एक आधा-अधूरा आत्मकथ्य : मैं से गुजरता हुआ ‘मैं’ / जवरीमल्ल पारख


“मैं किस बात पर बोलता हूं, किस बात पर चुप रहता हूं। किस बात पर क़दम आगे बढ़ाता हूं, किस बात पर क़दम पीछे खींच लेता हूं। कब किसके साथ खड़ा होता हूं और कब किससे दूरी बनाता हूं। यह सब कुछ करना या न करना न केवल मेरे लिए महत्वपूर्ण है बल्कि उस समाज के लिए भी, उस राष्ट्र के लिए भी और उस दुनिया के लिए भी जिसका मैं हिस्सा हूं और इसीसे मेरी सामाजिक भूमिका तय होती है।”– जवरीमल्ल पारख का यह लेख अपनी जीवन-यात्रा के बारे में है, पर उनकी आत्मकथा जीवन की पाठशाला की तरह संस्मरणात्मक नहीं, चिंतनपरक है। कह सकते हैं कि यह जीवन-यात्रा के पड़ावों से ज़्यादा उसके ईंधन और उसकी दिशा से ताल्लुक रखता है।

 

मैं कौन हूं, क्या हूं, मेरे होने का क्या अर्थ है, इन दार्शनिक प्रश्नों से मैं प्राय: दूर ही रहा हूं। हालांकि दर्शन में मेरी रुचि आरंभ से ही रही है। लेकिन इस रुचि के केंद्र में स्वयं मैं नहीं बल्कि अपने मैं से बाहर का जो सत्य है, और जो इतना विशाल, विराट और अगम्य है, अनंत के उस ओर-छोर तक जहां देश और काल का भेद तक मिटता हुआ प्रतीत होने लगता है, किसी धार्मिक या आध्यात्मिक अर्थ में नहीं बल्कि नितांत भौतिक और लौकिक अर्थ में प्रकृति जिसका प्रकटीकृत रूप है जो हमारे होने को संभव बनाती है, जिसका अंग होकर ही हमारा होना प्रमाणित होता है, लेकिन जिसके होने को भी हम ही प्रमाणित करते हैं हालांकि वह हमारे होने और न होने के पहले से भी थी और बाद में भी रहेगी—वह सत्य इस रुचि के केंद्र में रहा है।

प्रकृति के इस विराट सत्य में ही ‘मैं’ भी उपस्थित है। इसे ‘मैं’ ही प्राय: भूल जाता है। और जब-जब जिस-जिस क्षण उसे इस बात का एहसास होता है, उसे ‘मैं’ की क्षणभंगुरता का एहसास भी होता है, और यह एहसास उसे गहरे अवसाद से घेर लेता है। लेकिन इस एहसास के दौरान भी यह भुला दिया जाता है कि क्षणभंगुर होने के बावजूद वह ‘मैं’ भी उतना ही विशाल, विराट और अगम्य है जितनी प्रकृति स्वयं। क्योंकि प्रकृति अपनी पूर्णता के सूक्ष्म रूप में स्वयं ‘मैं’ में उपस्थित रहती है।

जिस सत्य को याद रखने की ज़रूरत सबसे ज्यादा है, उसकी जगह ऐसे छोटे-छोटे अपने ही द्वारा निर्मित असत्यों को या अर्धसत्यों (जो आधे-अधूरे रूप में असत्य ही हैं) को उस पूर्ण सत्य की जगह बैठाकर हम अपने ‘मैं’ के होने को, अपने वजूद को सत्य प्रमाणित करने लगते हैं। हमारा होना इन छोटे-छोटे असत्यों से इतना घिरा रहता है कि हम उन्हें ही सबसे बड़ा सत्य समझ लेते हैं। अपनी अस्मिता और दूसरों की अस्मिता का पैमाना उन्हें बना लेते हैं। वे ही हमारे होने के लिए, हमारे अस्तित्व के लिए निर्णायक बन जाते हैं। दूसरों से प्रेम और दूसरों से नफ़रत, दूसरों को अपना समझना और अपने को पराया समझना, हमारे रक्त में इतना घुलमिल जाता है कि उसके परे देखने की क्षमता ही खो बैठते हैं।

