हरदेवी – एक ‘लॉस्ट हीर’ / चारु सिंह


‘इतिहास में अधीनस्थ होने का अर्थ मूक होना या अशक्त होना नहीं है। संघर्ष हुआ है, इसे स्वीकार करने की शर्त संघर्ष का विजेता होना नहीं हो सकती। सत्ता से स्त्रियों का नाता केवल उत्पीड़क और पीड़िता का नहीं रहा है बल्कि यह एक ऐसा जटिल और ‘निगोशिएटेड’ संबंध है जिसमें स्त्रियाँ अगर पराजित हुई हैं तो लगातार मोल-भाव भी करती रही हैं।’–हरदेवी की विशेषज्ञ चारु सिंह द्वारा हरलीन सिंह की किताब की समीक्षा। चारु सिंह अहमदाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं और ‘आलोचना’ के नवीनतम अंक में हरदेवी पर उनका महत्त्वपूर्ण आलेख–‘अभिलेख, आलोचना, इतिहास और हरदेवी का जीवन’–प्रकाशित हुआ है।

वाइकिंग (पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया) से प्रकाशित हरलीन सिंह की नयी किताब ‘द लॉस्ट हीर- वीमेन इन कॉलोनियल पंजाब’ औपनिवेशिक पंजाब का एक स्त्री केन्द्रित इतिहास है। यह इतिहासलेखन का एक ऐसा प्रयोग है जहाँ बड़े सियासती, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों को स्त्रियों के रोज़मर्रा के जीवन और निजी-सार्वजनिक अनुभवों के सहारे समझने की कोशिश की गयी है। आम किसान स्त्रियाँ, क्रांतिकारियों की पत्नियाँ, माताएँ और मेहनतकश औरतें हों; या सजग राजनीतिक कार्यकर्त्ता, पतनोन्मुख राजवंशों की अभिजात स्त्रियाँ, सुशिक्षित मध्यवर्गीय आधुनिकाएँ और सुधारक स्त्रियाँ; इन सभी के बेहद निजी अनुभवों और सार्वजनिक-राजनीतिक जीवन से उभरी कहानियों को एक-दूसरे में समाहित करते हुए उनके माध्यम से रचा गया औपनिवेशिक पंजाब का यह इतिहास अपने आप में नवोन्मेषी है। इस किताब में संजोयी गयी औपनिवेशिक दौर के पंजाब की वह खोयी हुई ‘हीर’ एक ही वक़्त में घरेलू भी है और सार्वजनिक भी। हरलीन सिंह की यह अध्ययन पद्धति एड्रियन रिच की ‘रिविज़निस्ट हिस्ट्री’ सम्बन्धी उस अवधारणा की याद दिलाती है जिसे हम हिंदी में ‘पुनरावलोकनात्मक इतिहासलेखन’ कहते हैं[1] । इतिहासलेखन की यह पद्धति उन्हीं पुराने आख्यानों को एक नयी आलोचनात्मक नज़र से देखने का काम करती है जिनमें व्यापक ऐतिहासिक उलट-फेर की व्याख्या करते वक़्त इतिहासकार ने स्त्रियों को या तो पूरी तरह से अनुपस्थित मान लिया था, या उन्हें बेहद उपेक्षित रूप में कहीं हाशिये पर दर्ज किया था। कैसे एक ही वक़्त में स्त्रियाँ अपने सीमित घरेलू जीवन में आकंठ डूबी होकर भी व्यापक राजनीतिक घटनाओं की वाहक बन जाती हैं— यह इतिहास की किताब इस बात को रेखांकित करने में सफल रही है। ये कहानियाँ कभी विधवाओं के जीवन, वंशानुक्रम के विघटन, और औपनिवेशिक हस्तक्षेप के भावनात्मक प्रभावों के रास्ते उभरती हैं, तो कभी स्त्रियों की व्यक्तिगत आकांक्षाओं और संघर्षों के माध्यम से। मसलन, रायकोट के प्रसंग में नूर-उन-निस्सा जैसी स्त्रियों के जीवन की घटनाएँ तब महज़ उनका निजी दुःख नहीं रह जातीं जब उनके घरेलू दुःख और निजी त्रासदी राजनीतिक संकटों का वायस बन जाते हैं और राजनीतिक सत्ता-संघर्ष में सीधा हस्तक्षेप करना उनकी ऐतिहासिक नियति। यह ऐतिहासिक क़िस्सागोई हिन्दी में हो रहे स्त्री-आधारित इतिहासलेखन के लिए एक महत्त्वपूर्ण नज़ीर (टचस्टोन) बन सकती है, बशर्ते इसे आलोचनात्मक दृष्टि के साथ अपनाया जाये। हरलीन सिंह आधिकारिक ब्योरों, अख़बारों और साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं और इनसे प्राप्त सूचनाओं को एक कथात्मक साहित्यिक शैली में पिरोते जाते हैं। जो कथा वे अन्तिम रूप से बुनते हैं, वह दिखलाने में सक्षम रही है कि औरतें सत्ता और इतिहास की मुख्यधारा से बाहर रहते हुए, हाशिए पर ज़िंदगी जीती हुई और सत्ता की सीमा-रेखाओं से बाहर होते हुए भी उससे एक द्वंद्वात्मक संबंध में जुड़ी रही हैं। तमाम नये आँकड़ों, क़िस्सों और सूचनाओं के रास्ते यह किताब औपनिवेशिक सार्वजनिकता में स्त्रियों की भागीदारी की जो तस्वीर पेश करती है, वह हेबरमास या पार्थ चटर्जी द्वारा प्रस्तावित निजी-सार्वजनिक द्विभाजन की अवास्तविकता के तर्क को और भी मज़बूती देती है।

