्रतिरोध के केन्द्र के रूप में स्थापित करती है। कविता यह दिखाती है कि स्त्री की देह केवल जैविक अस्तित्व नहीं है; वह अनुभवों, स्मृतियों, आकांक्षाओं और स्वतंत्रता की संभावनाओं से निर्मित एक जटिल सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्र है। सविता सिंह की काव्य-दृष्टि का महत्त्व इसी में है कि वह स्त्री-देह को शर्म और नियंत्रण की भाषा से मुक्त करके आत्मबोध और परिवर्तन की भाषा में रूपांतरित कर देती है। यही इस कविता की देह-विमर्श संबंधी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
समग्रतः ‘ईश्वर और स्त्री’ स्त्रीवादी कविता का एक सशक्त उदाहरण है क्योंकि यह स्त्री को किसी बाहरी मान्यता की प्रतीक्षा करती हुई सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि स्वयं अर्थ-निर्माण करने वाली चेतना के रूप में प्रस्तुत करती है। कविता का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वह स्त्री की देह और उसकी कामना को मुक्ति के विरोधी नहीं, बल्कि मुक्ति के आधार के रूप में देखती है। इसी कारण यह कविता पितृसत्तात्मक संस्कृति द्वारा निर्मित स्त्री-छवियों का विखंडन करती है और एक ऐसी स्त्री की कल्पना प्रस्तुत करती है जो अपने अनुभव, अपनी इच्छा और अपनी चेतना के बल पर संसार को बदलने की क्षमता रखती है। यही इसकी स्त्रीवादी दृष्टि की केन्द्रीय उपलब्धि है।
‘कामना-विमर्श’ (Discourse of Desire) आधुनिक साहित्यिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक चिंतन का एक केंद्रीय क्षेत्र है। यह केवल यौन-इच्छा का अध्ययन नहीं है, बल्कि उन जटिल प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास है जिनके माध्यम से इच्छाएँ निर्मित, नियंत्रित, अभिव्यक्त और सामाजिक रूप से विन्यस्त होती हैं। कामना-विमर्श यह मानकर चलता है कि इच्छा कोई शुद्ध प्राकृतिक या निजी अनुभव नहीं है; वह संस्कृति, सत्ता, भाषा, धर्म, नैतिकता और सामाजिक संबंधों के साथ गहराई से जुड़ी होती है। इसलिए यह प्रश्न कि कौन इच्छा कर सकता है, किस प्रकार की इच्छा को स्वीकार किया जाएगा, और किस इच्छा को अनैतिक या अस्वीकार्य घोषित किया जाएगा, मूलतः राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्न भी हैं।
मिशेल फूको ने अपनी प्रसिद्ध कृति द हिस्ट्री ऑफ सेक्सुअलिटी में उस धारणा का विरोध किया कि आधुनिक समाज ने केवल यौनिकता का दमन किया है। उनका तर्क था कि सत्ता केवल निषेध के माध्यम से काम नहीं करती; वह ज्ञान का निर्माण करके भी काम करती है। आधुनिक समाज ने यौनिकता के बारे में लगातार बोलना शुरू किया, उसके बारे में वैज्ञानिक, चिकित्सीय, मनोवैज्ञानिक और कानूनी ज्ञान विकसित किया, और इस प्रकार उसे वर्गीकृत तथा नियंत्रित किया। कौन-सा व्यवहार ‘सामान्य’ है, कौन-सा ‘विकृत’; कौन-सी इच्छा ‘स्वाभाविक’ है, कौन-सी ‘अस्वाभाविक’—इन सबका निर्धारण सत्ता-तंत्रों द्वारा किया गया। फूको के अनुसार यौनिकता का इतिहास केवल दमन का इतिहास नहीं, बल्कि नियंत्रण और नियमन का इतिहास है।
स्त्रीवादी चिंतन ने फूको की इस अवधारणा का उपयोग यह समझने के लिए किया कि स्त्री की इच्छा पर नियंत्रण केवल पारिवारिक या वैवाहिक व्यवस्था का प्रश्न नहीं है। धर्म, शिक्षा, नैतिकता, चिकित्सा और सामाजिक प्रतिष्ठा—सभी संस्थाएँ मिलकर यह निर्धारित करती हैं कि ‘अच्छी स्त्री’ कैसी होगी और उसे क्या चाहना चाहिए। स्त्री की इच्छा को यदि अत्यधिक मुखर पाया जाता है, तो उसे अक्सर सामाजिक संदेह का विषय बना दिया जाता है। इस प्रकार स्त्री-कामना पर नियंत्रण सत्ता-संबंधों की एक व्यापक संरचना का हिस्सा बन जाता है।
दूसरी ओर,कैपिटलिज्म एंड शिजोफ्रेनिया (Capitalism and Schizophrenia) नामक ग्रन्थ के हिस्से के रूप में विख्यात संयुक्त पुस्तक शृंखला एंटी-एडिपस (एंटी-एडिपस) और अ थाउज़ेंड प्लेटोज़ (A Thousand Plateaus) के लेखक जिल देल्यूज़ (Gilles Deleuze) और फ़ेलिक्स ग्वात्तारी (Félix Guattari) ने कामना को देखने का बिल्कुल अलग तरीका प्रस्तुत किया। उन्होंने फ्रायडीय मनोविश्लेषण में उपस्थित उस धारणा का विरोध किया कि कामना मूलतः किसी अभाव या कमी से उत्पन्न होती है। उनके अनुसार कामना किसी खोई हुई वस्तु की तलाश नहीं है, बल्कि एक उत्पादक और सृजनात्मक शक्ति है। वे कामना को ऐसी ऊर्जा के रूप में देखते हैं जो निरंतर नए संबंध बनाती है, नई संभावनाएँ खोलती है और जीवन के नए रूपों का निर्माण करती है। उनके लिए कामना का अर्थ केवल यौनिकता नहीं है; वह सृजन, परिवर्तन और विस्तार की शक्ति भी है।
देल्यूज़ और ग्वात्तारी की यह अवधारणा स्त्रीवादी विमर्श के लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई क्योंकि इससे स्त्री-कामना को अपराध-बोध, अभाव और निषेध की भाषा से बाहर निकालकर सृजनात्मक शक्ति के रूप में समझा जा सकता था। यदि कामना को केवल कमी की प्रतिक्रिया माना जाए, तो वह हमेशा किसी अनुपस्थित वस्तु पर निर्भर रहेगी। लेकिन यदि कामना स्वयं एक उत्पादक ऊर्जा है, तो वह नए सामाजिक संबंधों, नई आत्म-चेतना और नए भविष्य की रचना कर सकती है। इस दृष्टि से कामना केवल निजी अनुभव नहीं, बल्कि परिवर्तनकारी शक्ति बन जाती है।
इन्हीं सैद्धांतिक आधारों के आलोक में जब हम सविता सिंह की कविता ‘ईश्वर और स्त्री’ को पढ़ते हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि कविता का मूल आग्रह स्त्री-कामना को पुनर्स्थापित करना है। यह पुनर्स्थापना केवल यौनिक अधिकारों की माँग नहीं है, बल्कि उस समूची सांस्कृतिक संरचना के विरुद्ध प्रतिरोध है जिसने स्त्री की इच्छा को नियंत्रित और मौन बनाए रखा।
कविता की पहली पंक्ति—“जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण”—कामना-विमर्श की दृष्टि से प्रवेश-द्वार का काम करती है। यहाँ ‘जागी हुई देह’ एक ऐसी देह है जो अपने अस्तित्व और अपनी इच्छाओं के प्रति सचेत हो चुकी है। पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की देह पर नियंत्रण स्थापित करने का अर्थ उसकी इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित करना भी रहा है। इसलिए देह का जागरण वस्तुतः कामना के जागरण का भी संकेत है। यह वह क्षण है जहाँ स्त्री स्वयं को दूसरों की दृष्टि से नहीं, बल्कि अपनी दृष्टि से देखने लगती है।
“देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को”—इस पंक्ति में ‘हाहाकार’ को केवल सामाजिक पीड़ा के रूप में नहीं, बल्कि दबी हुई इच्छाओं के इतिहास के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। फूको की अवधारणा के अनुसार सत्ता इच्छाओं को केवल दबाती नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित और परिभाषित भी करती है। स्त्री की इच्छा को सदियों तक मर्यादा, शील, पवित्रता और त्याग के आदर्शों के भीतर सीमित रखा गया। परिणामस्वरूप स्त्री का अनुभव और उसकी कामना सामाजिक भाषा में पर्याप्त स्थान नहीं पा सकी। कविता का ‘हाहाकार’ इसी ऐतिहासिक चुप्पी का ध्वनि-रूप है।
“बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को / कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक / ले सकें जो उसे बाहों में”—इन पंक्तियों में कविता पितृसत्तात्मक संबंधों की आलोचना करती है। यहाँ समस्या यह नहीं है कि स्त्री प्रेम चाहती है; समस्या यह है कि पुरुष-निर्मित संबंध-संरचनाएँ उसकी इच्छा को बराबरी से स्वीकार नहीं करतीं। स्त्री की कामना को या तो नियंत्रित किया जाता है या उसे गौण बना दिया जाता है। फूको के अर्थ में कहें तो संबंधों के भीतर भी सत्ता सक्रिय रहती है और यह निर्धारित करती है कि किसकी इच्छा को मान्यता मिलेगी। कविता इसी असमानता की ओर संकेत करती है।
“उनींदी आँखें बंद होने-होने को / खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े”—इन पंक्तियों में स्त्री-कामना एक संक्रमणशील अवस्था में दिखाई देती है। वह पूरी तरह दबाई नहीं जा सकी है, लेकिन अभी पूर्ण रूप से मुक्त भी नहीं हुई है। दरवाज़ों का बिम्ब उन सामाजिक अवरोधों का संकेत है जो स्त्री की इच्छाओं के सामने खड़े किए गए। फिर भी वे दरवाज़े खुलने की तैयारी में हैं। यह तैयारी केवल व्यक्तिगत मुक्ति की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परिवर्तन की भी है। “जिन्हें बचा रखा है अब रात ने”—रात यहाँ उस निजी क्षेत्र का रूपक है जहाँ स्त्री अपनी इच्छा के साथ बिना सामाजिक निगरानी के उपस्थित हो सकती है। दिन सामाजिक नियंत्रण का समय है; रात आत्म-अनुभूति का। इस प्रकार रात स्त्री-कामना के लिए एक संरक्षित स्थान निर्मित करती है।
“लहराता अन्धकार मिल जाने देता है / अपने तम में एक और तम को”—यहाँ कामना को किसी नैतिक अपराध की तरह नहीं, बल्कि स्वाभाविक मानवीय अनुभव की तरह प्रस्तुत किया गया है। अंधकार के भीतर अंधकार का मिलना सीमाओं के विघटन और आत्मीयता की स्वीकृति का संकेत है। यह वह क्षेत्र है जहाँ इच्छा सामाजिक वर्गीकरणों से मुक्त होकर स्वयं को व्यक्त कर सकती है।
कविता का एक केंद्रीय क्षण है—“सारी वासना को जैसे स्त्री हो।” कामना-विमर्श की दृष्टि से यह पंक्ति एक वैचारिक क्रांति का संकेत देती है। परंपरागत साहित्य और संस्कृति में स्त्री को अक्सर पुरुष-कामना की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया गया। उसकी भूमिका चाही जाने वाली सत्ता की थी। सविता सिंह इस संरचना को उलट देती हैं। यहाँ स्त्री स्वयं वासना का रूपक बन जाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि स्त्री केवल यौनिकता में सीमित हो जाती है; बल्कि इसका अर्थ यह है कि इच्छा की सक्रिय और स्वायत्त सत्ता अब स्त्री है। वह स्वयं चाहती है, कल्पना करती है, आकांक्षा रखती है और अर्थ का निर्माण करती है।
यहीं पर देल्यूज़ और ग्वात्तारी की अवधारणा विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाती है। यदि कामना को केवल अभाव माना जाए, तो यह पंक्ति स्त्री की किसी कमी या अपूर्णता की अभिव्यक्ति लगेगी। लेकिन कविता का स्वर ऐसा नहीं है। यहाँ स्त्री की वासना किसी अनुपस्थिति की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सृजनात्मक ऊर्जा है। वह जीवन को आगे बढ़ाने वाली शक्ति है। वह केवल किसी वस्तु या व्यक्ति को प्राप्त करना नहीं चाहती; वह नए संबंधों और नए संसार की संभावना को जन्म देती है। इस अर्थ में कविता की स्त्री देल्यूज़ और ग्वात्तारी की ‘उत्पादक कामना’ (productive desire) का मूर्त रूप प्रतीत होती है।
