प्रताप दीक्षित के नवीनतम कहानी संग्रह ‘कगार के आख़िरी सिरे पर’ की समीक्षा कर रहे हैं माधव महेश.

‘उम्मीद पर दुनिया टिकी हुई है’, यह कहावत हमने जाने कितनी बार सुनी होगी। इन्हीं उम्मीदों पर कुछ ख्वाब टिके होते हैं, जो कुछ आकांक्षाएं लिये होते हैं। इन आकांक्षाओं में कभी कुछ पूरी होती हैं, कभी नहीं भी। जो पूरी नहीं होती या अधूरी रह जाती हैं, वे कभी कभी कुंठाओं के रूप में व्यक्त होती हैं। इन्हीं सबसे हमारा अनुभव संसार बनता है। ऐसे ही जीवन संसार को लेखक अपनी कहानियों में बुनता है जिसमें उसकी स्मृतियां व चिंताएं दोनों ही शामिल होती हैं। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि लेखक की उम्मीद, ख्वाब, आकांक्षा, क्षमता-अक्षमता, कुंठा, अनुभव व स्मृतियों के साथ-साथ चिंता को गद्यात्मक शैली में व्यक्त करने की कला का नाम ही कहानी है।
कहानीकार प्रताप दीक्षित जी के कहानी संग्रह ‘कगार के आखिरी सिरे पर’ की 12 कहानियों में एक कहानी है, ‘जाती मकान थोड़ी है’। यह कहानी किरायेदार और मकान मालिक के रिश्तों को दर्शाती है। इस कहानी का आखिरी हिस्सा है – ‘सपनों में पहले आने वाले घर अब झुग्गी, झोपड़ियों, सड़कों के किनारे बांसों पर तिरपाल-पॉलिथीन से डाली छतों वाले आशियानों में तब्दील हो गए हैं। उन्हें अवैध कहकर ढहा दिया गया है। रोते हुए बच्चों को संभालती बिलखती औरतें, मलबे से बचे खुचे गृहस्थी के समान निकालते मर्द। मालूम नहीं मलबे के अंदर कुछ लोग दबे रह गए हैं या नहीं। मर्दों के चेहरे पर गुस्से के बजाय आश्वस्ति है, गनीमत है कि बेदखल झुग्गी से किया गया है, रिफ्यूजी बताकर उन्हें शहर से, मुल्क से जलावतन नहीं किया गया। बुलडोजर की घरघराहट और धुएं के बीच इन घरों के मलबे के ऊपर अपने को अकेले निस्सहाय बेसहारा खड़े देखते हैं। क्या आपको लगता है उन्हें किसी मनोचिकित्सक के पास ले जाने की जरूरत है।” लेखक इसी कथन के साथ कहानी का अंत करता है। यह हिस्सा पूरी कहानी से एकदम अलग है, फिर भी कहानीकार ने इसी सिरे पर लाकर खत्म किया। क्यों? दरअसल, कहानीकार अपने समय से तटस्थ नहीं है। आजकल जो बुलडोजर कल्चर चल निकला है, लेखक के चिंता का सबब है। बुल्डोजर न्याय संगत तो कतई नहीं है और सुप्रीम कोर्ट भी इस पर टिप्पणी कर चुका है। यह जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसा है। अभी दिल्ली में ही सरकार बदलने के बाद लोगों की झुग्गी झोपड़ियों को तोड़ने का सिलसिला चल निकला। गुड़गांव में भी ठेले गुमटी या दुकानों को हटाने के लिए इसी का इस्लतेमाल किया जा रहा है। सवाल उठता है कि जिनके घर या झुग्गी-झोपड़ियां तोड़ी जा रही हैं, क्या उन्हें कहीं रहने का अधिकार नहीं है? क्या सिर्फ वही रह सकता है जो उसकी कीमत दे सकता है? लेकिन जो कीमत नहीं दे सकता, वह कहां जाएगा। मौजूदा व्यवस्था की एक बहुत बड़ी खामी है कि वह जन सरोकारों से आज़ाद है। शायद इसीलिए लेखक अपने लिए घर तलाशते तलाशते हाशिये (राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक ) के लोगों के दृश्य को एक सपने के रूप में व्यक्त करता है । हालांकि पूरे पैराग्राफ में एक पंक्ति है जो खटकती है। “औरतें, मलबे से बचे खुचे गृहस्थी के समान निकालती औरतें, मलबे से बचे खुचे गृहस्थी के समान निकालते मर्द”। यहां पर औरतों और मर्दों में जिस तरह से बंटवारा किया गया है, ठीक नहीं लगता। माना कि समाज इसी तरह से सोचता है, लेकिन लेखक भी क्या इसी तरह से सोचेगा। बाकी इस कहानी में किराए पर रहने पर रहने वालों की दिक्कतों के साथ-साथ आपसी संबंधों को भी दर्शाया गया है जिससे हम अपने जीवन में कभी न कभी दो-चार जरूर होते हैं।
संग्रह की पहली कहानी “अगली सुबह फलक पर आफताब ज्यादा रोशन था”। मौजूदा दौर के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सांप्रदायिकता को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानी है। दोस्ती कैसे धार्मिक दायरे का अतिक्रमण करती है, इसमें देखा जा सकता है । लेखक का अपना अनुभव व कुंठा है जो इस कहानी में कहीं न कहीं प्रतिबिम्ब होती है। इसी कहानी का एक हिस्सा है “नहीं, यह मुमकिन नहीं हम किसी तरह काम चला लेंगे – राम आधार ने कहा था। ‘जनाब, राम आधार पांडे जी, आप इसे मना नहीं करेंगे,’ उनकी आवाज़ में आदेश था, ‘यदि आपकी गैरत को गवारा नहीं हो तो माफी चाहता हूं, इसे आप उधार समझ कर रख लें। जब हो तब चुका दीजिएगा। अच्छा इजाजत दीजिए,’ नाजिम और बेगम चलने को तैयार हो चुकी थी।” यह इस कहानी का एक अहम हिस्सा है । यहां पर कहानीकार को और तर्क रखने चाहिए थे। नाजिम साहब के इतने तर्क पर्याप्त नहीं लगते हैं ।
बढ़ते हैं अगली कहानी की तरफ, “व्यवस्था चालू आहे”। यह कहानी एक सरकारी कर्मचारी की रिटायरमेंट के बाद की दुश्वारियों की है। कोई भी कर्मचारी जब सरकारी नौकरी से रिटायर होता है तो वह फिर नहीं चाहता किसी भी विभागीय काम के लिए उसको तलब किया जाए। इस कहानी में मुख्य पात्र इन सब से परेशान होता है। वह चाहता है कि किसी तरह इन सब से उसे छुटकारा मिल जाए। लेकिन सरकारी विभागों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। रिटायरमेंट के बाद विभाग से जुड़े जांच व मुकदमे किसी और को हैंड ओवर किया जा सके। असल में यह कहानी लेखक की ही कहानी है। इस कहानी में बहुत ही सुंदर वाक्यों का इस्तेमाल किया गया है। जैसे “पुरुषोत्तम जी परिश्रमी थे, लेकिन व्यवहार कुशल नहीं।” ऐसा ही एक और वाक्य है, “एक टिमटिमाती उम्मीद की लौ जरूर मन के किसी कोने में थी।” इसी कहानी के बीच के हिस्से में आता है, “प्रबंधन कक्ष में, उसके पीछे की दीवार में प्रबंधकों के नाम, जिस पट्मेंटिका में लिखे थे, उनमें उनका नाम भी, उनके पद पर रहने की अवधि के साथ लिखा हुआ। इस पहचान का क्या मतलब रह गया था?” क्या विरोधाभास है । जब हम किसी संस्थान में लंबे अवधि तक काम करते हैं और वहां की पट्टिका में नाम भी दर्ज है लेकिन जब हम जाते हैं तो उसकी कोई वैल्यू नहीं