‘बनास जन’ से साभार लिया गया यह लेख राकेश बिहारी के आलोचक और कथाकार रूप का फ्यूज़न है. यहाँ वे बेहद कल्पनाशील पत्र-शैली में हिन्दी की चार कालजयी कहानियों — ‘कफन’, ‘रसप्रिया’, ‘सद्गति,’ और ‘दो बैलों की कथा’ — की पंकज मित्र द्वारा की गयी पुनर्रचना पर विचार कर रहे हैं. बेशक, जिन्होंने ये कहानियाँ न पढ़ी हों या मित्र द्वारा की गयी पुनर्रचना न पढ़ी हो, उन्हें इस लेख को पढ़ने में थोड़ी मुश्किल पेश आ सकती है. राकेश बिहारी, पंकज मित्र और प्रेमचंद/रेणु की अंतर्पाठीयता जितनी दिलचस्प है, उतनी ही डिमान्डिंग भी.
लेख के साथ दी गयी तस्वीर लेखक के फेसबुक से साभार.

सूरज आग उगल रहा है। यह एक बहुत पुराना-सा वाक्य है। इस वाक्य के भीतर सन्निहित भाव शायद उससे भी पुराना। लेकिन जाने कितनी बार कितनी-कितनी तरह से दुहराया गया यह वाक्य आज ठीक वही अर्थ संप्रेषित नहीं करता जो दस, बीस, पच्चीस या पचास साल पहले करता रहा होगा। पिछले कुछ वर्षों में तापमान के आंकड़ों ने जो छलांगें लगाई हैं, उसका तीव्रतम ताप आप सहज ही वर्षों से दुहराए जा रहे इस छोटे से वाक्य के अद्यतन संस्करण में महसूस कर सकते हैं। हाँ, तो आज भी सूरज आग उगल रहा है। दोपहर का एक बजने को है। मोबाइल का स्क्रीन अभी का तापमान 44 डिग्री, फील्स लाइक 49 डिग्री बता रहा है, कि तभी लगभग सर से पाँव तक ढँकी-बंधी पोस्टमैन प्रकट होती है। ‘पोस्टमैन’ और ‘होती है’ के इस संग-संयोग पर चौंक तो नहीं रहे आप? जेंडर विमर्श के इस ज़माने में ‘चेयरमैन’ ‘चेयर पर्सन’ और ‘बैट्समैन’ ‘बैटर’ हो चुके लेकिन ‘पोस्टमैन’ अब भी ‘पोस्टमैन’ ही है। ‘बाबा ए अफ़साना’ प्रेमचंद या रंग-रस-गंध के धनी सम्पूर्ण कथाकार रेणु ने शायद कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि कभी कोई लड़की पोस्टमैन बनी इस चिलचिलाती दुपहरी में घर-दफ्तर जा-जाकर चिट्ठियाँ पहुँचाएगी। फिलहाल हम उसे ‘पोस्टमैन’ नहीं, डाकिया ही कहते हैं, शायद आपलोगों को थोड़ा कम अटपटा लगे। हाँ, तो डाकिया के जाते ही मैंने उसका दिया पैकेट खोला है। इस बड़े से लिफ़ाफ़े के भीतर किंचित छोटे आकार के तीन और लिफ़ाफ़े हैं। एक मेरे नाम का और दो…
सर्वश्री पंकज मित्र के लिए…दो लिफ़ाफ़ों पर लिखित अपने प्रिय कथाकार का नाम मेरे भीतर रोमांच और कौतूहल का मिलाजुला संसार रच रहा है। लेकिन, मैं अपने नाम वाला लिफ़ाफ़ा ही पहले खोलता हूँ….लिफ़ाफ़े पर हस्तलिखित पता देखकर दिनों बाद अचानक ही किसी की लिखावट देखने की जो आत्मीय उत्कंठा मेरे भीतर जगी थी, पत्र के मुद्रित मजमून ने उसके गाढ़ेपन को थोड़ा कम कर दिया है। लेकिन मेरे उत्साह का प्याला अब भी लबालब है…
प्रिय राकेश जी,
सादर अभिवादन!
मुझ अजनबी का पत्र देखकर आप चिंतित तो नहीं हो गए? मैं रमपतिया, रेणु की मानस पुत्री! आपका पता ‘कथादेश’ के दफ्तर से मिला। ‘कथादेश’, जो दिल्ली से हरिणारायण जी के सम्पादन में प्रकाशित होती है।
पत्र तो मैं अपने दत्तक मानस पिता सर्वश्री पंकज मित्र जी को ही लिखना चाहती थी, बल्कि कहना तो यह चाहिए कि उन्हें लिखा भी। पर कोई जवाब नहीं आया। पिछले साल गुलाब बाग मेले में पाण्डे बाबा की ‘वाइफ’ मिली थीं, आप तो जानते ही होंगे उन्हें, वही, ‘सद्गति – 02’ वाले पांडे बाबा। उसका अनुभव भी ठीक ऐसा ही था। पहले तो मुझे संशय हुआ कि जाने मेरे दत्तक मानस पिता को मेरा पत्र मिला भी कि नहीं, पर जब पांडे बाबा की वाइफ ने भी यही शिकायत की तो मेरी आशंका कुछ-कुछ जाती रही। आपसे तो उनकी बात होती ही होगी। भला इसमें भी क्या शक, आपके सम्पादन में तो उनकी कई कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं। मेरी वाली भी तो आपने ही छापी थी न! मैंने तो यह भी सुना है कि लेखक-संपादक से अलग आप लोग बड़े गहरे मित्र भी हैं, तो सोचा क्यूँ न अपनी चिट्ठी आपको ही भेज दूँ। भले उनका जवाब मुझे न मिले, कम से कम यह विश्वास तो पक्का हो जाएगा कि मेरी चिट्ठी उनके कर कमलों तक पहुँच गई है। अपनी यह बात जब मैंने पाण्डे बाबा की ‘वाइफ’ को बताया तो लगे हाथ उसने अपना लिफ़ाफ भी मुझे ही पकड़ा दिया। तो लीजिए, दोनों चिट्ठियाँ हाज़िर हैं।
मैं जानती हूँ, इन चिट्ठियों को पढ़ने की उत्कट चाहत आपके पेट में मरोड़ का कारण बन रही होगी, इसलिए इन लिफ़ाफों को मैंने खुला ही छोड़ दिया है। बाकी आपको क्या समझाऊँ, आप तो खुद ही समझदार हैं…और विनोद जी ने भी तो कहा ही है कि ‘थोड़ा लिखना बहुत समझना’ को लोक अभी भी कहाँ छोड़ पाया है। विनोद जी के नाम से कन्फ्यूजियाइएगा मत। विनोद जी, यानी आलोचक विनोद तिवारी जी, जिन्हें आपने मेरी नई कहानी ‘रसपिरिया पर बज्जर गिरे’ के मूल्यांकन की ज़िम्मेदारी दी थी।
आदर सहित
रमपतिया
फौरन से पेश्तर मेरे भीतर मोहना से कहे मिरदंगिया के शब्द गूंज उठते हैं- “बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ।”
चिट्ठी में टंकित शब्दों पर मैं मन-ही-मन अपनी कल्पना से रमपतिया की लिखावट आरोपित कर देता हूँ…
श्रद्धेय पिताजी,
सादर चरण स्पर्श!