कविता की अंतिम पंक्तियाँ इस अर्थ को निर्णायक रूप से स्पष्ट कर देती हैं—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही / ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका।” यहाँ कामना को परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। यह देल्यूज़ और ग्वात्तारी की अवधारणा के सबसे निकट पहुँचने वाला क्षण है। संसार का परिवर्तन किसी दैवी आदेश या बाहरी शक्ति से नहीं होगा; वह स्त्री की इच्छा, उसकी आकांक्षा और उसकी सृजनात्मक ऊर्जा से होगा। कामना यहाँ निजी अनुभूति से आगे बढ़कर ऐतिहासिक और सामाजिक शक्ति बन जाती है।
साथ ही, यह कथन फूको की सत्ता-संबंधी अवधारणा का भी प्रतिवाद है। जिन संरचनाओं ने स्त्री की इच्छा को नियंत्रित किया था, कविता उन्हीं संरचनाओं को चुनौती देती है। अब सत्ता यह निर्धारित नहीं करेगी कि स्त्री क्या चाहे; बल्कि स्त्री की अपनी कामना नए संसार की दिशा तय करेगी। इस प्रकार कविता नियंत्रण की राजनीति से मुक्ति की राजनीति की ओर बढ़ती है।
‘ईश्वर और स्त्री’ का कामना-विमर्श हमें यह समझने में सहायता करता है कि स्त्री-कामना केवल दबी हुई इच्छा का प्रश्न नहीं है। यह सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रश्न भी है और नए संसार के निर्माण का प्रश्न भी। फूको के संदर्भ में कविता उन तंत्रों को उजागर करती है जिन्होंने स्त्री की इच्छा को नियंत्रित किया। देल्यूज़ और ग्वात्तारी के संदर्भ में वह स्त्री-कामना को एक सृजनात्मक, उत्पादक और परिवर्तनकारी ऊर्जा के रूप में स्थापित करती है। इसीलिए कविता का अंतिम संदेश केवल स्त्री की इच्छा की स्वीकृति नहीं, बल्कि उसकी ऐतिहासिक और रचनात्मक शक्ति की घोषणा है। स्त्री यहाँ इच्छा की विषय-वस्तु नहीं, बल्कि इच्छा की निर्माता है; और यही इस कविता की सबसे गहरी वैचारिक उपलब्धि है।
धर्म और ईश्वर की आलोचना (Critique of Religion) के परिप्रेक्ष्य में ‘ईश्वर और स्त्री’ कविता को पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता का उद्देश्य केवल स्त्री की पीड़ा का वर्णन करना नहीं है, बल्कि उन धार्मिक और वैचारिक संरचनाओं पर प्रश्न उठाना भी है जिन्होंने इतिहास के लंबे दौर में स्त्री की स्थिति को प्रभावित किया है। यह कविता सीधे-सीधे नास्तिकता का घोषणापत्र नहीं है, न ही ईश्वर के अस्तित्व के पक्ष या विपक्ष में कोई दार्शनिक तर्क प्रस्तुत करती है। इसका वास्तविक सरोकार इस प्रश्न से है कि यदि ईश्वर सृष्टिकर्ता, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है, तो स्त्री के जीवन में व्याप्त असमानता, अपमान, अधूरी इच्छाएँ और ऐतिहासिक पीड़ा को किस प्रकार समझा जाए। कविता का आलोचनात्मक स्वर इसी बिंदु से जन्म लेता है।
धर्म की आलोचना की आधुनिक परंपरा में कार्ल मार्क्स, फ़्रेडरिक नीत्शे, सिग्मंड फ्रायड और बाद में मिशेल फूको जैसे विचारकों ने अलग-अलग स्तरों पर यह दिखाया कि धर्म केवल आध्यात्मिक अनुभव का क्षेत्र नहीं है; वह सामाजिक सत्ता, नैतिक अनुशासन और सांस्कृतिक नियंत्रण से भी जुड़ा होता है। स्त्रीवादी चिंतन ने इस आलोचना को आगे बढ़ाते हुए यह प्रश्न उठाया कि धार्मिक संस्थाएँ और धार्मिक प्रतीक किस हद तक पुरुष-केन्द्रित रहे हैं। स्त्रीवादी धर्मशास्त्र (Feminist Theology) की चिंतकों—जैसे मैरी डेली, रोज़मेरी रैडफ़ोर्ड रूथर, एलिज़ाबेथ शूसलर फ़ियोरेन्ज़ा आदि—ने यह तर्क दिया कि पारंपरिक धार्मिक भाषाओं में ईश्वर की कल्पना प्रायः पुरुष-सत्तात्मक रूपों में की गई है। ईश्वर ‘पिता’ है, ‘स्वामी’ है, ‘राजा’ है; परिणामस्वरूप धार्मिक सत्ता की संरचनाएँ भी पुरुष-प्रधान बनी रहीं। स्त्रीवादी धर्मशास्त्र का एक मूल प्रश्न यह रहा है कि यदि ईश्वर की अवधारणा स्वयं पुरुष-केंद्रित है, तो क्या वह स्त्री-अनुभव को पूर्ण रूप से अभिव्यक्त कर सकती है?
सविता सिंह की कविता इसी प्रकार के प्रश्नों से संवाद करती हुई दिखाई देती है। कविता की शुरुआत ही एक ऐसे दृश्य से होती है जिसमें “जागी हुई देह” और “आसमान” एक-दूसरे के सामने उपस्थित हैं। यहाँ आसमान को ईश्वर की उपस्थिति या ब्रह्मांडीय सत्ता के संकेत के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। लेकिन इस दृश्य का केंद्र ईश्वर नहीं, स्त्री है। यह परिवर्तन महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि पारंपरिक धार्मिक आख्यानों में मनुष्य—विशेषकर स्त्री—अक्सर ईश्वर के संदर्भ में परिभाषित होती है; जबकि यहाँ ईश्वर की उपस्थिति भी स्त्री के अनुभव के संदर्भ में अर्थ ग्रहण करती है। कविता दृष्टि का केंद्र बदल देती है। अब ईश्वर नहीं, बल्कि स्त्री का अनुभव मूल बिंदु है।
“देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को”—यह पंक्ति धर्मा की आलोचना की दृष्टि से कविता की पहली बड़ी चुनौती है। यहाँ ईश्वर को सर्वज्ञ सत्ता मान लिया गया है; वह स्त्री के दुःख से अनभिज्ञ नहीं है। लेकिन यदि वह देख रहा है, तो प्रश्न उठता है कि फिर वह क्या कर रहा है? यह वही प्रश्न है जिसे धर्म-दर्शन में ‘दुःख की समस्या’ (Problem of Evil) कहा जाता है। यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और न्यायप्रिय भी है, तो संसार में अन्याय क्यों है? सविता सिंह इस दार्शनिक प्रश्न को स्त्री के अनुभव के स्तर पर ले आती हैं। स्त्री का ‘हाहाकार’ केवल व्यक्तिगत दुःख नहीं है; वह सदियों की लैंगिक असमानता, दमन और उपेक्षा का प्रतीक है। कविता यह संकेत करती है कि ईश्वर की सर्वज्ञता तब तक नैतिक अर्थ नहीं रखती जब तक वह पीड़ा को बदलने की क्षमता या इच्छा न रखे।
लेकिन कविता यहीं नहीं रुकती। वह आगे कहती है—“बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को।” यह एक विलक्षण कल्पना है। सामान्यतः धार्मिक परंपराओं में ईश्वर पूर्ण माना जाता है। उसकी सृष्टि भी पूर्ण मानी जाती है। लेकिन कविता में पहली बार ईश्वर स्वयं अपनी रचना पर पुनर्विचार करने की स्थिति में दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि वर्तमान व्यवस्था में कोई मूलभूत दोष मौजूद है। यह दोष केवल सामाजिक नहीं, बल्कि सृष्टि की संरचना तक फैला हुआ प्रतीत होता है।
“कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक / ले सकें जो उसे बाहों में”—इन पंक्तियों में धर्म और पितृसत्ता के संबंध पर गहरा व्यंग्य निहित है। यदि पुरुष भी ईश्वर की ही रचना हैं, तो स्त्री की पीड़ा के लिए केवल पुरुषों को दोषी ठहराकर ईश्वर को निर्दोष नहीं माना जा सकता। कविता अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रश्न उठाती है कि क्या ईश्वर की सृष्टि स्वयं लैंगिक असंतुलन से ग्रस्त है? यहाँ ईश्वर की रचनात्मक क्षमता पर नहीं, बल्कि उसकी नैतिक और मानवीय दृष्टि पर प्रश्न उठाया गया है। यह स्त्रीवादी धर्मशास्त्र के उस तर्क के निकट पहुँचता है जिसके अनुसार धार्मिक संरचनाओं ने पुरुष अनुभव को सार्वभौमिक अनुभव मान लिया और स्त्री-अनुभव को हाशिये पर डाल दिया।
कविता का मध्य भाग सीधे-सीधे धार्मिक आलोचना के बजाय स्त्री के आंतरिक अनुभव की ओर बढ़ता है, लेकिन यही परिवर्तन अपने भीतर आलोचनात्मक अर्थ भी समेटे हुए है। ‘रात’, ‘अंधकार’, ‘दरवाज़े’ और ‘वासना’ जैसे बिम्ब उन अनुभवों को सामने लाते हैं जिन्हें धार्मिक नैतिकता ने लंबे समय तक नियंत्रित या निषिद्ध घोषित किया। विशेष रूप से स्त्री-कामना को लगभग हर धार्मिक व्यवस्था ने किसी न किसी रूप में अनुशासित करने का प्रयास किया है। स्त्री के शरीर, उसकी यौनिकता और उसकी इच्छाओं पर नियंत्रण धार्मिक नैतिकता का एक केंद्रीय पक्ष रहा है। कविता इन निषेधों को अस्वीकार करती है। वह स्त्री की कामना को पाप, प्रलोभन या नैतिक विचलन के रूप में नहीं, बल्कि अस्तित्व की एक वैध और रचनात्मक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है।
“सारी वासना को जैसे स्त्री हो”—यह पंक्ति धार्मिक नैतिकता की पारंपरिक अवधारणाओं के विरुद्ध एक गहरा प्रतिवाद है। अधिकांश धार्मिक परंपराओं में वासना को संदेह की दृष्टि से देखा गया है, विशेष रूप से जब उसका संबंध स्त्री से हो। स्त्री को या तो तपस्या और पवित्रता के आदर्श में बाँधा गया या फिर उसे वासना के स्रोत के रूप में चित्रित किया गया। दोनों ही स्थितियों में स्त्री की अपनी इच्छा को मान्यता नहीं मिली। सविता सिंह इस पूरी संरचना को उलट देती हैं। यहाँ स्त्री वासना की निष्क्रिय वाहक नहीं, बल्कि उसकी सक्रिय सत्ता है। वह अपने अस्तित्व को अपराध-बोध के बिना स्वीकार करती है। यह स्वीकृति धार्मिक नैतिकता द्वारा निर्मित स्त्री-छवि के विरुद्ध खड़ी होती है।
कविता का अंतिम खंड धर्म और ईश्वर की आलोचना को सबसे स्पष्ट रूप में सामने लाता है। “चन्द्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर / सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता”—यहाँ चन्द्रमा भी एक प्रकार के गवाह की भूमिका में है। वह देखता है, लेकिन हस्तक्षेप नहीं करता। यह स्थिति ईश्वर की भूमिका से मिलती-जुलती है। दोनों उपस्थित हैं, दोनों साक्षी हैं, लेकिन परिवर्तन के सक्रिय कारक नहीं।
यही कारण है कि कविता का निष्कर्ष इतना निर्णायक बन जाता है—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही / ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका।” धर्म और ईश्वर की आलोचना के संदर्भ में यह कविता का केंद्रीय कथन है। यहाँ कवयित्री केवल यह नहीं कह रही कि ईश्वर असफल रहा है; वह यह भी कह रही है कि इतिहास और समाज के परिवर्तन के लिए अब ईश्वर पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। परिवर्तन का स्रोत मनुष्य के भीतर है, और विशेष रूप से स्त्री की चेतना तथा उसकी कामना में है। यह दृष्टि आधुनिक मानवतावादी और स्त्रीवादी चिंतन के निकट है, जहाँ मुक्ति किसी पारलौकिक सत्ता की कृपा से नहीं, बल्कि मनुष्य की अपनी सक्रियता से प्राप्त होती है।
इस कथन का एक और ख़ास पहलू है। कविता ईश्वर को पूरी तरह नकारती नहीं; वह उसकी ऐतिहासिक और वैचारिक केन्द्रीयता को नकारती है। अर्थात् प्रश्न ईश्वर के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उसकी भूमिका का है। स्त्री के जीवन को अर्थ देने, उसकी मुक्ति सुनिश्चित करने और संसार को बदलने का अधिकार अब ईश्वर के पास नहीं, स्वयं स्त्री के पास है। यह धार्मिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण का क्षण है। यहाँ स्त्री पहली बार इतिहास की सक्रिय निर्माता के रूप में सामने आती है।
