नया पथ में इस बार वरिष्ठ और सुपरिचित कवि अनिल गंगल की कविताएँ। भविष्य के लिए, स्वाद, एक टिटिहरी की चीख, घट-अघट, बैंड का आखिरी वादक जैसे उनके संग्रह चर्चित रहे हैं। पत्तों की तस्वीर के फोटोग्राफर हैं, मनोज कुलकर्णी।

अतीतजीवी
वह-
समय की उल्टी धारा में
धीरे-धीरे घुलता हुआ एक नाम है
जिसकी देह पर स्मृतियों की परतें
इतनी सघन जम चुकी हैं
कि वर्तमान उस पर टिक नहीं पाता।
उसकी आँखों में बीते हुए चेहरों की धूप है
पर वह धूप अब किसी भी दिशा में प्रकाश नहीं देती-
सिर्फ़ भीतर एक अनन्त साँझ रचती है।
वह चलता है
पर उसके पाँव आज की मिट्टी को नहीं छूते-
वे किसी भूले हुए रास्ते के
अनाम कणों से बँधे हैं।
वर्तमान उसके लिए एक अस्थिर छाया है
जिसे वह अतीत के ठोस अँधेरे से
बार-बार स्थिर करना चाहता है।
और इसी प्रयत्न में
वह स्वयं एक जीवित स्मारक बन जाता है-
जहाँ समय बहता नहीं
संग्रहीत होता है
और जीवन घटित नहीं
सिर्फ़ स्मरण में पुनः घटित होता रहता है।
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आदम का निषिद्ध फल
स्वर्ग के निर्जन उपवन में
जहाँ हवा भी आदेशों में साँस लेती थी
वहाँ एक वृक्ष था-
अपराध की तरह खड़ा
और उसकी शाखाओं पर लटके थे कुछ प्रश्न
जिन्हें ‘फल’ कह कर छिपा दिया गया था।
आदम ने देखा-
कि ज्ञान का रंग हमेशा निषेध की स्याही से गाढ़ा होता है
और जिज्ञासा हर आदेश के भीतर
एक धीमी दरार बनाती रहती है।
हव्वा ने कहा-
‘क्या सचमुच यह फल इतना ़ख़तरनाक है
या फिर डर का नाम दे कर
हमें अधूरा रखा गया है ?’
और उस क्षण
जब दाँतों ने छुई वर्जना की त्वचा
तो टूटी केवल आज्ञा नहीं
टूटा वह भ्रम भी
कि मासूमियत ही मुक्ति है।
फल का रस मीठा नहीं था-
वह था कडु़वा, तीखा, चुभता हुआ
जैसे पहली बार स्वयं को देख लेना।
स्वर्ग की दीवारें धीरे-धीरे पीछे छूट गयीं
और पृथ्वी की कठोर मिट्टी पर पहला क़दम पड़ा-
दोष के बोझ से नहीं
बल्कि समझ के भार से।
तब से हर मनुष्य
अपने भीतर एक आदम लिए फिरता है
और हर निषिद्ध फल उसे पुकारता है-
कि सत्य हमेशा किसी न किसी ‘ना’ के पीछे
छिपा होता है।
और शायद निर्वासन ही पहली स्वतंत्रता था।
लेकिन कहानी यहीं नहीं थमती-
हर युग में कोई न कोई वृक्ष फिर उग आता है
किसी किताब के हाशिये में
किसी सत्ता के आदेश में
किसी परंपरा के कठोर मुखौटे में।
हर बार कोई हव्वा धीमे से पूछती है-
‘क्या हमें सच जानने का अधिकार नहीं ?’
