स्मृति, प्रतिरोध और पुनस्सृजन: ‘एक चरवाहे का गीत’ / संतोष अर्श


“यह संग्रह उस समय में है जब मनुष्य और प्रकृति के बीच का संबंध तेज़ी से टूट रहा है और विकास के नाम पर चरागाह, जंगल, पहाड़ और नदियाँ लगातार नष्ट हो रहे हैं। इस समय में ऐसी कविता स्मृति, प्रतिरोध और पुनस्सृजन का कार्य करती है।”–केतन यादव के कविता-संग्रह पर महत्त्वपूर्ण आलोचक संतोष अर्श की समीक्षात्मक टिप्पणी। संतोष अर्श की ‘आलोचना की दूसरी किताब’ 2024 में प्रकाशित हुई थी। ‘विद्रोही होगा हमारा कवि’ और ‘परस्तार-ए-लखनऊ’ उनकी संपादित पुस्तकें हैं।

चरवाहे की धीमी चाल में समय की पुरानी लय बसती है। घास की हरियाली में उसका विश्वास था और पशुओं की आँखों में उसका अस्तित्त्व। लेकिन अब जब चरागाह सिकुड़ते जा रहे हैं और सड़कों की धूल स्मृतियों पर परतें बनाती जाती है, तब उसका गीत भी बदल गया है। धीमा, उदास, क्षुब्ध, आक्रोशित, किन्तु अब भी जीवित। चरवाहा जानता है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, आदिम साँस भरने की प्यारी जगह है। उसके लिए प्रकृति कोई दृश्य नहीं, मानवीय अस्तित्त्व का हिस्सा है— जिसमें प्रेम है, श्रम है और ख़ास किस्म की मौन नैतिकता भी। यह संग्रह उसी टूटते हुए संतुलन की कथा है, जहाँ हायपररियलिटी और तकनीकी विकास की तेज़ गति के बीच एक चरवाहा अपने छोटे-से निरीह और सूक्ष्म संसार को बचाने की कोशिश करता है। उसका गीत वास्तव में स्मृति है— और संभवतः एक चेतावनी भी, कि यदि यह स्वर गुम हो गया तो मनुष्य भी अपने भीतर कुछ अनिवार्य खो देगा।

‘एक चरवाहे का गीत’ शीर्षक पर्यावरणिक चेतना और पास्चरल संस्कृति के काव्यात्मक पुनर्पाठ को व्यंजित करता है। हिन्दी की काव्य-परम्परा (सूरसागर) को देखते हुए यह पास्चरल काव्य-दृष्टि का पुनराविष्कार है। समकालीन हिन्दी कविता में जिस तीव्रता से सामाजिक, राजनीतिक और अस्मिता-अस्तित्त्वगत प्रश्नों ने अपनी जगह बनायी है, उसके समानांतर ऐसी कोई महत्त्वपूर्ण धारा नहीं है जो पर्यावरणिक और पास्चरल विषयों को रोमानी आदर्श से आगे ले जा सके। जो किसी प्रकार की प्रतिरोधी इको-पॉलिटिक्स को कविता में अनायास ध्वनित कर दे। केतन यादव का ‘एक चरवाहे का गीत’ संग्रह इसके आस-पास धरा जा सकता है, जो न केवल प्रकृति और मनुष्य के सांस्कृतिक संबंध को पुनर्परिभाषित करता है, बल्कि आधुनिक उपभोग-केन्द्रित भ्रामक उन्नति को प्रश्नांकित करते हुए विस्मृत की जा रही जीवन-दृष्टि को भी प्रस्तुत करता है।

यह संग्रह उस समय में है जब मनुष्य और प्रकृति के बीच का संबंध तेज़ी से टूट रहा है और विकास के नाम पर चरागाह, जंगल, पहाड़ और नदियाँ लगातार नष्ट हो रहे हैं। इस समय में ऐसी कविता स्मृति, प्रतिरोध और पुनस्सृजन का कार्य करती है। पास्चरल संस्कृति एक सभ्यता-बोध है। ‘एक चरवाहे का गीत’ का केन्द्रीय रूपक ‘चरवाहा’ दरअसल संपूर्ण सभ्यता का प्रतिनिधि है। यह चरवाहा केवल पशुओं को चराने वाला व्यक्ति नहीं, एक ऐसी जीवन-शैली का रूपक है जिसमें प्रकृति के साथ संतुलन है, श्रम है, और जीवन में नैतिकता है, समुदाय और साझेदारी का भाव है। पास्चरल संस्कृति का मूल तत्त्व है—मनुष्य और प्रकृति का सह-अस्तित्त्व। इस संग्रह में यह सह-अस्तित्त्व मार्मिक रूप में उभरता है:

“उसके लिए उसकी जान और

उसके पशुओं की जान एक ही थी”

(शीर्षक कविता)

यहाँ मनुष्य और पशु के बीच कोई पदानुक्रम नहीं है। यह दृष्टि आधुनिक सभ्यता के उस अहंकार को तोड़ती है जिसमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी मानता है। पास्चरल जीवन में समय भी अलग तरह से चलता है, वह घड़ी या कैलेंडर का नहीं, ऋतु-चक्र और प्राकृतिक लय का समय है। ‘अक्टूबर’, ‘बाँस के फूल’, ‘चरागाह से लौटते हुए’ जैसी कविताएँ इस लयात्मक समय-बोध को पुनर्स्थापित करती हैं। प्रकृति का राजनीतिक अर्थ इस संग्रह की बड़ी विशेषता है। इसमें पर्यावरण केवल प्रकृति-सौंदर्य का विषय नहीं है, संस्कृतिमूलक राजनीति का प्रश्न है।

“अब न खेत बचे, न जंगल, न चरागाह”

यह पंक्ति केवल एक स्थिति का वर्णन नहीं, अपितु आधुनिक विकास-नीतियों की ओर क्षुब्धता भरी दृष्टि है। यहाँ पर्यावरण का विनाश सीधे-सीधे पूँजीवादी विस्तार और नव-उदारवादी नीतियों से जुड़ा हुआ है। ‘कम्पनी की गाड़ी’ जैसी कविताओं में यह स्पष्ट होता है कि सड़कें केवल सुविधा नहीं लातीं, विध्वंस भी लाती हैं, उद्योग केवल रोज़गार नहीं देते, वे विस्थापन भी पैदा करते हैं। इसी तरह पशुओं का ‘डरना’ केवल भावात्मक बिम्ब नहीं है, यह उस पारिस्थितिक अवनयन का संकेत है जो मनुष्य के क्रूर अप्राकृतिक हस्तक्षेप से हुआ है।

चरागाह का रूपक संस्कृति और पर्यावरण का सुमेल है। ‘चरागाह’ शब्द में अर्थ की जगह प्रतिरोध है। यह सिर्फ़ पशुओं के चरने की जगह नहीं, सांस्कृतिक स्थल है, आर्थिक व्यवस्था है, सामुदायिक स्मृति है। जब चरागाह नष्ट होता है, तो भूमि लुप्त नहीं होती, उस पर एक संस्कृति मिटाकर दूसरी खड़ी की जाती है और इस तरह कि एक पूरी जीवन-प्रणाली समाप्त हो जाती है। ‘चरागाह में क़ब्र’ जैसी कविताएँ इस विडम्बना को शालीन गहरायी से पकड़ती हैं। यहाँ चरागाह का विनाश दरअसल सभ्यता का क्षरण है।

केतन की इन कविताओं में प्रकृति का पुनर्पाठ  रोमानीकरण से परे है। कवि प्रकृति का चित्रण भर नहीं करता, उसकी अमूर्त  छाया को एक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में रचता है। यहाँ प्रकृति न तो केवल सुंदर है, न ही केवल भावनात्मक आलम्बन है, बल्कि यह एक स्वायत्त सत्ता है, जिसकी अपनी इयत्ता है। कवि प्रकृति को ‘मानवीकृत’ न करके उसके साथ एक समानान्तर संबंध स्थापित करता है। यह दृष्टि आधुनिक एंथ्रोपोसेन्ट्रिक (मनुष्य-केंद्रित) सोच के विरुद्ध जाती है।

 

“पत्तियों का रंग क्लोरोफिल के कारण हरा होता है

किसी मुसलमान के छूने की वजह से नहीं”

(घास का रंग)

यह पंक्ति सामयिक साम्प्रदायिकता का भी प्रतिरोध करती है और चरवाही संस्कृति के पृष्ठ पर प्रेमकथाओं के चित्र उकेरती है। इन कविताओं में पर्यावरणिक चेतना केवल पेड़ों और नदियों तक सीमित नहीं है, ज्ञान और तर्क की शुद्धता से भी जुड़ी हुई है। यह दिखाता है कि पर्यावरण को बचाने के लिए केवल भावुकता नहीं, तार्किक नैतिकता की समझ भी जरूरी है। आधुनिक तर्क नियन्त्रण का ही एक उपकरण है।