‘ईश्वर और स्त्री’ धर्म और ईश्वर की आलोचना को किसी दार्शनिक अमूर्तन में नहीं, बल्कि स्त्री-अनुभव की ठोस भूमि पर स्थापित करती है। कविता यह प्रश्न उठाती है कि यदि धार्मिक संरचनाएँ स्त्री की पीड़ा को समाप्त नहीं कर सकीं, यदि ईश्वर की पारंपरिक अवधारणा स्त्री को समान मानवीय गरिमा नहीं दे सकी, और यदि धार्मिक नैतिकता ने उसकी इच्छाओं को नियंत्रित करने का कार्य किया, तो फिर स्त्री की मुक्ति का आधार कहाँ खोजा जाए। सविता सिंह का उत्तर स्पष्ट है—स्त्री की अपनी चेतना, उसकी देह, उसकी कामना और उसकी स्वतंत्र सत्ता में। इस प्रकार कविता धर्म और ईश्वर की आलोचना करते हुए किसी शून्यवाद की ओर नहीं जाती, बल्कि स्त्री को ही अर्थ, परिवर्तन और मुक्ति का नया केंद्र बना देती है। यही इस कविता की धर्म की आलोचना की स्त्रीवादी दृष्टि की सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि है।
अस्तित्ववादी परिप्रेक्ष्य में‘ईश्वर और स्त्री’ कविता का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता का मूल सरोकार केवल स्त्री-मुक्ति या स्त्री-कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मनुष्य के अस्तित्व, उसकी स्वतंत्रता, उसकी आत्म-चेतना और उसके द्वारा अपने जीवन का अर्थ स्वयं निर्मित करने की प्रक्रिया से भी गहरे स्तर पर जुड़ती है। यह कविता ऐसे क्षण को पकड़ती है जहाँ स्त्री अपने ऊपर आरोपित भूमिकाओं, धार्मिक आश्वासनों और पारंपरिक अर्थ-व्यवस्थाओं से बाहर निकलकर स्वयं को एक स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में पहचानना आरम्भ करती है। अस्तित्ववादी दर्शन की केंद्रीय मान्यता है कि मनुष्य का कोई पूर्वनिर्धारित सार (essence) नहीं होता; वह अपने चुनावों, अपने कर्मों और अपनी चेतना के माध्यम से स्वयं अपना स्वरूप निर्मित करता है। सविता सिंह की कविता इसी आत्म-निर्माण की प्रक्रिया को स्त्री-अनुभव के भीतर खोजती है।
कविता की आरम्भिक पंक्ति—“जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण”—अस्तित्ववादी दृष्टि से एक निर्णायक क्षण का संकेत करती है। यहाँ ‘जागी हुई देह’ केवल शारीरिक चेतना का नहीं, बल्कि आत्म-चेतना का बिम्ब है। अस्तित्ववादी चिंतन में मनुष्य का सबसे महत्त्वपूर्ण अनुभव वह क्षण है जब वह स्वयं को एक स्वायत्त सत्ता के रूप में पहचानता है और यह समझता है कि उसके जीवन का अर्थ बाहर से नहीं आने वाला। इस अर्थ में ‘जागना’ केवल नींद से बाहर आना नहीं है; यह उन भ्रमों और तैयार अर्थों से बाहर आना है जो समाज और परंपरा ने उसे सौंपे हैं। देह और आसमान का ‘एक दर्पण’ होना इस आत्म-दर्शन को और गहरा बना देता है। स्त्री स्वयं को किसी दूसरे की आँखों से नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की रोशनी में देखने लगती है।
“देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को”—यह पंक्ति अस्तित्ववादी प्रश्नों का द्वार खोलती है। यदि ईश्वर है और वह देख रहा है, तो फिर यह पीड़ा क्यों है? यह वही प्रश्न है जिसने आधुनिक अस्तित्ववादी चिंतन को गहराई से प्रभावित किया। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के अनेक चिंतकों ने अनुभव किया कि मनुष्य ऐसे संसार में जी रहा है जहाँ दुःख, अकेलापन और असुरक्षा मौजूद हैं, लेकिन इनका कोई अंतिम और सुनिश्चित उत्तर उपलब्ध नहीं है। कीर्केगार्द ने जहाँ ईश्वर के साथ व्यक्ति के निजी और व्याकुल संबंध की बात की, वहीं बाद के अस्तित्ववादी चिंतन में यह प्रश्न और तीखा हो गया कि यदि ईश्वर मौन है तो मनुष्य क्या करेगा। कविता में ईश्वर उपस्थित है, लेकिन उसकी उपस्थिति समाधानकारी नहीं है। वह देखता है, पर हस्तक्षेप नहीं करता। यह स्थिति स्त्री को एक कठिन लेकिन निर्णायक निष्कर्ष की ओर ले जाती है—उसे अपने अस्तित्व का अर्थ स्वयं गढ़ना होगा।
“बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को”—यहाँ ईश्वर स्वयं अपनी रचना पर पुनर्विचार करता हुआ कल्पित है। यह दृश्य अस्तित्ववादी दृष्टि से दिलचस्प है क्योंकि यह उस स्थिर और पूर्ण व्यवस्था को अस्थिर कर देता है जिसके भीतर मनुष्य को केवल आज्ञाकारी प्राणी माना जाता था। संसार अब पूर्वनिर्धारित नहीं है; उसकी संरचना पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं। अस्तित्ववाद का एक केंद्रीय आग्रह यही है कि मनुष्य को किसी अंतिम, शाश्वत और अपरिवर्तनीय व्यवस्था के भीतर बंद करके नहीं समझा जा सकता। कविता इसी अस्थिरता को स्वीकार करती है।
“कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक / ले सकें जो उसे बाहों में”—इन पंक्तियों में स्त्री का अनुभव केवल सामाजिक असंतोष नहीं है; यह उस गहरे अस्तित्वगत अकेलेपन का अनुभव भी है जो तब जन्म लेता है जब मनुष्य स्वयं को दूसरों के बीच भी ख़ारिज किया हुआ या अधूरा पाता है। सार्त्र ने ‘दूसरे’ (the Other) के प्रश्न पर विचार करते हुए दिखाया था कि मनुष्य की स्वतंत्रता और उसका आत्मबोध हमेशा दूसरे मनुष्यों के साथ संबंधों में निर्मित होता है। लेकिन यही संबंध कई बार संघर्ष और वस्तुकरण का कारण भी बन जाते हैं। कविता में स्त्री ऐसे पुरुषों की अनुपस्थिति की बात करती है जो उसे सचमुच ग्रहण कर सकें। यहाँ समस्या केवल प्रेम की नहीं, बल्कि अस्तित्व की मान्यता की है। स्त्री चाहती है कि उसे एक स्वतंत्र चेतना के रूप में स्वीकार किया जाए, न कि किसी भूमिका या वस्तु के रूप में।
कविता का मध्य भाग एक ऐसी सीमा-रेखा पर स्थित है जहाँ पुरानी पहचानें टूट रही हैं और नई संभावनाएँ जन्म ले रही हैं—“उनींदी आँखें बंद होने-होने को / खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े।” अस्तित्ववादी साहित्य में संक्रमण के ऐसे क्षण बार-बार दिखाई देते हैं। व्यक्ति न तो पूरी तरह पुराने संसार में रह पाता है और न ही नए संसार में पूरी तरह प्रवेश कर पाता है। यह एक बेचैन और अनिश्चित स्थिति होती है। काफ्का के पात्रों की तरह यहाँ भी एक दहलीज़ मौजूद है—एक ऐसा द्वार जो खुलने की संभावना से भरा है, लेकिन जिसकी ओर बढ़ना जोखिम से खाली नहीं। स्त्री की चेतना भी इसी दहलीज़ पर खड़ी दिखाई देती है।
“जिन्हें बचा रखा है अब रात ने”—अस्तित्ववादी संवेदना में रात का बिम्ब अक्सर आत्म-साक्षात्कार, एकांत और आंतरिक संवाद से जुड़ा होता है। दिन का संसार सामाजिक भूमिकाओं का संसार है; रात का संसार व्यक्ति के अपने होने का। कविता में रात स्त्री को उन सामाजिक परिभाषाओं से कुछ समय के लिए मुक्त करती है जो दिन के उजाले में उस पर आरोपित रहती हैं। यह वह क्षण है जब वह अपने भीतर उतर सकती है।
“लहराता अन्धकार मिल जाने देता है / अपने तम में एक और तम को”—इन पंक्तियों में अंधकार भय का नहीं, बल्कि अस्तित्व की गहराई का प्रतीक है। कामू ने मनुष्य की स्थिति को कई बार ऐसे संसार में रखा जहाँ अंतिम अर्थ अनुपस्थित है, लेकिन उसी अनुपस्थिति के भीतर मनुष्य को अपना अर्थ निर्मित करना होता है। कविता का अंधकार भी किसी निश्चित उत्तर का क्षेत्र नहीं है; वह संभावनाओं का क्षेत्र है। एक अंधकार का दूसरे अंधकार में मिलना उस अनुभव का संकेत है जहाँ मनुष्य अपने भीतर की जटिलताओं और अपूर्णताओं को स्वीकार करता है।
“सारी वासना को जैसे स्त्री हो”—अस्तित्ववादी दृष्टि से यह पंक्ति विशेष ध्यान की अपेक्षा रखती है। यहाँ वासना को केवल यौनिक इच्छा के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। यह उस जीवंत ऊर्जा का प्रतीक है जो मनुष्य को अपने अस्तित्व का विस्तार करने के लिए प्रेरित करती है। बोउवार ने स्त्री की स्थिति का विश्लेषण करते हुए दिखाया था कि पितृसत्तात्मक समाज ने उसे ‘दूसरा’ (Other) बनाकर उसकी सक्रियता को सीमित किया। सविता सिंह की कविता इस स्थिति को उलट देती है। यहाँ स्त्री स्वयं इच्छा की सक्रिय सत्ता है। वह किसी दूसरे की इच्छा का विषय नहीं, बल्कि अपनी इच्छा की स्वामिनी है। यह वही क्षण है जहाँ स्त्री निष्क्रियता से सक्रिय अस्तित्व में रूपांतरित होती है।
कविता के अंतिम हिस्से में चन्द्रमा का बिम्ब आता है—“चन्द्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर / सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता।” यह दृश्य उस मौन साक्षी की याद दिलाता है जो सब कुछ देखता है लेकिन हस्तक्षेप नहीं करता। अस्तित्ववादी चिंतन में ब्रह्मांड की यह उदासीनता एक महत्त्वपूर्ण अनुभव रही है। संसार हमारे लिए कोई निश्चित अर्थ लेकर उपस्थित नहीं होता; हमें स्वयं उसे अर्थ देना पड़ता है। चन्द्रमा का देखना और सोचना, लेकिन कुछ न करना, इसी उदासीनता का संकेत बन जाता है।
यहीं कविता अपने सबसे निर्णायक कथन तक पहुँचती है—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही / ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका।” अस्तित्ववादी दृष्टि से यही कविता का केंद्रीय बिंदु है। यहाँ स्त्री किसी दैवी हस्तक्षेप की प्रतीक्षा नहीं करती। वह यह स्वीकार करती है कि यदि परिवर्तन होना है, तो उसे मनुष्य को ही संभव करना होगा। यह स्वीकार एक प्रकार का अस्तित्वगत साहस है। कीर्केगार्द के यहाँ व्यक्ति को अपने चुनाव की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है; सार्त्र के यहाँ मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है; कामू के यहाँ मनुष्य अर्थहीनता के विरुद्ध विद्रोह करता है। सविता सिंह की स्त्री इन सभी संवेदनाओं के निकट पहुँचती हुई दिखाई देती है। वह किसी बाहरी शक्ति पर निर्भर नहीं रहती, बल्कि अपनी कामना को ही परिवर्तन की ऊर्जा बना लेती है।
यहाँ ‘कामना’ केवल निजी आकांक्षा नहीं है। यह अपने अस्तित्व को स्वयं गढ़ने की इच्छा है। यह उस नियति को अस्वीकार करने की शक्ति है जिसे समाज, धर्म और पितृसत्ता ने उसके लिए तय कर रखा था। अस्तित्ववाद के अनुसार स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व भी है। कविता की स्त्री जब संसार को बदलने का दायित्व अपनी कामना पर रखती है, तब वह इसी उत्तरदायित्व को स्वीकार कर रही होती है। वह अब पीड़िता भर नहीं है; वह अपने अस्तित्व की निर्माता है।
‘ईश्वर और स्त्री’ का अस्तित्ववादी पाठ यह उद्घाटित करता है कि कविता स्त्री को किसी पूर्वनिर्धारित सार, भूमिका या नियति में कैद नहीं करती। वह उसे एक ऐसे अस्तित्व के रूप में प्रस्तुत करती है जो अपने दुःख को पहचानता है, अपनी इच्छा को स्वीकार करता है, अपने अकेलेपन का सामना करता है और अंततः अपने जीवन तथा संसार के अर्थ को स्वयं निर्मित करने का निर्णय लेता है। कविता का वास्तविक नायक कोई ईश्वर नहीं, बल्कि अपनी चेतना से जागृत वह स्त्री है जो यह समझ चुकी है कि उसके अस्तित्व का सत्य किसी बाहरी व्यवस्था में नहीं, बल्कि उसकी अपनी स्वतंत्रता, उसकी कामना और उसके आत्मनिर्णय में निहित है। यही इस कविता की अस्तित्ववादी संवेदना का सबसे गहरा और दूरगामी आयाम है।
