“जर्मनी में नाज़ी शासन के दौरान लगातार मज़बूत और अमानवीय होती गयी इस परिघटना की भाव-भूमि को समझने के लिए हर्फ़ ने जर्मन बौद्धिक इतिहास के तीन महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्वों— अर्न्स्ट युंगर, कार्ल श्मिट तथा मार्टिन हाइडेगर के विचारों की गहरी पड़ताल की है। यहाँ, इन विचारकों के बौद्धिक जगत पर एक सरसरी नज़र डालने से बहुत कुछ ऐसा खुलता है जिससे केवल जर्मनी की प्रतिक्रियावादी आधुनिकता को ही नहीं बल्कि दुनिया भर के दक्षिणपंथी आंदोलनों को समझने में मदद मिलती है।” –पढ़िए, जेफ्री हर्फ़ की किताब पर नरेश गोस्वामी की टिप्पणी। नरेश हिंदी में लगातार लिखने वाले साहित्यप्रेमी समाजवैज्ञानिक और आला दर्जे के अनुवादक हैं। उन्होंने कहानियाँ भी लिखी हैं।

पिछले दिनों आधुनिकता, प्रौद्योगिकी तथा प्रगति के अंतर्संबंधों पर सामग्री टटोलते हुए अमेरिकी इतिहासकार जेफ्री हर्फ़ द्वारा प्रस्तावित एक दिलचस्प अवधारणा पर ध्यान गया। हर्फ़ ने इस अवधारणा पर जर्मनी के नाज़ी शासन पर केंद्रित अपनी किताब (1984) Reactionary Modernism: Technology, Culture, and Politics in weimer and the third Reich में विचार किया है। इस किताब के पीछे जेफ्री हर्फ़ का बुनियादी सवाल यह था कि जर्मनी के समाज में यह अंतर्विरोधी मानसिकता कहाँ से पैदा हुई कि उसने अपने लिए आधुनिकता की वैज्ञानिक प्रक्रिया से निकली प्रौद्योगिकी और प्रगति का वरण तो कर लिया परंतु उसी आधुनिकता से निसृत तर्क-विवेक और लोकतांत्रिक मूल्यों को ताक़ पर रख दिया?
जेफ्री हर्फ़ बताते हैं कि एक ओर तो नाज़ी तंत्र औद्योगिक आधुनिकता और वैज्ञानिक प्रगति का रास्ता अपनाकर नये हथियार विकसित कर रहा था, मास प्रोपेगैंडा की मनोवैज्ञानिक युक्तियों का प्रयोग कर रहा था, जबकि दूसरी ओर लोकतंत्र, व्यक्ति के निजी अधिकार, वैज्ञानिक सोच और तर्क पर आधारित विमर्श का अवमूल्यन कर मिथकीय अतीत व नस्लवादी विचारों का प्रचार-प्रसार कर रहा था। हर्फ़ इस परिघटना को प्रतिक्रियावादी आधुनिकता कहते हैं।
इस किताब से गुज़रते हुए पहली महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि यह मिलती है कि विचारों का यह प्रतिक्रियावाद दरअसल एक वैचारिक निर्मिति है जो प्रत्येक समाज में अलग-अलग रूपों और घटकों के साथ प्रकट होती है। मसलन, आज भी तमाम दक्षिणपंथी आंदोलन एक तरफ़ डिजिटल वारफेयर, निगरानी (सर्विलांस) और कृत्रिम बुद्धि (एआई) का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ़ पितृसत्ता और धार्मिक मूलतत्त्ववाद के संरक्षक बने हुए हैं।
इसी तरह, उत्तर-औपनिवेशक देशों में भी आधुनिकता की पूरी आधारभूत संरचना देखी जा सकती है, परंतु पूर्व-आधुनिक अस्मिताओं का पुनराविष्कार वहाँ भी राजनीतिक लामबंदी का एक बुनियादी मसला बना हुआ है। पिछले बरसों में इसका एक कथित कलात्मक रूप भी सार्वजनिक परिदृश्य में घुसपैठ करता गया है। इस प्रसंग में उन तमाम फिल्मों और गीत-संगीत के उस सिलसिले को याद किया जा सकता है जिसमें अत्याधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करते हुए एक अतीतगामी संस्कृति परोसी जा रही है।
