विजय राही के संग्रह दूर से दिख जाती है बारिश पर प्रेमचंद गांधी की ज़रूरी टिप्पणी।

युवा कवि विजय राही इक्कीसवीं सदी में सामने आए युवा कवियों में इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि इस क्रूर, अमानवीय और निर्दयी समय में भी उनके यहां पारिवारिक, सामाजिक, मानवीय, नैसर्गिक एवं अनजाने संबंधों की असीम आत्मीयता से लबरेज कविताएं हैं। विजय राही की कविताएं लंबे समय से पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं और उनकी कविताओं ने पाठकों-आलोचकों का ध्यान आकृष्ट किया है। इसी वर्ष विश्व पुस्तक मेले में उनका पहला कविता संग्रह ‘दूर से दिख जाती है बारिश’ राजकमल प्रकाशन से आया है। यहां स्त्रियों के दु:ख इतनी सघनता के साथ सामने आते हैं कि परिवार, समाज और ज्ञात-अज्ञात स्त्रियां भी पाठकों के संवेदना जगत में बहुत गहरे तक पैठ जाती हैं। विजय की कविताओं का संसार मुख्य रूप से गांव-देहात और शहर में संघर्षरत लोगों के हर्ष-विषाद से भरा-पूरा है। यहां गांव में अभावों से जूझते परिवार हैं, लेकिन उनमें आपसी संबंधों की ऐसी गहरी ऊष्मा है कि वे हमारे लिए कविता के पात्रों से कहीं अधिक एक विस्तृत एवं बहुआयामी आख्यान के वाहक हो जाते हैं। उनके जीवन के छोटे-छोटे प्रसंग भी रसदार फलों की तरह जीवन-रस से सराबोर लगते हैं।
जैसे हमको गाड़ी दूर से दिख जाती है
मां को दूर से दिख जाती है बारिश
इन कविताओं में मां का वात्सल्य है तो संतान और परिवार को लेकर उसकी चिंताओं का असीम संसार भी है। बहनें तो जैसे मां की तरह ममतालु और तमाम दु:खों के बीच भी पिता की तरह भाई में आसरा हेरने वाली। ससुराल में बहन के दु:खों से परेशान भाई है, लेकिन मां है कि सब कुछ जानते हुए भी कहती है “म्हारी बेटी खूब मौज में है।” एक स्त्री अपनी बेटी के दु:खों को परदे की ओट में छिपा लेना चाहती है, क्योंकि वह कामना करती है कि एक दिन सच में बेटी मौज से जिएगी। दु:ख और कष्टों को ढांपना भारतीय ग्रामीण ही क्या, शहरी समाज की स्त्रियों का सदियों पुराना रिवाज है। यहां बेटियां अभावों वाले एक घर से अभावों वाले दूसरे घर में जाती हैं। स्त्रियों का सूमचा जीवन ही यहां अभाव और कष्टों से भरा हुआ है।
घर में जमा थे आस-पड़ौस के सब लोग
सबने पूछना चाहा उसके दु:ख का सबब
बताना चाहा कोई पारंपरिक उपाय
मगर वह कुछ भी नहीं बोली
उसने जुबान तक नहीं खोली
इस संग्रह की कविताओं में परिवार की मां, बहन, दादी, भाभी, काकी आदि स्त्रियां ही नहीं हैं, बल्कि प्रेम में डूबी और ऐन शादी से पहले घर छोड़कर प्रेमी के साथ जाती युवती है तो बकरियां चराकर जीवन चलाती किशोरी से अधेड़ हो गई स्त्री भी है। संतान न होने के दु:ख से कुएं में कूद कर जान देने चली विवाहिता है, जो जिंदा रहने से दु:खी है। एक ख़ामोश स्त्री है जो सबके सामने मुंहफट है, लेकिन अपने कष्ट और दु:खों को लेकर उसने बहुत गहरी ख़ामोशी अख्तियार कर रखी है। एक दादी है जो पोते को लेकर अपने पीहर जाती है और पोता कुएं में गिरकर मर जाता है। दादी