दुनिया को औपनिवेशिक दौर में ले जाने की कोशिश / जवरीमल्ल पारख
‘आज हम औपनिवेशिक ग़ुलामी के एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह ग़ुलामी केवल अमरीका की नहीं है
‘आज हम औपनिवेशिक ग़ुलामी के एक नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। यह ग़ुलामी केवल अमरीका की नहीं है
नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा (2024) का पुनर्पाठ एक संग्रह के बहाने केशव तिवारी के समूचे काव्य-संसार पर
“सत्य का सम्यक स्वरूप वह है जिसके केन्द्र में तथ्य या प्रमाण नहीं, बल्कि मनुष्य की अंतर्निहित संवेदना और अस्तित्व
आज विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए थोड़े बदलाव के साथ जवरीमल्ल पारख का यह आलेख। इसका यह बलाघात
प्रखर अध्येता और समाजवैज्ञानिक कमल नयन चौबे ने टॉम बॉटमोर द्वारा संपादित ए डिक्शनरी ऑफ़ मार्क्सिस्ट थॉट का हिंदी अनुवाद
प्रताप दीक्षित के नवीनतम कहानी संग्रह ‘कगार के आख़िरी सिरे पर’ की समीक्षा कर रहे हैं माधव महेश. ‘उम्मीद पर
“मैं जीवन भर यह अनुसंधान करता रहा हूँ कि किस प्रकार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मों की परंपरा और उनके विकास
“ये लघुकथाएं एक संक्षिप्त काल की हैं, फिर भी लेखक ने परिस्थितियों, विचारों और बयान करने की कला को दोहराने
“ग्राम्शी ने क्रांति को केवल सत्ता–हस्तांतरण की घटना नहीं माना, बल्कि उसे एक लंबी सांस्कृतिक प्रक्रिया बताया। यदि पूँजीवाद अपनी