जर्मनी में नाज़ी शासन के दौरान लगातार मज़बूत और अमानवीय होती गई इस परिघटना की भाव-भूमि को समझने के लिए हर्फ़ ने जर्मन बौद्धिक इतिहास के तीन महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्वों— अर्न्स्ट युंगर, कार्ल श्मिट तथा मार्टिन हाइडेगर के विचारों की गहरी पड़ताल की है।
यहाँ, इन विचारकों के बौद्धिक जगत पर एक सरसरी नज़र डालने से बहुत कुछ ऐसा खुलता है जिससे केवल जर्मनी की प्रतिक्रियावादी आधुनिकता को ही नहीं बल्कि दुनिया भर के दक्षिणपंथी आंदोलनों को समझने में मदद मिलती है।
उदाहरण के लिए, अर्न्स्ट युंगर (1895-1998) युद्ध को राजनीतिक या सैन्य कर्म के बजाय एक ऐसे आध्यात्मिक और सौंदर्यमूलक अनुभव की तरह देखता था जो व्यक्ति की अंतर्निहित दुर्बलताओं का परिमार्जन कर उसे लोकोत्तर हस्ती में बदल देता है। ग़ौरतलब है कि युंगर ने पहले विश्व युद्ध में जर्मनी की ओर भाग लिया था। जर्मनी में नाजि़यों के उत्थान तक युंगर एक नायक और सांस्कृतिक चिंतक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था। हालांकि उसने कभी नाज़ी दल की सदस्यता ग्रहण नहीं की लेकिन उसकी कल्पना में जर्मनी के खोये हुए सम्मान और गौरव का उन्नायक वही व्यक्ति हो सकता था जो आधुनिक प्रौद्योगिकी की भट्ठी में तपकर और परम अनुशासन में रहकर इस्पाती मनुष्य बनने की क्षमता रखता हो। युंगर की सांस्कृतिक कल्पना का यह कल्पित मनुष्य व्यक्तिगत इच्छाओं और आकांक्षाओं से परे था। उसके भीतर निजता के बजाय एक सामूहिक रहता था। ग़ौरतलब है कि युंगर का यह कल्पित नायक लोकतांत्रिक उदारतावादी किरदार नहीं था। उसके मूल में नवनिर्माण और प्रभुत्व की इच्छा सर्वोपरि थी।
ज़ाहिर है कि अपने समय के रूढ़िवादी चिंतकों की तरह युंगर आधुनिक प्रौद्योगिकी से परहेज़ नहीं करता था, बल्कि वह इसे बोर्ज्वा उदारतावाद के संक्रामक प्रभावों से अछूती एक नयी व्यवस्था का आवश्यक साधन मानता था। युंगर की सांस्कृतिक कार्यशाला में ‘वाल्डगेंगर’ एक महत्त्वपूर्ण रूपक है। हालाँकि युंगर के यहाँ यह रूपक नाज़ी शासन के पतन के बाद ज़्यादा दिखायी देता है, लेकिन अपनी उद्भावना में यह उस विद्रोही व्यक्तित्व का पर्याय है जो किसी व्यवस्था का अनुगामी न बनकर अपनी नैतिक स्वायत्तता हासिल करने के लिए जंगल में चला जाता है। वह एक ऐसा व्यक्तित्व है जो सत्ता प्राप्त नहीं करना चाहता बल्कि अवैध प्राधिकार का प्रतिकार करने के लिए सत्ता के प्रभाव-क्षेत्र से बाहर चला जाता है। स्मरणीय है कि एक ऐसे ही योद्धा-संन्यासी की छवि हमारे यहां भी मौजूद रही है।
ख़ैर, संक्षेप में कहें तो युंगर एक ऐसा प्रतिक्रियावादी चिंतक था जो आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके एक पतित और खंडित हो चुकी दुनिया को उसकी मिथकीय अखंडता और कर्मसाधक एकता में देखता था।