मेरे सम्बोधन पर आप चौंक तो नहीं रहे हैं? आपकी अनुभवी पुतलियाँ मुझे पहचान तो रही हैं न! मैं, रमपतिया; मानस पुत्री – श्री फणीश्वरनाथ रेणु, मुकाम- रसप्रिया। मुझ पितृहीन को आपने गोद लिया, इसके लिए मैं आपकी आभारी हूँ।
मैं झूठ नहीं कहूँगी, जिस दिन आपके मानस में मुझे पुनः रचने के अंकुर फूटे थे, मैं एक बार को डर गई थी। जाने नए घर में मुझे कितना प्यार मिलेगा? पिछले चवालीस सालों में ऐसा एक भी दिन नहीं बीता, जब अपने प्रति बाबूजी के अथाह प्रेम को मैंने याद न किया हो। इसलिए मन के फ्रेम में टंगी उनकी छवि पर अनायास ही किसी और की, यानी आपकी छवि चस्पाँ कर देने की कल्पना भर ने ही मुझे असहज कर दिया था। लेकिन, आपने जिस स्नेह और संकल्प के साथ मेरी उंगली थामी थी, उसमें एक अतिरिक्त सतर्कता थी, मेरे लिए चिंतामिश्रित लगाव भी-
“मिरदंगिए के प्रेम को तो उच्च पीठिका पर स्थापित कर दिया कथा शिल्पी ने, लोक जीवन की सांस्कृतिक महत्ता भी प्रतिष्ठित हो गई, वंचित वर्ग में लोक संस्कृति के प्रति चाहना भी अनुप्राणित हुई, मगर रमपतिया? एक स्त्री, जिसका प्रेम शायद कहीं मृदंग की ढिमिक ढिमिक में बिला सा गया है। उसके रिक्त हृदय का हाहाकार कहीं उस तरह नहीं आ सका। वंचना से छलनी उसका ह्रदय स्वयं को अभिव्यक्त भी नहीं कर पाया- एक तो स्त्री, प्रेम में छली गई, वंचित वर्ग की स्त्री की हजार दिक्कतें, एक ऐसी संतान का पालन पोषण जिसके पिता कौन है, इस पर लोकापवाद है, अकेली युवा स्त्री जिस पर पूरे समाज की लोलुप निगाहे रहती होंगी – कितना कष्टपूर्ण, संघर्षमय जीवन रहा होगा उसका, फिर भी लोक संस्कृति की चेतना को न सिर्फ जगाए रखना बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरण का गुरुतर उत्तरदायित्व का भी निर्वहन- कभी लगता था कि शायद रेणु ने रमपतिया को उसका पावना नहीं दिया और इसी ने वह लीक भी बतलाई कि अगर रमपतिया के नजरिए से रसप्रिया कहानी को पुनर्सृजित किया जाए तो?”
बाबूजी को कोई थोड़ा भी भला-बुरा कहे, मुझे कभी मंजूर नहीं रहा। पर उनके प्रति आपकी शिकायत औरों की शिकायत से अलग थी। इस शिकायत में शामिल मेरे लिए आपकी चिंता ने मेरे भीतर पल रहे भय और संकोच को किंचित परे धकेला था और थोड़ी असहजता के बावजूद मैं आपकी स्नेहिल उंगली थामे औराही हिंगना से रांची की तरफ चल पड़ी थी। रास्ते भर आप जिस तरह बार-बार बाबूजी के शब्द दुहराते रहे थे, आपके प्रति मेरे भीतर लगाव बढ़ता जा रहा था। शब्द-दर-शब्द वही भाव, लोक-रस में पगी साँसों की वही खुशबू…वंचितों-शोषितों केलिए वही अनुराग…मैं चकित थी और मुग्ध भी कि आपको मेरी करुण कथा शब्दशः याद है। लेकिन जब से ‘रसपिरिया पर बज्जर गिरे’ में स्वयं को आपकी निगाहों से देखा है, मेरे भीतर टीस की एक गहरी लकीर चिलकती रहती है। बाबूजी के बाद जब कोई अपना नहीं रहा, अजोधा दास ने मोहना को अपना नाम देकर मेरा जीवन कुछ आसान करने की कोशिश की थी। जब तक वह था, अपना सुख-दुख उससे बाँट लेती थी, पर अब तो वह भी नहीं रहा। अपना यह दुख किससे कहती, सोचा आपको ही कह डालूँ।
आपने बिलकुल सही पहचाना कि मैंने पाँचू को मन प्राण से चाहा था। आज भी मेरा कलेजा उसके लिए जार-जार रोता है। इसीलिए, जब मोहना ने बताया कि मिरदंगिया आया हुआ है, मैं उसके बारे में जानने-सुनने को पुनः व्याकुल हो उठी। मैं मोहना के कानों को ही अपने कान और उसकी आँखों को ही अपनी आँखें बनाकर पाँचू तक पहुँच जाना चाहती थी। छिन भर को अपना सारा अगला-पिछला भूलभालकर मैंने मोहना को अपनी छाती से लगा लिया था। लेकिन प्रेम और विछोह के उन विदग्ध क्षणों में अगले ही पल पाँचू के विषबुझे शब्द, जो उस रात उसने गुलाब बाग मेले में कहे थे, मेरी स्मृति में पुनः जाग उठे थे, –
“क्या झूठ फरेब जोड़ने आई है। कमलपुर के नंदू बाबू के पास क्यों नहीं जाती? मुझे उल्लू बनाने आई है। नंदू बाबू का घोड़ा बारह बजे रात को…”
अपने भीतर मोहना के आमद की पहली आहट मैं उससे साझा करती ही कि उसके पहले ही वह चुपचाप चला गया था। मेरी चुप्पी के बावजूद मेरे जैविक पिता जोधन गुरुजी ने इसे समझ भी लिया था और इस आघात को सह नहीं सके। मैं आज भी खुद को उनके परलोक गमन की अपराधिनी मानती हूँ। पाँचू का छल तो किसी तरह सह लेती, लेकिन जिस निर्ममता से उस रात उसने मुझे लांछित करते हुए मेरी तरफ तर्जनी उठाई थी, वह मेरे लिए असह्य था। मैं चीख उठी थी- “पाँचू!…चुप रहो!”
