सत्य के बारे में / महेश मिश्र
“सत्य का सम्यक स्वरूप वह है जिसके केन्द्र में तथ्य या प्रमाण नहीं, बल्कि मनुष्य की अंतर्निहित संवेदना और अस्तित्व
“सत्य का सम्यक स्वरूप वह है जिसके केन्द्र में तथ्य या प्रमाण नहीं, बल्कि मनुष्य की अंतर्निहित संवेदना और अस्तित्व
“ग्राम्शी ने क्रांति को केवल सत्ता–हस्तांतरण की घटना नहीं माना, बल्कि उसे एक लंबी सांस्कृतिक प्रक्रिया बताया। यदि पूँजीवाद अपनी
“सोफ़ोक्लीज़ की कृति यह बताने नहीं आती कि शोकांतिका केवल भाग्य का खेल है; वह हमें यह दिखाती है कि
नात्सी अत्याचार का भयावह दौर… अपने बेटे से दूर नात्सियों के यातना शिविर में फँसी अन्ना सेम्योनोव्ना… शिविर के अँधेरे
कुछ लोगों की राय है कि दमन के दौर लेखन को व्यंजना शक्ति की ओर अधिकाधिक उन्मुख करते हैं और
‘द बुक थीफ़ ‘ को अक्सर ‘एक युद्ध में फँसी बच्ची की कहानी’ समझा जाता है, लेकिन यह भाषा की
साहित्य-दृष्टि वस्तुतः जीवन-दृष्टि का ही विस्तार है, यह बात चेखव पर लिखी गई महेश मिश्र की इस छोटी और गहरी
‘ ‘द कॉन्ट्रैक्ट्स ऑफ फ़िक्शन’ हमें याद दिलाती है कि साहित्य एक गहरा अभ्यास है जिसके सहारे हम अपने नैतिक
‘अच्छे साहित्य की एक पहचान यह भी होती है कि वह हमारी चेतना को उन्नत करता है और परम्परागत प्रगति-विरोधी