इस क्रम में, दूसरा महत्त्वपूर्ण विचारक कार्ल श्मिट है। क़ानून और राजनीति का सिद्धांतकार श्मिट उदारतावाद का दुर्धर्ष विरोधी था। वह संसदीय लोकतंत्र का कटु आलोचक था। उसका मानना था कि विधिसम्मत प्रक्रियाओं के घटाटोप और निर्णायकता की अनुपस्थिति के कारण शासन की यह प्रणाली एक विफल तंत्र बन जाती है। वह सर्वसत्तावाद का खुला समर्थक था। क़ानून की अमूर्त प्रेरणाओं या उसके वैचारिक पक्षों से उसकी चिढ़ का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह विधि-व्यवस्था को केवल संप्रभु की इच्छा मानता था।
संप्रभुता के इस प्रसंग में उसकी यह भयावह सोच देखिए कि संप्रभु वह होता है जो अपवाद का फ़ैसला करता है। राजनीति के बारे में भी उसका विचार इतना ही जनविरोधी है— वह उसे नीति और आदर्शों की भाषा के बजाय एक ऐसी शक्ति के रूप में व्याख्यायित करता है जो संकट की घड़ी में नीति और आदर्शों को भंग करने की कूवत रखती हो। राजनीति के संबंध में उसकी एक अन्य धारणा भी इसी तरह उन्मूलनवादी है। वह कहता है कि राजनीति मूलतः दुश्मन और दोस्त में अंतर करने की कार्रवाई है। वह उदारतावादी लोकतंत्र की इसलिए भर्त्सना करता है क्योंकि उसमें बहस-मुबाहिसे और समझौते का रास्ता अपनाने के चक्कर में मित्र और शत्रु की अस्तित्वगत स्पष्टता धुँधली पड़ जाती है।
श्मिट के यहाँ प्राधिकार की निर्णय-क्षमता, व्यवस्था में अनुशासन तथा एकता का मिथक इतना घनघोर है कि उसमें एक स्वतंत्र नागरिक की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इस प्रकार, श्मिट उसी प्रतिक्रियावादी आधुनिकता का पहरेदार बनकर सामने आता है जो राज्य-संचालन के आधुनिक तौर-तरीक़ों— अधिकारी-तंत्र आदि से कोई दिक़्क़त न मानते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों को सिरे से ख़ारिज कर देता है।
युंगर और श्मिट की तुलना करें तो दोनों लोकतंत्र विरोधी हैं। युंगर व्यक्ति में नायकत्व की खोज करता था। वह तकनीक-प्रौद्योगिकी को नियंत्रित करने वाले अभिजन समूहों का प्रशंसक था। श्मिट संप्रभु शासक उसी को मानता था जो अराजकता को समाप्त कर अनुशासन स्थापित कर सके। दोनों ही आधुनिकता के उपकरणों के पैरोकार थे, लेकिन आधुनिकता के मूल्य-मान्यताओं और बहुलतावाद की निंदा करते थे। दोनों ही संकट या चुनौती के समय को मनुष्य में उसकी श्रेष्ठतम शक्तियों के उभार का स्रोत मानते थे। उनकी दृष्टि में विपत्ति, संघर्ष और अपवाद इतिहास व जीवन में एक नवोन्मेष का अवसर था ।
इस मुक़ाम पर नाज़ी दल के सदस्य तथा एक समय तक उसके पैरोकार रहे मार्टिन हाइडेगर की चर्चा करना भी ज़रूरी है। इसकी एक वजह यह भी है कि भारत में आधुनिकता की मुख़ालफ़त करने वाले विद्वानों का एक समूह हाइडेगर की गाहे-बगाहे चर्चा करते रहते हैं।
युंगर और श्मिट की तुलना में मार्टिन हाइडेगर आधुनिकता का धुर विरोधी था।
हाइडेगर का मानना था कि आधुनिक तकनीक केवल उपकरणों के निर्माण और इस्तेमाल का मसला नहीं है, बल्कि उसका सत्व (गेस्टेल) अस्तित्व के समग्र विन्यास को कुछ इस तरह बदल देता है कि मनुष्य के साथ दुनिया की हर चीज़ उपयोगिता— क्रमबद्धता, भंडारण, अधिकतम सदुपयोग और दोहन आदि में अवघटित हो जाती है।