आपको तो कहानी का शब्द-शब्द याद है, बाबूजी ने ठीक उसके बाद लिखा है- “उसी रात रसपिरिया बजाते समय उसकी उंगली टेढ़ी हो गई थी।” मेरे जैविक पिता भले चले गए हों, पर बाबूजी ने मुझे टूटने नहीं दिया, मेरे स्वाभिमान को मेरे प्रेम से ऊपर जगह दी।
श्रद्धेय पिताजी, पंचकौड़ी की उंगली का यूं टेढ़ा होना सिर्फ एक स्थूल घटना तो नहीं थी न! उसकी उंगली टेढ़ी होने की सूचना देते हुए बाबूजी ने उसकी उस तर्जनी के टेढ़ी होने की बात भी कही थी, जो उस रात उसने मेरी तरफ उठाई थी। बाबूजी बिना वाचाल हुए बोलने की कला जानते थे। संकेतों में जादू रचने का जो कौशल उनके पास था, वह फिर किसी और के यहाँ नहीं दिखा। आपने तो गौर किया ही होगा, उन्होंने कुछ ही वाक्यों की दूरी पर लिखा है- “झूठी टेढ़ी ऊँगली!” बाबूजी के नैतिक संबल का ही यह असर था कि प्रेम में बुरी तरह छली जाने के बाद भी मैं सिर उठा कर जीती रही। और फिर किसी की हिम्मत नहीं हुई कि मुझ पर झूठा लांछन लगाए। लेकिन, श्रद्धेय पिता जी, आपने पाँचू की उठी तर्जनी को सच कैसे मान लिया? आपने पहली बार मेरी उंगली थामते हुए मुझे एक ऐसी संतान का पालक पोषक बताया था, जिसके पिता कौन हैं, इस पर लोकापवाद है। दशकों की पितृहीन मैं, तब अपने प्रति आपकी चिंताओं की ऊष्मा से यूं पिघल गई कि मुझे समझ ही नहीं आया, कि आप क्या कहना चाहते थे। पाँचू के लांछन से आहत मेरे मन ने जब चीखकर उसका प्रतिवाद किया, बाबूजी मेरे साथ खड़े रहे और और उसकी उठी तर्जनी को हमेशा के लिए टेढ़ी कर दिया। पंचकौड़ी के कुबोल को कभी लोकापवाद नहीं बनने दिया। मैंने आपकी कुछ और कहानियाँ भी पढ़ी हैं, और पाया है कि ऐसे ‘मसालेदार’ प्रसंगों में आपका मन खूब रमता है। जाने क्यों मुझे लगता है कि मिरदंगिया के कुबोल ने आपके भीतर के उस चटोर मसखरे को थोड़ा ज्यादा ही बहका दिया और बाबूजी द्वारा निरस्त कर दिये गए उसके झूठ को आपने पुनर्रचना के क्रम में लोकापवाद का रूप दे डाला-
“शोभा मिसिर शाम को अपने संगातियों के साथ दिशा मैदान के लिए जाते हुए बोले – आँय यौ! अजोधा को गए तो नौ महीना से जादे हो गया तो फिर…
भाय! खेत कोय जोते फसल तो उसी का ना होगा जिसके नाम से खेत का केवाला है – संगाती हंसने लगे।
यही बात तो पँचकौड़ी के ध्यान में भी आई थी – मोहना जैसे लड़कीमुँहा लड़के छोटी जाति के लोगों के यहाँ हमेशा पैदा नहीं होते – वे तो अवतार लेते हैं – जदा जदा हि धर्मस्य-”
जब पंचकौड़ी मेरे जैविक पिता जोधन गुरु जी के पास आया था, मैं तरुणाई की देहरी पर खड़ी थी। कलाकार हृदय पाँचू की प्रतिभा ने मुझे उसके लिए अनुराग से भर दिया था। बाबूजी ने मेरी उस अनुरागिनी दशा को बहुत स्नेह से निरखा था- ‘नव अनुरागिनी राधा, किछु नहीं मानय बाधा’। परखा भी होगा ही, तभी तो मुझ ‘अनुरागिनी’ को ‘मानिनी’ होने तक का विस्तार दिया और मैं प्रेम व बिछोह के सघनतम क्षणों में भी मैं मोहना को पूरी निर्ममता से कह पाई- “ऐसे लोगों की संगत कभी मत करना।” पर मेरे मन को समझने से आप कैसे चूक गए श्रद्धेय पिताजी?-
“ “मानिनी आब उचित नहिं मान”
आजकल रमपतिया बार-बार इसी गीत की कड़ी उठाती है।
एखनुक रंग एहन सन लागय जागल पए पंचबान
ऐसा रंग लगा है जीवन में जैसे कामदेव अपने पंच वाणों के साथ जाग चुके हैं।” (रसपिरिया पर बज्जर गिरे)
‘अनुरागिनी’ से ‘मानिनी’ बनी प्रेम में छली गई रमपतिया को आपने इस तरह ‘कामिनी’ क्यों बना दिया? मैंने कहा न, बाबूजी ने पाँचू के प्रति मेरे प्रेम को बहुत स्नेह से निरखा था। उन्हें पता था कि प्रेम में मिले घात ने मुझे हमेशा के लिए तोड़ दिया है। मुझे अच्छा लगता यदि आप मेरे भीतर सूख चुकी अनुराग की उन लताओं को नए सिरे से सींचने का जतन करते, उसके अनुकूल माहौल का निर्माण करते। पर आपने तो उस झूठे पंचकौड़ी के लांछन को ही सच साबित कर दिया? सीता मैया ने सदियों पहले अकेले दम पर लवकुश को राम से बड़ा धनुर्धर बनाया था। आपने मेरे भीतर के कलाकार को क्यों नहीं पहचाना? इंतेहा तो ये हो गई कि मुझे उसी नंदूबाबू के घर कुटान-पिसान-चौका–बरतन के लिये भेज दिया, जिसके नाम का लांछन उस झूठे-बेईमान पंचकौड़ी ने मुझे देने की कोशिश की थी।
बाबूजी के जाने के चालीस साल बाद जब आपने मेरी उंगली थामी थी, मुझे लगा था, कबसे बंद मेरे पंखों को उड़ान की नई ताकत मिलेगी, मेरे भीतर घुट कर रह गए असमय काल कवलित उन छंदों को खुली हवा में गूंजने का पुनः मौका मिलेगा, पर आपने तो मुझे ही मेरी राह के आगे बाधा की तरह उपस्थित कर दिया– “हीरामन भैया की गाड़ी में लौटते हुए रमपतिया ने कसम खा ली कि कभी नहीं गाएगी रसप्रिया और किसी के कहने पर तो एकदम ही नहीं।” (रसपिरिया पर बज्जर गिरे)
बाबूजी ने पंचकौड़ी के भीतर पल रहे अनकहे पश्चाताप को अपनी बारीक निगाहों से देखा था। उसके भीतर किलकते वात्सल्य को भी। निरगुन गाते मिरदंगिया के भीतर उसकी टेढ़ी उंगली के सीधी होने की एक क्षीण-सी आस यूं ही तो नहीं जागी थी न! यह सबकुछ शब्दशः याद होने के बावजूद आपने तो उसके झूठ और कुबोल को ही सत्यापित कर दिया। बाबूजी के विवेक पर आपको भरोसा क्यों नहीं हुआ? यह सच है कि मैंने जिस तरह टूटकर पाँचू से प्रेम किया था, संकट के क्षणों में उसके लिए कुछ भी करती, अपनी छाती पर पत्थर रखकर भी उसकी आखिरी इच्छा पूरा करती, लेकिन इसके लिए मेरे मान का अवमूल्यन करने की तो जरूरत नहीं थी न श्रद्धेय पिताजी!