यह सच है कि जिस परिवार में जन्म होता है, वही आपके व्यक्तित्व को निर्मित करता है। आपका खान-पान, आपकी वेशभूषा, आपकी भाषा, आपकी धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं, आपकी आदतें, आपकी पसंद-नापसंद, यहां तक कि आपके जीवन के लक्ष्य भी आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि से तय होते हैं। इन्हीं से आपका संसार बनता है, जिसे आप दूसरों के संसार से श्रेष्ठ भले न मानते हों, न केवल उनसे भिन्न मानते हैं बल्कि अपनी पहचान भी उसी में खोजते हैं और उस पर गर्व करना भी सीखते हैं। यह सब इतने स्वाभाविक ढंग से घटित होता है कि यह सोचने की ज़रूरत भी महसूस नहीं की जाती कि हमारी निजी सोच, निजी पसंद और हमारे निजी लक्ष्य भी हो सकते हैं, जो परिवार की परंपरा से न केवल भिन्न हों बल्कि कई बार उसके विरुद्ध भी हो सकते हैं।

जाति-केंद्रित पहचान से वामपंथी पहचान सिर्फ़ बातों से नहीं बनी थी। कुछ संयोग हुए तो कुछ ऐसे अवसर आये जिसने सोच भी बदली, पसंद भी और लक्ष्य भी। और यह सब अचानक और एक दिन में नहीं हुआ। इसमें आत्मसंघर्ष कितना था, कहना मुश्किल है, लेकिन व्यक्तित्व के विकास की एक प्रक्रिया ज़रूर थी। कभी कुछ भिन्न करने का साहस जुटा सका, तो कई बार कई तरह के समझौते भी किये। और ऐसे अवसरों पर अपने-आपको सही ठहराने की कोशिश भी की। यह जानते हुए भी कि यह अंदरूनी दुर्बलता के सिवा कुछ नहीं है।

एक धर्मभीरु मारवाड़ी बनिया परिवार में धार्मिक पुस्तकों और पाठ्यपुस्तकों के अलावा कुछ अन्य पढ़ना कुफ़्र के अलावा कुछ भी नहीं था। वहां साहित्य पढ़ने और अध्यापक बनने की चाह का पैदा होना और उसे कई तरह की भवबाधाओं के बावजूद पूरा कर लेना कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी। साहित्य पढ़ने में बढ़ती अभिरुचि ने एक ओर साहित्य रचना की ओर प्रेरित किया, तो दूसरी ओर साहित्येतर पढ़ने की ओर भी। जैसे-जैसे साहित्य का अध्ययन बढ़ता गया, यह साफ़ होने लगा कि कविता, कहानी पर बात कर सकता हूं, बहस कर सकता हूं लेकिन रच नहीं सकता। अपनी ही लिखी कुछ रचनाएं इतनी सतही और फालतू लगीं कि किशोरावस्था पार करते-करते साहित्यकार बनने का इरादा हमेशा के लिए दफ़न हो गया।

लेकिन एक और बदलाव जो हो रहा था, वह यह कि साहित्य केवल रसास्वादन की वस्तु नहीं है बल्कि बौद्धिक विमर्श की वस्तु भी है। अपने आपको और अपने आसपास को जानने-समझने का माध्यम भी है। रवींद्रनाथ के गोरा और प्रेमचंद के गोदान ने इसमें अहम भूमिका निभायी। और यह केवल साहित्य के कारण ही नहीं हो रहा था बल्कि उन पुस्तकों के अध्ययन के कारण भी हो रहा था जो ऐसे बहुत से अनुशासनों से जुड़ी थीं जिनको पढ़ने में भी वैसा ही मन लगने लगा था, जैसा साहित्य में लग रहा था। बहुत कुछ पढ़ने की आदत ने धीरे-धीरे उन ज़ंजीरों को महसूस कराना शुरू किया जिसे अब तक अपनी पहचान समझ रहा था। धर्म, जाति, ईश्वर, बहुत तरह की पारिवारिक और सामाजिक परंपराएं खौलते प्रश्न की तरह सामने आने लगीं। ऐसा है तो वैसा क्यों नहीं है। वहां वैसा है, तो हमारे यहां ऐसा क्यों है। कुछ सवाल सवाल ही बने रहे तो कुछ के जवाब भी मिले। लेकिन उन जवाबों के अनुसार जीवन को ढालना आसान काम नहीं था। यह बाहरी संघर्ष भी था और आत्म संघर्ष भी था। यह अपने आपसे संघर्ष भी था और अपनों से भी। यह बदलाव की धीमी और ज़रूरी प्रक्रिया भी थी। इसी ने धर्मभीरुता से धर्मनिरपेक्षता, आस्तिकता से नास्तिकता, परंपरा से प्रगतिशीलता और हिंदूपरस्तता से आर्यसमाजी और वहां से समाजवाद होते हुए मार्क्सवाद तक की यात्रा को संभव बनाया। इस यात्रा में किताबें सबसे बड़ी मार्गदर्शक थीं तो वे अध्यापक भी थे, जो जीवन के सबसे ज़रूरी मोड़ पर खड़े मिले थे। और वे सब लोग घर-परिवार और दीन-दुनिया के, जिनके साथ एक लंबी बहस बिना किसी कटुता के चल रही थी।