और हर बार कोई आदम
अपने ही भय से जूझते हुए हाथ बढ़ा देता है।
निषिद्ध फल अब सिर्फ़ एक फल नहीं रहा-
वह बन गया है प्रश्न पूछने का साहस
अनसुनी राहों पर चलने की ज़िद
और तय सीमाओं के पार स्वयं को गढ़ने की बेचैनी।
ई्रश्वर अब भी कहीं न कहीं
अपने स्वर्ग की रखवाली करता है
पर मनुष्य हर निर्वासन में एक नया संसार बना लेता है।
और अंततः जब हम अपने भीतर झाँकते हैं
तो पाते हैं कि वह फल अब बाहर नहीं
हमारी चेतना में पक चुका है।
उसे खा लेना कोई पाप नहीं
बल्कि एक स्वीकार है-
कि हम अधूरे नहीं रहना चाहते।
और शायद हर बार जब हम सच चुनते हैं
स्वर्ग थोड़ा और पीछे छूट जाता है-
और मनुष्य थोड़ा और मनुष्य हो जाता है।
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मणिपुर
मणिपुर किसी नक़्शे पर
बस एक छोटा-सा राज्य नहीं है
यह एक काँपती हुई स्मृति है
जिसे बार-बार आग में डुबो कर इतिहास कहा जाता है।
यहाँ पहाड़ अपनी हरी देह पर बारूद की गंध ढोते हैं
और नदियाँ कभी-कभी लाल हो जाती हैं
जैसे किसी ने उनमें शर्म बहा दी हो।
गाँवों के बीच धुएँ की पतली लकीरें उठती हैं
मानों घर आकाश को चिट्ठियाँ लिख रहे हों-
‘हमें बचा लो।’
पर आकाश
राजधानी की ओर झुका रहता है।
मणिपुर में औरतों की आँखों में
अब भी बची है एक ज़िद्दी रोशनी-
वे रोती नहीं
वे इतिहास को अपनी देह पर लिखती हैं।
बच्चे स्कूल की किताबों में शांति का अर्थ पढ़ते हैं
और घर लौट कर बंदूक की आवाज़ से
उसका विलोम समझते हैं।
मणिपुर दरअसल एक ऐसा प्रश्न है
जिसे देश बार-बार टाल देता है।
और जब रात गहरी होती है
तो जले हुए घरों की राख से धीरे-धीरे उठती है
एक फुसफुसाहट-
‘क्या हम सचमुच इसी देश के नागरिक हैं ?’
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सोनम वाङ्चुक
लद्दाख की ठंडी चुप्पियों में एक आदमी
आग की तरह खड़ा है।
वह बर्फ़ से पानी निकालता है
और पानी से भविष्य गढ़ता है-
जैसे कोई साधु मंत्रों से नहीं
मेहनत से चमत्कार करता हो।
उसने देखा सूखती नदियों का दुःख
और बच्चों की आँखों में जमे हुए सवाल-
तब उसने खड़े किए आइस स्तूप
जैसे रेगिस्तान में उम्मीद के स्तंभ।
वह शिक्षक है-
किताबों से नहीं, हक़ीक़त से पढ़ाता है;
कहता है-
‘सीखना, जीना है,’
और जीना सिर्फ़ शहरों में नहीं होता।
उसकी आवाज़
पहाड़ों से टकरा कर वापस नहीं आती
बल्कि सरकारों के दरवाज़ों तक पहुँचती है-
कभी धीमे
कभी उपवास की ख़ामोशी में और भी तेज़।
वह पूछता है-
‘क्या विकास सिर्फ़ सड़कों का नाम है?’
और फिर अपने हाथों से एक और रास्ता बनाता है।
लद्दाख की रातों में जब तापमान गिरता है
हड्डियों से भी नीचे-
वह आदमी अपनी ज़िद से ताप पैदा करता है।
वह जानता है
बर्फ़ पिघलती है धीरे-धीरे
पर इरादे अगर सख़्त हों
तो हिमालय भी रास्ता दे देता है।
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जमरात के पत्थर
हज की तपती दोपहर में
जब पाँवों के नीचे रेत धधकती है
और माथे पर पसीना दुआ बन कर चमकता है
तब उठता है एक छोटा-सा पत्थर हथेली की झिझक से।
ये पत्थर सिर्फ़ कंकड़ नहीं होते-
इनमें छिपी होती हैं अपनी-अपनी पराजयों की किरचें
लोभ की महीन धूल
अहंकार की जमी परत
और वह फुसफुसाहट जो हर बार बहकाती है।
जमरात की ओर बढ़ते क़दम
दरअसल भीतर की घाटियों से गुज़रते हैं
हर फेंका गया पत्थर हवा में एक क्षण ठहरता है,
मानो पूछता हो-
‘क्या सचमुच तुम तैयार हो
अपने भीतर के शैतान से लड़ने के लिए ?’
भीड़ में उठती आवाज़ें सिर्फ़ नारे नहीं होतीं
वे सदियों की प्रतिज्ञाएँ हैं-
इब्राहीम की स्मृति में अपने ही मोह के विरुद्ध।
और जब पत्थर उस प्रतीक से टकराता है
तो गिरती है सिर्फ़ एक आवाज़ नहीं-
थोड़ा-सा घमंड
थोड़ी-सी स्वार्थ की दीवार
थोडी़-सी अंधी महत्वाकांक्षा भी।
जमरात के पत्थर दरअसल बाहर नहीं
भीतर फेंके जाते हैं-
जहाँ हर मनुष्य
अपने ही प्रलोभनों का क़िला खड़ा करता है।
हज से लौटते हुए हाथ खाली होते हैं
पर हथेलियों में रह जाती है एक हल्की-सी खरोंच-
याद दिलाने को कि सच्ची जंग भीड़ में नहीं
अपने भीतर लड़ी जाती है।
मो. 8233809053






