प्रखर अध्येता और समाजवैज्ञानिक कमल नयन चौबे ने टॉम बॉटमोर द्वारा संपादित ए डिक्शनरी ऑफ़ मार्क्सिस्ट थॉट का हिंदी अनुवाद किया है : मार्क्सवादी चिंतन शब्दकोश (2025, सेतु प्रकाशन)। 6 दिसम्बर 2025 को जनवादी लेखक संघ ने ‘समीक्षा-संवाद’ की शृंखला में इस पर एक चर्चा आयोजित की। विजय झा उसमें एक वक्ता थे और प्रस्तुत समीक्षात्मक आलेख उसी मौक़े के लिए तैयार किया गया था।
[आज की इस चर्चा में आमंत्रित करने के लिए जलेस और बजरंग जी का आभारी हूँ। जिस किताब या कोश पर हम चर्चा करने के लिए एकत्रित हुए हैं, उसके लिए इससे ज़्यादा उपयुक्त कोई और मंच हो भी नहीं सकता है।]
- अनुवादक
टॉम बॉटमोर संपादित ‘ए डिक्शनरी ऑफ़ मार्क्सिस्ट थॉट’ (1983, 1991) को मार्क्सवादी चिंतन जगत में मील का पत्थर माना जाता है। इसे क्लासिक का दर्जा प्राप्त है। इस तरह के ग्रंथ को सभी भाषाओं में होना चाहिए। भले ही बहुत देर से, लेकिन हिंदी में इसका आना एक ऐतिहासिक क्षण है। इसे लाने में कमल नयन ने जो मेहनत की है, उसके लिए हिंदी जगत को उनका आभारी होना चाहिए। आज की यह चर्चा उन्हें आभार व्यक्त करने का ही एक प्रयास है। कमल उन कुछ चंद विद्वानों में अग्रणी स्थान रखते हैं जो हिंदी में विचार साहित्य को लाने में जुटे हुए हैं। इस तथ्य से अच्छी तरह वाक़िफ़ होने के बावजूद कि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद के काम को विद्वत काम के रूप में प्रतिष्ठित नहीं किया जाता है। इसके लिए न तो कोई अकादमिक अंक मिलता है और न ही उचित पारिश्रमिक। आम तौर पर अनुवाद की पहल किताब के लेखक या हिंदी प्रकाशकों की तरफ़ से की जाती है। हिंदी प्रकाशकों और उनके सलाहकारों की अपनी राजनीति है। इसे इसी से समझा जा सकता है कि न केवल यह डिक्शनरी बल्कि ऐसी कई क्लासिक किताबें अनूदित नहीं की गईं।[1] क्या यही डिक्शनरी आ पाती यदि खुद कमल ने इसे लाने की न सोची होती! जबकि जितना समय और जितनी ऊर्जा इसके अनुवाद में लगी होगी, उतने में आसानी से वे एक कोश बना कर अपने नाम कर सकते थे। इसके साथ ही, यह अपने-आप में एक राजनीतिक स्टैंड भी है। उनका यह साहस अभिनंदनीय है।
- डिक्शनरी की संपादक मंडली
मार्क्सवाद नज़रिया या परिप्रेक्ष्य है। ज्ञान का ऐसा कोई अनुशासन या शाखा नहीं जिसमें इसने पैराडाईम शिफ्ट न लाया हो। इस विविधता और व्यापकता को एक कोश में समेटने का काम किसी एक अनुशासन या ज्ञान-शाखा के विशेषज्ञ के बूते की बात नहीं थी। यह काम सामूहिक ही संभव था। यही वजह है कि इस कोश को बनाने के लिए समाजशास्त्री टॉम बॉटमोर ने लॉरेंस हैरिस (अर्थशास्त्र), वी. जी. किरनन (औपनिवेशिक इतिहास और साम्राज्यवाद के आलोचक, इतिहास) और राल्फ मिलिबैंड (राजनीति शास्त्र) के साथ एक संपादकीय टीम बनाई। यहाँ इन संपादकों का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। ध्यान रहे, बॉटमोर और किरनन का भारत से गहरा जुड़ाव रहा है।
बॉटमोर: उनके छात्र रहे समाजशास्त्री डी. एन. धनागरे ने उनके बारे में कई दिलचस्प बातें लिखी हैं। उनके मुताबिक, बॉटमोर आशावादी मार्क्सवादी थे। उन्होंने मार्क्सवादी समाजशास्त्र को हाशिया से उठाकर मुख्यधारा में स्थापित किया। वे मार्क्सवाद को ऐसी विचार परंपरा के रूप में देखते थे जिसमें असहमति, बहस, विकासमानता आदि आवश्यक तत्व थे। 1960 में आगरा विश्वविद्यालय में आयोजित दक्षिण एशियाई समाजशास्त्र कार्यशाला में बॉटमोर ने जिस गंभीरता से भारतीय समाज-विज्ञान की चुनौतियों पर चर्चा की, उससे वे भारतीय अकादमिक समुदाय के चहेते बन गए। इसी कार्यशाला की प्रेरणा से उन्होंने 1962 में सोसियोलोजी: ए गाइड टू प्रोबलेम्स एंड लिटरेचर नामक किताब लिखी। यह किताब आने वाले कई दशकों तक भारत में समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए ज़रूरी पाठ्य पुस्तक बन गई। पहले ही संस्करण को नौ बार पुनर्मुद्रित करना पड़ा। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय समाजशास्त्र संघ (ISA) के अध्यक्ष के रूप में बॉटमोर ने तीसरी दुनिया के विद्वानों और शोधकर्ताओं के लिए जो अवसर और संसाधन उपलब्ध करवाए, वह अत्यंत महत्त्वपूर्ण क़दम था। मार्क्सवादी समाजशास्त्र पर बॉटमोर की लिखी बेहद ही लोकप्रिय और क्लासिक किताब का अनुवाद हिंदी में डॉ. सदाशिव द्विवेदी ने किया था। बहुत ही सुंदर अनुवाद है यह। यह मैकमिलन से 1977 में प्रकाशित हुआ। दिलचस्प है कि यह अंग्रेजी में 1975 में यानी दो साल पहले ही आई थी।