ज्यां पाल सार्त्र को पढ़ते हुए उनका एक कथन मेरे मनो-मस्तिष्क पर छा गया। ‘अपने को बनाने में ही मैं मनुष्य को बनाता हूं’। यानी हम जो भी करते हैं, वह दूसरों के लिए आदर्श बन जाता है। हम यह कहकर नहीं छूट सकते कि मेरे किये का दूसरों से क्या संबंध। अगर मैं एक काम को सही मानता हूं, तो इसका मतलब यह है कि मैं उसे दूसरे के लिए भी सही मान रहा हूं। इसका मतलब यह भी है कि मैं जो करता हूं वही महत्वपूर्ण नहीं है, वह भी महत्त्वपूर्ण है जो मैं नहीं करता हूं, या जो नहीं करने का फैसला करता हूं। मैं किस बात पर बोलता हूं, किस बात पर चुप रहता हूं। किस बात पर क़दम आगे बढ़ाता हूं, किस बात पर क़दम पीछे खींच लेता हूं। कब किसके साथ खड़ा होता हूं और कब किससे दूरी बनाता हूं। यह सब कुछ करना या न करना न केवल मेरे लिए महत्वपूर्ण है बल्कि उस समाज के लिए भी, उस राष्ट्र के लिए भी और उस दुनिया के लिए भी जिसका मैं हिस्सा हूं और इसीसे मेरी सामाजिक भूमिका तय होती है।

जब आप इस तरह सोचना शुरू करते हैं तो आप अपने आसपास से निरपेक्ष नहीं रह सकते। मुझे याद है, जब अपने विवाह के संबंध में माता-पिता से चर्चा होती थी, तो मैं यह ज़रूर कहता था, ‘आप जैसा चाहते हैं, अगर मैं वैसा ही करूं तो फिर उन एक हज़ार विद्यार्थियों के सामने क्या आदर्श रख रहा होऊंगा, जिनको मैं पढ़ाता हूं।’ यह तो मैं नहीं कह सकता कि जैसा जीवन मैं जीना चाहता था, वैसा ही जीवन मैंने जिया है, लेकिन उसके लिए प्रयत्न अवश्य किया है। जब ज़रूरत हुई है तब खड़े होने की, दो क़दम आगे बढ़ाने की कोशिश की है। लेकिन इस खड़े होने से ज़्यादा मौक़ों पर मैं बैठा ही रह गया हूं और अपनी नज़रे इधर-उधर भी घुमाई है। और अपनी दुर्बलता के लिए मेरे पास हमेशा ठोस बहाने रहे हैं, लेकिन बहाने कितने भी ठोस हों, आख़िरकार वे बहाने ही होते हैं। और वे आपके व्यक्तित्व को एक दायरे में बांध लेते हैं। यह दायरा ही आपकी पहचान बन जाता है। धीरे-धीरे न दूसरे न खुद इस दायरे को लांघने का साहस जुटा पाते हैं। लेकिन यह दायरा इतना छोटा भी नहीं था कि पढ़ने-पढ़ाने और लिखने तक ही सीमित रहा हो। जब जहां ज़रूरी लगा, उन दायित्वों को निभाया जो सामाजिक के तौर पर ज़रूरी लगे। इस एहसास के कारण भी कि साहित्य और कलाएं बेहतर इंसान बनाने में कुछ हद तक ही भूमिका निभा पाती हैं और सामाजिक बदलाव के लिए तो दूसरे कई रास्तों पर क़दम बढ़ाने पड़ते हैं। क़दम बढ़ाये भी, चले भी लेकिन आज यह सवाल तो और भी बड़ा बनकर खड़ा है कि कहीं पहुंच क्यों नहीं पाये!

