साहित्य के अनुबंध / महेश मिश्र
‘ ‘द कॉन्ट्रैक्ट्स ऑफ फ़िक्शन’ हमें याद दिलाती है कि साहित्य एक गहरा अभ्यास है जिसके सहारे हम अपने नैतिक
‘ ‘द कॉन्ट्रैक्ट्स ऑफ फ़िक्शन’ हमें याद दिलाती है कि साहित्य एक गहरा अभ्यास है जिसके सहारे हम अपने नैतिक
‘व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता के तमाम दावों के बावजूद अधिकांश लोग अपनी मानवीय संभावनाओं और क्षमताओं से कमतर जीवन ही
इरफ़ान हबीब का यह निबंध –दि नेशन दैट इज़ इंडिया–पहले पहल 10 जून 2003 को ‘दी लिटिल मैगज़ीन’ में प्रकाशित
‘अच्छे साहित्य की एक पहचान यह भी होती है कि वह हमारी चेतना को उन्नत करता है और परम्परागत प्रगति-विरोधी
“जर्मनी में नाज़ी शासन के दौरान लगातार मज़बूत और अमानवीय होती गयी इस परिघटना की भाव-भूमि को समझने के लिए
‘इस ऐतिहासिक मोड़ पर हमें न केवल संविधान सभा की नैतिक दूरदर्शिता की ओर लौटना होगा, बल्कि बिपिन चंद्र, रजनी
‘नेहरू केवल भाषणों में ही महान नहीं थे—उनके कर्म उनके शब्दों से एक क़दम आगे रहते थे। उन्होंने पहले आम
यह आलेख बताता है कि 1996 में प्रकाशित एक किताब किस तरह होलोकॉस्ट के संदर्भ में आम जर्मन की भूमिका
मुख़्तार ख़ान का यह लेख जितना उर्दू क़वायद के बारे में है, उतना ही हिंदी-उर्दू के अटूट रिश्ते के बारे