वी.जी. किरनन: बॉटमोर का भारत से जुड़ाव अकादमिक था, लेकिन किरनन का अकादमिक के साथ-साथ राजनीतिक और भावनात्मक भी। वे 1938 से 1946 तक भारत (लाहौर) में रहे। इस दौरान उन्होंने कॉलेज में अध्यापन के साथ-साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के साथ मिलकर काम भी किया। वे पी. सी. जोशी के बेहद क़रीब थे। इसी दौरान उनका संपर्क इक़बाल और फ़ैज़ जैसे महान शायरों से हुआ। फ़ारसी और उर्दू में कुशलता हासिल कर चुके किरनन ने इन दोनों ही महान कवियों का अंग्रेजी में अनुवाद कर उन्हें दुनिया भर में पहुँचाया। हिंदी पाठकों के लिए यह जानना गर्व की बात होगी कि किरनन ने राहुल सांकृत्यायन की कालजयी कृति ‘वोल्गा से गंगा’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया। प्रकाश करात ने उनके सम्मान में एक किताब का संपादन किया है, जिसका शीर्षक है, ‘ऐक्रॉस टाईम एंड कॉन्टीनेंट्स’। करात पहली बार उनसे 1968 में मिले जब वे एडिनबरा विश्वविद्यालय में पढ़ने गए थे। उसके बाद तो किरनन उनके ‘मेंटर’ और दोस्त बन गए। प्रकाश करात ने उल्लेख किया है कि किरनन भारतीय वामपंथियों के बीच ‘सिद्धांत की कमी’ की बात किया करते थे। वे भारत छोड़ो आंदोलन में कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मिलित न होने के फैसले को एक बड़ी ग़लती मानते थे। हालाँकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि भारतीय वामपंथियों में उत्साह और आशावाद की कोई कमी नहीं थी और उनका जीवन बहुत संयमित था।
राल्फ मिलिबैंड: इनकी गिनती बीसवीं सदी के महत्वपूर्ण मार्क्सवादी राजनीतिक सिद्धांतकारों में होती है। 1969 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘द स्टेट इन कैपिटलिस्ट सोसाइटी’ ने मार्क्सवादी राजनीति विज्ञान को एक नई दिशा दी। उस समय तक पश्चिमी राजनीति विज्ञान में इस मत का बोलबाला था कि राज्य एक तटस्थ संस्था है। मिलिबैंड ने इसे चुनौती दी और तर्कों व आँकड़ों के साथ सिद्ध किया कि आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य भी अंततः शासक वर्ग (पूंजीपतियों) के हितों का ही साधन है। राज्य की प्रकृति पर निकोस पौलान्ज़ास के साथ हुई उनकी बहस मार्क्सवादी सिद्धांत के इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है। डिक्शनरी में ‘राज्य’, ‘नौकरशाही’ और ‘लोकतंत्र’ जैसी प्रविष्टियों पर इस बहस की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। वे वामपंथी पत्रिका ‘न्यू लेफ्ट रिव्यू‘ के शुरुआती दिनों से जुड़े थे और बाद में वार्षिक मार्क्सवादी पत्रिका ‘सोसलिस्ट रजिस्टर’ की शुरुआत की। उन्होंने ‘संसदीय समाजवाद’ की सीमाओं की आलोचना की और एक वैकल्पिक समाजवादी लोकतंत्र की वकालत की।
लॉरेंस हैरिस: लॉरेंस हैरिस ने डिक्शनरी में उस समय के सबसे जटिल हिस्से को संभालने का जिम्मा लिया। वह था मार्क्सवादी अर्थशास्त्र। 1980 का दशक वह समय था जब वैश्विक अर्थव्यवस्था बदल रही थी, और हैरिस ने यह सुनिश्चित किया कि मार्क्स के आर्थिक सिद्धांत 19वीं सदी के कारखानों तक ही सीमित न रहें। मार्क्स की कृति ‘पूंजी’ में कई सिद्धांत बहुत अमूर्त हैं। हैरिस की विशेषता यह थी कि उन्होंने इन सिद्धांतों को आधुनिक बैंकिंग, क्रेडिट और मुद्रा की जटिल दुनिया पर लागू किया। डिक्शनरी में ‘मूल्य का सिद्धांत’ या ‘मुनाफ़े की गिरती दर’ जैसी कठिन अवधारणाओं को स्पष्ट और आधुनिक संदर्भ में समझाने का श्रेय काफ़ी हद तक उन्हें जाता है। हैरिस ने मार्क्सवाद को केवल ‘उत्पादन’ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि ‘वितरण’ और ‘विनिमय’ पर भी ज़ोर दिया। वे मार्क्स और एंगेल्स के आर्थिक विश्लेषण को एक जीवित परंपरा के रूप में देखते थे। ऐसी परंपरा जो खुद को बदलती स्थितियों के अनुसार विकसित करती है। इसीलिए वे अक्सर इस बात पर ज़ोर देते थे कि मार्क्सवाद को केवल औद्योगिक यूरोप की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में नहीं, बल्कि तीसरी दुनिया के उन समाजों के संदर्भ में भी पढ़ा जाना चाहिए जिन्हें पूँजीवादी विश्व-बाज़ार ने अपने प्रभावक्षेत्र में समाहित कर लिया है।