दत्तक पिता भी तो पिता ही होता है न, जब वही अपनी संतान के मन को न समझ पाए तो उसे अन्य लोग क्यों कर समझेंगे? ‘कथादेश’ के उसी अंक में प्रकाशित विनोद तिवारी जी का आलेख तो आपने पढ़ा ही होगा न! उन्होंने कहा है-
“रमपतिया द्वारा अब कभी भी रसप्रिया नहीं गाने की सौगंध, मोहना के गौर वर्ण और ‘लड़की-मुंहा’ होने, मोहना द्वारा अपने पिता का नाम अजोधा प्रसाद बताना, उसकी आँखों का नंदूबाबू की आँखों से मेल खाना, ये सारे प्रसंग ऐसे हैं कि इनका विस्तार किया जा सकता था, पर रेणु ने नहीं किया।” विनोद जी को पढ़ते हुए ऐसा लगता है, जैसे बाबूजी इन प्रसंगों से अवगत तो थे, पर उन्होंने संकेत की तकनीक का सहारा लिया, उसे विस्तारित नहीं किया। काश, उन तक यह बात पहुंची होती कि बाबूजी ने जिस तरह हमारी कथा रची, उसमें पंचकौड़ी के लांछन को झूठ करार देने का निर्णयबोध शामिल था। इसलिए इन प्रसंगों के आरोपण या उधर की तरफ संकेत का कोई प्रश्न तो उनके समक्ष था ही नहीं।
विनोद जी ने यह भी समझाया है कि अंततः मुझे पाँचू के सम्मुख पहुंचाकर आपने मेरे और पॅँचकौड़ी के बीच प्रेम और पीर की उस ख़लिश को, उसके इल्यूजन को ख़त्म कर दिया जो बाबूजी की कहानियों की आत्मा है। कभी उनसे मिलने का संयोग मिला तो उनसे जरूर कहूँगी कि बाबूजी के लिए यह ‘विसाल-ए-यार’ और ‘इंतजार’ से आगे मेरी अस्मिता और स्वाभिमान का प्रश्न था।
पत्र कुछ ज्यादा ही लंबा हुआ जा रहा है। अपना मन हल्का करने के क्रम में मैंने आपका मन तो भारी नहीं कर दिया न? यदि ऐसा हुआ हो तो मुझे क्षमा कीजिएगा। मैं यह तो नहीं मानती कि बाबूजी ने मेरा पावना नहीं दिया, पर पैंसठ साल की इस लंबी अवधि में जो कुछ मैंने देखा-झेला और महसूस किया है, यह जरूर चाहती हूँ कि उसकी कथा मेरी तरफ से आप अपने पाठकों को जरूर सुनाएं। तब शायद सचमुच वह मेरी कहानी होगी। मुझे उम्मीद है मेरे कहे को आप किसी राजा-मंत्री के ‘मन की बात’ की तरह उपेक्षित नहीं छोड़ेंगे। जब पहली बार आपने मेरी उंगली थामी थी, तब आप भी तो यही चाहते थे न! क्या एक बार फिर से आप मुझे रचेंगे? मेरी कई सहेलियाँ ‘मेरी’ कहानी पढ़ना चाहती हैं। आपसे बेहतर भला इसे और कौन लिखेगा!
आपकी दत्तक मानस पुत्री,
रमपतिया
रमपतिया के पत्र को मैंने भारी मन से लिफ़ाफ के हवाले कर दिया है। लेकिन उसके शब्द और उन शब्दों के भीतर छुपी पीड़ा का अर्क मेरे बूंद-बूंद में उतर रहा है…मैं बिलाआवाज़ उस लिफ़ाफ़े को अपने हाथ में थामे रखता हूँ। कुछेक पल के उदास अंतराल के बाद अब दूसरे लिफ़ाफे का पत्र मेरे हाथों में है।
आदरणीय श्री पंकज मित्र जी!
मैं मेधावी! मुझे पता था, आप नहीं पहचानेंगे मुझे। पहचानते भी कैसे, आप ने मुझे कोई नाम तो दिया नहीं। वैसे नाम तो बाबा-ए-अफ़साना प्रेमचंद ने भी मुझे नहीं दिया था। फिर भी उनके सम्बोधन ‘पंडिताइन’ से मेरा कुछ अता-पता तो लोगों को मालूम चल ही सकता है। पर, आपने तो ‘पत्नी’ या ‘बीवी’ भर कहकर काम चला लिया। अब मैं परिचय में कहूँ- मैं, पत्नी, तो कितना हास्यास्पद और निरर्थक लगेगा न यह!
खैर, अब और ज्यादा बुझऊअल नहीं बुझाती। मैं मेधावी! आपके शब्द में कहूँ तो पांडे बाबा की ‘पत्नी’, वही, जो कॉलेज से लौटने के बाद सोलह पर एसी चलाकर अपने कमरे में मोबाइल पर लगी रहती है। पांडे बाबा यानी अपने पति को खाना तक नहीं देती। वह बेचारा निरीह, बेबस हड्डियों में दर्द न शुरू हो जाए की चिंता में, मेरे प्रशीतिकूलित कमरे में प्रवेश तक नहीं कर पाता और बिना शिकायत चुपचाप ड्राइंग रूम में ही लंब लेट हो जाता है। शायद यदा कदा मुझसे लात भी खाता हो। अरे, आपकी भौहें क्यों तन रही हैं? आपने साफ़-साफ़ ऐसा घटित होते हुए भले न दिखाया हो, पर संकेत तो कर ही छोड़े हैं न!
“हमको घर में नाश्ता मिल जाता है। तुम्हारे तरह नहीं कि…अब क्या करें, सबका अपना-अपना नसीब होता है…नसीब तो बढ़िया है तुम्हारा। इतिहास कहता है कि जो भी बीवी से लात खाता है, वही महान बनता है आगे जाकर।” (सद्गति – 02)
पर हाँ, पांडे जी की निरीहता को छोड़ दूँ, तो लिजलिजेपन और चापलूसी के उत्तरआधुनिक लिबास में लिपटे उनके नवावतारी शोषक रूप को आपने क्या खूब पहचाना है! इस नवखोजी दृष्टि के लिए तो आप सचमुच बधाई के पात्र हैं। और इस क्रम में पांडे जी के कर्मकांड की जो बैंड आपने बजाई है, वह भी शानदार है। ऐसा नहीं है कि भगत सिंह की तरह मैं नास्तिक हूँ, पर कर्मकांड के पाखंड में मेरा कतई विश्वास नहीं। वैसे भी जबसे इस नई शिक्षा नीति के तामझाम शुरू हुए हैं, हम प्रोफेसर कम सरकारी बाबू या ज्यादा से ज्यादा हाकिम बनकर रह गए हैं। और इस चक्कर में पूजापाठ के लिए समय तो बस होली-दिवाली ही मिल पाता है। मिल क्या पाता है, किसी तरह निकाल पाते हैं।
आपने यह भी सही पकड़ा कि बिलुंग, जिसे पीठ पीछे लोग ‘बिलुंड’ कहते हैं, बहुत तेज, समझदार और टेकनोसेवी है। मैं भी सोचती हूँ, यदि वह नहीं होता तो, बेचारे पांडे जी फटाफट न्यूज के इस तीव्र गतिशील जमाने के साथ कैसे तुक तान बिठा पाते। उन्हें तो पक्का ही ‘वी आर एस’ लेना पड़ता और यदि ऐसा नहीं करते तो विभाग उन्हें ‘सी आर एस’ पकड़ा देता। लेकिन एक बात बताइए, आज जब हाशिये पर धकेल दिये गए तमाम व्यक्ति समूह अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैँ, यह बिलुंग, पांडे जी की चापलूसी से फूलकर कुप्पा क्यों हुआ रहता है? पांडे जी के साथ धौल धप्पे की छूट भर से ही खुश होकर, अपने साथ हो रहे शोषण को क्यों नहीं पहचान पाता? आपको ‘मोहनदास’ तो याद है न, वही, उदय प्रकाश जी की कहानीवाला, कितना निरीह और रीढ़विहीन था वह! आपको नहीं लगता कि दोनों की पृष्ठभूमि में पर्याप्त अंतर होने के बावजूद, बिलुंग उसी का एक लघु संस्करण होकर रह गया है?
शोषण का शिकार दुखी लकड़ी चीरेते-चीरते मर गया। काल और स्थिति को देखते हुए उसके मरने पर एक बार हम सवाल नहीं खड़ा करें तो चलेगा, लेकिन प्रभात बिलुंग का इस तरह बिना किसी प्रतिरोध के दुनिया से चला जाना खटकता है। कहानी के आखिरी वाक्य में बिलुंग की पत्नी का जलती आँखों से पांडे की तरफ देखने के संकेत भर से उनका प्रतिरोध पूरा हो जाता है क्या?