हाइडेगर के लिए यह इसलिए दिक़्क़ततलब है कि इसके चलते अस्तित्व के अन्य संभावित रूप बेमानी क़रार दे दिये जाते हैं। यानी उनकी नज़र में ख़तरा मशीनों के कारण नहीं, बल्कि उस सोच के कारण है जो दुनिया को केवल एक संसाधन में बदल कर रख देता है।
हाइडेगर उदारतावाद, पूँजीवाद और मार्क्सवाद, तीनों पर इसलिए अविश्वास करते थे कि विचारों की तीनों ही प्रणालियों में प्रौद्योगिकी के प्रति गहरी निष्ठा और स्वीकार का भाव दिखायी देता है। हाइडेगर की दृष्टि में तीनों ही वाद दुनिया को एक नियोजित, प्रबंधित और दोहन करने की चीज़ समझते हैं।
इन विचारकों के संक्षिप्त परिचय के बाद यह सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद उठने लगता है कि उन्हें नाज़ीवाद में ऐसी कौन-सी बात नज़र आयी कि युंगर को छोड़कर श्मिट और हाइडेगर नाज़ी पार्टी के सदस्य तक बन गये?
कार्ल श्मिट की पोजीशन तो ख़ैर बिल्कुल साफ़ थी। वह तो सर्वसत्तावाद का निर्द्वंद्व पैरोकार था। उसका समग्र राजनीतिक चिंतन केवल ताक़त से शुरू और उसी पर ख़त्म होता था।
लेकिन, हाइडेगर के पास तो पूंजीवादी आधुनिकता के दोषों की यह गहरी समझ भी थी कि वह मनुष्य और प्रकृति की नैसर्गिकता को नष्ट कर देती है। फिर वह उसी नाज़ीवाद की ओर कैसे चला गया जो न केवल विज्ञान और प्रौद्योगिकी का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहा था, जिसने एक भारी-भरकम और भयावह ब्यूरोक्रेसी भी निर्मित की थी और भीड़ के दिमाग़ को नियंत्रित करने के लिए तमाम मनोवैज्ञानिक हथकंडे भी अपना रहा था?
दरअसल, इस सवाल का जवाब बौद्धिकता— विचार और चिंतन की बनावट तथा उसके सत्ता-विमर्श की ओर लेकर जाता है।
सामान्यतः हम इस बात को भूले रहते हैं कि महान से महान विचारक भी मूलतः अपने समय को संबोधित कर रहा होता है। लेकिन, यहाँ समय से हमारा आशय केवल विचारक के अपने जीवन के समय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वह पिछला समय, उसके संचित प्रभाव और उसके अपने समय के प्रश्न भी शामिल रहते हैं। लेकिन बहुत-से विचारक ख़ुद को एक ख़ास विषय तक सीमित कर लेते हैं। उस पर निरंतर काम करते रहते हैं किंतु उनके कृतित्व में समकालीन समय अनुपस्थित रहता है। हम अपने इर्द-गिर्द ऐसे अनेक विद्वानों को देखते हैं जो भारतीयता, संस्कृति और परम्पराओं के किसी विशुद्ध संस्करण की खोज में बरसों से लगे हैं। वे स्वयं आधुनिक जीवन जीते हैं। आधुनिकता से निकली संस्थाओं में काम करते हैं, लेकिन समकालीन समय पर कोई टिप्पणी नहीं करते। कभी अपने काम के औचित्य पर विचार नहीं करते कि वृहत्तर जनता की ख़ुशहाली के लिए उनका काम किस तरह प्रासंगिक है।
कहना न होगा कि किसी विचारक, चिंतक या दार्शनिक को देखने-समझने का एक तरीक़ा यह भी है कि उसकी प्रेरणाएँ कहाँ से आ रही हैं? कि वह अपने समय के लैंडस्केप में किस तरफ़ खड़ा है? अपने समय में किधर देख रहा है?