इस तरह, इन चारों संपादकों के एक साथ मिलकर काम करने से ही इस चिंतन कोश जैसी मुश्किल परियोजना की राह आसान हो पाई।
3. यह चिंतन कोश
जहाँ तक मार्क्स या मार्क्सवाद विषयक डिक्शनरी की बात है तो बॉटमोर की डिक्शनरी से पहले दो डिक्शनरी प्रकाशित हो चुकी थीं। एक तो मॉरिस स्टॉकहैमर की कार्ल मार्क्स डिक्शनरी और दूसरी, 1980 में जेम्स रसेल की मार्क्स-एंगेल्स डिक्शनरी। इनमें से पहला वास्तव में उद्धरण कोश है। स्टॉकहैमर ने मार्क्स के कथनों को वर्णानुक्रम सजाया है। इसमें केवल यह बताया गया कि मार्क्स ने वास्तव में क्या कहा। जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है दूसरी डिक्शनरी में मार्क्स के साथ एंगेल्स को भी शामिल किया गया है। बॉटमोर की डिक्शनरी 1983 में प्रकाशित हुई। उन्होंने अपनी प्रस्तावना में यह दावा किया कि अंग्रेजी में मार्क्सवादी विचारों पर एक व्यापक संदर्भ ग्रंथ का अभाव है। यह दावा तकनीकी रूप से सही हो सकता है (क्योंकि पिछले ग्रंथों केवल ‘मार्क्स’ या मार्क्स-एंगेल्स थे, ‘मार्क्सवाद’ पर नहीं), लेकिन उन्हें अपने पूर्ववर्तियों के प्रयासों का उल्लेख करना चाहिए था। वे यह स्पष्ट कर सकते थे कि उनकी योजना इन पूर्ववर्ती ‘परिभाषा-कोशों’ से कैसे अलग है। भले ही उद्धरणों का संकलन हों, लेकिन दोनों डिक्शनरी ने मार्क्स-एंगेल्स को अंग्रेजी पाठकों के लिए सुलभ तो किया।
बॉटमोर की डिक्शनरी पर विचार करने से पहले यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि यह कोई डिक्शनरी नहीं है। यह एक छोटी एनसाइक्लोपीडिया या छोटे-छोटे लेखों का संकलन है और इस लिहाज से हिंदी अनुवाद में शीर्षक को चिंतन कोश रखा जाना सही है। यह जिस साल प्रकाशित हुई, वह मार्क्स का शताब्दी वर्ष था। मार्क्स के गुजरने के सौ साल के दरमियान मार्क्सवाद की कई धाराएँ विकसित हो चुकी थीं। सोवियत मार्क्सवाद, उत्तर-औपनिवेशिक देशों के मार्क्सवाद, माओवाद, नया वाम या पश्चिमी मार्क्सवाद, पार्टियों के मार्क्सवाद और साहित्यिक-अकादमिक जगत के मार्क्सवाद। ऐसा होना स्वाभाविक भी था। आख़िर मार्क्सवाद कोई डॉग्मा न होकर एक विकासमान और गतिशील नज़रिया जो है।[2]
लेकिन मार्क्सवाद में हुए इस विकास की तब तक कोई मुकम्मल तस्वीर या मानचित्र नहीं बनाया जा सका था। सोवियत मार्क्सवाद के बारे में कई भ्रांतियाँ प्रचलित थीं। विरोधियों ने उसके हवाले से यह प्रचारित किया कि मार्क्सवाद एक क्लोज्ड सिस्टम है। टॉम बॉटमोर इस तरह की व्याख्या को आपत्तिजनक मानते थे। वे खुद को नियो-मार्क्सवादी की श्रेणी में रखते थे, जिसका मतलब था ऐसा मार्क्सवादी जो मार्क्सवाद को ‘बंद व्यवस्था’ नहीं मानता। बल्कि वह मानता है कि मार्क्स कुछ मामलों में ग़लत या अपूर्ण हो सकते थे। उनके साथी संपादकों का भी यही रुख था। यह डिक्शनरी की भूमिका में ‘खुलेपन’ पर ज़ोर दिए जाने में स्पष्ट भी हुआ है। वहीं, मार्क्सवाद अकादमिक जगत में भी पसर रहा था। उसके अध्ययन-अध्यापन के लिए भी एक संदर्भ ग्रंथ की ज़रूरत महसूस की जाने लगी थी। तो एक तो मार्क्सवाद के खुलेपन[3] को जाहिर करने, उसे एक कठोर दर्शन होने के आरोप से मुक्त करने और अध्ययन-अध्यापन के लिए एक संदर्भ-ग्रंथ तैयार करने, इन सबसे प्रेरित होकर बॉटमोर इस कोश को तैयार करने की तरफ उन्मुख हुए होंगे। उनके साथी संपादक भी मार्क्सवाद को खुला और विकासमान नज़रिया मानते थे। इसकी भरसक कोशिश की गई कि प्रविष्टियाँ अधिकारी विद्वानों से लिखवाई जाएँ। वस्तुनिष्ठता पर व्यक्तिनिष्ठता न हावी देने का ख़याल रखा गया। बहुलता और विविधता को बरकरार रखने की कोशिश की गई। प्रविष्टियाँ इस तरह लिखी-लिखवाईं गईं ताकि वे स्पष्ट और सटीक हों और उनकी भाषा बोझिल न हो। इन सबकी वजह से ही कोश ने क्लासिक का दर्जा हासिल कर लिया। इस कोश ने यह भी ज़ाहिर किया कि मार्क्सवाद में दूसरे दर्शनों और नज़रियों से संवाद करने और ज़रूरत के अनुसार उनसे ग्रहण करने की परंपरा रही है। इतना ही नहीं, यह असहमति दर्ज करने और उसे जगह देकर खुद को एक जीवंत नज़रिया या दर्शन बनाए रखने का भी गुण रखता है। प्रविष्टि के अंत में आगे और पढ़ने के लिए दी गई सामग्री ने इसे और भी उपयोगी बना दिया। यह सब आसान नहीं था। ख़ासकर तब जबकि यह अपनी तरह का पहला प्रयास था और शायद आख़िरी भी।
