कवि के रूप में शालिनी सिंह और सीमा सिंह से नया पथ के पाठकों का पुराना परिचय है। यहाँ सीमा सिंह समीक्षक के रूप में आपसे रू-ब-रू हैं, शालिनी के पहले कविता-संग्रह धूप के बंद दरवाज़े पर अपनी टिप्पणी के साथ।

कविताओं की कोई निश्चित यात्रा नहीं होती, वे कभी भी किसी भी दिशा और किसी भी काल खंड से होती उतर सकती हैं । एक कवि की रचना प्रक्रिया में उसकी कल्पना, भावना, जीवन के अनुभवों के साथ उसकी स्मृतियाँ भी होती हैं। ये सभी तत्व मिल कर उसकी रचना प्रक्रिया को पूरा करते हैं। शालिनी के पहले कविता संग्रह धूप के बंद दरवाज़े में कविताओं की इस यात्रा को देखा जा सकता है, साथ ही कवि के अंतर्जगत की यात्रा को भी। सिर्फ़ कवि कविताओं का सृजन नहीं करता बल्कि कविताएँ भी कवि का निर्माण करती हैं। यह अलग बात है कि हम इस निर्माण में कविताओं को कितना शामिल करते हैं। शालिनी के कवि व्यक्तित्व में इस बात की झलक मिलती है, वे और उनकी कविताएँ एक साथ बनने की प्रक्रिया में शामिल हैं। इस साझेपन का हासिल ही है कि पहले ही संग्रह में उनकी कविताएँ मज़बूत और परिपक्व हैं। उनका रचना संसार विस्तृत और दूरगामी है। जहाँ शालिनी की कविताओं में पितृसत्ता का धूसर चेहरा है तो वहीं धर्म ईश्वर और आस्था को लेकर तमाम सवाल हैं। इन सवालों में सृष्टि उनके साथ चलती है। इस सृष्टि के निर्माण में स्त्री की क्या भूमिका है, इसे वे बखूबी समझती हैं। व्यवस्था और उसकी जकड़न का एहसास है उन्हें। ‘भरोसा’ कविता में वे स्पष्ट कहती हैं:
उन्होंने ही किया सर्वाधिक दोहन भरोसे का
जिनकी शिराओं में सभ्यता की रसोई का नमक था
पितृसत्तात्मक समाज की जड़ें कितनी लम्बी और कितनी गहरी हैं, वे जानती हैं। अभी इन गिरहों को खोलने में समय लगेगा लेकिन तब तक इस व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करना पड़ेगा, निरंतर सवाल उठाने होंगे, क्योंकि अभी भी यह समाज स्त्री को व्यक्ति के तौर पर नहीं, चरित्र के आधार पर ही उसका आकलन करता है। जहाँ एक सहज हँसी भी उसके लिए भारी है, जहाँ अभी भी वह असूर्यपश्या है, इसलिए कवि सीधे सूर्य का आवाहन करती है, उसे सभी दिशाओं से बुलाती है यह कहते हुए कि
सृष्टि की समस्त स्त्रियों की आवाज़
कण्ठ में उतारते हुए आहवान करती हूँ तुम्हारा
हे सूर्य देव तुम आओ
सात समन्दर, सात नदी, सात ताल सात द्वार
पार करने पड़े तब भी तुम आओ
स्त्री की अस्थिमज्जा को तुम्हारी उतनी ही दरकार है
जितनी सृष्टि के अन्य जीवों को
ये कविताएँ एक समान समाज की चाहना रखती हैं और घट रहे के विपरीत एक विपरीत दृष्टि रचती हैं जहाँ स्त्री एक चेतस प्राणी है, उसे अपने होने का एहसास है। जहाँ वह अब सिर्फ़ प्रेम के बहकावे में नहीं आयेगी, उसे खुद का अस्तित्व चाहिए, इसलिए वह हठी होना चाहती है:
तुमने इन हठी लड़कियों को
प्रेम की मनुहार संग वापस बुलाया
पर उन्हें अब
केवल प्रेम स्वीकार नहीं था
चाहिए थी चेतना और खुद का वजूद
यह चेतस स्त्री अपने दुख पहचानती है और जानती है कि उसे अपनी कहानी खुद ही लिखनी होगी। इसलिए वह जीवन के कान मरोड़ कर दुख को मन के बाहर ही रखती है ताकि इस संसार में रची जा सकें उसकी संभावनाएं।
लड़की जानती है उसके हाथों में
सुख की रेखाएँ हल्की हैं
