राम निहोर तिवारी के नवगीत प्रकृति की सुंदरता से लेकर व्यवस्था की कमियों तक, कितनी ही चीज़ों पर बहुत सहज-स्वाभाविक प्रतिक्रियाओं की तरह हैं. वे मध्य प्रदेश शिक्षा विभाग से प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हैं.

व्यथा किससे कहें
पीठ उघड़ी फ़र्श, क्षत छप्पर
व्यथा किससे कहें!
साँप का सूँघा समूचा घर
व्यथा किससे कहें!
घन सघन संकेत हैं लय के
हो गए पर्याय दिन भय के
रात डायन भाँजती खप्पर,
व्यथा किससे कहें!
वंचकों का हो रहा वंदन
स्वस्तिवाचन, लोक अभिनंदन
सत्य निगले समय का अजगर
व्यथा किससे कहें!
खोज मरुथल में सतत जल की
आज जीते आस में कल की
रोज़ कोल्हू-बैल का चक्कर,
व्यथा किससे कहें!
000
रजनी के पाँव थरथराए
सोये संकल्प सुगबुगाए.
रजनी के पाँव थरथराए.
तिमिर तरी तरुवरी हवाएँ
पात-पात बाँचती ऋचाएँ
वनपाखी भैरवी सुनाए
रजनी के पाँव थरथराए.
प्राची ने चित्र क्या उकेरे
बिन धोए धुल गए अँधेरे
कण-कण में प्राण उतर आए
रजनी के पाँव थरथराए.
भोर लगी चूनरी बदलने
किरण लगी पाँव-पाँव चलने
सूरज के अश्व हिनहिनाए
रजनी की पाँव थरथराए.
000
दर्पण दरक गया
झीनी बीनी फटी चदरिया
फिर-फिर धोने में.
फूट गया घट बार-बार के
छाछ बिलोने में.
उलटबाँसियों की कावर ले
निरगुन भटक रहा.
सगुन साधने वालों की
आँखों में खटक रहा.
कंधे थके संस्कारों के
खुद को ढोने में.
उलझाऊ कागद की लेखी
रचती रोज़ नया.
आँखों देखी कहने वाला
दर्पण दरक गया.
टूट गया अनहद का खेतिहर
बंजर बोने में.
बिखर गए संबंध, विलोपित
मर्यादा घर की.
हुई चलन से बाहर पोथी
ढाई आखर की.
झिझक रहे अपनत्वों के क्षण
अपना होने में.
झीनी बीनी फटी चदरिया
फिर-फिर धोने में.
फूट गया घट बार-बार के
छाछ बिलोने में.
000
जोड़े हाथ खड़ी संज्ञाएँ
‘सर्वनाम’ के सम्मुख सहमी
जोड़े हाथ खड़ी ‘संज्ञाएँ’.
बिना ‘विशेषण’ वैशिष्ट्यों का
अभिनन्दन कर रही ‘क्रियाएँ’.
विच्छेदित हो रही ‘संधियाँ’
विग्रह से विचलित ‘समास’ है.
संशयग्रस्त समय का ‘प्रत्यय’
मन ‘विसर्ग’ का उपन्यास है.
कर्महीन ‘कर्त्ता’ के हिस्से
“सकल पदारथ” की सुविधाएँ.
‘अलंकार’, ‘रस’ हीन व्यवस्था
लुप्त छंद का अनुशासन है.
सदाशयी सत्पथ ‘संचारी-
भावों’ का सूना आसन है.
‘शब्द-शक्ति’ सामर्थ्य खो चुकी
अर्थहीन हो गयी ‘विधाएँ’.
‘एक वचन’ का ‘बहुवचनों पर’
एक छत्र अधिकार अभी भी.
‘बोली’ से ‘भाषा’ का परिचित
परहेजी व्यवहार अभी भी.
‘वाक्यों की करनी कुछ ऐसी
वर्णों की बिखरी निष्ठाएँ.
‘तद्भव’, ‘तत्सम’ के पचड़े में
सपने उलझे विश्वग्राम के.
‘अपभ्रंसों’ की संप्रभुता में
चिन्ह नहीं दिखते विराम के.
वैयाकरण व्यथित ‘अव्यय’ की
आशा छोड़ चुकी आशाएँ.
‘सर्वनाम’ के सम्मुख सहमीं
जोड़े हाथ खड़ी संज्ञाएँ.
000
रात लगे ढोने
उजियारे की लिखी इबारत
अर्थ लगी खोने
सूरज डूबा आसमान के
रीत गए कोने.
मौसम बदला डेवढी के
जयकारे बदल गए.
पलक झपकते देवलोक के
नारे बदल गए.
‘दिन’ के सगे सहोदर थे जो
‘रात’ लगे ढोने.
‘भुजबलियों’ के आगे-पीछे
आसन बड़े-बड़े
नतमस्तक हो ‘मूल्य’ सामने
बाँधे हाथ खड़े.
बुद्धि-विवेकी हंस-बकों के
पाँव लगे धोने.
संपर्क : 6267955289







व्यवस्था को आईना दिखाते नवगीत। काश, व्यवस्था आईना देखती!
समसामयिक यथार्थ को सरल शब्दों में व्यक्त करते उत्तम नवगीत । सभी नवगीत कथ्य की सघनता को शिल्प की सरलता से अच्छी तरह संप्रेषित कर रहे हैं ।
दादा रामनिहोर तिवारी जी को बधाई और सादर प्रणाम !
बहुत सुन्दर,प्रभावी और व्यवस्था की कलई खोलते गीत.
तिवारी जी को बधाई और प्रणाम.पहलीबार इन्हें पढ़ा.
बेहतरीन बेमिसाल समय को आइना दिखाते नवगीत, हार्दिक शुभकामनाएं
बढ़िया नवगीत हैं।