बॉटमोर की 1983 की डिक्शनरी की सफलता के ठीक बाद, 1985-87 के दौरान तीन और महत्वपूर्ण प्रयास सामने आए, जिन्होंने मार्क्सवादी चिंतन को देखने के नज़रिए को मौलिक रूप से बदला। 1985-86 में रॉबर्ट ए. गोरमन की ‘बायोग्राफ़िकल डिक्शनरी ऑफ़ मार्क्सिज्म’ और ‘बायोग्राफ़िकल डिक्शनरी ऑफ़ नियो-मार्क्सिज्म’ प्रकाशित हुई। इनमें मार्क्सवादियों की जीवनियाँ दी गईं। गौरतलब है कि गोरमन ने मार्क्सवाद और नव-मार्क्सवाद के बीच स्पष्ट विभाजन किया। गोरमन ने स्वीकार किया कि 20वीं सदी में मार्क्सवाद की एक ऐसा धारा भी विकसित हुई है जो आर्थिक नियतिवाद को ख़ारिज करती है और संस्कृति, चेतना तथा अलगाव पर ज़ोर देती है। गोरमन की डिक्शनरी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि इसने भारतीय मार्क्सवादियों को अच्छी-ख़ासी जगह दी। मिसाल के लिए, गंगाधर अधिकारी, ज्योति बसु, के. दामोदरन, प्रमोद दासगुप्ता, ए. आर. देसाई, डी. डी. कोसंबी आदि। ध्यान रहे, बॉटमोर की डिक्शनरी की तीसरी दुनिया के देशों के मार्क्सवाद और मार्क्सवादियों के प्रति उदासीनता बरतने के लिए आलोचना की गई थी। 1987 में टेरेल कार्वर की ‘ए मार्क्स डिक्शनरी’ सामने आई। इसमें ‘मार्क्सवाद’ से ‘मार्क्स’ की ओर वापसी की गई। कार्वर ने यह दलील दी कि बाद के व्याख्याकारों ने मार्क्स के मूल विचारों को विकृत कर दिया है। उन्होंने इसे एक परिचयात्मक गाइड की तरह तैयार किया और केवल 16 प्रमुख संकल्पनाओं पर पर लंबे निबंध लिखे। गोरमन ने बॉटमोर का कोई उल्लेख नहीं किया था, लेकिन कार्वर ने उसे एक उपयोगी सदर्भ ग्रंथ बताया।
- कोश की खूबियाँ और आलोचनाएँ
कोई भी कोश पूर्ण समावेशी नहीं हो सकता है, भले ही वह इसकी दावेदारी करे। आख़िर इसके तैयार करने वालों की अपनी सीमाएँ होती हैं। प्रकाशक की नीति भी इसे प्रभावित करती है। प्रकाशक के लिए यह एक पण्य भी तो होता है। वैसे भी, कोश की खूबियाँ और सीमाएँ तभी उजागर होकर सामने आती हैं जब यह बन कर तैयार होकर हमारे हाथों में आ जाता है। इस कोश के साथ भी यही हुआ।
इसे अंग्रेजी में मार्क्सवाद पर सर्वाधिक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ कह कर इसकी प्रशंसा की गई। यह स्वीकार किया गया कि कोश विद्यार्थियों, अध्यापकों और जिज्ञासुओं के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शिका का काम करेगा। वहीं क्लासिकल मार्क्सवाद की तुलना में समकालीन मार्क्सवाद और उसमें भी, पश्चिमी मार्क्सवाद को अधिक तवज्जो देने के लिए इसकी आलोचना की गई। इस तरफ़ भी ध्यान दिलाया गया कि कोश में मार्क्सवाद के दार्शनिक पक्ष को ज़्यादा जगह दी गई है जबकि राजनीतिक पक्ष को या तो कम या नहीं। मसलन, प्रत्यक्षवाद, अनुभववाद, कांटवाद और नीतिशास्त्र पर तो लंबी-चौड़ी प्रविष्टियाँ हैं, लेकिन उन ऐतिहासिक घटनाओं पर नहीं जिन्होंने मार्क्सवाद को व्यवहार में आकार दिया। उदाहरण के लिए, ‘पेरिस कम्यून’ (1871) पर प्रविष्टि का होना, लेकिन बोल्शेविक क्रांति और हंगरी विद्रोह, या यूनाइटेड फ्रंट और पॉपुलर फ्रंट आदि पर कोई स्वतंत्र लेख नहीं होना। फ्रैंकफर्ट स्कूल को पाँच पृष्ठ दिया जाना और बोल्शेविकवाद को केवल दो।
कोश की सबसे विस्तृत और आलोचनात्मक समीक्षा टी.जे. बायर्स ने की। 1984 में ईपीडब्लू में आठ पृष्ठों (तकरीबन 8000 शब्दों) में प्रकाशित इस समीक्षा में संतुलित, अनाग्रही और स्पष्ट होने के लिए डिक्शनरी की प्रशंसा की और उसे उन्नत पूँजीवादी देशों में मार्क्सवाद के अध्ययन के लिए एक व्यापक और उपयोगी मार्गदर्शिका माना। बायर्स ने डिक्शनरी की जो कमियाँ गिनाईं, वे ग़ौरतलब हैं। क्योंकि उनकी आलोचना को संपादकों ने गंभीरता से लिया और आठ साल बाद आए दूसरे संस्करण में न केवल उनकी गिनाई कमियों को दूर करने की कोशिश की बल्कि खुद बायर्स से एक प्रविष्टि लिखवाई। बायर्स को कोश में सबसे मौलिक कमजोरी यह नजर आई कि इसमें तीसरी दुनिया को न के बराबर प्रतिनिधित्व मिला था। प्रविष्टि लिखने वालों में से एक भी विद्वान तीसरी दुनिया का नहीं था। इसलिए उन्होंने कोश को यूरोकेंद्रित कहा। बायर्स ने कई उदाहरण गिनाए। माओ पर प्रविष्टि थी लेकिन माओवाद पर नहीं, मानो वह ट्रोत्स्कीवाद या लेनिनवाद की तरह मार्क्सवाद में कोई मौलिक अवदान न हो। हो ची मिन्ह और वो गुयेन गियाप जैसे प्रमुख एशियाई मार्क्सवादियों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया था। अमीलकार कैब्राल और वाल्टर रॉडनी जैसे विचारकों का कोई उल्लेख नहीं था।