किताब के आवरण पर प्रयुक्त चित्र स्वयं उस इतिहास-दृष्टि का दृश्य रूपक बन पड़ा है जिसे यह किताब प्रतिपादित करती है। ‘अमृतसर की देशी स्त्री’ नाम का यह चित्र 1880 के दशक में अमृतसर की रहनेवाली एक साधारण पंजाबी महिला का है जिसे संभवतः जर्मन-ब्रिटिश कलाकार हॉरेस वैन रूथ ने बनाया है। आवरण का यह चित्र किसी रानी-महारानी या सत्ता से जुड़ी किसी महत्त्वपूर्ण स्त्री का नहीं है। पंजाबी सज-धज में खड़ी यह एक गुमनाम स्त्री है। इस दृष्टि से लेखक का चयन उन भीतरी प्रसंगों में और भी स्पष्ट हो उठता है जब आम किसान और मेहनतकश औरतें भी इस किताब में शामिल होती जाती हैं। यह चयन सजग रूप से लेखक के उस नज़रिये को सामने लाता है जो इस किताब का मुख्य स्वर है – सत्ता के केन्द्रीय आख्यानों से इतर, हाशिये की स्त्री-संवेदनाओं को इतिहास के केंद्र में देखना। यह अध्ययन ऐसी स्त्रियों से पाठकों को मुख़ातिब कराता है जिनका जीवन दरबारी इतिहासों में नहीं बल्कि घरेलू, पारिवारिक और भावनात्मक दुनिया में आकार लेता है। विधवाओं, माताओं और पत्नियों के अनुभवों का यह संसार ही वह क्षेत्र है जहाँ से खड़े होकर हरलीन सिंह अपनी किताब में औपनिवेशिक संकट की जटिलताओं को निजी अनुभवों की नज़र से पढ़ने का प्रयास करते हैं।

हरलीन सिंह के यहाँ हरदेवी [2]