मेरी ही तरह आपने प्रभात की पत्नी को भी बेनाम ही रखा है। काश आप कभी मेरे कॉलेज की तरफ आए होते! कहानी के अंतिम दृश्य में जिस स्त्री (प्रभात की पत्नी) की सिसकती हुई आवाज आपने सुनाई है न, वह मेरे कॉलेज की लायब्रेरियन सुजाता है। आदिवासी और स्त्री के रूप में उसके दोहरे संघर्ष से हम सब वाकिफ हैं। क्या ही अच्छा होता कि हम कामकाजी स्त्रियों को आपने हमारे कार्यस्थलों पर भी देखा होता! आपको तो उस मीडिया हाउस के दफ्तर में भी, जहाँ हमदोनों के जीवनसाथी काम करते थे, कोई स्त्री नहीं दिखाई दी- प्रोड्यूसर, डायरेक्टर न सही, कोई कैजुअल अनाउंसर ही…कभी इस बात पर गंभीरता से सोचिएगा कि आपको दफ्तर से घर लौटा पुरुष देश विदेश की खबरें देखता और दफ्तर से लौटी स्त्री मोबाइल पर लगी क्यों दिखाई पड़ती है? क्या आज का यथार्थ सचमुच इतना एकरैखिक और एकांगी है?
एक आखिरी बात, ‘सद्गति 02’ की संरचना लगभग प्रेमचंद की ‘सद्गति’ जैसी ही है। जातीय भेदभाव, विद्वेष और शोषण का वही संजाल, दुखी हो कि प्रभात कहानी के अंत में उनकी लाशों का उसे तरह घसीटा जाना…पुनर्रचना और ऐसी प्रतिकृति का प्रामाणिक युग्म आप ही संभव कर सकते हैं। पर, एक जैसे दिखने वाले दोनों अंतिम दृश्यों में एक बड़ा अंतर है। पहली कहानी में जहाँ लाश का घसीटा जाना जातीय भेदभाव से उत्पन्न विडंबना का द्योतक है, वहीं दूसरी कहानी में कोरोना की विवशता से उत्पन्न स्थितियों का सूचक। मतलब यह कि प्रभात की जगह मैं या पांडे बाबा या कोई और भी मरा होता, तो उसकी यही नियति होती। ऐसे में ‘सद्गति 02’ का अंत त्रासद होते हुए भी कहानी के केन्द्रीय सरोकार की दृष्टि से विडंबना की उस ऊंचाई तक नहीं पहुँच पाता, जहाँ ‘सद्गति’ पहुँचती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि युगीन परिवर्तनों पर आपकी बारीक नजर होती है, लेकिन मुझे यह कहने की इजाज़त दीजिए कि, इस कहानी में आपने उसे भीतर के बजाय बाहर-बाहर से ही ज़्यादा देखा है। काश, आपकी निगाहें इस समय के बाह्य आवरण को भेदकर उसकी नाभि तक पहुंची होती!
मंच पर होती तो मैं पचास मिनट से कम में चुप नहीं होती। कक्षा में जाने का समय हो चुका है। इसलिए, फिलहाल मुझे यहीं रुकना होगा।
सादर
मेधावी पांडे
रमपतिया की संवेदना के बाद पांडे जी की पत्नी, माफ कीजिएगा, श्रीमती मेधावी पांडे के पत्र की तल्खी ने मुझे भी बैक फुट पर ला दिया है। पर इन चिट्ठियों को पंकज मित्र जी तक ज़रूर पहुंचना चाहिए। इसलिए ज़रूरी है कि इन चिट्ठियों को उन्हें अग्रेषित करने के लिए अपनी तरफ से एक कवरिंग लेटर भी तुरंत ही लिख डालूँ।
नमस्कार भाई!
तो आप भी साठत्व को प्राप्त हो ही गए। सचमुच समय की गति बहुत तेज होती है! आने वाली नस्लों को कभी हम भी गर्व से बताया करेंगे कि युवा कथाकार पंकज मित्र को हमने अपनी आंखों के सामने पहले वरिष्ठ कहानीकार और फिर वरिष्ठ नागरिक होते देखा है।
आप इस दुनिया को मुझसे आठ साल पहले से देख रहे हैं। पर आपके जीवन के उन शुरुआती आठ सालों में यदि हम दोनों के जीवन के साझा पच्चीस साल भी मिला दिये जाएं तो सचमुच अब वे किसी दूसरे ज़माने की बात हो चुके हैं। उसके बाद जो समय आया है, जिसे मैं भूमण्डलोत्तर समय कहता रहा हूँ, को मुख्यतः बाज़ार और संचार का समय कहा जा सकता है। बाज़ार और संचार के दो छोरों के बीच समय का जो भूगोल पसरा हुआ है, उसका चरित्र इतना जटिल, बहुरंगी, बहुरैखिक और परस्पर प्रतिच्छेदी है कि उसकी कोई एक प्रतिनिधि तस्वीर नहीं बनाई जा सकती। जिन कुछ तस्वीरों के कोलाज से इस समय का चरित्र मुकम्मल होता है, उन सबकी तो नहीं, पर हाँ, उनमें से अधिकांश की छवियों-प्रतिछवियों से आपने जो कथा-संसार जीवंत किया है, वह हमारे कथा-समय की सबसे मज़बूत गवाहियों में अग्रगण्य है।
यूं तो अलग-अलग मंचों से कई बार मैंने कहा ही है, पर आज ‘पाठा’ होने के मुबारक मौके पर सीधे आप से भी कहना चाहता हूँ कि इक्कीसवीं सदी में घटित हुए बदलावों को रेखांकित करने की दृष्टि से, आप ‘हमारी पीढ़ी’ और यदि कविता जी के शब्द उधार लूँ तो ‘अपनी पीढ़ी’ के सर्वाधिक विश्वसनीय कहानीकारों में शुमार हैं। यह कहने में मुझे कोई संशय या संकोच नहीं है कि शहर होने को व्यग्र कस्बों के सीमांत से यदि किसी को समकालीन भारत का आर्थिक-सांस्कृतिक-सामाजिक भूगोल देखना हो, तो उसे एक बार आपकी कहानियों से ज़रूर गुज़रना चाहिए।
यह बड़ी बात है कि बाजार और संचार के दुकूल समय में जब कुछ लेखक-आलोचक साँचाई बड़बोलेपन और सूचनाओं के गट्ठर को ही कहानी का नवावतार मानते हुए कहानी की संरचना में बड़े बदलावों की विरुदावलियाँ गा रहे हों, आपने अपने भीतर के किस्सागो और तंजिया हंसोड़ जो खुद कभी खुलकर नहीं हँसता पर जमाने के अधरों पर हास्य की कई-कई वक्र लकीरें खींच जाता है, पर बेपनाह भरोसा किया। यही कारण है कि बिलौती महतो, बेचूलाल, सोमरा, मंगरा, बैजू-झुनिया, बंटी-बबली और नररू-मत्तू जैसे चरित्र सिर्फ कहानियों के चरित्र भर नहीं रहते, बल्कि कहानियों के फ्रेम से बाहर निकलकर हमारे आस-पास सांसें लेने और विचरने लगते हैं। कहानी और कहानीपन के ठाठ की रक्षा करते हुए अपने समय की दुरभिसंधियों में मारक और दृष्टिपूर्ण हस्तक्षेप करने की यह कला कम ही कथाकारों में होती है। आपके कथाकार की इन विशेषताओं पर हमेशा से चर्चा होती रही है, अलग-अलग अवसरों पर इसे परखा-पहचाना भी जाता रहा है।