बायर्स ने डिक्शनरी में भारत को मिली जगह को विशेष रूप से निराशाजनक बताया। (भारत को लेकर इसलिए उम्मीद रही होगी कि इसके दो संपादकों का भारत से गहरा भावनात्मक जुड़ाव था, जिसकी चर्चा हम ऊपर कर आए हैं। किरनन को तो भारतीय वाम का प्रत्यक्ष अनुभव था। लेकिन उन्होंने इस पर कोई प्रविष्टि नहीं लिखी।) किरनन द्वारा हिंदू धर्म और बॉटमोर द्वारा जाति पर लिखी गई प्रविष्टियाँ उन्हें असंतोषजनक नजर आईं। उन्हें यह बात काफी अखरने वाली लगी कि भारतीय मार्क्सवादियों के बीच से केवल एम.एन. रॉय को शामिल किया गया। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत में कृषि उत्पादन प्रणाली पर हुई प्रसिद्ध बहस और नक्सलवाड़ी जैसे महत्वपूर्ण किसान आंदोलनों का कोश में कोई उल्लेख नहीं था। ‘कृषि प्रश्न’ जैसे मार्क्सवादी केंद्रीय विषय पर कोई अलग लेख न होना बायर्स के लिए हैरानी का विषय था। अंत में, बायर्स ने एक रूपक का प्रयोग करते हुए लिखा कि शब्दकोश घड़ियों की तरह होते हैं, सबसे ख़राब भी न होने से बेहतर है, लेकिन सबसे अच्छे से भी पूरी तरह सही समय बताने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
बायर्स की आलोचना को डिक्शनरी के संपादकों ने सकारात्मक भाव से लिया। इसका असर 1991 के संस्करण में दिखा। नए संस्करण में 50 से ज़्यादा नई प्रविष्टियाँ जोड़ी गईं, जिनमें से एक कृषि प्रश्न भी था। उसे खुद बायर्स से लिखवाया गया। तीसरी दुनिया का समावेश किया गया। पहले संस्करण में ‘मार्क्सिज्म इन द थर्ड वर्ल्ड’ नाम से केवल एक छोटी सी प्रविष्टि थी। दूसरे संस्करण में ये प्रविष्टियाँ जोड़ी गईं – ‘मार्क्सिज्म इन अफ्रीका’, ‘मार्क्सिज्म इन इंडिया’ और मार्क्सिज्म इन लैटिन अमेरिका’। भारत वाली प्रविष्टि को प्रभात पटनायक से लिखवाया गया। बायर्स ने शिकायत की थी कि डिक्शनरी में ‘पेटी कमोडिटी प्रोडक्शन’ (लघु पण्य उत्पादन) की उपेक्षा की गई है, जबकि विकासशील देशों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण अवधारणा है। नए संस्करण यह जुड़ गया। बायर्स ने हो ची मिन्ह, अमिल्कर कैब्राल और अन्य नेताओं की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए थे और औपनिवेशिक मुक्ति संघर्षों को कम जगह देने के लिए डिक्शनरी की आलोचना की थी। नए वाले में इन्हें जगह दी गई। अजीब बात बात यह है कि संपादकों ने दूसरे संस्करण में इन आलोचनाओं का न तो कोई ज़िक्र किया और न ही उन पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की। यहाँ तक कि बायर्स तक की नहीं, जिनके द्वारा चिन्हित कमियों को औपचारिक तौर पर दूर करने की कोशिश उन्होंने की।
दरअसल इन संशोधनों से उस समस्या का हल नहीं हो सकता जिसकी तरफ बायर्स ने ध्यान दिलाया। होना तो यह चाहिए था कि तीसरी दुनिया के विद्वान मिलकर एक अपना मार्क्सवादी कोश तैयार करते। बुनियादी संकल्पनाओं के लिए यह कोश तो अब था ही। ताज्जुब की बात है कि न तो बायर्स और न ही भारतीय मार्क्सवादी और उनमें मैं पार्टियों को भी जोड़ रहा हूँ, इस तरह का एक कोश बनाने की तरफ अग्रसर हुए। कमियाँ गिनाना तो आसान है। बॉटमोर और उनके साथियों ने दिखा दिया कि एक अच्छा मार्क्सवादी कोश कैसे बनाया जा सकता है? उनसे प्रेरित होकर और उनकी ग़लतियों से सीखकर हम अपना कोश तो बना ही सकते थे।
इससे भी बड़ी ताज्जुब की बात यह है कि पश्चिमी दुनिया में और खुद ब्रिटेन में इस डिक्शनरी की परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया गया। आज हम ‘प्लेटफ़ॉर्म कैपिटलिज़्म’, ‘सर्विलांस कैपिटलिज़्म’, ‘गिग इकॉनमी’ और ‘डेटा कॉलोनियलिज़्म’ के दौर में हैं। कृत्रिम मेधा मनुष्य प्रजाति के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी की जा रही है। पारिस्थितकी की चिंता केंद्रीय हो गई है। पूंजीवाद और संसदीय लोकतंत्र के रिश्ते में आमूल बदलाव होते हुए दिख रहे हैं। एक विकासमान नज़रिया होने के नाते मार्क्सवाद ने इन बदलावों को समझने और उनकी व्याख्या करने के क्रम में खुद को पहले से कहीं अधिक समृद्ध और बहुल बनाया है। इसने एंथ्रोपोसीन, मेटाबोलिक रिफ्ट, डिग्रोथ आदि जैसी नई संकल्पनाएँ पेश की हैं। इन सबके मद्देनज़र एक नया कोश बन जाना चाहिए था।