जिस परिवार में जन्म हुआ, वहां साहित्य पढ़ने की किसी को दिलचस्पी नहीं थी, तो अन्य कलाओं में भी किसी को रुचि नहीं थी। न गाने में, न बजाने में और न ही कुछ उकेरने में। शादी में और मंदिर में बेसुरे ढंग से गीत गाना भी कर्त्तव्य समझ कर ही किया जाता था। इसलिए फ़िल्में देखने में रुचि बढ़ी तो इस बात का एहसास भी हुआ कि साहित्य के अलावा भी बहुत कुछ है, जिसमें रुचि ली जा सकती है। सीखने की उम्र और अवसर दोनों जा चुके थे, लेकिन देखने, सुनने और महसूस करने की लंबी उम्र बाकी थी। फ़िल्मों ने इन सबका अवसर दिया और धीरे-धीरे यह एहसास भी कराया कि साहित्य की तरह अन्य कलाओं में बहुत-सी विविधताएं हैं और बहुत-से स्तर हैं। उनका आस्वादन लेने की प्रक्रिया में ही अपनी अभिरुचि का विकास करना होता है। बहुत तो नहीं लेकिन साहित्य और सिनेमा पर आलोचनात्मक लेखन में इस अभिरुचि और समझ ने बहुत मदद की।

एक विद्यार्थी (और शिक्षक) के तौर पर साहित्य पढ़ने का मतलब सिर्फ़ अपनी पसंद के साहित्य का अध्ययन करना नहीं होता। बहुत-कुछ वैसा भी पढ़ना होता है जिनमें आपकी कोई दिलचस्पी न हो। जिसकी उपयोगिता आपको नज़र न आती हो। साहित्य को पढ़ना और समझना उसी ढांचे में होता है जो पहले से क़ायम है। उससे बाहर ही विचरण करने पर अध्यापक बनने की तमन्ना पूरी नहीं होती। इसलिए रुचि न होते हुए भी बहुत कुछ ऐसा पढ़ना और समझना होता है, जो साहित्य, साहित्यिक प्रवृत्तियों को और साहित्य की परंपराओं को समझने के लिए ज़रूरी है। लेकिन सावधानी से और आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ने पर उनमें कई प्रश्न, कई दरारें और कई गड्ढे नज़र आने लगते हैं। और उनके प्रति विद्यार्थियों को सचेत करने के अवसर निकल ही आते हैं।

साहित्य सबसे पहले शब्द है और शब्द ही साहित्य को समझने का सिंहद्वार है। यही बात सिनेमा के संदर्भ में भी सही है जहां शब्द का स्थान दृश्य ले लेता है। शब्द केवल अर्थ नहीं देता, उस अर्थ के साथ और भी बहुत कुछ जुड़ा होता है। अनुभव, विचार, परंपरा। साहित्यकार जब शब्दों का इस्तेमाल करता है, तो इनके साथ-साथ ये सब भी जुड़े चले आते हैं। मुमकिन यह भी है कि शब्द का अभिधार्थ बहुत पीछे छूट गया हो। अगर हम उसी में अटके रहते हैं, तो रचना के मर्म तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। हमें उससे आगे जाना होता है, कई बार वहां तक जहां तक रचनाकार भी नहीं गया है। अगर आप अध्यापक (और आलोचक भी) हैं, तो आपका काम रचना और पाठक के बीच पुल बनाना है। आपका काम वे सारे संदर्भ जुटाना है, जिसके परिप्रेक्ष्य में रचना के मर्म तक पहुंचा जा सकता है। आपका काम रचना का अर्थ बताना नहीं है बल्कि उसके उस मर्म तक ले जाना है, जिसे आपने महसूस किया है। शेष काम तो विद्यार्थी और पाठक स्वयं कर लेगा।