आपके कथा-साहित्य पर समग्रता में हुई बातचीत के बावजूद जिस पक्ष पर अपेक्षाकृत लोगों का कम ध्यान गया है, वह है- आपके द्वारा हिन्दी की क्लैसिक कहानियों की पुनर्रचना। मुझे लगता है, उस पर अलग से विचार किया जाना चाहिए। यूं तो आधा दर्जन से ज्यादा क्लैसिक कहानियों के संदर्भ समयानुकूल और युगीन कायांतरण के साथ आपकी कहानियों में कभी जगमगाते तो कभी टिमटिमाते दिखाई पड़ते हैं। लेकिन ‘कफन’, ‘रसप्रिया’, ‘सद्गति,’ और ‘दो बैलों की कथा’ हिन्दी की वे चार बड़ी कहानियाँ हैं, जिसकी सीधे तौर पर आपने पुनर्रचना की है। मेरा सौभाग्य है कि इनमें से पहले दो की पुनर्रचना क्रमशः ‘कफन रिमिक्स’ (रचना समय, कहानी विशेषांक; 2016) और ‘रसपिरिया पर बज्जर गिरे’ (‘पुनसृजन में रेणु’ – कथादेश; फरवरी 2022) शीर्षक से मेरे ही सम्पादन में प्रकाशित हुई हैं। इन दोनों ही पत्रिकाओं के सम्पादन के दौरान पुनर्रचना की योजना पर मैंने हिन्दी के कई समर्थ और वरिष्ठ कथाकारों से बात की थी। कुछ ने जहाँ इसके लिए अपनी असमर्थता जताई, वहीं कुछ को यह योजना सिरे से बकवास और आपत्तिजनक भी लगी। उनकी वरिष्ठता के सम्मान में तब मैंने उनका प्रतिवाद भले नहीं किया हो, पर उनके समक्ष यह प्रस्ताव रखते हुए मुझे भारतीय और विश्व साहित्य में स्थित मिथकों और क्लैसिक के पुनर्लेखन की सुदीर्घ परंपरा का सतत ध्यान था। तुलसीदास के शब्दों में कहूँ तो ‘नाना भांति राम अवतारा। रामायन सतकोटि अपारा॥’ रामायण, महाभारत के कई-कई प्रारूप हों या फिर शेक्स्पियर की कृतियों का दुनिया की अलग-अलग भाषाओं में पुनर्लेखन, प्रसिद्ध अँग्रेजी लेखक शार्लोट ब्रोंटे के उपन्यास ‘जेन एयर’ की एक स्त्री चरित्र की पुनर्रचना के बहाने रची गई ज्याँ रिज़ की कृति ‘वाइड सरगोसा सी’ हो या फिर मशहूर अमरीकी उपन्यास ‘गोन विद द विंड’ (मारग्रेट मिशेल) की प्रतिरचना ‘द विंड डन गोन’ (एलिस रांडेल), ये सब उसी परंपरा की मजबूत कड़ियाँ हैं। हिन्दी सिनेमा की दुनिया में तो ऐसे प्रयोग खूब हुये हैं। अकेले शेक्सपियर की कृतियों पर ही कई फिल्में बनी हैं, जिनमें ‘मैकबेथ’ आधारित ‘मकबूल’, ‘ओथेलो’ आधारित ‘ओंकारा’, ‘हैमलेट’ आधारित ‘हैदर’, ‘कॉमेडी ऑफ एरर’ आधारित ‘अंगूर’ और ‘दो दूनी चार’ जैसी फिल्में महत्त्वपूर्ण हैं। ‘देवदास’ और ‘कोहबर की शर्त’ जैसे उपन्यासों पर बनी एकाधिक फिल्मों के उदाहरण भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। रेणु की अमर कहानी ‘तीसरी कसम’ पर इसी नाम से बनी फिल्म भी पुनर्रचना का एक बेहतरीन उदाहरण है। ‘बनास जन’ में प्रकाशित पुंज प्रकाश द्वारा लिखित ‘तीसरी कसम’ का नाट्य रूपांतरण और भगवत रावत द्वारा इसी कहानी की काव्यात्मक पुनर्रचना ‘सुनो हिरामन’ भी इसी परंपरा की कड़ियाँ हैं। अनामिका अनु ने भी पिछले दिनों अपनी कविताओं ‘तीसरी कसम’, ‘जी नहीं रहे हैं जनाब थेथरई कर रहे हैं’ और ‘करमा आदमी नहीं पूरा स्टेशन है’ शीर्षक कविताओं में रेणु की तीन कहानियों ‘तीसरी कसम’, ‘रसप्रिया’ और ‘आदिम रात्रि की महक’ की काव्यात्मक पुनर्रचना की है।
वर्ष 2019 में अरुणाचल लिटरेचर फेस्टिवल के एक कथा-सत्र की अध्यक्षता करते हुये मुझे सुपरिचित असमिया कथाकार मौसमी कंदली से उनकी एक बेहद महत्त्वपूर्ण कहानी का अँग्रेजी अनुवाद ‘द क्लाउड मैसेन्जर’ सुनने का अवसर मिला था। यह कहानी कालिदास के प्रसिद्ध चरित्र मेघदूत की समकालीन पुनर्रचना है।
बिना माध्यम बदले हिन्दी कहानी में पुनर्रचना की कोई बड़ी परंपरा भले न रही हो, पर इसके जो थोड़े किन्तु सफल उदाहरण मौजूद हैं, उनमें ‘कफन 1984’ (अरुण प्रकाश), ‘डिप्टी कलक्टरी : उत्तर कथा’ (संतोष दीक्षित), ‘‘पूस की एक और रात’ (लक्ष्मी शर्मा) आदि प्रमुख हैं। ऊपर उल्लिखित कहानियों की आपके द्वारा की गई पुनर्रचनाएं विश्व और भारतीय साहित्य की उन्हीं परम्पराओं का सार्थक विस्तार हैं।
अपने पूर्वज कथाकारों की कालजयी कहानियों से गुजरते हुए यह प्रश्न कई बार सामने आता है कि आज यदि वे कथाकार हमारे साथ होते और अपनी उन कहानियों को आज के संदर्भ में फिर से लिखते तो उनका स्वरूप क्या होता? अपने पूर्ववर्ती कथाकारों की उन खास कहानियों को बार-बार पढ़ते हुये बाद के किसी कथाकार के भीतर यह भाव आना भी अस्वाभाविक नहीं कि ‘यदि इन कहानियों को मैं लिखता तो कैसे लिखता?’ अपने पुरखे कथाकारों को याद करने के इस प्रयोगात्मक तरीके की परिकल्पना में इन्हीं दो प्रश्नों की शायद सबसे बड़ी भूमिका होती है। यहाँ इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि पहला प्रश्न जहाँ पूर्ववर्ती या पुरखे लेखक के प्रति श्रद्धा भाव से उत्पन्न हुआ है, वहीं दूसरा प्रश्न उनकी रचनाओं के मूल्यांकन भाव से। ‘रसपिरिया पर बज्जर गिरे’ को अलग कर दें तो आपकी शेष तीनों कहानियाँ, पहले प्रश्न के जवाब में लिखी गई हैं। पात्र-परिवेश की संरचना तथा भाषा और दृश्यों के विन्यास की दृष्टि से मूल कहानी (‘रसपिरिया’) की लगभग अनुकृति होने के बावजूद ‘रसपिरिया पर बज्जर गिरे’ में मूल कहानी के रचनात्मक मूल्यांकन का भाव निरंतर दिखाई पड़ता है। उस कहानी की रचना प्रक्रिया के बारे में जो आपने कहा है, वह भी उसी तरफ संकेत करता है। इन चार कहानियों में से दो के पात्रों ने अपनी प्रतिक्रिया सीधे आपको ही भेजी है, जो इस पत्र के साथ संलग्न है। इसलिए मैं खुद को बाकी दो कहानियों तक ही सीमित रखूँगा।
यूं तो मोटे तौर पर ‘कफन’ और ‘कफन रिमिक्स’ दोनों ही कहानियाँ एक जैसी हैं – एक जैसे बाप-बेटे, प्रसव वेदना से कराहती एक जैसी स्त्रियाँ, प्रसव से पहले उसी तरह उनका मर जाना और उनकी अंतिम क्रिया के लिए कफन का न मिलना….बावजूद इन मोटी समानताओं के जो चीजें ‘कफन’ और ‘कफन रिमिक्स’ को एक दूसरे से अलग करती हैं, उन पर गौर किया जाना चाहिए। ‘घीसू’ और ‘माधव’ यहाँ क्रमशः ‘जी राम’ और ‘एम राम’ हो चुके हैं तो ‘बुधिया’ बुधवंती में बदल चुकी है। हाँ, मृतक यानी बुधिया और बुधवंती के स्वर्गारोहण की चिंता दोनों कहानियों के बाप-बेटे को है-
घीसू तेज हो गया – ‘मैं कहता हूँ उसे कफन मिलेगा। तू मानता क्यों नहीं?’