इस किताब के दसेक पृष्ठों में हरदेवी की भी चर्चा है। हरदेवी के राष्ट्रवादी प्रयासों और राजनीतिक सक्रियता की एक सुंदर झलक ‘द लॉस्ट हीर’ में देखने को मिलती है। इस किताब से हरदेवी के राजनीतिक जीवन संबंधी कई नयी जानकारियाँ सामने आयी हैं। सिविल एंड मिलिट्री गज़ट, लाहौर ट्रिब्यून जैसे समाचार पत्रों, NIA की रिपोर्टों तथा हरदेवी के अपने यात्रावृत्तांत के आधार पर प्राप्त अभिलेखीय सामग्री का उपयोग करते हुए हरलीन सिंह बहुत सीमा तक उनके जीवन की एक ऐतिहासिक रूपरेखा तैयार कर सके हैं। जहाँ पर उनका विश्लेषण उलझता है, वह है निहाल सिंह द्वारा लिखी गयी रचनात्मक संस्मरण-कथा पर उनकी निर्भरता [3]। निहाल सिंह हरदेवी के दामाद सच्चिदानंद सिन्हा के मित्र थे और अपने कॉलेज के दिनों में हरदेवी के यहाँ जाया करते थे, लेकिन जो संस्मरण उन्होंने लिखा है, वह आँखों-देखी घटनाओं का नहीं है बल्कि उनके जन्म से पहले की बातों के बारे में है। सच्चिदानंद सिन्हा पर लिखे गये एक लम्बे संस्मरण में उन्होंने इन्हीं सुनी-सुनायी बातों के आधार पर हरदेवी को याद करते हुए दो पन्नों का एक भावुक संस्मरण भी लिखा है। यह संस्मरण लिखते वक्त वे “जहाँ तक मुझे याद है” या “जैसा मैंने सुना था” आदि का बेहद सजग इस्तेमाल भी करते रहे हैं। हालिया लेख [4] में हमने ऐतिहासिक साक्ष्यों से तुलना करते हुए निहाल सिंह के संस्मरण में मौजूद भ्रान्तियों, लैंगिक पूर्वाग्रहों और ग़लत सूचनाओं को विस्तार से रेखांकित किया है और ध्यान दिलाया है कि एक बेहद महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सामग्री होते हुए भी निहाल सिंह जैसे स्रोतों का एक सजग और आलोचनात्मक इस्तेमाल कितना ज़रूरी है। हरलीन सिंह अपने उल्लेखनीय अभिलेखीय शोध के सहारे जिन उत्कृष्ट और दुर्लभ स्रोतों को एकत्र कर सके हैं, यदि वे उन पर अधिक भरोसा करते और निहाल सिंह से एक आलोचनात्मक दूरी बनाकर रखते, तो इस किताब में मौजूद हरदेवी-संबंधी निष्कर्ष कहीं अधिक संतुलित और प्रामाणिक होते।

संस्मरणात्मक लेखन के सहारे इतिहास लिखने की प्रक्रिया में मौजूद इन समस्याओं पर भविष्य में काम करने वाले शोधार्थियों को गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है। कल्पनाशील साहित्य/ स्मृति पर आधारित संस्मरण और उनके रास्ते रचे जा रहे ऐतिहासिक वृत्तांत के बीच की सीमाओं को सावधानी से पहचानना अत्यंत आवश्यक है। ध्यान रहे, अपने संस्मरण में ‘बहुत वक्त गुज़र जाने’ और ‘ठीक से याद न आने’ की बात निहाल सिंह ख़ुद बार-बार दोहराते जा रहे हैं। इसमें संदेह नहीं कि हरलीन सिंह ने जो शोधपरक श्रम किया है, वह सराहनीय है; अगर उनका अध्ययन महज हरदेवी पर केंद्रित होता, तो उनके द्वारा संकलित स्रोतों के आलोक में यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे एक अधिक समग्र और आलोचनात्मक जीवनी तैयार कर पाते। यहाँ यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि हरलीन सिंह के अध्ययन का मुख्य विषय हरदेवी नहीं हैं। ऐसे में विषय का विस्तार देखते हुए उनसे हरदेवी केंद्रित इन सूक्ष्मताओं अपेक्षा रखना अतिरेक होगा। इस किताब की विषयवस्तु व्यापक है और हरदेवी या सरलादेवी चौधरानी जैसी स्त्रियाँ उसमें प्रसंगवश दर्ज होती गयी हैं। ऐसे में, यह अपेक्षा करना कि लेखक निहाल सिंह की संस्मरण-कथा के मौजूद होते हुए भी अतिरिक्त गहराई से केवल हरदेवी के जीवन को जाँचें–परखें, अनुचित माँग है।

इसके बावजूद, यह किताब हरदेवी या हिन्दी साहित्य में रुचि रखने वाले शोधार्थियों के लिए इस लिहाज़ से महत्त्वपूर्ण है कि इसमें गुप्तचर विभाग की रिपोर्टों के आधार पर हरदेवी की साम्राज्यविरोधी और राष्ट्रवादी सक्रियता से जुड़ी कई महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ प्रस्तुत की गयी हैं। वे सूचनाएँ न केवल हिन्दी लोकवृत्त की एक लेखिका-संपादिका की सार्वजनिक गतिविधियों को समझने के लिहाज़ से दुर्लभ हैं, बल्कि हिन्दी क्षेत्र और हिन्दी साहित्यकारों में राष्ट्रवाद के विकास की स्थापित समझ को भी चुनौती देती हैं। यह ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ के समकालीन होते हुए भी उससे अगले दर्जे के राष्ट्रवादी क़िस्से हैं। हरलीन सिंह के अध्ययन से कुछ अंश इस लेख में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, जो न केवल हमारे अध्ययन में मौजूद हरदेवी की साम्राज्यविरोधी सक्रियता के दावे को मज़बूती देते हैं बल्कि हमारे लेख में मौजूद गुप्तचर विभाग की दूसरी रिपोर्टों और हरदेवी के 1910 में राजद्रोह के आरोप में जेल जाने की ख़बरों को ठीक से समझने में भी मदद करते हैं। यह साक्ष्य न सिर्फ़ बीसवीं सदी के पहले दशक के हिन्दी लोकवृत्त की एक नयी तस्वीर पेश करते हैं बल्कि हरदेवी के कारावास पहुँचने से संबंधित घटनाओं को भी स्पष्टता से समझने में मददगार हैं [5]।