पोते की मौत का सदमा सहन कर लेती है लेकिन बेटे ने उससे बोलना बंद कर दिया, इस दु:ख को नहीं सह पाती और मर जाती है। एक मां है जो खेत में अनाज बरसा रही है और दाना चुगती चिड़ियों को भी उड़ा रही है। एक चिड़िया का बच्चा उसके घात से घायल हो जाता है तो उसे पानी पिलाकर बचाने में जुट जाती है। वह मां अपने बेटे और चिड़िया के बच्चे को जिस वात्सल्य से देखती है, वह हमारे समय का सबसे दुर्लभ दृश्य है। इसी तरह प्रेम की बाट जोहती पत्नी है, जिसे अमरूद, सहजन की फली, ताजी सब्जी, पीली लूगड़ी, नाक की लौंग और कान की बालियां जैसी मामूली चीजों को लेकर आने की कामना करती है। कवि भंवरी देवी से मिलने जाता है तो उसे खेत में काम करते देख रोने लगता है और साथ में भंवरी देवी भी रोने लगती है। रुलाई विजय की कविताओं में कहीं न कहीं से टपक ही पड़ती है, कविता में यह मार्मिकता विजय की शक्ति है, दोष नहीं। आज के समय में सबसे मुश्किल काम है किसी के दु:ख-कष्ट में शामिल होकर रुलाई तक पहुंचना या पाठक तक पहुंचा देना।
मेरा बच्चा मेरे बिना रो-रोकर अधमरा हो जाता है
उन सारे बच्चों की चीत्कार
मां-मां की पुकार मेरे कानों में गूंजती है
मैं उन्हें यहां-वहां ढूंढ़ती हूं और रोती हूं
फिर अपने बच्चे को देखती हूं
सीने से लगाती हूं दूध पिलाती हूं
और दोबारा रोती हूं
अपनी पीढ़ी के कवियों के अनुरूप विजय राही के पास भी देशज-ग्राम्य जीवन की सहज, अकृत्रिम और अपनी तरह की मौलिकता से भरपूर प्रेम कविताएं हैं। इनमें जीवन की सारी ऋतुएं घर, आंगन, चूल्हा-चौका, खेत, खलिहान, जंगल, किराए का कमरा, फूल-फल, मां-पिता-बहन-बच्चा और तमाम माध्यमों से उपजता है और पाठक को अहसास होता है कि प्रेम की सघनता देह के मांसल सौंदर्य से नहीं, भाव और शब्दों के सहमेल से निर्मित होती है। मनुष्य के सारे संबंध प्रेम के ही संबंध होते हैं, लेकिन सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-पारिवारिक कारण प्रेम के सामने बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं और ऐसे में जो बिछोह होता है, वह दो मनुष्यों का नहीं, पूरे मानव समाज का होता है। दुनिया में कहीं भी टूटता प्रेम संबंध मनुष्य समाज को तोड़ता है।
भाई पर वार करते समय
लाठी एकबारगी झटका ज़रूर खाती है
रुक जाते हैं हाथ अधबीच हवा में ही
क्योंकि वह नहीं चाहती है
कि भाई, भाई के हाथ मरें
बल्कि वह तो हमेशा यही चाहती है
भाई जब भी मरें साथ-साथ मरें
विजय राही कविताओं के साथ ग़ज़लें भी लिखते रहे हैं। इसलिए विजय की कविताओं में एक ख़ास तरह की लयात्मकता है और कई जगह कविता में मितकथन सूत्र वाक्य या सूक्तियों के रूप में सामने आते हैं। ऐसे मितकथन कविताओं में भरपूर हैं। कुछ उदाहरण देखें:
कविताएं/कवि-मन में चलने वाली आंधी की बेटियां हैं
जीवन की ऐसी ही एक आंधी में/तुमसे बिछड़ने के बाद/मेरी छाती टूट गई थी
अकेले तिल-तिल मरना क्या किसी जेल से कम है
अभी से मन को कच्चा मत कर/अभी तो धरती की गोद से उगा है बेटा
जीवन में जो भी शख़्स मिला मुझे/मिला कम और बिछड़ा बहुत