‘कौन देगा बताते क्यों नहीं?’
‘वही लोग देंगे जिन्होने अबकी दिया। हाँ वो रुपये हमारे हाथ न आएंगे.‘”
(‘कफन’ कहानी से)
एम. राम – “लेकिन हमरा से पूछेगी कि हमारा किरिया-करम भी नहीं किए तो हम का जवाब देंगे?”
जी. राम – “किरिया-करम तो होगा बस थोड़ा दूसरा तरीका से। देख, माटी का शरीर माटी में मिलना है। चाहे जैसे मिले। गफ़ूरवा का बाप मरा था तो सरग गया होगा कि नहीं। एतना एकबाली आदमी था।”
(‘कफन रिमिक्स’ कहानी से)
गौरतलब है कि दोनों ही कहानियों के अंत में बाप-बेटे दार्शनिक मुद्रा में आ जाते हैं। लेकिन अपनी तमाम दार्शनिकताओं के बीच बैकुंठ और स्वर्ग की बात करने के बावजूद ‘कफ़न’ के घीसू-माधव जहाँ कफन के अनिवार्य कर्मकांड से बाहर नहीं आ पाते, वहीं जी राम और एम राम कफन की सामाजिक घेरेबंदी को पीछे छोड़ जाते हैं। आर्थिक अभाव और शोषण की अंतहीन श्रृंखलाओं ने घीसू और माधव को कामचोर और अमानवीय बनाया था वहीं बुधवंती के नाम कुआं के आवंटन में प्राप्त होने वाली संभावित सरकारी धनराशि का लोभ अर्थाभाव और बेरोजगारी का दंश झेल रहे जी राम और एम राम को चैतन्य और भविष्योन्मुखी तो बनाता ही है मजबूरी में ही सही, कर्मकांड और रूढ़ियों के जंजाल से भी एक बार मुक्त कर देता है। यानी तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद जहाँ प्रेमचंद के पात्र कफन के अनिवार्य कर्मकांड में उलझ कर रह जाते हैं, वहीं आपके पात्र संभावना (लालच) से भरे अगले पल की आस में क्रिया कर्म की वैकल्पिक व्यवस्था का हवाला देते हुये कफन की अनिवार्यता से ही मुक्त हो जाते हैं। घीसू-माधव का प्रतिरोध कफन खरीदने के लिए इकट्ठा सहायता राशि को उड़ाने तक ही सीमित है। कहानी के समकाल को देखते हुये तब यह भी कम नहीं था, बल्कि उस पर यथार्थ से विलग होने के आरोप भी लगते रहे हैं। आवंटन राशि की उम्मीद में बुधवंती के शव को चुपचाप दफनाने का दृश्य रचकर आपने जी राम और एम राम के चरित्र में घीसू-माधव के प्रतिरोध का जो विस्तार रचा है, उसके लिए आप बधाई के पात्र हैं।
चाहे वह पात्रों के नाम का अंतर हो या उनकी दार्शनिक नियतियों के बीच का फासला या फिर ‘कफन रिमिक्स’ में नाम मात्र को ही सही, एक अस्पताल का होना…ये बातें सिर्फ दोनों कहानियों को एक दूसरे से अलग भर नहीं करतीं, बल्कि इनके बीच पसरे लगभग अस्सी वर्ष लंबे समयान्तराल के बीच खड़े भारतीय समाज के जातिगत और बुनियादी ढांचे में आए बदलाव और ठहराव दोनों को एक साथ रेखांकित करती हैं।
व्यवस्था और उसके अनुरूप प्रतिरोध की चेतना में आए अंतर को समझने के लिए ‘कफन रिमिक्स’ में जी राम के ये शब्द गौरतलब हैं – ‘अभी तो कम से कम छोटका हस्पताल के उजाड़, बेरंग बंद दरवाजा में लात मारने का भी उपाय है. तब तो वह भी नहीं था.’ निःसन्देह तब और अब के बीच उल्लेखनीय अंतर हुआ है, लेकिन सवाल यह है कि अस्सी बरस के बीच आया यह बदलाव पर्याप्त है? ‘कफन रिमिक्स’ के आरंभ में मुझे अपने इस प्रश्न का उत्तर मिलता है-
‘शायद घीसू ही रहा हो या गनेशी या गोविंद- नाम से फर्क भी क्या पड़ना था। एक चीज एकदम नहीं भूलते थे दोनों बाप-बेटे नाम के साथ ‘राम’ लगाना, बल्कि माधो या मोहन जो भी नाम रहा हो, एकदम छोटा करके बतलाता था- एम राम। बाप का नाम? – जी राम। पीठ पीछे गरियाते थे लोग – ऊँह! काम न धाम, नाम एम राम! सामने हिम्मत नहीं होती थी क्योंकि जमाना ‘इनलोगों’ का था या कम से कम ऐसा समझा जाता था.’