हरदेवी की राजनीतिक सक्रियता को किसान आंदोलन से उभरी जैविक राष्ट्रवादी अभिव्यक्तियों के सन्दर्भ में देखते हुए हरलीन सिंह दिखलाते हैं कि किस तरह ‘पंजाब लैंड एलियनेशन बिल, 1900’ के क़ानून बनने पर पंजाब में किसानों के बीच जो आंदोलन उठ खड़ा हुआ, उसने हरदेवी जैसी ‘विक्टोरिया समर्थक’ शहरी मध्यवर्गीय स्त्री को भी साम्राज्यवादी सरकार के ख़िलाफ़ ला खड़ा किया। हरलीन सिंह दिखलाते हैं कि इस आंदोलन में बहुत-सी स्त्रियाँ जैसे – जय कौर, हरनाम कौर, हुकम कौर आदि भी सक्रिय थीं। इन्हीं जय कौर के बेटे थे अजीत सिंह जिन्होंने अपने साथी लाला लाजपत राय के साथ मिलकर ‘राजद्रोहात्मक’ परचे बाँटे और आंदोलन को हवा दी। ब्रिटिश सरकार ने जब इन दोनों को बर्मा डिपोर्ट किया, तब यह आंदोलन और भी ज़ोर पकड़ने लगा। गुप्तचर विभाग की रिपोर्टों के आधार पर हरलीन सिंह ध्यान खींचते है कि हरदेवी, जिन्होंने कुछ समय पहले रानी विक्टोरिया के लिए एक ‘वफ़ादार शोकगीत’ लिखा था, अब लाहौर में घर-घर जाकर ‘हिंदू स्त्रियों के मन में राष्ट्रीय भावना जगाने का कार्य’ करने लगीं।

एनआईए की डेली रिपोर्ट ऑफ़ द डाइरेक्टर ऑफ़ क्रिमिनल इंटेलिजेंस, न. 119, 4 जून 1907 में दर्ज किया गया कि हरदेवी ने ‘प्रतिशोध कोष’ में अपने सभी जेवर दान कर दिये हैं। साथ ही, उन्होंने अपने घर में पर्दानशीन स्त्रियों की एक सभा कर आगंतुकों से आग्रह किया है कि वे अपने आभूषणों का से कम से कम दसवाँ हिस्सा उस इस ‘प्रतिशोध कोष’ में दान करें।

इस सभा में हरदेवी ने ‘गोरे फिरंगियों’ द्वारा हिंदुस्तानियों के ‘धर्म को भ्रष्ट करने’ पर गुस्सा जताया और लाला लाजपत राय के निर्वासन की तुलना ‘रावण द्वारा किये गये सीता-हरण’ से की। उन्होंने हिंदू स्त्रियों से अपील की कि जिस तरह विधवाएँ आभूषण नहीं पहनतीं हैं, उसी प्रकार भारत माता के इस आज्ञाकारी पुत्र की क्षति के शोक में उन्हें भी अपने आभूषण त्याग देने चाहिए [6]।

रावलपिंडी में उसी समय यूरोपियों के ख़िलाफ़ एक हिंसक राष्ट्रवादी दंगा भी हुआ था जिसमें कई व्यक्तियों की गिरफ़्तारी हुई थी। हरलीन सिंह गुप्तचर विभाग की वह रिपोर्ट उद्धृत करते हैं जिसके अनुसार इन गिरफ़्तार व्यक्तियों की पत्नियाँ हरदेवी और सरला देवी के विचारों से प्रभावित थीं और लगातार उनके संपर्क में बनी हुई थीं [7]।