वह समय के बरतन में
भय को घोटते हुए साहस निथार रही है
उसे जीवन के कान मरोड़ कर
दुख को मन के बाहर बैठाना आता है
इन कविताओं में असमानता को जीवन के परिदृश्य में और उससे बाहर भी देखा जा सकता है। जहाँ समाज है, व्यवस्था है, बाज़ार है। बाज़ार से उपजी असमानता को “आकार में हर छोटी चीज स्त्री लिंग नहीं होती“ कविता में बखूबी देखा जा सकता है, जहाँ किस तरह दैनिक जीवन की वस्तुओं को भी बाज़ार ने लैगिंक आधार पर मुनाफ़े के लिए बाँट दिया है । कवि बाज़ार से उपजे संकट और उसके परिणामों से वाक़िफ़ है, तभी वे अपनी कविताओं में बार बार इसका ज़िक्र करती हैं कि बाज़ार किस तरह से समय, समाज और सत्ता के गलियारों में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।
फिर समय बदला
तो ऐसे बदला
कि सदी की उँगली पकड़कर पहले बाज़ार आया
फिर बाज़ार के कन्धों पर सिर रखकर
निज़ाम मुस्कुराया
शालिनी की कविताओं में धर्म, ईश्वर और आस्था को लेकर बहुत से प्रश्न हैं। वर्तमान समय में जब धर्म राजनीति का अखाड़ा बन गया हो तो ऐसे समय में यह प्रश्न और इन पर उठाए गए संशय लाजिमी हैं। धर्म जिसका संबंध आस्था से है, वह मात्र दिखावा बन कर रह गया है, जहाँ लोग एक दूसरे से होड़ में लगे हैं
आस्था जो मन का विषय रहा ..
वह अब मन का उत्सव नहीं
शुद्ध दिखावे की प्रत्यंचा पर साधा लक्ष्य भर रह गया हो
धर्म के भीतर चलने लगा है मल्ल युद्ध
एक दूसरे को परास्त करने का
कवि मन ऐसे धर्म और ईश्वर से सवाल करता है कि जिस धन से किसी ग़रीब का गुज़ारा हो सकता था, उससे कई गुना धन ईश्वर के दरबार में चढ़ाया जा रहा जिसके वास्तविक हक़दार हाथ जोड़ याचना में दूर खड़े हैं।
इन कविताओं में प्रकृति अपने पूरे वैभव के साथ उपस्थित है और साथ ही साथ प्रेम भी। ‘तुम्हारी याद’, ‘फूलों के खिलने का मौसम’, ‘विदा की बेला’, ‘कोई आए तो ऐसे आए’ आदि कविताएँ प्रेम में प्रतीक्षा, प्रगाढ़ता और विरह को दर्शाती हैं जो इस संग्रह का मोहक पक्ष है। यह प्रेम में बीत गई स्मृतियों और प्रिय की प्रतीक्षा में बीत रहे समय की कविताएँ हैं जहाँ पुकारे जाने की इच्छा बनी हुई है:
बारहा पुकारने से स्मृतियों के पेड़ सदा हरे रहते हैं
तो हम प्रेम में पुकारते रहेगें एक दूसरे को
प्रकृति और प्रेम का सुन्दर समन्वय हैं यहाँ। ‘आषाढ़ बीतने से पहले’, ‘कुहासे भरे दिन’, ‘धरती के नहान के दिन’, ‘चाँदनी रात’ आदि कई कविताओं में प्रकृति को चाँदनी-सा झरता हुआ देखा जा सकता है। प्रतीक और बिम्ब इन कविताओं का वैशिष्ट्य हैं, जहाँ चाँद की तश्तरी से झरती चाँदनी है तो हवाओं संग डोलते फूलों के मन और उनके मंजीरे भी, जहाँ पक्षियों के मंगल गीत हैं तो स्त्रियों का लोक पद्धति को धारण करने का रास्ता भी।
इन कविताओं का मुख्य स्वर वैसे तो स्त्री स्वर है किन्तु यह जीवन जगत से भरपूर कविताएँ हैं। जहाँ प्रेम भी है प्रकृति भी, समाज भी है और राजनीतिक सत्ता भी, जहाँ उनकी वैचारिकी स्पष्ट है। सब मिलाकर कर कह सकते हैं कि पहला संग्रह होते हुए भी यह व्यापक परिदृश्य को अपनी कविताओं में समाहित करता है। वे आगे भी इसी वैचारिक प्रतिबद्धता को साथ लेकर लिखती रहेंगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। उन्हें शुभकामनाएँ!