उत्तर-संरचनावादी (Post-Structuralist) और विखंडनवादी (Deconstructionist) दृष्टि से ‘ईश्वर और स्त्री’ को पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता किसी स्थिर अर्थ, किसी अंतिम सत्य या किसी निश्चित वैचारिक निष्कर्ष पर आधारित नहीं है। इसके विपरीत, कविता उन अवधारणाओं और द्वैतों को अस्थिर करती है जिन पर पारंपरिक विचार-व्यवस्थाएँ टिकी रही हैं। उत्तर-संरचनावाद का एक मूल आग्रह यह है कि अर्थ कभी स्थिर नहीं होता; वह निरंतर स्थगित, परिवर्तित और पुनर्निर्मित होता रहता है। जैक्स देरिदा ने दिखाया था कि पश्चिमी चिंतन का बड़ा हिस्सा द्वैतों (binary oppositions) पर आधारित है—जैसे आत्मा/शरीर, पुरुष/स्त्री, सत्य/असत्य, उपस्थिति/अनुपस्थिति, प्रकाश/अंधकार आदि। इन द्वैतों में एक पद को श्रेष्ठ और दूसरे को गौण माना जाता है। विखंडन का कार्य इन द्वैतों की आंतरिक संरचना को उजागर करना और यह दिखाना है कि जिन अर्थों को स्थिर माना गया था, वे वास्तव में अस्थिर और परस्पर-निर्भर हैं। ‘ईश्वर और स्त्री’ ऐसी ही कविता है जो अपने भीतर अनेक द्वंद्वों को समेटे हुए है, लेकिन उन्हें किसी सरल निष्कर्ष में नहीं बदलती। कविता का अर्थ इन्हीं द्वंद्वों की परस्पर क्रिया से निर्मित होता है।
सबसे पहले कविता के शीर्षक में उपस्थित द्वंद्व—‘ईश्वर/स्त्री’—पर ध्यान देना आवश्यक है। पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक संरचनाओं में ईश्वर को सृष्टि का केन्द्र, अर्थ का स्रोत और सर्वोच्च सत्ता माना गया है, जबकि स्त्री को अपेक्षाकृत गौण स्थिति में रखा गया। इस प्रकार ईश्वर और स्त्री के बीच एक पदानुक्रम निर्मित किया गया जिसमें ईश्वर सक्रिय, सार्वभौमिक और शक्तिशाली है, जबकि स्त्री सीमित, आश्रित और नियंत्रित। लेकिन कविता इस पदानुक्रम को धीरे-धीरे उलट देती है।
“देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को”—यहाँ ईश्वर अभी भी देखने वाली सत्ता है, लेकिन उसकी स्थिति पहले जैसी सर्वशक्तिमान नहीं रह जाती। वह साक्षी है, किंतु परिवर्तन का कारक नहीं। दूसरी ओर स्त्री, जो आरम्भ में पीड़ा की वाहक दिखाई देती है, कविता के अंत तक परिवर्तन की स्रोत-सत्ता बन जाती है। अंतिम पंक्तियों में जब कहा जाता है कि संसार अब स्त्री की कामना से बदलेगा, तब ईश्वर और स्त्री के बीच स्थापित पारंपरिक पदानुक्रम उलट जाता है। देरिदा के शब्दों में कहें तो यहाँ द्वैत का ‘प्रमुख’ पद हाशिये पर चला जाता है और ‘गौण’ पद अर्थ-निर्माण का केन्द्र बन जाता है। किंतु कविता केवल इस उलटफेर पर नहीं रुकती; वह यह भी दिखाती है कि ईश्वर की अवधारणा स्वयं स्त्री के अनुभव के बिना अर्थहीन हो जाती है। इस प्रकार दोनों पद एक-दूसरे पर निर्भर सिद्ध होते हैं।
इसी प्रकार ‘पुरुष/स्त्री’ का द्वंद्व भी कविता में विखंडित होता है। पितृसत्तात्मक संरचना में पुरुष को सक्रिय और स्त्री को निष्क्रिय माना गया है। पुरुष इच्छा का वाहक है और स्त्री इच्छा की वस्तु। लेकिन कविता इस व्यवस्था को अस्वीकार करती है। “कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक / ले सकें जो उसे बाहों में”—यहाँ पुरुष की अपूर्णता रेखांकित होती है। वह वह सत्ता नहीं रह जाता जो स्त्री को परिभाषित करती है; बल्कि स्वयं उसकी सीमाएँ उजागर होती हैं। दूसरी ओर स्त्री अपनी इच्छा और अपनी कामना के साथ उपस्थित होती है। “सारी वासना को जैसे स्त्री हो”—यह पंक्ति स्त्री को निष्क्रियता से निकालकर इच्छा की सक्रिय सत्ता में रूपांतरित कर देती है। इस प्रकार पुरुष/स्त्री का द्वैत स्थिर नहीं रहता। पुरुष सक्रिय और स्त्री निष्क्रिय होने की पारंपरिक धारणाएँ टूट जाती हैं।
कविता में ‘प्रकाश/अंधकार’ का द्वंद्व भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पश्चिमी और भारतीय दोनों परंपराओं में प्रकाश को ज्ञान, सत्य और पवित्रता का प्रतीक माना गया है, जबकि अंधकार को अज्ञान, भय और नकारात्मकता से जोड़ा गया है। लेकिन कविता इस सांस्कृतिक कोड को उलट देती है। “लहराता अन्धकार मिल जाने देता है / अपने तम में एक और तम को”—यहाँ अंधकार विभाजन नहीं, बल्कि मिलन का क्षेत्र है। वह निषेध का नहीं, स्वीकृति का प्रतीक बन जाता है। अंधकार के भीतर आत्मीयता, समावेशन और अनुभव की गहराई मौजूद है। इस प्रकार कविता उस अर्थ-व्यवस्था को विखंडित करती है जिसमें प्रकाश को स्वतः सकारात्मक और अंधकार को स्वतः नकारात्मक मान लिया जाता है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि कविता प्रकाश को नकारकर अंधकार को स्थापित नहीं करती। वह केवल यह दिखाती है कि जिन अर्थों को हम स्वाभाविक मानते हैं, वे वास्तव में सांस्कृतिक निर्माण हैं। अंधकार में भी अर्थ, अनुभव और आत्मीयता मौजूद हो सकती है। यही विखंडन का मूल कार्य है—स्थिर अर्थों की अस्थिरता को उजागर करना।
‘चेतना/नींद’ का द्वंद्व भी कविता में एक जटिल रूप में उपस्थित है। “उनींदी आँखें बंद होने-होने को / खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े”—यहाँ न तो पूरी नींद है, न पूरी जागृति। कविता एक ऐसी मध्यवर्ती स्थिति रचती है जहाँ दोनों अवस्थाएँ एक-दूसरे में प्रवेश करती हुई प्रतीत होती हैं। उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह द्वैत की सीमाओं को धुँधला कर देता है। चेतना और अचेतन, जागरण और निद्रा—ये अलग-अलग और स्थिर अवस्थाएँ नहीं रह जातीं। उनके बीच एक ऐसा क्षेत्र निर्मित होता है जहाँ अर्थ लगातार बन रहा है और बदल रहा है।
देरिदा ने ‘सीमांतता’ (liminality) और अर्थ की अनिश्चितता पर बल दिया था। कविता का यह अंश उसी प्रकार की सीमांत स्थिति का निर्माण करता है। स्त्री की चेतना किसी निश्चित अवस्था में नहीं है; वह एक प्रक्रिया में है। इसलिए यहाँ अर्थ भी प्रक्रिया है, परिणाम नहीं।
‘सत्ता/कामना’ का द्वंद्व कविता का शायद सबसे महत्त्वपूर्ण द्वंद्व है। सामान्यतः सत्ता को नियंत्रण, अनुशासन और व्यवस्था से जोड़ा जाता है, जबकि कामना को अव्यवस्था, आवेग और निजी अनुभव से। लेकिन कविता इन दोनों को एक-दूसरे के विरोधी रूप में नहीं रहने देती। ईश्वर, धर्म और पुरुष-सत्ता के माध्यम से जो नियंत्रण-तंत्र निर्मित हुआ है, उसके बरक्स स्त्री की कामना उभरती है। किंतु यह कामना केवल व्यक्तिगत इच्छा नहीं है; वह संसार को बदलने की क्षमता रखती है। अंतिम पंक्ति—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही”—कामना को एक ऐतिहासिक शक्ति में बदल देती है।
यहाँ कामना सत्ता का प्रतिपक्ष नहीं रह जाती; वह स्वयं एक नई अर्थ-व्यवस्था का केन्द्र बन जाती है। इस प्रकार सत्ता और कामना का पारंपरिक द्वैत विखंडित हो जाता है। कामना केवल अधीनस्थ अनुभव नहीं है; वह परिवर्तनकारी शक्ति है। सत्ता का स्रोत अब ऊपर नहीं, बल्कि उस हाशिये पर स्थित स्त्री में है जिसे अब तक गौण माना जाता था।
कविता में ‘उपस्थिति/अनुपस्थिति’ का द्वंद्व भी सूक्ष्म रूप से सक्रिय है। ईश्वर उपस्थित है, लेकिन अनुपस्थित भी है; वह देखता है, लेकिन हस्तक्षेप नहीं करता। पुरुष उपस्थित हैं, लेकिन ऐसे रूप में अनुपस्थित हैं कि वे स्त्री को वास्तव में ग्रहण नहीं कर पाते। दूसरी ओर स्त्री की कामना लंबे समय तक अनुपस्थित रखी गई थी, लेकिन कविता में वही सबसे अधिक उपस्थित हो उठती है। इस प्रकार जो अनुपस्थित था, वही अर्थ का केन्द्र बन जाता है। यह देरिदा की उस स्थापना की याद दिलाता है कि किसी भी पाठ का अर्थ केवल उसकी उपस्थितियों से नहीं, बल्कि उसकी अनुपस्थितियों और मौनों से भी निर्मित होता है।
कविता का एक और महत्त्वपूर्ण द्वंद्व ‘केंद्र/हाशिया’ है। पारंपरिक धार्मिक और सामाजिक संरचनाओं में ईश्वर, पुरुष और सत्ता केंद्र में रहे हैं, जबकि स्त्री, उसकी देह और उसकी कामना हाशिये पर। कविता इस व्यवस्था को उलट देती है। लेकिन यह केवल केंद्र को बदलने का कार्य नहीं करती। वह यह भी दिखाती है कि तथाकथित केंद्र वास्तव में हाशिये के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। स्त्री का अनुभव ही वह आधार है जिसके बिना ईश्वर और पुरुष-सत्ता की अवधारणाएँ अधूरी हैं। इस प्रकार केंद्र और हाशिये की सीमाएँ भी अस्थिर हो जाती हैं।
वस्तुत: ‘ईश्वर और स्त्री’ का उत्तर-संरचनावादी और विखंडनवादी पाठ यह उद्घाटित करता है कि कविता किसी स्थिर सत्य की स्थापना नहीं करती, बल्कि उन अर्थ-संरचनाओं को अस्थिर करती है जिन पर पितृसत्तात्मक, धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाएँ आधारित रही हैं। ईश्वर/स्त्री, पुरुष/स्त्री, प्रकाश/अंधकार, चेतना/नींद, सत्ता/कामना, उपस्थिति/अनुपस्थिति तथा केंद्र/हाशिया जैसे द्वंद्व कविता में उपस्थित अवश्य हैं, किंतु वे अपनी पारंपरिक अर्थ-संरचनाओं में नहीं टिक पाते। कविता उन्हें उलटती है, परस्पर निर्भर सिद्ध करती है और उनके भीतर छिपी हुई अस्थिरताओं को उजागर करती है। यही कारण है कि कविता का अर्थ किसी एक निष्कर्ष में बंद नहीं होता; वह लगातार खुलता, फैलता और नए अर्थ-संकेतों की ओर बढ़ता रहता है। यही इसकी उत्तर-संरचनावादी और विखंडनवादी शक्ति है।
मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से इस रचना का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता केवल सामाजिक यथार्थ या स्त्रीवादी प्रतिरोध का आख्यान नहीं है, बल्कि वह स्त्री के भीतरी मानस, उसकी दबी हुई इच्छाओं, उसके अवचेतन, उसकी कामना और उसकी आत्म-अभिव्यक्ति की जटिल प्रक्रिया को भी रूपायित करती है। कविता का बड़ा हिस्सा ऐसे बिम्बों और सांकेतिक संरचनाओं से निर्मित है जो प्रत्यक्ष सामाजिक यथार्थ से अधिक मनुष्य के आंतरिक जगत की ओर संकेत करते हैं। ‘जागी हुई देह’, ‘उनींदी आँखें’, ‘रात’, ‘अंधकार’, ‘दरवाज़े’, ‘वासना’ और ‘चन्द्रमा’ जैसे बिम्ब मनोविश्लेषणात्मक पाठ के लिए विशेष रूप से उपजाऊ सिद्ध होते हैं।
मनोविश्लेषण की शुरुआत फ्रायड के उस विचार से होती है कि मनुष्य का व्यक्तित्व केवल उसकी चेतन इच्छाओं और विचारों से निर्मित नहीं होता। उसके भीतर एक विशाल अवचेतन क्षेत्र भी होता है जिसमें दमित इच्छाएँ, निषिद्ध आकांक्षाएँ, भूली हुई स्मृतियाँ और अस्वीकार किए गए अनुभव सक्रिय रहते हैं। सभ्यता और सामाजिक नैतिकता मनुष्य की अनेक इच्छाओं को प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति नहीं करने देतीं; परिणामस्वरूप वे अवचेतन में दब जाती हैं और स्वप्न, कल्पना, प्रतीक या कला के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करती हैं। स्त्री के संदर्भ में यह प्रश्न और अधिक जटिल हो जाता है, क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज ने उसकी इच्छाओं को केवल नियंत्रित ही नहीं किया, बल्कि उन्हें बोलने की भाषा से भी वंचित किया है। इस दृष्टि से सविता सिंह की कविता को स्त्री-अवचेतन की अभिव्यक्ति के रूप में पढ़ा जा सकता है।