अपने स्वयं के शोध से हासिल इतनी महत्त्वपूर्ण जानकारी के बावजूद हरलीन सिंह हरदेवी की आत्मनिर्णय की क्षमता पर यक़ीन करने की बजाय निहाल सिंह की कथात्मक प्रस्तुति को अधिक वज़न देते हैं। वे हरदेवी के लंदन जाने को लेकर सुनायी गयी निहाल सिंह की उस कथा पर यक़ीन कर लेते हैं जहाँ हरदेवी एक आज्ञाकारी बालविधवा दिखती हैं जो बस संयोगवश लंदन चली गयीं जबकि वे स्वयं उन ख़बरों को अपने शोध के माध्यम से उद्धृत करते हैं जिसमें स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि हरदेवी ने लंदन में बच्चों की शिक्षा की किंडरगार्टन पद्धतियों का अध्ययन किया और इस विषय पर भारत लौटकर किताबें भी लिखीं। मात्र यही इस अध्ययन की सीमा है जो अपने ही शोध से प्राप्त प्राथमिक स्रोतों की तुलना में निहाल सिंह जैसे स्रोतों पर अधिक भरोसा करने से उत्पन्न हुई है। यदि इस सीमा को ध्यान में रखते हुए हरलीन सिंह की किताब को पढ़ा जाये, तो वह तस्वीर में और भी गहरे रंग भरती है। ख़ासकर हरदेवी सरीखी स्त्रियों के राजनीतिक जीवन के बारे में। यह किताब औपनिवेशिक पंजाब की मध्यवर्गीय स्त्रियों के यहाँ राष्ट्रवादी चेतना के विकास को किसान आंदोलनों से उभरे राष्ट्रवाद से जोड़ने का काम करती है जो गाँधी के रास्ते स्त्रियों के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने की परिकल्पना को सप्रमाण चुनौती है।

सरला देवी और हरदेवी के रिश्तों का जो विवरण गुप्तचर विभाग की रिपोर्टों के आधार पर उभरता है, वह हरदेवी को सरला देवी की छाया से अलग पहचान दिलाने वाला है। हरलीन सिंह द्वारा संकलित गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट – एनआईए, वीकली रिपोर्ट ऑफ़ द डायरेक्टर ऑफ़ क्रिमिनल इंटेलिजेंस, 31 अगस्त 1907 में स्पष्ट रूप से लिखा गया था- लाहौर की हिंदू स्त्रियों को समकालीन राजनीतिक आंदोलनों से जोड़ने की हरदेवी की मुहिम में अब रवींद्रनाथ की भतीजी, सरला देवी भी शामिल हो गयी हैं [8]।

यह हरदेवी और सरला देवी से संबंधित इस तर्क को एक अधिक मज़बूत तथ्यात्मक आधार प्रदान करता है कि हरदेवी जिन कार्यों में पहले से सक्रिय थीं, उनमें सरला देवी ने बाद में भागीदारी की। यह हिन्दी लोकवृत्त में राष्ट्रवाद के प्रस्फुटन की अवधारणा को बांग्ला नक़ल की छाया से मुक्त रखकर देखने के लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण है। सरला देवी बाद में शरीक हुईं और अपनी स्पष्ट दृष्टि और अपने पंजाबी पति के ‘हिंदुस्तान’ अख़बार की ताक़त के सहारे निस्संदेह उन्होंने हरदेवी के इन प्रयासों को और भी तीव्र बना दिया।

कहना न होगा, जिस तरह गाँधी की छाया में सरला देवी चौधरानी को देखना निष्फल है, उसी प्रकार यह भी अन्यायपूर्ण होगा कि सरला देवी के मंच पर आने से पहले से सक्रिय हरदेवी को सरला देवी के इतिहास की प्रतिच्छाया में सीमित कर दिया जाये। उपरोक्त शोध इस विषय में सचेत है। हरलीन सिंह ने ‘सीमंतनी उपदेश’ किताब पर भी अपने अध्ययन में लम्बी चर्चा की है लेकिन वे यह नहीं जानते कि यह हरदेवी की ही रचना है।