पास्चरल बनाम आधुनिकता का एक द्वंद्व इस संग्रह में बार-बार उभरता है। पास्चरल जीवन बनाम आधुनिक विकास का यह द्वंद्व दर्शनीय है। आज का विकास गति और लाभ पर आधारित है जो प्रकृति को संसाधन मानता है, व्यक्तिवाद को बढ़ावा देता है। बौद्रिला जिसे ‘उन्नति नहीं, तेज़ गति’ मानते हैं। जबकि पास्चरल जीवन संतुलन और सह-अस्तित्त्व पर आधारित है। यह प्रकृति को सहभागी मानता है, सामुदायिकता को महत्त्व देता है। अपरिग्रह का वरण करता है। पशुओं से प्रेम करता है। एक जैविक जीवन जीता है। कवि इस द्वंद्व को सरल रूप में नहीं प्रस्तुत करता। वह यह नहीं कहता कि अतीत पूरी तरह आदर्श था, मगर वह यह जरूर दिखाता है कि आधुनिकता ने मानवीय संवेदना और प्रकृति दोनों को संकट में डाल दिया है। यहाँ प्रेम भी पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। चरवाहे का प्रेम केवल किसी स्त्री से नहीं, बल्कि अपने पशुओं से, अपने जंगल से, अपनी भूमि से है। यह प्रेम एक व्यापक जीवन-प्रेम है। यही कारण है कि जब चरागाह नष्ट होता है, तो वह केवल आर्थिक नुकसान नहीं, भावनात्मक और अस्तित्त्वगत क्षति भी है।

इन कविताओं में स्मृति का एक गहरा संबंध पर्यावरण से है। बचपन की स्मृतियाँ, खेत, पेड़, नदी, प्रेम की स्मृतियाँ प्राकृतिक परिवेश, समुदाय की स्मृतियाँ, चरागाह सभी पारिस्थितिकी से उत्पन्न हैं। जब पर्यावरण नष्ट होता है, तो स्मृतियाँ भी मिटने लगती हैं। इस प्रकार यह संग्रह एक तरह से स्मृति-संरक्षण का काव्य भी बन जाता है। यदि इन कविताओं को इको-क्रिटिकल दृष्टि से देखें, तो कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदु सामने आते हैं जिसमें एंथ्रोपोसेन्ट्रिज़्म का किंचित विरोध, उत्तर-पूँजीवादी जीवन को केंद्र में रखने की प्रवृत्ति का खंडन, सस्टेनेबिलिटी का प्रश्न, लोक-ज्ञान की पुनर्स्थापना इत्यादि हैं।

संग्रह में कतिपय अस्तित्त्ववादी और मनोवैज्ञानिक गहराई की कविताएँ भी हैं। ‘असमर्थता’, ‘अप्रासंगिक’, ‘कमरा, ‘आत्महत्या से ठीक पहले’ जैसी कविताएँ आधुनिक मनुष्य की अकेलेपन, अवसाद और अस्तित्त्वगत-संकट को व्यक्त करती हैं। आत्महत्या की कविता में सामाजिक संरचना पर तीखा प्रश्न है, ‘अप्रासंगिक’ में संबंधों का क्षरण, ‘कमरा’ में आंतरिक भय और शून्यता। यहाँ कवि अंदरूनी विखंडन को बेहद सघन रूप में पकड़ता है। इसे अस्तित्त्ववादी प्रभावों के रूप में कम, मार्क्सीय एलियेनेशन के साथ अधिक देखा जाना चाहिए, जहाँ एक नैसर्गिक सांस्कृतिक परिवेश से दूसरे कृत्रिम परिवेश में व्यक्ति का निर्वासन हुआ है।

केतन यादव की कविताएँ एक साथ स्मृति, प्रतिरोध और मानवीय संवेदना की कविताएँ हैं। वे न तो केवल ग्रामीण जीवन का रोमानीकरण करती हैं, न ही केवल आधुनिक निराशा में फँसती हैं। ये दोनों के बीच में एक संवाद पैदा करती हैं। रही बात चरवाहे की तो वह प्रतिरोध के एक प्रतीक की तरह धीरे-धीरे मूर्त होता है।

(एक चरवाहे का गीत, केतन यादव, 2026, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली)


1 thought on “स्मृति, प्रतिरोध और पुनस्सृजन: ‘एक चरवाहे का गीत’ / संतोष अर्श”

  1. अंततोगत्वा आलोचक की बात माननी ही पड़ती है, केतन जी लगातार लिख रहे है और चर्चा में है यह आश्वातिकारक कारक है उनको बधाई और साधुवाद

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