किसी खास वर्ग के लोगों का समय होना या ऐसा समझा जाना के बीच चाहे जितना बड़ा अंतर हो इसने इतना तो किया ही है कि अब किसी के सामने आप उसकी जाति के नाम पर गालियां नहीं दे सकते हैं।
प्रेमचंद ‘कफन’ में बिना हिचक चमारों का कुनबा कह जाते हैं, या शोषण की प्रतिक्रिया में घीसू-माधव को कामचोर तक दिखा जाते हैं पर आपकी कहानी लगातार चैतन्य और युगीन सामाजिक बोध से संचालित होती दिखती है। जाति की सूचना के अवसर पर मौन या अप्रकट की तकनीक का इस्तेमाल हो या जी राम और एम राम को कामचोर के बजाय बेकार बताना, ये आपकी उसी चैतन्यता के उदाहरण हैं। पर एक प्रश्न आपसे जरूर पूछना चाहता हूँ कि अस्सी वर्षों के लंबे अंतराल के बावजूद ‘कफन रिमिक्स’ की बुधवन्ती के जीवन की छवियाँ ‘कफन’ की बुधिया के जीवन की छवियों से कुछ खास अलग क्यों नहीं दिखतीं? जबकि एक जैसी स्थितियों के बावजूद जी राम और एम राम घीसू-माधव से बहुत अलग हैं।
‘कफन रिमिक्स’ पर अपनी राय मैं पहले ही विस्तार से लिख चुका हूँ। माफ कीजिएगा, यहाँ जो मैंने कहा है, वह उसी का दुहराव भर है। लेकिन प्रसंगवश यह दुहराव मुझे जरूरी लगा।
चिट्ठी लंबी होती जा रही है, पर इसे समाप्त करने के पहले कुछ शब्द ‘दो बैलों की नई कथा’ पर भी-
प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’ के फॉर्मेट में लिखी होने के बावजूद ‘दो बैलों की नई कथा’, कई अर्थों में उसका प्रतिलोम है। प्रेमचंद की कहानी के दोनों बैल जहाँ भौतिक रूप से बैल ही हैं, वहीं आपकी कहानी के दोनों बैल मनुष्यों के प्रतीक हैं। ये मनुष्य कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि अपने समय के दो शीर्ष सत्ता पुरुष हैं। पिछले सदी के आखिरी दशक में तथाकथित सांस्कृतिक राजनीति की जो हवा चली थी पिछले दो दशकों में अब वह एक चक्रवात का रूप ले चुकी है। राजनीति के मैदान में खेलते दिख रहे लोग असली खिलाड़ी नहीं बल्कि खिलाड़ियों के वेश में दिखने वाली कठपुतलियाँ हैं। उन कठपुतलियों की डोर जिन मालिकों के हाथों में है वे पुराने जमाने के जमींदार या सामंत से कहीं बहुत आगे की चीज हैं, जो राजनीति को मोहरा बनाकर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर लेना चाहते हैं। नागरिकों के बीच विभाजन और धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति को सत्ता और सरकार का मौन समर्थन एक अगोपन रहस्य की तरह फलफूल रहा है। अतीत की समस्त उपलब्धियों को शून्य बताते हुए स्वयं को प्रथम और आखिरी निर्माता की तरह स्थापित करने का स्वयंभू सिलसिला रोज कुछ और अहमन्य होता जा रहा है। यह कहानी इन सारी स्थितियों का एक प्रामाणिक प्रतिरूप तो रचती है, लेकिन मालिक के बजाय कठपुतली पर ही फोकस होने के कारण अर्थ सत्ता, धर्म सत्ता और राजनैतिक सत्ता के गठजोड़ से उत्पन्न दुरभिसंधियों की सूक्ष्मताओं तक नहीं पहुँच पाती। प्रेमचंद की कहानी ऊपर से भले बैलों की कहानी दिखती है, लेकिन अपने प्रतीकार्थों में स्वामीभक्ति, स्वतंत्रता और भाईचारा के मूल्यों के संवाहक की तरह उपस्थित होती है। पर आपकी कहानी प्रतीकों में होने के बावजूद प्रस्तुति की वाचालता के कारण तात्कालिक वर्तमान के स्थूल राजनैतिक यथार्थ का प्रहसन भर बनकर रह गई है। मारक व्यंग्य की सामर्थ्य से सिंचित भाषा का जो ट्रेड मार्क आपने अपने नाम अर्जित किया है, वह तो इस कहानी में खूब देखने को मिलता है, लेकिन उस भाषा को एक उपयोगी उपकरण बनाकर समस्या के मूल कारण और उसकी विडंबनाओं तक पहुँचने के जिस रचनात्मक हुनर को हम आपकी कहानियों में देखते रहे हैं, उसका सतत अभाव इस कहानी में खटकता है। बावजूद इस सीमा के, एक ऐसे समय में जब बड़े-बड़े स्वनामधन्य प्रतिबद्धों की कलई उतरते देखेने को हम आज विवश हो रहे हैं, समकालीन राजनैतिक यथार्थ को आपने जिस साहस, विवेक और जोखिम के साथ बेपरदा किया है, उसके लिए आप बधाई और प्रशंसा के पात्र हैं। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि लड़ाई जीतने के लिये रणनीति और नारा दोनों की जरूरत और उपयोगिता होती है। इसीलिए किंचित सीमाओं के बावजूद यह हमारे समय की एक जरूरी कहानी है।
फिलहाल अपनी बात को यहीं विराम देते हुए ‘क्लब सिक्स्टी’ में शामिल होने की भर-भर खँचिया बधाइयों सहित यह पत्र आपको प्रेषित कर रहा हूँ। इसे ही मेरा उपहार समझिएगा। वैसे मुझे इस बात का पूरा अहसास है कि सभा गोष्ठियों में प्राप्त स्मृति चिह्नों और मेमेंटोज़ की तरह मेरा यह उपहार भी आपके लिए अनुपयोगी और निरर्थक ही है। याद है न, एक बार किसी सेमीनार से लौटते हुए भोपाल या रायपुर में हमने वहाँ प्राप्त अपने-अपने मेमेंटो होटल में ही छोड़ दिये थे। आपने कहा भी था- ‘जितना कम सामान रहेगा, उतना सफर आसान रहेगा।’ लेकिन इस पत्र के साथ संलग्न दो और चिट्ठियाँ आपके बहुत काम की हैं। उन्हें जरूर संभाल कर रखिएगा। बुधवंती तो रही नहीं। यदि आपने उसे जीवित रखा होता तो बहुत संभव है ऐसी ही एक और चिट्ठी…
आपका स्नेहाधीन,
राकेश
पुनश्च: और हाँ, नौकरी से अवकाशग्रहण के बाद लिखने-पढ़ने के लिए जरूर कुछ ज्यादा समय मिलता होगा। ‘इस साल, इस साल’ सुनते अब कई साल बीत गए, अब तो अपना अधूरा उपन्यास पूरा कर दीजिए।
***
एक तो चिट्ठी पत्री का ज़माना नहीं रहा, दूसरे डाकघर यहाँ से पाँच किलोमीटर दूर है। लेकिन जब चिट्ठी लिख ली गई है तो जाएगी भी। कल फिर पोस्टमैन इधर की तरफ आएगी। उसी के हाथ रवाना कर दूंगा। जाने रमपतिया को पंकज मित्र जवाब दें या नहीं। मुझे तो उसके पत्र का जवाब जरूर देना चाहिए।
रमपतिया को चिट्ठी लिखते हुए मेरी उँगलियाँ रुक सी गई हैं…समझ नहीं आ रहा कैसे शुरू करूँ। आदरणीय लिखना नहीं चाहता और किसी अनजान स्त्री को प्रिय संबोधित करते हुए संकोच हो रहा है। इस ऊहापोह को तनिक परे धकेलते हुए लिखता हूँ-
श्रीमती रमपतिया जी,
आपकी चिट्ठियाँ मिलीं। प्रकाशन के पूर्व ‘रसपिरिया पर बज्जर गिरे’ एकाधिक बार पढ़ी थी। भाषा और प्रवाह में रेणु के बहुत नजदीक होने के कारण कहानी ने मुझे बहुत प्रभावित किया था। पर पंकज मित्र जी के नाम आपकी चिट्ठी पढ़ते हुए इसे समझने के कई जरूरी सूत्र मिले।
आपके द्वारा प्रेषित चिट्ठियाँ मैं आज ही पंकज जी को भेज रहा हूँ। मुझे विश्वास है इन्हें वे बहुत ध्यान से पढ़ेंगे। उनके चुप रह जाने को अन्यथा मत लीजिएगा। चुप रहने के हद तक की मितभाषिता उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। वे बोलने से ज्यादा गुनने, निरखने और फिर-फिर रचने में भरोसा करते हैं। इसलिए उनकी आगामी कहानियों का इंतजार कीजिए। अपने प्रश्नों का जवाब शायद आपको वहीं से मिले।
शुभकामनाओं सहित,
राकेश बिहारी