इन दिनों वोल्फगैंग फ्रिट्ज़ हॉग के नेतृत्व में बर्लिन से एक विशाल मार्क्सवाद का ऐतिहासिक आलोचनात्मक शब्दकोश तैयार किया जा रहा है। यह 15 से ज़्यादा खंडों में होगा। ध्यान रहे यह जर्मन प्रयास है। ब्रिटिश नहीं।
- मार्क्स का शताब्दी वर्ष और भारत
1983 में कार्ल मार्क्स की 100वीं पुण्यतिथि के अवसर पर भारत में भी मार्क्स के विचारों को लेकर असाधारण बौद्धिक सक्रियता दिखाई दी। सोसल साइंटिस्ट पत्रिका ने इस अवसर पर मार्क्स सेंटीनेरी अंक निकाले। पत्रिका ने दिल्ली में ‘कार्ल मार्क्स एंड द एनेलिसिस ऑफ़ इंडियन सोसाइटी’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जिसमें देश-विदेश के पचास से अधिक विद्वानों ने भाग लिया। उसमें वहाँ जाति, वर्ग, औपनिवेशिक अतीत, भारतीय सामाजिक संरचना और मार्क्सवादी पद्धति पर गहरी चर्चा हुई। इसकी विस्तृत रिपोर्ट खुद सोसल साइंटिस्ट और ईपीडब्लू में प्रकाशित हुई। सीपीएम और सीपीआई दोनों पार्टियों ने 1983 को मार्क्स शताब्दी वर्ष घोषित कर व्यापक अध्ययन-अभियान चलाए। आईसीएसएसआर ने भी एक संगोष्ठी का आयोजन किया। इसके अलावा, विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों में मार्क्स पर व्याख्यान, चर्चा-गोष्ठियाँ और पाठकों के लिए विशेष अध्ययन-सत्र आयोजित किए गए। भारतीय संसद भी पीछे नहीं रहा। 14 मार्च 1983 को संसद में श्रद्धांजलि दी।[4] इसी अवसर पर भारत सरकार ने मार्क्स की तस्वीर वाली टिकट भी जारी की। हिंदी के लोकवृत्त में भी कई गतिविधियाँ आयोजित की गई होंगी। पत्र-पत्रिकाओं ने विशेषांक निकाले होंगे। जैसे आलोचना पत्रिका ने 1984 में जुलाई-सितंबर का अंक ‘मार्क्स अंक’ के रूप में निकाला। इन सब को समग्रता से देखें तो स्पष्ट होता है कि 1983 भारत में मार्क्स के गंभीर पुनर्पाठ का साल था। और इतनी सामग्री जरूर उत्पादित हुई जिन्हें कई खंडों में संकलित किया जा सकता था। सोचिए, उन संकलनों को इस चिंतन कोश के साथ पढ़ना कितना रोचक और संतोषजनक होता।
6. यह अनुवाद
अब हम बात करेंगे हिंदी अनुवाद पर। इस अनुवाद के आने से हिंदी जगत में एक बड़ा खालीपन भरा है। यह अकादमिक और राजनीतिक दोनों ही क्षेत्रों में उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरी था जितना कि इसके आने के वक़्त अंग्रेजी में। अपनी तमाम सीमाओं और तक़रीबन चार दशक से ज़्यादा पुराना हो जाने के बावजूद हिंदी में यह काफ़ी उपयोगी साबित होगा। कारण, हिंदी में साहित्येतर परिप्रेक्ष्य से मार्क्सवाद पर अकादमिक लेखन कम ही हुआ है। ऐसे में, इसकी बुनियादी संकल्पनाओं और इसके विकास में योगदान देने वाली प्रमुख हस्तियों को सारगर्भित तरीके से पेश करने वाले सदर्भ ग्रंथ की भला कौन नहीं अपनी मेज पर मौजूदगी चाहेगा। इससे हिंदी की दुनिया में मार्क्सवाद के मिथक टूटेंगे और भ्रांतियाँ दूर होंगी। ख़ासकर बोलशेविज़्म, स्टालिन, स्टालिनवाद के बारे में पूर्वाग्रहरहित जानकारी मिलेगी, जो विवाद के प्रमुख विषय रहे हैं। इन्हीं को लेकर बंद और खुले की बातें भी की जाती हैं। उनमें भी ख़ासकर स्टालिन और स्टालिनवाद पर लिखी यह कोश हिंदी पाठकों के लिए मार्क्सवाद ज्ञान की दुनिया में घुसने के प्रवेश-द्वार का काम करेगी।
हिंदी में अनुवाद में सबसे बड़ी समस्या संकल्पनाओं के साथ उत्पन्न होती है। कहना न होगा कि जिस दर्शन की बात हम कर रहे हैं, उसकी बुनियादी भाषा जर्मन है। बाद में फ्रांसीसी, इतालवी आदि भाषाओं के विद्वानों और चिंतकों ने इसमें मौलिक योगदान दिए। ब्रिटेन, अमेरिका और उत्तरऔपनिवेशिक (ख़ासकर ब्रिटिश अधीन रहे) देशों में इस पर अंग्रेजी में लिखा-पढ़ा गया। मार्क्सवाद की बीज संकल्पनाओं के जर्मन से अंग्रेजी में अनुवाद पर मतभेद रहे हैं। चूँकि प्रस्तुत कोश अंग्रेजी में तैयार किया गया और उससे हिंदी में अनुवाद किया गया, ऐसे में जर्मन बीजशब्द और उसके लिए खोजे गए उपयुक्त हिंदी शब्द के बीच का फ़ासला दोगुना हो जाता है। इस महत्वपूर्ण बिंदु को जेहन में रख कर चलने से अनुवाद को और भी अधिक सृजनात्मक और संदर्भबद्ध किया जा सकता है।