कविता की आरंभिक पंक्ति—“जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण”—मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से केवल देह-जागरण का दृश्य नहीं है। यह उस क्षण का संकेत है जब दबा हुआ आत्मबोध चेतना के स्तर पर उभरना आरम्भ करता है। फ्रायड के अनुसार दमित इच्छाएँ पूरी तरह नष्ट नहीं होतीं; वे लगातार वापसी का प्रयास करती रहती हैं। ‘जागी हुई देह’ को इसी वापसी के संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है। यह वह देह है जो अब केवल सामाजिक अनुशासन का विषय नहीं रह गई, बल्कि अपने भीतर दबे अनुभवों और इच्छाओं के प्रति सजग होने लगी है। ‘दर्पण’ का बिम्ब भी यहाँ महत्त्वपूर्ण है। यह आत्म-दर्शन और आत्म-पहचान का संकेत देता है। स्त्री पहली बार स्वयं को अपनी दृष्टि से देख रही है।
“देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को”—इस पंक्ति में ‘हाहाकार’ को केवल सामाजिक पीड़ा तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। मनोविश्लेषणात्मक अर्थ में यह उस लंबे दमन का परिणाम भी है जिसके भीतर स्त्री की इच्छाएँ कैद रही हैं। फ्रायड का मानना था कि दमित इच्छा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती; वह किसी न किसी रूप में लौटती है। कविता का ‘हाहाकार’ इसी दबी हुई ऊर्जा का ध्वन्यात्मक रूप प्रतीत होता है। यह केवल दुःख नहीं है, बल्कि लंबे समय तक दबाए गए आत्म-अनुभव की तीव्र अभिव्यक्ति भी है।
“बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को”—यहाँ ‘कल्पना’ शब्द विशेष ध्यान की माँग करता है। मनोविश्लेषण में कल्पना (fantasy) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कल्पना केवल यथार्थ से पलायन नहीं होती; वह उन इच्छाओं की सांकेतिक अभिव्यक्ति भी होती है जिन्हें प्रत्यक्ष रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता। कविता में ईश्वर का अपनी ही कल्पना को बदलने के लिए उत्सुक होना इस बात का संकेत है कि वर्तमान व्यवस्था स्त्री की आंतरिक आकांक्षाओं को संतुष्ट नहीं कर पाई। इसलिए अवचेतन एक वैकल्पिक संरचना की कल्पना करने लगता है।
“कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक / ले सकें जो उसे बाहों में”—इन पंक्तियों को मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि यहाँ स्त्री की इच्छा केवल शारीरिक निकटता की इच्छा नहीं है। यह उस स्वीकृति और पहचान की आकांक्षा है जिसकी अनुपस्थिति उसके मानस में एक रिक्तता छोड़ गई है। लाकाँ के चिंतन में मनुष्य की इच्छा केवल किसी वस्तु को पाने की इच्छा नहीं होती; वह मान्यता (recognition) की इच्छा भी होती है। स्त्री की आकांक्षा भी इसी प्रकार की है। वह ऐसे संबंध की खोज में है जहाँ उसका अस्तित्व देखा और स्वीकार किया जाए।
कविता का मध्य भाग मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से सबसे अधिक अर्थपूर्ण है। “उनींदी आँखें बंद होने-होने को / खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े”—यह दृश्य चेतन और अवचेतन के बीच स्थित एक सीमांत क्षेत्र का निर्माण करता है। फ्रायड ने स्वप्न को अवचेतन तक पहुँचने का राजमार्ग कहा था। नींद और जागरण के बीच की अवस्था वही क्षेत्र है जहाँ अवचेतन की सामग्री चेतना के निकट आने लगती है। कविता की ‘उनींदी आँखें’ इसी मध्यवर्ती स्थिति का प्रतीक हैं। वे पूरी तरह बंद भी नहीं हैं और पूरी तरह खुली भी नहीं। यह वह क्षण है जहाँ दबी हुई इच्छाएँ सतह पर आने के लिए तैयार हैं।
‘दरवाज़ों’ का बिम्ब मनोविश्लेषणात्मक पाठ में और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। दरवाज़े अक्सर मन के बंद कक्षों, निषिद्ध क्षेत्रों या दबे हुए अनुभवों के प्रतीक के रूप में पढ़े जाते हैं। कविता में वे खुलने की तैयारी में हैं। इसका अर्थ है कि जो अनुभव अब तक अवचेतन में बंद थे, वे अब अभिव्यक्ति की ओर बढ़ रहे हैं।
“जिन्हें बचा रखा है अब रात ने”—रात मनोविश्लेषणात्मक साहित्य में अवचेतन का एक पारंपरिक प्रतीक रही है। दिन सामाजिक अनुशासन और चेतन नियंत्रण का क्षेत्र है, जबकि रात वह समय है जब दबी हुई इच्छाएँ अपेक्षाकृत स्वतंत्र हो जाती हैं। कविता में रात किसी भयावह शक्ति की तरह नहीं आती; वह संरक्षण देती है। वह उन अनुभवों को बचाकर रखती है जिन्हें सामाजिक व्यवस्था ने दबा दिया था। इस प्रकार रात स्त्री-अवचेतन की संरक्षिका बन जाती है।
“लहराता अन्धकार मिल जाने देता है / अपने तम में एक और तम को”—अंधकार का यह बिम्ब मनोविश्लेषणात्मक अर्थों में अवचेतन की गहराइयों की ओर संकेत करता है। अंधकार यहाँ अज्ञान या भय का प्रतीक नहीं है। वह वह क्षेत्र है जहाँ चेतना के दमनकारी नियंत्रण शिथिल पड़ जाते हैं। एक अंधकार का दूसरे अंधकार में मिलना अवचेतन की उन परतों की ओर संकेत करता है जहाँ विभाजन और सामाजिक वर्गीकरण अपना महत्त्व खो देते हैं। यह आत्म के भीतर दबे हुए हिस्सों के पुनर्मिलन का दृश्य भी हो सकता है।
कविता की सबसे अर्थगर्भित पंक्तियों में से एक है—“सारी वासना को जैसे स्त्री हो।” फ्रायडीय दृष्टि से देखें तो वासना (libidinal energy) मनुष्य के मानसिक जीवन की मूल प्रेरक शक्ति है। सभ्यता इस ऊर्जा को नियंत्रित और रूपांतरित करती है। लेकिन स्त्री के संदर्भ में यह नियंत्रण दोहरा रहा है—एक ओर सामान्य सामाजिक अनुशासन, दूसरी ओर पितृसत्तात्मक नियंत्रण। कविता इस दमित ऊर्जा को पुनः प्रतिष्ठित करती है। यहाँ वासना किसी विकृति या नैतिक दोष का संकेत नहीं है। वह स्त्री के अस्तित्व की मूल जीवन-शक्ति बन जाती है।
लाकाँ के संदर्भ में यह पंक्ति और भी दिलचस्प हो जाती है। लाकाँ के अनुसार इच्छा को पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं होता क्योंकि भाषा स्वयं अपूर्ण है। इच्छा हमेशा कुछ ऐसी होती है जो पूरी तरह पकड़ी नहीं जा सकती। कविता में भी ‘वासना’ किसी निश्चित वस्तु की ओर निर्देशित नहीं है। वह एक व्यापक और तरल ऊर्जा है। स्त्री स्वयं उस ऊर्जा का रूपक बन जाती है। इस प्रकार कविता स्त्री की इच्छा को किसी विशेष लक्ष्य में सीमित नहीं करती; वह उसे अस्तित्वगत आकांक्षा के रूप में प्रस्तुत करती है।
कविता का अंतिम खंड मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से दमन से अभिव्यक्ति की यात्रा का समापन-बिंदु है। “चन्द्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर / सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता”—चन्द्रमा यहाँ उस साक्षी की तरह उपस्थित है जो अवचेतन की गतिविधियों को देखता है। वह प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन उसकी उपस्थिति आत्म-निरीक्षण का वातावरण निर्मित करती है।
अंततः कविता कहती है—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही / ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका।” मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से यह दबी हुई इच्छा के पूर्ण पुनरागमन का क्षण है। जो इच्छा अब तक निषिद्ध थी, वही अब परिवर्तन की शक्ति बन जाती है। यह केवल इच्छा की अभिव्यक्ति नहीं है; यह उसकी वैधता की घोषणा भी है। स्त्री का अवचेतन अब मौन नहीं है। उसे भाषा मिल गई है, स्वर मिल गया है और ऐतिहासिक भूमिका भी मिल गई है।
विशेष रूप से स्त्रीवादी मनोविश्लेषण के संदर्भ में यह कविता महत्त्वपूर्ण हो जाती है। लूस इरिगारे, जूलिया क्रिस्तेवा और हेलेन सिक्सू जैसी चिंतकों ने बार-बार यह प्रश्न उठाया कि स्त्री की इच्छा को व्यक्त करने वाली भाषा कहाँ है। पितृसत्तात्मक भाषा-संरचनाओं में स्त्री-अनुभव अक्सर विकृत या मौन कर दिया जाता है। सविता सिंह की कविता इसी मौन को तोड़ती है। वह स्त्री की इच्छा को बोलने का अवसर देती है और उसके लिए एक वैध काव्य-भाषा का निर्माण करती है।
मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से ‘ईश्वर और स्त्री’ दबी हुई स्त्री-कामना, अवचेतन की ऊर्जा, आत्म-पहचान की आकांक्षा और निषिद्ध अनुभवों की वापसी की कविता है। इसके बिम्ब—उनींदी आँखें, रात, अंधकार, बंद दरवाज़े और वासना—मिलकर स्त्री के उस भीतरी संसार को उद्घाटित करते हैं जिसे सामाजिक और धार्मिक संरचनाओं ने लंबे समय तक दबाए रखा था। कविता का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वह स्त्री-अवचेतन को केवल पीड़ा का स्थल नहीं मानती, बल्कि उसे सृजनात्मक शक्ति और आत्म-अभिव्यक्ति के स्रोत के रूप में प्रस्तुत करती है। इस प्रकार कविता मनोविश्लेषणात्मक स्तर पर स्त्री की दमित इच्छाओं के पुनर्जागरण और उनकी वैध अभिव्यक्ति का काव्यात्मक आख्यान बन जाती है।
सत्ता-विमर्श (Power Discourse) की दृष्टि से ‘ईश्वर और स्त्री’ कविता का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता का मूल तनाव केवल स्त्री और पुरुष के बीच नहीं है, बल्कि उन व्यापक सत्ता-संरचनाओं के साथ भी है जो स्त्री के अस्तित्व, उसकी देह, उसकी कामना और उसकी आत्म-अभिव्यक्ति को नियंत्रित करती रही हैं। कविता स्त्री की पीड़ा को किसी व्यक्तिगत या मनोवैज्ञानिक समस्या के रूप में नहीं प्रस्तुत करती; वह उसके पीछे सक्रिय उन सांस्कृतिक, धार्मिक और वैचारिक व्यवस्थाओं की ओर संकेत करती है जिन्होंने स्त्री को ऐतिहासिक रूप से अधीनस्थ स्थिति में रखा है। इस प्रकार कविता सत्ता के दृश्य और अदृश्य दोनों रूपों का अनावरण करती है।
मिशेल फूको ने सत्ता को केवल राज्य, कानून या राजनीतिक संस्थाओं तक सीमित नहीं माना। उनके अनुसार सत्ता समाज के सूक्ष्मतम स्तरों तक फैली होती है। वह भाषा, ज्ञान, शिक्षा, धर्म, चिकित्सा, नैतिकता, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक व्यवहारों के माध्यम से कार्य करती है। सत्ता केवल दमन नहीं करती; वह यह भी तय करती है कि क्या सत्य माना जाएगा, कौन-सा व्यवहार सामान्य होगा और किस प्रकार का जीवन आदर्श समझा जाएगा। इस अर्थ में सत्ता मनुष्य के शरीर, उसकी इच्छाओं और उसकी आत्म-धारणा तक को निर्मित करती है। स्त्रीवादी आलोचना ने फूको की इस अवधारणा का उपयोग यह दिखाने के लिए किया कि स्त्री का दमन केवल पुरुषों के व्यक्तिगत व्यवहार का परिणाम नहीं है; उसके पीछे एक जटिल सत्ता-तंत्र कार्यरत है।