हरलीन सिंह की यह शोध-यात्रा इस किताब में भारत-विभाजन, ख़ासकर पंजाब के बँटवारे, सांप्रदायिक हिंसा और शरणार्थियों के साक्षात्कार से शुरू होती है। साम्प्रदायिक लड़ाइयाँ महिलाओं की देह पर लड़ी जाती हैं। उन्हें इसकी सबसे अधिक क़ीमत चुकानी पड़ती है। उर्वशी बुटालिया ने इस पर विस्तार से अध्ययन किया है। हरलीन सिंह का अध्ययन इस मायने में अलग है कि यह विभाजन पर हुए उन शोध कार्यों से एक अलग राह चुनता है जहाँ पंजाब की स्त्रियों पर विचार मूल रूप से एक पीड़िता के रूप में किया जाता रहा है। ‘बर्कले’ के एक प्रोजेक्ट के लिए हरलीन सिंह ने पाकिस्तान से भाग कर आये शरणार्थियों से बातचीत करते हुए पाया कि पुरुष और स्त्रियों की याददाश्त विभाजन के अलग-अलग पहलुओं को सामने ला रही हैं। अपने साक्षात्कारों में उन्होंने देखा कि पुरुषों की चिंताएँ स्त्रियों की स्मृतियों से काफ़ी अलग थीं। पुरुषों के लिए उनकी संपत्ति का विनाश और उसका पाकिस्तान में छूट जाना जहाँ सबसे दुखद स्मृति होती थी। साथ ही, भारत में बसकर अपना नया व्यवसाय शुरू करना या नौकरी के सहारे तमाम सुख-सुविधाएँ और प्रतिष्ठा वापिस हासिल करने की संतुष्टि उन्हें गर्व से भर देती थी। वहीं, स्त्रियाँ याद करती थीं कि कैसे चूल्हे पर खीर चढ़ी थी जिसे यों ही छोड़कर उन्हें भागना पड़ा, किसी ने साड़ियों को कटवाकर नये-नये सलवार और कुर्ते सिलवाये थे जो तह किये रखे थे, वह सब छोड़ कर उन्हें भागना पड़ा। स्त्रियों की इसी छूट गयी दुनिया को खोजने और समझने के लिए हरलीन सिंह ने ‘द लॉस्ट हीर प्रोजेक्ट’ शुरू किया।

इस किताब में जिन स्त्रियों का विवरण मिलता है, उनकी एक ही पहचान है, उनका पंजाबी होना। चाहे सरला देवी मूलतः बंगाल से हों या हरदेवी आगरे से, लेकिन उन सबका कर्मक्षेत्र पंजाब था। यही कारण है कि इस किताब में सिख, हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी आदि धर्मों को मानने वाली स्त्रियों की चर्चा पंजाब के संदर्भ में की गयी है। आर्यसमाज, ब्रह्म समाज, ईसाई मिशनरी, सिख, हिंदू, सनातनी आदि तमाम पहचानों के साथ ये स्त्रियाँ औपनिवेशिक पंजाब के बहुभाषी लोकवृत्त में किस तरह सक्रिय और संवादरत थीं, इसे एक जगह रखकर देखना इस किताब की बड़ी उपलब्धि है। मसलन, जब सरला देवी के प्रसंग में हरलीन सिंह गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट के सहारे हरदेवी को लाते हैं और उग्र राष्ट्रवादी गतिविधियों की चर्चा करते हैं तो पाठक साफ़ देख पाता है कि ये स्त्रियाँ अनेक धागों के सहारे एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है – उपनिवेशवाद और पितृसत्ता।

‘द लॉस्ट हीर’ को पढ़ते हुए जो बात सबसे शिद्दत से महसूस होती है, वह इसकी अभिलेखीय गहराई या साहित्यिक संवेदनशीलता भर नहीं है बल्कि वह विशाल रिक्तता है जो हिन्दी की एक अध्येता के सामने यह किताब उजागर करती है। हिंदी में ऐसा एक भी समेकित कार्य नहीं है जो हिन्दी भाषी क्षेत्र की स्त्रियों को वर्ग, जाति और साम्प्रदायिक जटिलताओं में देखते हुए एक ऐसा खाका पेश कर सके, औपनिवेशिक स्त्रियों की वह समग्र दुनिया उजागर कर सके जहाँ वे परदे में बंद साहित्यिक-मिथकीय ‘असूर्यम्पश्या’ की रूढ़ छवि से मुक्त हो सकें और एक मनुष्य के बतौर ‘निजी और सार्वजनिक की बाइनरी’ से परे देखी जा सकें। उपनिवेशवाद, प्रतिरोध, सत्ता और संरचनात्मक परिवर्तन की साझा ऐतिहासिक कसौटियाँ स्त्रियों के इतिहास के लिए भी उतनी ही कारगर हैं। ज़रूरत है कि ‘पीड़िता स्त्री’ और ‘कामदग्ध क्रांतिकारी स्त्री’ की ‘स्त्री-विमर्श’ द्वारा रची गयी नवीन बाइनरी से मुक्त हुआ जाये – जहाँ ‘देह की मुक्ति ही स्त्री मुक्ति’ है और स्त्री का इतिहास या तो महज उसकी यौनिकता का इतिहास है, या शोषण का। स्त्री भी उतनी ही मनुष्य है, वह भी एक ही वक़्त में निजी भी हो सकती है और राजनीतिक भी; शोषित भी हो सकती है और सत्ता में भागीदारी के लिए संघर्षरत भी; इसे समझे बिना हिन्दी सार्वजनिक क्षेत्र के सन्दर्भ में ‘द लॉस्ट हीर’ सरीखी किताब का लिखा जाना मुश्किल है।