यही बात फ़िल्म के बारे में भी सही है। दृश्य केवल यह नहीं बताता कि क्या हो रहा है। उसके साथ-साथ अनुभव, विचार और परंपरा भी आते हैं। कठिनाई यह होती है कि फ़िल्म में दृश्य के साथ शब्द भी जुड़े होते हैं और साहित्य का विद्यार्थी और पाठक दृश्य पर कम, शब्दों पर ज़्यादा ध्यान देता है और फ़िल्म के अर्थ को शब्दों के माध्यम से ही पाने की कोशिश करता है। जबकि शब्द बहुत बार दिग्भ्रमित करते हैं। अगर फ़िल्म में दृश्यों पर शब्द हावी हैं तो मानकर चलिए कि एक कला-रचना के तौर पर वह कमज़ोर है। फ़िल्मकार को दृश्यों पर यक़ीन नहीं है या वह दृश्यों के माध्यम से अपनी बात कहने की कला नहीं जानता।

साहित्य को मैंने हिंदी के माध्यम से ग्रहण किया और सिनेमा को भी। लेकिन इस प्रक्रिया में यह भी सीखा कि कलाएं भाषाओं के माध्यम से अपने को व्यक्त करती हों, लेकिन वे उन तक सीमित नहीं होती। अगर होती तो प्रेमचंद के साथ-साथ मंटो और चेखव नहीं चले आते। बिमल राय के साथ-साथ सत्यजित राय, आइसेंस्टीन, तारकोव्स्की और कोरोसावा नहीं चले आते।

साहित्य और सिनेमा कलासृजन है तो सामाजिक और सांस्कृतिक उत्पाद भी है। उन्हें इस रूप में भी समझना होता है और लोगों तक अपनी बात को ले जाना भी होता है। और ऐसा करते हुए उन कलाओं की तरफ भी ध्यान देना होता है, जिन्हें लोकप्रिय और व्यावसायिक कलाएं कहा जाता है। क्योंकि वे केवल मनोरंजन नहीं करतीं बल्कि एक संदेश भी देती हैं और वह संदेश लोगों की चेतना को निर्मित करने में भूमिका अदा करता है। उन्हें यथास्थितिवादी बने रहने देता है, या पीछे की ओर धकेलता है या बेहतर बदलाव की ओर प्रेरित करता है। चुनौती यह है कि अधिकतर पाठक और दर्शक आस्वादन के दौरान यह पहचान नहीं पाते कि उनकी चेतना में ऐसा कोई बदलाव हो रहा है। साहित्य, मीडिया और सिनेमा आदि पर लिखते हुए कहीं न कहीं ये सारे प्रश्न सामने खड़े रहते हैं।

और कभी-कभी लिखते हुए चारों ओर नज़र डालने पर सब कुछ इतना निरर्थक लगता है कि कलम रुक-रुक सी जाती है।

फिर भी लिखना जारी रहता है।

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2 thoughts on “एक आधा-अधूरा आत्मकथ्य : मैं से गुजरता हुआ ‘मैं’ / जवरीमल्ल पारख”

  1. प्रोफेसर पारख जी का यह लेख आत्ममंथन, दार्शनिकता और बेझिझक सच्चाई से भरा हुआ है। अपने संकीर्ण पारिवारिक, जातीय और धार्मिक बंधनों से निकलकर उनकी बौद्धिक यात्रा धर्मनिरपेक्षता, प्रगतिशीलता और मार्क्सवाद तक की एक धीमी लेकिन साहसिक यात्रा है।

    उन्होंने साहित्य को सिर्फ रसास्वादन का विषय नहीं, बल्कि आत्म तथा समाज को गहराई से समझने का माध्यम बनाया, साथ ही सिनेमा की दृश्य भाषा की गहराई को भी बखूबी समझा और उसका आलोचनात्मक विश्लेषण किया। सार्त्र के विचारों से प्रेरित होकर वे हर व्यक्ति की सामाजिक जिम्मेदारी को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं, इसके साथ ही अपनी आत्मिक कमजोरियों, चुप्पियों और अपने लिए बनाए गए बहानों को भी बेझिझक स्वीकारते हैं।

    उनका लेखन सिर्फ शुद्ध विचारों से नहीं, बल्कि जीवनानुभवों, आत्मसंघर्षों और सच्चे बुद्धिजीवी के नैतिक दायित्वों से पूर्ण है। निरर्थकता के क्षणों के बावजूद उनका लेखन जारी रहता है—यही उनकी सबसे बड़ी ताकत और विशेषता है।

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