सुपरिचित कवयित्री सीमा सिंह द्वारा कवयित्री शालिनी सिंह के कविता-संग्रह ‘धूप के बंद दरवाज़े’ की अत्यंत प्रशंसनीय समीक्षा। बिलकुल सही कहा कि
“फिर समय बदला
तो ऐसे बदला
कि सदी की उँगली पकड़कर पहले बाज़ार आया
फिर बाज़ार के कन्धों पर सिर रखकर
निज़ाम मुस्कुराया।”
कवयित्री और समीक्षक- दोनों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ!
दोनों कवियों को पढ़ता रहा हूँ। इस बार सीमा सिंह की समीक्षा पढ़ने को मिली।
‘नया पथ’ को इसके लिए धन्यवाद।
शुरुआती अनुच्छेद में सीमा सिंह ने शालिनी सिंह की कविताओं की अंतर्वस्तु के स्रोतों की पहचान की है-
“एक कवि की रचना प्रक्रिया में उसकी कल्पना, भावना, जीवन के अनुभवों के साथ उसकी स्मृतियाँ भी होती हैं। ये सभी तत्व मिल कर उसकी रचना प्रक्रिया को पूरा करते हैं।”
जो मूल बात है वह कवि की विचारधारा है। किसी कवि की रचना प्रक्रिया का वह नियामक तत्व है। कैसी कल्पना की जाएगी, भावना का स्वरूप क्या होगा, जीवनानुभवों को परिप्रेक्ष्य कैसे दिया जाएगा और स्मृति संभार से कौन-से हिस्से चुने जाएंगे, यह सब कवि की वैचारिकी या विचारधारा तय करती है। शालिनी जी ने पितृसत्ता और धर्मसत्ता वे गठजोड़ को पहचानने में उसी विचारधारा की सहायता ली है।
सीमा सिंह ने समीक्षा के अंत में विचारधारा का निर्देश किया है। उनकी समीक्षा ने कवि को समझने का अवसर दिया।
सीमा जी को हार्दिक धन्यवाद।
शालिनी की कविताओं जैसी ही सीमा की सुंदर समीक्षा।
दोनों को मुबारकबाद।
एक सार्थक भावपूर्ण आलोचनात्मक आलेख एक भावनात्मक काव्य संग्रह पर बधाई के पात्र हैं कवियित्री शालिनी जी और आलेख की समीक्षात्मक रचियता सीमा जी
शालिनी जी की कविताएँ जहाँ एक ओर पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुध्द भरपूर प्रश्न उठाती हैं वहीं कहीं कहीं ये भरोसा भी दिलाती हैं कि आने वाला कल बेहतर होगा ।
एक बढ़िया संग्रह के लिए शालिनी जी को और तथ्यात्मक समीक्षा के लिए सीमा जी को बहुत बधाई 💐💐
सीमा जी ने समीक्षा के रूप में सभी कविताओं के उद्धेश्य एवं सार्थकता को बड़ी ही गहराई से पेश किया है। यह समीक्षा पाठक को कविताएं पढ़ने के लिए और अधिक प्रेरित कर देता है।साथ ही साथ कविताओं की एक छोटी सी यात्रा पर ले जाती है बहुत बहुत बधाई कवि एवं समीक्षक को 👏 👏👍👍
‘धूप के बंद दरवाज़े’ शीर्षक ही अपने आप में एक मुक़म्मल बयान है कि इस संग्रह की कवि का रचना संसार जितना विस्तृत है उतना ही इनकी कविताएँ वैचारिक दृष्टि से सशक्त और प्रभावशाली हैं। साथ ही सीमा सिंह की चेतना सम्पन्न दृष्टि और समझ ने इस संग्रह पर सारगर्भित बात रखी है। दोनों ही कवि- साथियों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। 💐💐