हिंदी में मार्क्सवाद पर ज़्यादा अकादमिक लेखन भले ही न हुआ हो, लेकिन दूसरे तरह के लेखन तो खूब हुए हैं। ज्ञान की अन्य शाखाओं की तरह मार्क्सवाद पर भी विचार-विमर्श की शुरुआत हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं में हुई। इस विचार-विमर्श पर राम विलास शर्मा ने तफ़सील से लिखा है और इस क्रम में संकल्पनाओं के लिए हिंदी शब्द भी रचे और गढ़े गए। रामविलास शर्मा का लेखन तो हिंदी मार्क्सवाद की कार्यशाला है। तो पत्र-पत्रिकाओं से लेकर, सत्यभक्त, रमाशंकर अवस्थी, राहुल सांकृत्यायन, रमेश सिन्हा, राम वृक्ष बेनीपुरी, राम विलास शर्मा आदि के लेखन से गुजरें तो हमें मार्क्सवादी पदावली की विकास-यात्रा और उसकी सीमाओं का पता चलेगा। ज़ाहिर है, हमें वहाँ से ग्रहण करने के लिए भी बहुत कुछ मिल जाएगा। हिंदी को विचार की भाषा बनाने में साहित्य के आलोचकों ने काफ़ी परिश्रम किया है। हिंदी में समाजविज्ञान के अभ्यासकर्ताओं को इनसे भी बहुत कुछ मिल सकता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने न जाने कितने संकल्पनात्मक पद गढ़े। नामवर सिंह के लेखन से गुज़रिए। उन्होंने मार्क्सवादी संकल्पनाओं के हिंदी समानभावार्थी शब्द तो गढ़े ही हैं, साथ ही कई प्रसंगों में विस्तार से व्याख्या भी की है कि वे इस गढ़ंत तक कैसे पहुँचे। एक उदाहरण देना चाहूँगा।
…इस प्रसंग में मार्क्स ने जिन दो जर्मन शब्दों का प्रयोग किया है उनके अंग्रेजी प्रतिशब्द क्रमशः ‘एलियनेशन और ‘री-इफ़िकेशन’ हैं। इन शब्दों के साथ मार्क्स ने ‘सेल्फ़-एलियनेशन’ और ‘लॉस ऑफ़ सेल्फ़’ की भी चर्चा की है। ‘एलियनेशन’ और ‘सेल्फ़-एलियनेशन’ के लिए हिंदी में अभी तक किसी अधिक उपयुक्त शब्द के अभाव में ‘अलगाव’ और ‘आत्मनिर्वासन’ का प्रयोग किया जाता है। मार्क्स ने जिसे है ‘लॉस ऑफ़ सेल्फ़’ कहा है, वह अन्य विचारकों द्वारा प्रयुक्त ‘लॉस ऑफ़ आइडेंटिटी’ ही है जिसे हिंदी में ‘अस्मिता का लोप’ कहा जा सकता है। रहा ‘री-इफ़िकेशन’, उससे हिंदी के लेखक अभी कम परिचित मालूम होते हैं। कहीं-कहीं इसका हिंदी रूपांतर ‘वस्तूकरण’ के रूप में किया गया है, जिसका अर्थ है वस्तु में रूपांतरण। ‘री-इफ़िकेशन’ जिस लैटिन शब्द ‘रेइस’ से बना है, उसका एक अर्थ संपत्ति भी होता है, इसलिए चाहें तो उसे संस्कृत ‘रै’ के सहारे हिंदी में ‘रैकरण’ भी कह सकते हैं…(‘कविता के नए प्रतिमान’, पृष्ठ 245)
मार्क्सवाद में दर्शन, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र, इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र आदि, इन सबसे संकल्पनाएँ आई हैं। इसलिए हिंदी में इन विषयों पर हुए लेखन और अनुवाद से हमें बहुत कुछ मिल सकता है। दिक्क़त यह है कि हिंदी का वैचारिक लेखन सुलभ नहीं है। हमें ठीक से अंदाज़ा भी नहीं कि कितना लिखा गया है। सुलभ न होने के कारण या अज्ञानता के कारण (जो सायास भी हो सकती है) हिंदी में किए गए नवोन्मेष प्रचलित नहीं हो पाते। अभी नामवर जी का एक उदाहरण दिया है। आलोचना के एक अंक में रेमंड विलियम्स के ‘बेस एंड सुपरस्ट्रक्चर’ लेख का अनुवाद नामवर जी ने नवल जी से करवाया था। अनुवाद करते वक़्त हम हमेशा इस दबाव में भी रहते हैं कि शब्दावली सरल हो। जहाँ तक विवरण या वर्णन की बात है तो उसका सरल भाषा में होना स्वीकार्य है। लेकिन संकल्पनात्मक शब्दों के लिए संस्कृत के पास जाना ही होगा। कारण संस्कृत ज्ञान की भाषा रही है। उसमें काफ़ी लचीलापन है। लेकिन अंग्रेजी वालों के दबाव के चलते हम भी घबरा जाते हैं।
अन्य प्रांतीय भाषाओं से लेन-देन
मार्क्सवादी साहित्य का अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। वहाँ से भी लेन-देन हो सकता है। मराठी में तो जी. अधिकारी ने सीधे जर्मन से अनुवाद किया। जैसा कि हम सभी जानते हैं, इस पर काफ़ी बहस और विवाद रहा है कि मार्क्स की कई संकल्पनाओं का अंग्रेजी में सही अनुवाद नहीं किया गया। ऐसे में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि जर्मन से मराठी में अनुवाद करते वक्त मार्क्स की संकल्पनाओं को ठीक-ठीक समझा गया या नहीं। मराठी में उसका समानभावार्थी शब्द कैसे बनाया गया? क्या वे शब्द हमारे काम आ सकते हैं? इसी तरह बंगाली मार्क्सवाद पर भी अवलोकनात्मक निगाह डालने की ज़रूरत है।