‘ईश्वर और स्त्री’ इसी सत्ता-तंत्र को उजागर करती है। कविता की शुरुआत में ही “जागी हुई देह” का बिम्ब आता है। सत्ता-विमर्श की दृष्टि से यह जागरण केवल आत्मबोध का नहीं, बल्कि सत्ता-संबंधों के प्रति चेतना का भी संकेत है। फूको के अनुसार सत्ता का सबसे प्रभावी रूप वह है जो स्वयं को स्वाभाविक और अदृश्य बना लेता है। स्त्री जब अपनी देह के प्रति जागरूक होती है, तब वह उन नियंत्रणों को भी पहचानने लगती है जो उसकी देह पर स्थापित किए गए हैं। इसलिए ‘जागी हुई देह’ एक राजनीतिक बिम्ब बन जाती है। यह वह देह है जिसने अपने ऊपर कार्यरत सत्ता को पहचानना शुरू कर दिया है।
“देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को”—यह पंक्ति धार्मिक सत्ता के प्रश्न को सामने लाती है। फूको ने यद्यपि धर्म पर प्रत्यक्ष रूप से कम लिखा, लेकिन उनकी सत्ता की अवधारणा धार्मिक संस्थाओं को समझने में भी उपयोगी है। धर्म केवल आस्था का क्षेत्र नहीं है; वह नैतिक अनुशासन और सामाजिक नियंत्रण का भी माध्यम रहा है। स्त्री के लिए क्या उचित है, क्या अनुचित; उसे कैसे रहना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, किस प्रकार व्यवहार करना चाहिए—इन प्रश्नों पर धार्मिक परंपराओं ने गहरा प्रभाव डाला है। कविता में स्त्री का ‘हाहाकार’ केवल पुरुष-प्रधान समाज के कारण नहीं है; उसके पीछे वे धार्मिक संरचनाएँ भी हैं जिन्होंने स्त्री के अनुभव को गौण बना दिया।
ईश्वर का ‘देखना’ और कुछ न करना भी सत्ता की एक विशेष संरचना को उद्घाटित करता है। सत्ता अक्सर स्वयं को नैतिक वैधता के स्रोत के रूप में प्रस्तुत करती है, लेकिन जब पीड़ितों की वास्तविक स्थिति सामने आती है, तब उसकी निष्क्रियता उजागर हो जाती है। कविता में ईश्वर की यह स्थिति धार्मिक सत्ता की सीमाओं को रेखांकित करती है।
“बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को / कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक / ले सकें जो उसे बाहों में”—इन पंक्तियों में सत्ता का एक और स्तर खुलता है। यहाँ समस्या केवल व्यक्तिगत पुरुषों की नहीं है। यदि पुरुष भी उसी सृष्टि-व्यवस्था का हिस्सा हैं, तो उनकी असफलता एक व्यापक संरचनात्मक समस्या की ओर संकेत करती है। फूको के अनुसार सत्ता व्यक्ति के बाहर नहीं होती; वह व्यक्तियों के माध्यम से कार्य करती है। पुरुष भी सत्ता-संरचनाओं के वाहक बन जाते हैं। वे केवल जैविक अर्थों में पुरुष नहीं रहते; वे उन सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक मान्यताओं के प्रतिनिधि बन जाते हैं जिनके माध्यम से स्त्री को नियंत्रित किया जाता है। कविता इस बात को पहचानती है कि स्त्री की समस्या केवल किसी एक पुरुष से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से है जो पुरुषों को विशेषाधिकार और स्त्रियों को अधीनता प्रदान करती है।
कविता का मध्य भाग सत्ता और नियंत्रण की सूक्ष्म प्रक्रियाओं को और गहराई से समझने का अवसर देता है। “उनींदी आँखें बंद होने-होने को / खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े”—यहाँ ‘दरवाज़े’ केवल संभावनाओं के प्रतीक नहीं हैं; वे निषेध और नियंत्रण के प्रतीक भी हैं। सत्ता हमेशा कुछ क्षेत्रों को खोलती है और कुछ को बंद रखती है। स्त्री के लिए कौन-से अनुभव वैध होंगे और कौन-से निषिद्ध—यह निर्धारण भी सत्ता ही करती है। कविता में ये दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं हैं; वे खुलने की तैयारी में हैं। इसका अर्थ है कि स्त्री-चेतना उन सीमाओं को पहचान रही है जिन्हें उसके चारों ओर निर्मित किया गया था।
“जिन्हें बचा रखा है अब रात ने”—रात यहाँ सत्ता से आंशिक मुक्ति का क्षेत्र बन जाती है। दिन का संसार सामाजिक निगरानी का संसार है, जहाँ व्यक्ति लगातार सामाजिक मानदंडों के अधीन रहता है। रात उस निगरानी को कुछ हद तक शिथिल कर देती है। इसीलिए कविता में रात एक वैकल्पिक क्षेत्र का निर्माण करती है जहाँ स्त्री अपने अनुभवों और इच्छाओं के साथ अधिक स्वतंत्र रूप से उपस्थित हो सकती है।
“लहराता अन्धकार मिल जाने देता है / अपने तम में एक और तम को”—इन पंक्तियों को फूको की सत्ता-प्रतिरोध संबंधी अवधारणा के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। फूको का मानना था कि जहाँ सत्ता होती है, वहीं प्रतिरोध की संभावनाएँ भी मौजूद होती हैं। अंधकार यहाँ सत्ता द्वारा नियंत्रित दृश्यता के बाहर का क्षेत्र है। यह वह स्थान है जहाँ वैकल्पिक अनुभव और संबंध विकसित हो सकते हैं। अंधकार इस अर्थ में प्रतिरोध का सांकेतिक क्षेत्र बन जाता है।
कविता की सबसे निर्णायक पंक्ति—“सारी वासना को जैसे स्त्री हो”—सत्ता-विमर्श की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखती है। सत्ता का एक प्रमुख कार्य इच्छाओं का नियमन करना है। कौन-सी इच्छा स्वीकार्य है और कौन-सी नहीं, इसका निर्णय सामाजिक संस्थाएँ करती हैं। स्त्री की कामना को लंबे समय तक नियंत्रित, दबाया और नैतिकता के नाम पर अनुशासित किया गया। स्त्री से अपेक्षा की गई कि वह इच्छा की वस्तु बने, इच्छा की स्वामी नहीं। कविता इस व्यवस्था को उलट देती है। यहाँ स्त्री स्वयं वासना का रूपक बन जाती है। इसका अर्थ यह है कि वह अपनी इच्छा पर अपना अधिकार स्थापित कर रही है।
यहाँ कामना केवल निजी अनुभूति नहीं रह जाती; वह सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का माध्यम बन जाती है। स्त्री अपनी इच्छा को व्यक्त करके उस पूरी व्यवस्था को चुनौती देती है जिसने उसकी इच्छाओं को मौन बनाए रखा था। इस प्रकार कामना एक राजनीतिक क्रिया का रूप ग्रहण कर लेती है।
कविता के अंतिम हिस्से में सत्ता-संबंधों का सबसे बड़ा पुनर्गठन दिखाई देता है। “चन्द्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर / सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता”—यहाँ चन्द्रमा और ईश्वर दोनों साक्षी की स्थिति में हैं। वे उपस्थित तो हैं, लेकिन परिवर्तन के सक्रिय स्रोत नहीं हैं। पारंपरिक सत्ता-संरचनाओं में परिवर्तन का अधिकार ईश्वर, राजा, धर्म या पुरुष-नायक जैसी संस्थाओं के पास होता था। कविता इस पूरी व्यवस्था को उलट देती है।
“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही / ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका”—यह कथन सत्ता-विमर्श की दृष्टि से कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष है। यहाँ सत्ता का केंद्र बदल जाता है। अब परिवर्तन ऊपर से नहीं आएगा; वह उस सत्ता से आएगा जिसे अब तक हाशिये पर रखा गया था। स्त्री की कामना, जिसे नियंत्रित और दमनित किया गया था, अब इतिहास-निर्माण की शक्ति बन जाती है।
फूको के अनुसार सत्ता कभी एक जगह स्थिर नहीं रहती; वह निरंतर पुनर्वितरित होती रहती है। कविता इसी पुनर्वितरण की कल्पना करती है। स्त्री केवल सत्ता का विरोध नहीं करती; वह अर्थ और परिवर्तन का नया केंद्र भी निर्मित करती है। यह सत्ता पर अधिकार स्थापित करने का पारंपरिक रूप नहीं है, बल्कि सत्ता की संरचना को ही बदल देने का प्रयास है।
कविता का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह प्रतिरोध को हिंसात्मक या प्रतिशोधात्मक रूप में नहीं प्रस्तुत करती। स्त्री की शक्ति उसकी कामना, उसकी चेतना और उसके आत्मबोध में निहित है। वह उसी क्षेत्र को प्रतिरोध का माध्यम बनाती है जिसे सत्ता ने सबसे अधिक नियंत्रित किया था। इस प्रकार कविता यह दिखाती है कि प्रतिरोध हमेशा बाहरी संघर्ष के रूप में नहीं होता; वह आत्म-अभिव्यक्ति, आत्म-स्वीकृति और अपनी इच्छा की वैधता की घोषणा के रूप में भी सामने आ सकता है।
वस्तुत: सत्ता-विमर्श की दृष्टि से ‘ईश्वर और स्त्री’ एक ऐसी कविता है जो धार्मिक, सांस्कृतिक और लैंगिक सत्ता-संरचनाओं के अंतर्संबंधों को उजागर करती है। कविता यह दिखाती है कि स्त्री का दमन केवल पुरुषों के व्यवहार का परिणाम नहीं, बल्कि एक व्यापक ज्ञान-सत्ता-नैतिकता तंत्र का परिणाम है। साथ ही, वह यह भी दिखाती है कि प्रतिरोध की सबसे प्रभावशाली संभावना स्त्री की अपनी चेतना और उसकी कामना में निहित है। कविता के अंत तक स्त्री सत्ता की अधीनस्थ विषय-वस्तु नहीं रहती; वह अर्थ, परिवर्तन और इतिहास की सक्रिय निर्माता के रूप में उभरती है। यही इसकी सत्ता-विमर्श संबंधी सबसे बड़ी वैचारिक उपलब्धि है।
उत्तर-आधुनिक दृष्टि से ‘ईश्वर और स्त्री’ कविता का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता केवल स्त्री-अनुभव को अभिव्यक्त करने वाली रचना नहीं है, बल्कि वह उन वैचारिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संरचनाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है जिन्हें लंबे समय तक अंतिम सत्य, सार्वभौमिक मूल्य और निर्विवाद सत्ता के रूप में स्वीकार किया जाता रहा। उत्तर-आधुनिक चिंतन का एक प्रमुख आग्रह यह है कि संसार को किसी एक केंद्रीय सत्य, किसी एक महावृत्तांत (Grand Narrative) या किसी एक सर्वमान्य दृष्टिकोण के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। सत्य, पहचान, इतिहास और अनुभव बहुल, खंडित और संदर्भ-निर्भर होते हैं। सविता सिंह की कविता इसी प्रकार की संवेदना के साथ संवाद करती हुई दिखाई देती है।
ज्याँ-फ़्राँस्वा ल्योतार ने उत्तर-आधुनिकता की सबसे चर्चित परिभाषा देते हुए कहा था कि उत्तर-आधुनिक स्थिति की पहचान “महावृत्तांतों के प्रति अविश्वास” (incredulity toward meta-narratives) है। महावृत्तांत वे व्यापक वैचारिक संरचनाएँ हैं जो यह दावा करती हैं कि उनके पास संसार, इतिहास और मनुष्य के जीवन का अंतिम और सार्वभौमिक सत्य मौजूद है। धर्म, ईश्वर, राष्ट्र, प्रगति, तर्क या इतिहास की कुछ विशिष्ट अवधारणाएँ ऐसे महावृत्तांतों के उदाहरण हैं। ‘ईश्वर और स्त्री’ में ईश्वर की अवधारणा को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। कविता ईश्वर का प्रत्यक्ष निषेध नहीं करती, लेकिन उसकी सार्वभौमिकता और उसकी केंद्रीयता पर प्रश्न उठाती है।
“देखता होगा ईश्वर भी स्त्री के हाहाकार को”—यह पंक्ति उत्तर-आधुनिक दृष्टि से विशेष अर्थ ग्रहण करती है। पारंपरिक धार्मिक आख्यानों में ईश्वर सत्य, न्याय और व्यवस्था का अंतिम स्रोत होता है। लेकिन यहाँ ईश्वर स्त्री के दुःख को देख रहा है, फिर भी स्त्री की स्थिति में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं हुआ। इससे ईश्वर की सर्वशक्तिमान और सर्वन्यायी छवि में दरार पड़ती है। उत्तर-आधुनिक चिंतन ऐसे ही क्षणों की खोज करता है जहाँ कोई महान और सर्वमान्य संरचना अपनी वैधता खोने लगती है। कविता में ईश्वर अब निर्विवाद केंद्र नहीं रह जाता; वह प्रश्नों के घेरे में आ जाता है।