इधर मैं टूटी बाल्टी को देख रहा था/और कमरे में बैठा अकेला रो रहा था
तुम्हें याद करना/फूलों को याद करना है
तुम्हारे बाद/अब मृत्यु हमारी सहयात्री है
किसी ने कल मुझे अधूरा कहा/किसी की कल अचानक याद आई
दिया बझाने से नहीं हो जाता है घर में अंधेरा/बल्कि दिल के बुझने से भी हो सकता है
एक बच्ची है ये उदासी भी/रोज़ कांधों पे आ लटकती है
शहर के कवियों ने/उसकी मृत्यु पर कविताएं लिखीं/और मुक्ति पाई
विजय राही राजस्थान के उस क्षेत्र से आते हैं जिसे माड़-जगरौटी कहा जाता है। यहां लोक काव्य परंपरा में पद गायन और हेला ख्याल की समृद्ध विरासत आज भी जीवित है। इसी क्षेत्र से हिंदी के समर्थ कवि विनोद पदरज और प्रभात आते हैं। विजय ने इस परंपरा को अपने ढंग से आत्मसात किया है और अपनी देशज बोली-बानी के शब्दों का बहुत सुंदर इस्तेमाल किया है। ऐसे शब्दों में पेकणा, कुदक्कड़े, कउ, चडू, बड़ीता, रामझारा, सरणाटा, चीलगाड़ी आदि के साथ बीच-बीच में जब लोक गीतों की पंक्तियां आती हैं तो कविता में एक अलग ही रंग पैदा होता है।
मुझे यह बात गर्व के साथ कहनी चाहिए कि विजय राही एक संभावनाशील कवि के रूप में प्रगतिशील लेखक संघ, राजस्थान की अंचल सृजन यात्रा से सामने आए थे। इस यात्रा का एक पड़ाव विजय के गांव में भी संपन्न हुआ था। इस जुड़ाव के बाद वे वैचारिक रूप से बहुत तैयारी के साथ लेखन की दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं। लेकिन इस संग्रह में ऐसी कविताएं नहीं हैं जो उनकी राजनैतिक पक्षधरता को प्रखरता से व्यक्त करती हों। संभव है पहला संग्रह होने के कारण ऐसी कविताएं शामिल नहीं की गई होंगी। लेकिन इन कविताओं से उनकी संवेदनशीलता और पक्षधरता साफ दिखाई देती हैं। आशा है कि आने वाले संग्रहों में हमें विजय राही की कविताओं के और नये आयाम दिखाई देंगे।







पठनीय समीक्षा। कवि एवं समीक्षक- दोनों को हार्दिक बधाई!
निश्चित ही विजय राही युवा पीढ़ी के सशक्त और पठनीय कवि हैं,मौजूदा आर्थिक युग में कटु और जटिल होते मानवीय संबंधों के पुनर्मूल्यांकन, तेज तर्रार भागते दौर में जीवन की बेहतरी की गुंजाइश और मानवता की महक को शब्दबद्ध करती हैं उनकी कविताएं ……..इन कविताओं में प्रकृति है,प्रेम है और उनकी सुलझी हुई मानवीय दृष्टि जो पाठक को भाव विभोर कर देती है।
दिखने में बहुत सीधी सरल कविताएं लेकिन अपने होने और सहने में मन को असहजावस्था तक ले जाती हुई।एक बेचैनी जो बजती ही रहती सह वाद्य की तरह कविताओं के पीछे।मेरी पंक्ति में कहूं ” नहीं नहीं ये कविता नहीं, दुखती आत्मा का सन्ताप है”।।
बहुत सुन्दर समीक्षा
‘नया पथ’ पर प्रकाशित होना मेरे लिए गौरव की बात है। मेरी पहली किताब ‘दूर से दिख जाती है बारिश’ की यह पहली समीक्षा है, जो कहीं भी प्रकाशित हुई है। इसलिए भी मुझे यह समीक्षा हमेशा याद रहेगी। इतनी आत्मीयता से किताब पर लिखने के लिए प्रेमचंद गाँधी जी का बेहद शुक्रिया।
इस प्रस्तुति के लिए नया पथ और संजीव जी का आभार। आप सब पाठकों का भी शुक्रिया 🌼