है । सिर्फ नाम ही अंकित है। इसी तरह से जब कोर्ट में जाते हैं और वहां के कामकाज से दो-चार होते हैं, ऐसा लगता है कुछ वर्षों तक इस व्यवस्था में काम कर रहा व्यक्ति इसका आदी हो जाता है और उसका यांत्रिकीकरण हो जाता है। असल में नियम कानून व्यवस्था इसलिए बनाए जाते हैं ताकि देश प्रदेश सुचारु रूप से चल सके। लेकिन ऐसा लगता है कि व्यवस्था हमारे लिए नहीं, बल्कि हम व्यवस्था के लिए बने हैं। इस कहानी में बैंक से लेकर थाना-कचहरी तक की व्यवस्था का संवेदनहीन चेहरा दिखता है ।
“यह दीमक है, साहब, जहां जाएगी महामारी की तरह सबको अपनी गिरफ्त में ले लेगी। आजकल सभी जगह दीमक फैल रही है। जरा ध्यान न दें, लग जाती है। शायद कुछ मौसम ही ऐसा हो गया है। सीलन भी तो बढ़ गई है। अभी लोग ध्यान नहीं दे रहे हैं। ऐसे ही फैलती रही तो लगता है एक दिन सब चट कर जाएगी।” उपरोक्त पैराग्राफ “दीमक” कहानी से है। शायद इस संग्रह की सबसे बेहतरीन कहानी ‘दीमक’ ही है । ऊपर दिया गया स्टेटमेंट क्या सिर्फ कमरे में फैल रही दीमक के बारे में है। ऐसा नहीं है। आसानी से समझा जा सकता है कि वह किस सीलन और किस मौसम की बात कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि लेखक की चिंता का विषय क्या है। इस कहानी का अंत बहुत ही मारक है । हालांकि ऐसा नहीं है कि यह एफर्टलेसली है लेकिन फिर भी बहुत अच्छा अंत है। कुछ चीजें हैं जो लेखक सोचता है कि दीमक का यही इलाज है, इसलिए इनका बचना जरूरी है। बात करें कहानी की तो मौजूदा दौर पैसे पर केंद्रित है और बाकी चीजों की वैल्यू कम हो गई है या पैसे ने उसे रिप्लेस कर दिया है। किताबों का तो कहना ही क्या।
कई दफा कुछ ऐसे प्रसंग या कैरेक्टर होते हैं जो याद रह जाते हैं । “कगार के आखिरी सिरे पर” कहानी में कुसुम का प्रसंग न भूलने वाला प्रसंग है। हालांकि यह बड़ा ट्रैजिक है जो मुख्य पात्र को ही नहीं, पाठक को भी परेशान करता है। कभी-कभी हम कुछ चीज नहीं समझ पाते हैं और जब तक समझते हैं तब तक बहुत देर हो जाती है। कोई हमें इशारे से अपने जज्बात हमसे साझा करने की कोशिश करता है लेकिन हम अपने में इतने खोए रहते हैं कि हम वह समझ ही नहीं पाते। और जबतक हम समझ पाते हैं तब-तक बहुत देर हो जाती है। इस कहानी में कुछ पंक्तियां कोट करने लायक हैं । “भावनात्मक खालीपन का क्या करें ?” , “देह प्रेम और भावनात्मक जरूरतों के बीच विभाजन रेखा होती ही कहां है!” इस कहानी में देखा जा सकता है एक विकलांग व्यक्ति को किस तरह से सामाजिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है जो कहीं न कहीं उसे भावनात्मक रूप से कमजोर करता है।