कविता की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह इतिहास और समाज को ईश्वर की दृष्टि से नहीं, बल्कि स्त्री की दृष्टि से देखने का आग्रह करती है। उत्तर-आधुनिक विमर्श में हाशिये की आवाज़ों को विशेष महत्त्व दिया गया है। स्त्रियाँ, दलित, आदिवासी, उपनिवेशित समुदाय, लैंगिक अल्पसंख्यक—ये सभी वे समूह हैं जिन्हें लंबे समय तक मुख्यधारा के इतिहास और ज्ञान-व्यवस्थाओं में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। उत्तर-आधुनिकता इन हाशियागत अनुभवों को वैधता प्रदान करती है। सविता सिंह की कविता भी यही करती है। यहाँ कथा का केंद्र ईश्वर नहीं, स्त्री है; सत्ता नहीं, अनुभव है; व्यवस्था नहीं, पीड़ा और कामना है।
“बदलने के लिए होगा उत्सुक अपनी ही कल्पना को / कि बनाये नहीं उसने वे पुरुष अब तक / ले सकें जो उसे बाहों में”—इन पंक्तियों में कविता एक स्थापित संरचना के भीतर मौजूद दरारों को उजागर करती है। यदि ईश्वर की सृष्टि पूर्ण है, तो फिर स्त्री की यह स्थिति क्यों है? यदि पुरुष और स्त्री के संबंध प्राकृतिक और आदर्श हैं, तो फिर उनमें यह असमानता क्यों है? उत्तर-आधुनिक दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह किसी भी स्थापित सत्य को स्वाभाविक या अपरिवर्तनीय मानने से इंकार करती है। कविता भी इसी प्रकार की संशयात्मक दृष्टि अपनाती है। वह सृष्टि, संबंध और सामाजिक व्यवस्था की स्वीकृत अवधारणाओं को पुनर्विचार के लिए प्रस्तुत करती है।
उत्तर-आधुनिक चिंतन का एक अन्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व है—केन्द्र का विघटन (decentring)। पश्चिमी चिंतन में लंबे समय तक कुछ अवधारणाओं को केंद्र में रखा गया: ईश्वर, पुरुष, तर्क, सत्य, राष्ट्र, इतिहास आदि। उत्तर-आधुनिकता इन केंद्रों को अस्थिर करती है और यह दिखाती है कि वे स्वाभाविक नहीं, बल्कि निर्मित संरचनाएँ हैं। ‘ईश्वर और स्त्री’ में यही प्रक्रिया दिखाई देती है। कविता के आरंभ में ईश्वर एक बड़ी सत्ता की तरह उपस्थित है, लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते उसका केंद्र टूट जाता है।
“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही / ईश्वर की नहीं इसमें अब कोई भूमिका”—यहाँ सत्ता का एक महत्त्वपूर्ण विकेन्द्रीकरण घटित होता है। परिवर्तन का स्रोत अब कोई दैवी सत्ता नहीं है। इतिहास का केंद्र अब ईश्वर नहीं, स्त्री की कामना है। यह उत्तर-आधुनिकता की उस प्रवृत्ति से जुड़ता है जिसमें हाशिये को केंद्र में लाया जाता है और केंद्र को प्रश्नांकित किया जाता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि कविता स्त्री को नया सर्वशक्तिमान केंद्र भी नहीं बनाती। वह केवल यह कहती है कि अब तक उपेक्षित और मौन रखी गई स्त्री-कामना को इतिहास-निर्माण की शक्ति के रूप में पहचाना जाना चाहिए। इस प्रकार कविता किसी एक सत्ता को हटाकर दूसरी सत्ता स्थापित नहीं करती, बल्कि अर्थ और शक्ति के स्रोतों का पुनर्वितरण करती है।
कविता की संरचना में भी उत्तर-आधुनिक संवेदना दिखाई देती है। इसमें कोई एक अंतिम अर्थ नहीं है। ‘दर्पण’, ‘रात’, ‘अंधकार’, ‘दरवाज़े’ और ‘चन्द्रमा’ जैसे बिम्ब बहुव्यंजक हैं। वे किसी एक अर्थ में स्थिर नहीं होते। उदाहरण के लिए अंधकार को सामान्यतः नकारात्मक माना जाता है, लेकिन कविता में वही अंधकार आत्मीयता और मिलन का क्षेत्र बन जाता है। ‘रात’ भय का नहीं, संरक्षण का प्रतीक बन जाती है। उत्तर-आधुनिक पाठ में अर्थ की यही बहुलता महत्त्वपूर्ण होती है। कोई भी प्रतीक एक निश्चित अर्थ तक सीमित नहीं रहता।
“उनींदी आँखें बंद होने-होने को / खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े”—यहाँ भी एक प्रकार की अनिश्चितता और मध्यवर्ती स्थिति उपस्थित है। उत्तर-आधुनिकता स्पष्ट सीमाओं और स्थिर श्रेणियों पर संदेह करती है। कविता की यह स्थिति न पूरी तरह बंद है, न पूरी तरह खुली; न पूर्ण अंधकार है, न पूर्ण प्रकाश। यह ‘बीच की अवस्था’ (in-betweenness) उत्तर-आधुनिक अनुभव का महत्त्वपूर्ण आयाम है। अर्थ किसी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुँचता; वह संभावनाओं के रूप में खुला रहता है।
उत्तर-आधुनिक दृष्टि से कविता का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह सार्वभौमिक स्त्री-अनुभव का दावा नहीं करती। कविता की स्त्री कोई अमूर्त और आदर्शीकृत सत्ता नहीं है। वह एक विशिष्ट अनुभव-क्षेत्र से बोलती है—देह, कामना, पीड़ा और आत्म-अभिव्यक्ति के क्षेत्र से। इस प्रकार कविता अनुभव की स्थानीयता और विशिष्टता को महत्त्व देती है। यह उत्तर-आधुनिक आग्रह के अनुरूप है, क्योंकि उत्तर-आधुनिकता किसी एक सार्वभौमिक मानवीय अनुभव की अवधारणा पर प्रश्न उठाती है।
कुल मिलाकर उत्तर-आधुनिक दृष्टि से ‘ईश्वर और स्त्री’ एक ऐसी कविता है जो महावृत्तांतों पर प्रश्न उठाती है, ईश्वर जैसी केंद्रीय सत्ता को विकेन्द्रित करती है, हाशिये की स्त्री-आवाज़ को केंद्र में लाती है, अर्थ की बहुलता को स्वीकार करती है और किसी एक अंतिम सत्य की स्थापना से बचती है। कविता यह नहीं कहती कि अब एक नया सार्वभौमिक सत्य मिल गया है; बल्कि वह यह दिखाती है कि सत्य और अर्थ उन अनुभवों में भी निहित हैं जिन्हें लंबे समय तक उपेक्षित रखा गया। इसी कारण यह कविता उत्तर-आधुनिक संवेदना की उस मूल आकांक्षा को मूर्त रूप देती है जिसमें सत्ता का केंद्रीकरण टूटता है, हाशिये बोलने लगते हैं और अर्थ एकवचन से बहुवचन में रूपांतरित हो जाता है।
‘ईश्वर और स्त्री’ कविता का शिल्प-सौन्दर्य उसकी वैचारिक प्रखरता जितना ही आकर्षक और विचारोत्तेजक है। यह कविता पहली नज़र में सरल, संक्षिप्त और सहज प्रतीत होती है, किन्तु उसके भीतर अर्थ-संरचनाओं, प्रतीकों, बिम्बों और सांकेतिक संकेतों की ऐसी बहुलता मौजूद है जो उसे बहुपरतीय बनाती है। कविता का प्रभाव किसी अलंकारिक वैभव या जटिल भाषिक विन्यास से नहीं उत्पन्न होता, बल्कि एक संयमित, मितव्ययी और संकेतधर्मी भाषा से निर्मित होता है। यही कारण है कि कविता को बार-बार पढ़ने पर उसके नए अर्थ-स्तर खुलते जाते हैं।
कविता की सबसे पहली शिल्पगत विशेषता उसका कथन-विन्यास है। कविता में कोई कथात्मक विस्तार नहीं है, न कोई घटना-क्रम और न ही कोई नाटकीय प्रसंग। इसके बावजूद कविता के भीतर एक आंतरिक गति मौजूद है। यह गति विचार और अनुभूति के क्रमिक विस्तार से निर्मित होती है। कविता ‘जागी हुई देह’ से आरम्भ होकर ‘स्त्री की कामना’ तक पहुँचती है। इस पूरी यात्रा में भाषा किसी तर्कशास्त्रीय विमर्श की तरह नहीं चलती, बल्कि बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से अर्थ का प्रसार करती है। इस दृष्टि से कविता आधुनिक हिन्दी कविता की उस प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें प्रत्यक्ष कथन और सांकेतिक अभिव्यक्ति एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
कविता का आरम्भिक बिम्ब—“जागी हुई देह और आसमान एक दर्पण”—शिल्प की दृष्टि से विशेष ध्यान आकर्षित करता है। सामान्यतः दर्पण किसी वस्तु का प्रतिबिम्ब दिखाता है, लेकिन यहाँ ‘जागी हुई देह’ और ‘आसमान’ स्वयं ‘एक दर्पण’ बन जाते हैं। यह एक असामान्य और काव्यात्मक संरचना है। यहाँ उपमा या रूपक किसी एक अर्थ को स्थिर नहीं करते, बल्कि अनेक संभावनाएँ खोलते हैं। दर्पण आत्म-दर्शन का प्रतीक है, प्रतिबिम्ब का भी और आत्म-चेतना का भी। दूसरी ओर आसमान अनंतता, विस्तार और विराटता का बोध कराता है। जब देह और आसमान एक-दूसरे के दर्पण बनते हैं, तब सीमित और असीम, व्यक्तिगत और सार्वभौमिक, सूक्ष्म और विराट के बीच एक गहरा संबंध स्थापित होता है। यह बिम्ब कविता के आरम्भ में ही उसके प्रतीकात्मक संसार का द्वार खोल देता है।
कविता में प्रयुक्त प्रतीकों की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे पारंपरिक अर्थों को ग्रहण करते हुए भी उन्हें नए संदर्भ प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए ‘दरवाज़े’ का बिम्ब लें। “खुलने के लिए तैयार मगर वे दरवाज़े”—यहाँ दरवाज़े केवल भौतिक संरचना नहीं हैं। वे संभावनाओं, निषिद्ध क्षेत्रों, अवरुद्ध इच्छाओं और नए अनुभवों के संकेतक बन जाते हैं। दरवाज़े बंद भी हैं और खुलने की प्रक्रिया में भी। यह द्वंद्वात्मक स्थिति कविता को स्थिर अर्थ से बचाती है। पाठक स्वयं इन दरवाज़ों के अर्थ-क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रेरित होता है।
‘रात’ का बिम्ब भी कविता में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हिन्दी काव्य-परंपरा में रात प्रायः विरह, मिलन, रहस्य या आत्मचिंतन का समय रही है। सविता सिंह इस परंपरा को नए अर्थ देती हैं। “जिन्हें बचा रखा है अब रात ने”—यहाँ रात एक संरक्षिका की तरह उपस्थित है। वह स्त्री की उन अनुभूतियों और संभावनाओं को सुरक्षित रखती है जिन्हें दिन का सामाजिक संसार स्वीकार नहीं करता। इस प्रकार रात केवल समय का बोध नहीं कराती; वह एक सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में रूपांतरित हो जाती है।
कविता में ‘अंधकार’ का प्रयोग भी उल्लेखनीय है। सामान्यतः साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराओं में प्रकाश को सकारात्मक तथा अंधकार को नकारात्मक अर्थों से जोड़ा गया है। लेकिन कविता इस रूढ़ अर्थ-व्यवस्था को तोड़ देती है। “लहराता अन्धकार मिल जाने देता है / अपने तम में एक और तम को”—यहाँ अंधकार भय, अज्ञान या विनाश का प्रतीक नहीं है। वह आत्मीयता, समावेशन और गहन अनुभव का क्षेत्र बन जाता है। ‘लहराता अन्धकार’ स्वयं में एक सशक्त काव्यात्मक प्रयोग है। अंधकार सामान्यतः स्थिर माना जाता है, किन्तु यहाँ वह गतिशील है, लहरा रहा है, अपने भीतर दूसरे अंधकार को समाहित कर रहा है। इस प्रकार कवयित्री अंधकार को एक जीवंत और सक्रिय सत्ता में बदल देती हैं।
इस रचना की काव्यभाषा में दृश्यात्मकता (visuality) और अमूर्तन (abstraction) का संतुलित मेल दिखाई देता है। ‘देह’, ‘आँखें’, ‘दरवाज़े’, ‘रात’, ‘चन्द्रमा’ जैसे मूर्त बिम्बों के माध्यम से कविता पाठक के सामने एक दृश्य संसार रचती है। लेकिन इन बिम्बों के अर्थ केवल दृश्य स्तर तक सीमित नहीं रहते। वे चेतना, कामना, स्मृति और सत्ता जैसे अमूर्त अनुभवों से जुड़ जाते हैं। यही कारण है कि कविता का बिम्ब-विधान बहुस्तरीय अर्थों का निर्माण करता है।