चूँकि कमल ने यह काम अकेले किया, इसमें उन्हें बहुत ज़्यादा मेहनत करनी पड़ी। ऐसे में उनके पास मार्क्सवाद के अनुवाद के इस पहलू की तरफ़ ध्यान देने का समय नहीं रहा होगा। संकल्पनाओं के अनुवाद की समस्या से वे बखूबी अवगत हैं। हालाँकि यह कहने में मुझे थोड़ी हिचक हो रही है, फिर भी इसी अवसर पर ही यह कहा भी जा सकता है। मेरा व्यक्तिगत मत है कि कोश निर्माण का काम हो या उसके अनुवाद का, उसे सामूहिक तौर पर किया जाना चाहिए। ख़ासकर जब बात मार्क्सवाद की हो, जो ज्ञान और सृजनशीलता को सामाजिक मानता है न कि व्यक्तिगत। इससे बोझ भी कम होता है और सबके अनुभव और कौशल मिलकर काम को बेहतर भी बनाते हैं। मसलन, कुछ संकल्पनात्मक शब्दों को विचार-विमर्श कर और सटीक किया जा सकता था। जिन संकल्पनात्मक शब्दों की हिंदी नहीं दी जा सकी, उन्हें दिया जा सकता था। यहाँ कुछ उदाहरण देना चाहूँगा।
एक्युमुलेशन : पूंजी संचय
एनालिटिकल मार्क्सिज्म : विश्लेषणात्मक मार्क्सवाद
औटोमेशन : स्वचालन
बेस एण्ड सुपरस्ट्रक्चर: आधार और अधिरचना
चांस एण्ड नेसेसिटी : संयोग और आवश्यकता
डिक्टेटरशिप ऑफ प्रोलिटेरियट : सर्वहारा का अधिनायकत्व
डेमोक्रेटिक सेन्ट्रलिज्म : लोकतांत्रिक केंद्रीयवाद
इकोनॉमिक प्लानिंग : आर्थिक नियोजन
इकोनॉमिक एण्ड फिलोसॉफिकल मैन्युस्क्रिप्ट्स : आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियाँ
फॉल्स कॉन्शसनेस : भ्रमित बोध या मिथ्या चेतना
फोर्सेज एण्ड रिलेशन्स ऑफ प्रोडक्शन: उत्पादन की शक्तियाँ और उत्पादन संबंध।
हिस्ट्री एण्ड क्लास कॉन्शसनेस : इतिहास और वर्ग चेतना
इण्टरनेशनलिज्म : अंतर्राष्ट्रीयतावाद
ज्वाइन्ट स्टॉक कम्पनी : संयुक्त पूँजी कम्पनी
मेडिएशन : मध्यवर्तिता
मनी : मुद्रा
ऑर्गेनिक कम्पोजिशन ऑफ कैपिटल : पूँजी का आंगिक संघटन
रिजर्व आर्मी ऑफ लेबर : श्रम की आरक्षित सेना
वेजेस : मजदूरी
उम्मीद है कि अगले संस्करण में इसे सुधार कर लिया जाएगा। इसके तो छपने की ही उम्मीद नहीं थी। इस डिक्शनरी के हिंदी में आने से हिंदी वालों का एक और हित सधा है। अब इस कोश को सामने रखते हुए इसकी तर्ज पर या दूसरे ढंग से, इसके पूरक कोश बनाने की तरफ़ अग्रसर हुआ जा सकता है। इस चिंतन कोश के रूप में कमल ने बुनियाद डाल दी है। अब इस पर कई कोशों की मंज़िलें खड़ी की जा सकती हैं। हिंदी में मार्क्सवादी कोश/संकलन तैयार करना समय की माँग है। बिखरे, भूले-बिसरे सब नज़र आने लगेंगे।
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[1] मिसाल के लिए, लेसजेक कोलाकोस्की की तीन खंडीय ‘मेन करेंट्स ऑफ मार्कसिज़्म’; आइजक डाइचर की लिखी स्टालिन और ट्राट्स्की की क्लासिक जीवनियाँ; ई. एच. कार लिखित बोल्शेविक क्रांति का इतिहास आदि। ऐसी अनेकों कृतियाँ गिनाई जा सकती हैं, जिनका कई भाषाओं में अनुवाद किया गया लेकिन किसी भारतीय भाषा या हिंदी में नहीं। खासकर, वाम संगठनों और पार्टियों की तो यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे मार्क्स और मार्क्सवाद विषयक महत्वपूर्ण विद्वत-कर्म को हिंदी पाठकों के लिए सुलभ करें।
[2] इसका उदय पूंजीवादी व्यवस्था को समझने और उसके ख़ात्मे के उपाय सुझाने की प्रक्रिया में हुआ था। पूंजीवाद कोई जड़ और स्थिर व्यवस्था नहीं है। बाहरी दबावों और भीतरी अंतर्विरोधों के चलते इसमें निरंतर बदलता होता रहता है। ऐसे में ज़ाहिर है मार्क्सवाद को भी इस पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए निरंतर विकसित होते रहना पड़ता है।
[3] मार्क्सवाद के बंद सिस्टम होने की सोच कितनी प्रबलता से हावी थी और मार्क्सवादियों को कितना रक्षात्मक होना पड़ रहा था, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जब कार्ल मरजानी ने 1957 में ग्राम्शी की कुछ रचनाओं को अंग्रेजी पाठकों के सामने पेश किया तो उन्होंने उस किताब का नाम ‘द ओपेन मार्क्सिज़्म ऑफ़ एंतोनिओ ग्राम्शी’ रखा। वैसे, इससे बहुत पहले मार्क्सवाद को बंद सिस्टम मानने की नासमझी की खुद एंगेल्स आलोचना कर चुके थे।
[4] https://eparlib.sansad.in/handle/123456789/835019?view_type=browse







