उमैरा अहमद और स्त्रियों के रोज़मर्रा को स्वर देती कहानियाँ / अदिति भारद्वाज
‘उमैरा अहमद के लेखन में सामाजिक जटिलताओं में, नैतिक दुविधाओं में फँसी वे तमाम स्त्रियाँ हैं जो चुपचाप हर दिन
‘उमैरा अहमद के लेखन में सामाजिक जटिलताओं में, नैतिक दुविधाओं में फँसी वे तमाम स्त्रियाँ हैं जो चुपचाप हर दिन
मेट गाला 2026 में सौंदर्य, समाज और समकालीन दृश्य-संस्कृति की एक आलोचनात्मक समीक्षा समकालीन विश्व में कुछ सांस्कृतिक आयोजन केवल
“यह संग्रह उस समय में है जब मनुष्य और प्रकृति के बीच का संबंध तेज़ी से टूट रहा है और
‘मैरी रॉय के बहाने अरुंधती ने बार बार खुद से मिलवाया है।’ —मदर मैरी कम्स टू मी को पढ़ने के बाद
रूसी फोटोग्राफर जूलिया बुरुलेवा ने गुलाबी शहर जयपुर में एक हाथी को गुलाबी रंग में रंगने का प्रयोग किया। ऐसा
गुजरात लॉ सोसाइटी यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद की फैकल्टी ऑफ़ डिज़ाइन में असिस्टंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत सुमन पांडेय का यह
‘दुनिया जिन हस्तियों की तरफ़ बड़ी उम्मीद से देखती थी, वे एप्सटीन गांव के निवासी निकले।… इस विलेज ने पूरी
‘आज हम औपनिवेशिक ग़ुलामी के एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह ग़ुलामी केवल अमरीका की नहीं है
नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा (2024) का पुनर्पाठ एक संग्रह के बहाने केशव तिवारी के समूचे काव्य-संसार पर