कविता में चन्द्रमा का बिम्ब विशेष रूप से उल्लेखनीय है। “चन्द्रमा खिला रहता है आसमान में रात भर / सिमटा एक कोने में सब कुछ देखता सोचता”—यहाँ चन्द्रमा केवल प्रकृति-दृश्य का हिस्सा नहीं है। वह एक साक्षी है, एक चिंतनशील उपस्थिति है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में चन्द्रमा का संबंध मन, भावना और संवेदना से जोड़ा गया है। ऋग्वैदिक और उपनिषद्-परंपरा से लेकर पुराणों तक यह धारणा मिलती है कि चन्द्रमा मन का प्रतीक है। प्रसिद्ध वैदिक उक्ति है—“चन्द्रमा मनसो जातः” अर्थात् चन्द्रमा मन से उत्पन्न हुआ है। इस सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखें तो कविता का चन्द्रमा केवल आकाशीय पिंड नहीं रह जाता; वह मानो सामूहिक चेतना और मन की उपस्थिति का प्रतीक बन जाता है। वह देखता है, सोचता है, पर हस्तक्षेप नहीं करता। इस प्रकार चन्द्रमा स्त्री-अनुभव का मूक साक्षी बनकर उपस्थित होता है।
कविता की एक और शिल्पगत विशेषता उसका मुक्तछंद है। कविता किसी निश्चित छंद, तुक या लय-योजना का पालन नहीं करती। फिर भी उसमें एक आंतरिक लय मौजूद है। यह लय शब्दों की पुनरावृत्ति, वाक्य-विन्यास और विचारों के क्रमिक विस्तार से निर्मित होती है। उदाहरण के लिए “देखता होगा”, “सोचता”, “बदलेगा” जैसे क्रियापद कविता में एक चिंतनशील और मननपरक लय उत्पन्न करते हैं। यह लय कविता के वैचारिक स्वर को भी पुष्ट करती है।
इसमें कथन और संकेत का संतुलन भी उल्लेखनीय है। अंतिम पंक्ति—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही”—प्रत्यक्ष और स्पष्ट कथन है। इसके विपरीत ‘अंधकार’, ‘दरवाज़े’ और ‘रात’ जैसे बिम्ब सांकेतिक हैं। कविता इन दोनों स्तरों को संतुलित ढंग से साधती है। यदि पूरी कविता केवल प्रतीकों में होती, तो उसका वैचारिक कथ्य धुँधला पड़ सकता था; और यदि पूरी कविता प्रत्यक्ष कथन में होती, तो उसकी काव्यात्मकता कम हो सकती थी। सविता सिंह इन दोनों संभावित अतियों से बचती हैं।
भाषा की दृष्टि से कविता का एक और गुण उसका संयम है। कविता में शब्दों की अनावश्यक बहुलता नहीं है। प्रत्येक शब्द अपने साथ अर्थ का एक विस्तृत क्षेत्र लेकर आता है। उदाहरण के लिए ‘हाहाकार’, ‘वासना’, ‘तम’, ‘कल्पना’ जैसे शब्द केवल शब्दार्थ तक सीमित नहीं रहते; वे सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक अर्थों को भी सक्रिय कर देते हैं। यही भाषिक मितव्ययिता कविता की प्रभावशीलता को बढ़ाती है।
कविता का शिल्प इस अर्थ में भी उल्लेखनीय है कि वह वैचारिकता को काव्यात्मकता में रूपांतरित कर देता है। सामान्यतः वैचारिक कविता के सामने यह चुनौती होती है कि विचार कहीं कविता पर हावी न हो जाए। सविता सिंह इस चुनौती का सफलतापूर्वक सामना करती हैं। उनके विचार सीधे नारे या घोषणाएँ नहीं बनते, बल्कि बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से संवेदनात्मक रूप ग्रहण करते हैं। इस कारण कविता पाठक को केवल विचार नहीं देती, बल्कि एक अनुभव भी देती है।
इसका शिल्प-सौन्दर्य उसकी प्रतीकात्मकता, बिम्ब-विधान, भाषिक संयम, मुक्तछंदीय लय, सांकेतिक संरचना और बहुस्तरीय अर्थ-संभावनाओं में निहित है। ‘दर्पण’, ‘आसमान’, ‘दरवाज़े’, ‘रात’, ‘अंधकार’ और ‘चन्द्रमा’ जैसे बिम्ब कविता को एक समृद्ध प्रतीक-लोक प्रदान करते हैं। विशेष रूप से ‘चन्द्रमा’ का बिम्ब भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में निहित “चन्द्रमा मनसो जातः” की अवधारणा को अनुगूँजित करते हुए कविता के मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक आयामों को और गहरा कर देता है। इस प्रकार कविता का शिल्प उसके कथ्य का मात्र वाहक नहीं है, बल्कि वही माध्यम है जिसके द्वारा स्त्री, कामना, ईश्वर और परिवर्तन के जटिल प्रश्न अपनी सम्पूर्ण कलात्मकता और अर्थवत्ता के साथ उद्घाटित होते हैं।
कविता में भाषा का प्रयोग भी उत्तर-आधुनिक संवेदना से जुड़ता है। यहाँ भाषा किसी निश्चित अर्थ को संप्रेषित करने का पारदर्शी माध्यम नहीं है। वह संकेतों, प्रतीकों और अर्थ-स्तरों से निर्मित है। पाठक को अर्थ स्वयं निर्मित करना पड़ता है। कविता किसी बंद व्याख्या की ओर नहीं ले जाती; वह पाठक को अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाती है। यह उत्तर-आधुनिक साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है।
यदि स्त्रीवादी उत्तर-आधुनिक चिंतन के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो कविता और भी अधिक अर्थपूर्ण हो उठती है। जूडिथ बटलर जैसी चिंतकों ने यह दिखाया कि पहचानें स्थिर नहीं होतीं; वे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से निर्मित होती हैं। सविता सिंह की कविता भी स्त्री की पहचान को किसी स्थिर सार के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। स्त्री यहाँ एक प्रक्रिया है—जागती हुई देह, खुलते हुए दरवाज़े, उभरती हुई कामना और बदलती हुई दुनिया। उसकी पहचान निरंतर निर्माणाधीन है।
उपर्युक्त विवेचन के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि सविता सिंह की ‘ईश्वर और स्त्री’ कविता पारंपरिक और रूढ़ प्रतिमानों का अतिक्रमण करते हुए एक सर्वथा नवीन वैचारिक क्षितिज का निर्माण करती है। यह आलेख केवल पितृसत्तात्मक दमन की शिनाख्त नहीं करता, बल्कि उस दार्शनिक और सत्तात्मक शून्यता को भी उजागर करता है जहाँ सदियों पुरानी व्यवस्थाएँ अपनी सार्थकता खो चुकी हैं। कविता में ईश्वर की ‘अधूरी कल्पना’ और अंततः उसकी अप्रासंगिकता इस बात का प्रमाण है कि अब स्त्री को अपनी मुक्ति के लिए किसी पारलौकिक या बाहरी सत्ता के अनुग्रह की आवश्यकता नहीं है।
इस विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्थान-बिंदु यह है कि यहाँ स्त्री का जागरण किसी आक्रामक प्रतिक्रिया या महज़ विद्रोह के रूप में नहीं, बल्कि ‘सृजन की एक वैकल्पिक ऊर्जा’ के रूप में घटित होता है। कविता का अंतिम स्वर इतिहास, समय और सृष्टि के केंद्र को ही विस्थापित कर देता है। जहाँ अतीत में शक्ति और विमर्श का केंद्र पुरुष या ईश्वर था, वहीं अब वह केंद्र ‘स्त्री की कामना और देह’ में स्थानांतरित हो चुका है। यह सत्ता-परिवर्तन संसार के पुनर्निर्माण की एक ऐसी नई भाषा गढ़ता है जो समावेशी, संवेदनात्मक और स्वायत्त है।
संक्षेप में कहें तो, यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ‘ईश्वर और स्त्री’ समकालीन कविता के भीतर एक ऐसी युगांतकारी घोषणा है जो महावृत्तांतों का विखंडन कर भविष्य की रूपरेखा तय करती है। अब संसार का बदलना किसी दैवीय विधान का हिस्सा नहीं, बल्कि स्त्री-चेतना की अनिवार्य परिणति है। यह कविता आने वाले समय के लिए एक नया ब्रह्मांडीय सत्य (Cosmological Truth) स्थापित करती है, जहाँ स्त्री स्वयं अपनी नियति और इस संसार की अंतिम रचयिता बनकर उभरती है।
‘ईश्वर और स्त्री’ कविता का संस्कृत साहित्य में समानांतर साक्ष्य ढूँढ़ने हुए देवीभागवतपुराण के एक छंद पर दृष्टि अटक जाती है जिसमें देवी स्वयं कहती हैं—
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत्सदसत्परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥(देवीभागवतपुराण 1.8)
अर्थात् सृष्टि के पूर्व केवल मैं थी; मुझसे अतिरिक्त न सत् था न असत्। सृष्टि के बाद भी मैं हूँ और प्रलय के पश्चात् भी मैं ही शेष रहती हूँ।
यहाँ देवी किसी पुरुष-ईश्वर की सहचरी नहीं, बल्कि स्वयं परमसत्ता है। ‘ईश्वर और स्त्री’ में भी स्त्री को अंततः ईश्वर से अधिक निर्णायक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अंतर यह है कि देवीभागवत में यह दार्शनिक-धार्मिक घोषणा है, जबकि सविता सिंह के यहाँ यह ऐतिहासिक और सामाजिक प्रतिरोध पर बल है।
‘ईश्वर और स्त्री’ कविता की “कामना” के निकट अगर कोई संस्कृत साक्ष्य खोजा जाय, तो ऋग्वेद का ‘देवीसूक्त’ सबसे करीब प्रतीत होता है:
यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि
तं ब्रह्माणं तं ऋषिं तं सुमेधाम्।
यहाँ देवी की इच्छा (कामना) ही सृजनात्मक शक्ति है। जिसे वह चाहती है, उसे ऋषि, ब्रह्मा या प्रज्ञावान बना देती है। सविता सिंह की कविता में भी संसार-परिवर्तन का स्रोत स्त्री की कामना है; इसलिए यह वैचारिक साम्य अत्यंत रोचक है।
फिर भी एक बुनियादी अंतर याद रखना चाहिए। शाक्त संस्कृत ग्रंथों में स्त्री को प्रायः दैवी बनाकर सर्वोच्च स्थान दिया गया है; वहाँ स्त्री की शक्ति अलौकिक है। सविता सिंह की रचना की मौलिकता यह है कि वह किसी देवी की नहीं, एक मानवीय स्त्री की कामना, देह और चेतना को परिवर्तनकारी शक्ति घोषित करती है। इस कारण संस्कृत साहित्य में उसका सबसे निकटतम समकक्ष कोई एक श्लोक नहीं, बल्कि देवीसूक्त, देवीमाहात्म्य, देवीभागवत और शाक्त तांत्रिक परंपरा का संयुक्त वैचारिक क्षेत्र है।
तांत्रिक परंपरा में भगवत्पाद आदि शंकराचार्य की सौन्दर्यलहरी का प्रथम श्लोक विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है—
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति॥
यहाँ एक साहसिक प्रतिपादन है—शक्ति के बिना शिव स्वयं स्पंदित होने में भी असमर्थ हैं। संस्कृत परंपरा में यह स्त्री-तत्त्व की सर्वोच्च प्रतिष्ठा है। सविता सिंह की ‘ईश्वर और स्त्री’ कविता में जहाँ कहा गया है कि अब संसार-परिवर्तन में ईश्वर की भूमिका नहीं, स्त्री की कामना की भूमिका है—“बदलेगा यह संसार अब स्त्री की कामना से ही/ईश्वर की नहीं अब इसमें कोई भूमिका”, —वहीं सौन्दर्यलहरी में कहा गया है कि ईश्वर भी शक्ति पर निर्भर है।
अगर विश्व साहित्य के ‘ईश्वर और स्त्री’ कविता के समानांतर कोई पाठ सबसे सटीक बैठता है,तो वह चर्च की नाराज़गी के तहत ज़िंदा जला दी जाने वाली मध्ययुगीन फ़्रांसीसी दार्शनिक-कवि मार्गरीट पोरेट (Marguerite Porete) रचित ‘सरल ‘आत्माओं का दर्पण’ (The Mirror of Simple Souls) कविता की ये पंक्तियाँ हैं —
“आत्मा को अब किसी और की आवश्यकता नहीं,
क्योंकि वह उसी स्वतंत्रता में स्थित है
जहाँ प्रेम स्वयं उसका नियम है।”(“This Soul has no need of any other thing,
for she dwells in the freedom
where Love alone is her law.”)
यहाँ स्त्री की आत्मा धार्मिक संस्था और बाहरी आदेश से मुक्त होकर स्वयं अपने सत्य की अधिकारी बनती है। यही बात ‘ईश्वर और स्त्री’ के सबसे निकट प्रतीत होती है—हालाँकि सविता सिंह की रचना मार्गरीट पोरेट से अधिक राजनीतिक, देहधर्मी और स्त्रीवादी है।
सन्दर्भ
बुनियादी पाठ :
सिंह,सविता. ईश्वर और स्त्री.(कविता). स्वप्न समय.2013. राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली.
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