हिंदी भाषा में भी ‘स्त्री इतिहास’ पर काफ़ी लिखा गया है। यह लेखन कुछ सजग अपवादों के बावजूद फ़िलहाल कुछ परिचित चक्रों में ही घूम रहा है जहाँ स्त्री से संबंधित हरेक चर्चा ‘स्त्री विमर्श’ के फ्रेमवर्क में क़ैद हो जाती है। अपने मूल रूप में क्रांतिकारी होते हुए भी यह ‘स्त्री विमर्श’ एक रूढ़िगत संरचना में बँध गया है। यहाँ स्त्री को उसके अनुभवों तक सीमित रखते हुए जेंडर से जुड़े प्रत्येक प्रश्न को अधिकतर यौनिकता, उत्पीड़न, व्यथा, घरेलूपन, असहायता, वियोग, ‘स्त्रीत्व और पुरुषत्व के किसी सार्वभौमिक यथार्थ’ और ‘स्त्री-पुरुष के सार्वभौमिक संघर्ष’ के फ्रेम में ही पढ़ा जाता है। यहाँ स्त्री को इतिहास में व्याख्यायित करने की दृष्टि भी व्यापक इतिहास से कटी हुई है। स्त्री पीड़ा का रेटरिक, इच्छाओं के अधूरेपन की चर्चा, मौन का महिमामंडन आदि ट्रोप यहाँ इस कदर हावी हो गये हैं कि औपनिवेशिक अनुभव, वर्ग, ब्राह्मणवाद, राज्य, पितृसत्ता और ऐतिहासिक विरोधाभासों की जटिलता ओझल हो जाती है। जेंडर के सवालों पर लिख रहे बहुत से नये लेखक (स्त्रियाँ और पुरुष) इससे अलग और गंभीरता से भी काम कर रहे हैं लेकिन जिसे हम ‘स्त्री विमर्श’ के रूप में जानते हैं, उसका आम स्वर यही है।

कहना न होगा, हिन्दी के ‘स्त्री विमर्श’ ने स्त्री की एजेंसी के जिस तर्क को बार-बार दोहराया और स्थापित किया है, हरलीन सिंह के विश्लेषण में कई बार उसका अभाव दिखता है। मसलन, हरदेवी की ही वैचारिक यात्रा का उदाहरण लें – “ब्रह्म समाज से आर्यसमाज की ओर”(?) – जिसे वे ब्रह्म समाजी भाई की मृत्यु के बाद आर्यसमाज पति के प्रभाव के रूप में व्याख्यायित करते हैं। हरदेवी की अपनी सार्वजनिक सक्रियता, उनके लेखन में मौजूद आर्य समाज की तीखी आलोचनाओं और उनके व्यक्तिगत चयन या निर्णय लेने की क्षमता को तवज्जो देने की बजाय यह किताब उनके परिवार में मौजूद पुरुषों की विचारधारा के आधार पर हरदेवी जैसी स्त्रियों के वैचारिक रुझान को समझने की कोशिश करती है।

ऐसे में ‘द लॉस्ट हीर’ जैसे अध्ययन अगर हिन्दी में मौजूद जेंडर सम्बन्धी सजगता के साथ हों तो यह न केवल ‘खोयी हुई स्त्रियों’ की रिकवरी या पुनर्प्रस्तुति के लिहाज से एक महत्त्वपूर्ण कार्य होगा बल्कि यह स्त्रियों को इतिहास के चक्र की ‘मूक भुक्तभोगी रूपी पैसिव छवि’ से निकालकर इतिहास की सक्रिय कर्ताओं के रूप में उन्हें उनकी सही जगह दिलाने में सफल होगा। इतिहास में अधीनस्थ होने का अर्थ मूक होना या अशक्त होना नहीं है। संघर्ष हुआ है, इसे स्वीकार करने की शर्त संघर्ष का विजेता होना नहीं हो सकती। सत्ता से स्त्रियों का नाता केवल उत्पीड़क और पीड़िता का नहीं रहा है बल्कि यह एक ऐसा जटिल और ‘निगोशिएटेड’ संबंध है जिसमें स्त्रियाँ अगर पराजित हुई हैं तो लगातार मोल-भाव भी करती रही हैं। वे विरोध करती हैं और कई बार उस सत्ता को अपनाती और दूसरी स्त्रियों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल भी करती रही हैं।