यहाँ से जर्मनी के इन तीनों विचारकों को एक बार फिर देखें। उनमें एक बात बिल्कुल समान है— दरअसल, तीनों लोग उस जर्मनी से मुख़ातिब हैं जो उनके देखते-देखते एक औद्योगिक समाज में बदल चुका है। पुराने समाज का ढाँचा, उसकी स्थिरता ख़त्म हो गयी है; राजशाही का शीराज़ा बिखर गया है— उसका सांस्कृतिक वर्चस्व सिमट गया है; राजनीति में समाजवादी, लोकतांत्रिक और साम्यवादी धाराएँ पनप रही हैं। कुल मिलाकर कहें तो इन विचारकों के सामने जो दुनिया प्रकट हो रही है, वह उनकी शुरुआती दुनिया से अलग जा छिटकी है। उनके लिए यह एक अजनबी दुनिया है। उन्हें यह अर्थ, अस्मिता और व्यवस्था का संकट काल महसूस होता है।
दरअसल, एक स्तर पर तीनों ही विचारकों को यह लगता था कि नाज़ियों के उत्थान से जर्मनी की आहत महानता और खंडित गौरव लौट आयेगा।
लेकिन, जैसा कि बाद में साबित हुआ, यह भ्रांत आशा थी। वे अपने समय के यथार्थ को दार्शनिक भाव-भूमि से देख रहे थे। नाज़ियों के नेतृत्व में जर्मनी का और भी तेज़ गति से आधुनिकीकरण हो रहा था, जबकि ख़ास तौर पर युंगर और हाइडेगर जैसे लोग उसमें जर्मनी के आध्यात्मिक पुनरोद्धार की संभावना देख रहे थे।
इन तमाम विचारकों की पृष्ठभूमि पर नज़र डालें तो यह बात साफ़ होने लगती है कि असल में ये लोग एक अभिजन दुनिया की खोयी हुई प्रतिष्ठा से व्यथित थे। और चूँकि वे इस बात को सपाट शब्दों में या प्रत्यक्ष ढंग से नहीं कह सकते थे, इसलिए वह एक दार्शनिक, अमूर्त या बिम्ब-प्रधान भाषा में आ रहा था।
इसलिए, यह बात विस्मृत नहीं होनी चाहिए कि विचारों का ऐसा विन्यास वस्तुत: साधारण जनता के सशक्तीकरण की प्रतिक्रिया में पैदा होता है। सच यह है कि बहुत-से चिंतक और लेखक अपने विचारों पर दार्शनिकता का आवरण चढ़ा लेते हैं, लेकिन अगर इस आवरण को सुसंगत ढंग से हटाया जाए तो उसके नीचे आभिजात्य और साधारण जनता के बँटवारे पर टिकी जनविरोधी व्यवस्था के नक्शे आसानी से देखे जा सकते हैं।
naresh.goswami@gmail.com







इतनी बेहतरीन समीक्षा लिखने के लिए बंधुवर नरेश गोस्वामी का धन्यवाद।
बेशक, समीक्ष्य ग्रंथ न केवल नाज़ी जर्मनी अपितु हमारे हिन्दुत्व-भारत को समझने में बहुत सहायक है।
बजरंग जी, इसे समीक्षा कहना जेफ्री हर्फ़ के साथ अन्याय करना होगा। मैंने उनकी अवधारणा को थोड़ा किताब की रोशनी में और बाक़ी मौजूदा संदर्भों को सामने रखकर बात कहने का प्रयास किया है बस।
महत्वपूर्ण जानकारीमूलक रचना।