इसके अलावा 2 और कहानियों की बात करूं तो उनमें एक है “न खाता न बही, पूरा हिसाब सही” वहीं दूसरी कहानी “कब जाओगे प्रभु”। “न खाता न बही, पूरा हिसाब सही” कहानी विस्तार लेती हुई कहानी है। यह तीन समय काल को कवर करती है । कहानी की बुनावट भी अच्छी है ।इस कहानी में एक वाक्य है “अभिजात पर्दा नसी स्त्रियों की सामान्य परंपरा अभी बची रह गई थी” यह कुछ अखरता है । “बचा रह जाना” ऐसा वाक्य हम तब इस्तेमाल करते हैं जब हमें लगता है कि वह चीज बची रहनी चाहिए । हमारी इच्छा कहीं ना कहीं उसे बचाने की होती है । साथ ही कहानी की शुरुआत में लेखक स्पष्ट कर देता है कि वह हमारे असली दादाजी नहीं है । लेखक को अपनी तरफ से यह बताने की जरूरत नहीं थी । और चीज जितनी देर से खुले उतना अच्छा । इस कहानी का अंत जल्दबाजी में किया गया लगता है । हम सब इससे वाकिफ हैं कि बगुला मछली बहुत अच्छे से पकड़ता है। इसके लिए वह ध्यान लगाकर पूरे धैर्य के साथ बैठा रहता है । यदि आखिर के कुछ क्षणों में भी बगुले का धैर्य जवाब दे गया तो मछली गई। कहानीकार को भी वैसे ही धैर्य की जरूरत होती है ।जो इस संग्रह की कुछ कहानियों मे नहीं दिखती। यदि वह होता तो कहानी कुछ बेहतर हो सकती थी ।उदाहरण के तौर पर इसी कहानी को 3 समयकाल में देखा जा सकता है। पहले 2 समय काल वाले हिस्से को तो बहुत ही बेहतर ढंग से बुना गया है जबकि आखिरी समय काल में लेखक ने जल्दबाजी में कलम चलाई है । बात करते हैं अगली कहानी ” कब जाओगे प्रभु” पर। यह कहानी कला व शिल्प की दृष्टि से बहुत अच्छी है । इसमें कल्पना का बहुत अच्छा इस्तेमाल हुआ है। इसे पढ़ते हुए पाठक को कहानी का पूरा रस मिलता है लेकिन इस कहानी के साथ भी वही दिक्कत है । धैर्य अगर थोड़ा सा साध लिया जाता। तो यह कहानी और भी अच्छी हो सकती थी।
संग्रह पढ़ते हुए लगता है कि कहानीकार अधिकतर कहानियों में उपस्थित है और नौकरी के दौरान खुद को ईमानदार बताने की कोशिश करता है। कहानियों में नरेशन का इस्तेमाल ज्यादा है। पात्र आपस में कम ही बात करते हैं। लेखक प्रगतिशील होते हुए भी कुछ जगहों पर परंपराओं से जुड़ता प्रतीत होता है। इन कहानियों में लेखक मानवीय पहलुओं व आपसी संबंधों के साथ साथ समाज के प्रति अपनी चिंताएं भी व्यक्त करता है। कहानी संग्रह में कुछ और भी कहानियां हैं जिस पर लोग अपनी टिप्पणियां देंगे जैसे विपन्न, हत्या, हासिल । कुल मिलाकर देखें तो यह संग्रह पठनीय है और पढ़ा जाना चाहिए।
प्रताप दीक्षित जी का यह तीसरा कहानी संग्रह है। यह लोकरंजन प्रकाशन से आया है। इसमें कुल 12 कहानियां हैं। इससे पहले भी प्रताप जी के 2 कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पहला संग्रह “विवस्त्र एवं अन्य कहानियां” है जबकि दूसरा संग्रह “पिछली सदी की अंतिम प्रेम कथा” है। प्रताप जी की पैदाइश 1950 के आसपास की है और यह कानपुर के पुराने मोहल्ले में रहते थे। 20-22 की उम्र में बैंक में नौकरी पर लग गये । उसके बाद इलाहाबाद व आसपास के शहरों में ही कार्यरत रहे। रिटायरमेंट के बाद लखनऊ के जानकीपुरम में रहने लग गये। प्रताप जी की पत्र पत्रिकाओं में कहानियां, लेख व समीक्षाएं प्रकाशित होती रहती हैं।
संपर्क : 9140092759







प्रताप जी की कहानियाँ हमारे समय और समाज का सच्चा दस्तावेज़ हैं।माधव और प्रताप जी को बहुत बधाई ।