ऐसे में यह दोहराना ग़लत नहीं होगा कि यदि ज्योतिप्रसाद मिश्र निर्मल आदि के कुछेक ग्रंथों पर निर्भरता को छोड़ते हुए इसी विशद पैमाने पर कुछ कार्य हिंदी लोकवृत्त की स्त्रियों पर किये जा सकें, तब यह हिन्दी क्षेत्र के इतिहास की मौजूदा समझ में बहुत से आधारभूत बदलाव लेकर आयेगा। साथ ही, हिन्दी में हो रहे स्त्री सम्बन्धी अध्ययन और इतिहासलेखन को भी अधिक विस्तृत, महीन और बहुआयामी बना सकेगा। यह समझा जा सकता है कि समूचे हिन्दी लोकवृत्त को इस तरह के अध्ययन में समेटना कठिन होगा लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, बुंदेलखंड जैसे किसी सुविधाजनक विभाजन में बाँटकर तो यह कार्य किया ही जा सकता है।

पंजाब की इन ‘खोयी हुई हीरों’ का यह पुनरावलोकनात्मक इतिहास, जिसे हरलीन सिंह ने रचनात्मक साहित्य और अभिलेखीय स्रोत दोनों का इस्तेमाल करते हुए तैयार किया है, हिन्दी के पाठकों को भी ज़रूर पढ़ना चाहिए – पंजाब की उन स्त्रियों का एक सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक इतिहास जानने के लिए जो इतिहास की पितृसत्तात्मक धारा में बहती हुई ‘गुमशुदा’ हो गयी हैं; औपनिवेशिक पंजाब की स्त्रियों को उनके समकालीन इतिहास के संदर्भ में देखते हुए स्त्रियों की दुनिया की सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से एक समग्र तस्वीर देखने के लिए। जिसे मार्क्सवादी-नारीवादी नैन्सी फ़्रेज़र के सहारे हम ‘स्त्रियों के प्रतिलोकवृत्त’ के रूप में चिह्नित करते आये हैं, वह प्रतिलोकवृत्त औपनिवेशिक पंजाब में किस तरह निर्मित हुआ, इसे समझने के लिए हरलीन सिंह की किताब एक महत्वपूर्ण स्रोत है। हिन्दी भाषी स्त्रियों के पंजाब केन्द्रित प्रतिलोकवृत्त को समझने के लिहाज़ से भी यह एक सन्दर्भ पुस्तक का काम करेगी। इसे आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ने पर औपनिवेशिक काल से संबंधित स्त्री-इतिहास के अध्येताओं के लिए न सिर्फ़ पंजाबी स्त्रियों बल्कि पंजाब में सक्रिय ‘हिन्दी स्त्रियों’ की एक नयी दुनिया उभर कर सामने आयेगी। अपनी तमाम दिलचस्प कहानियों, किंचित दृष्टिगत सीमाओं और अभिलेखीय विशिष्टताओं के साथ यह किताब ‘द लॉस्ट हीर- वुमन इन कॉलोनियल पंजाब’ हमें याद दिलाती है कि एक वैकल्पिक इतिहास संभव है, बशर्ते उसके लिए ज़रूरी श्रम किया जाए।

charusingh.du@gmail.com


संदर्भ 

1 रिच, एड्रियन. (1979). व्हेन वी डेड अवेकन: राइटिंग ऐज़ री-विज़न. इन ऑन लाइज़, सीक्रेट्स, ऐंड साइलेंस: सिलेक्टेड प्रोज़ 1966–1978. न्यू यॉर्क, एन. वाय.: डब्ल्यू. डब्ल्यू. नॉर्टन.

2 इससे मिलते-जुलते विषय पर समीक्षक का शोधालेख आलोचना-78 में ‘अभिलेख, आलोचना, इतिहास और हरदेवी का जीवन’ नाम से प्रकाशित हुआ है जिसमें हरदेवी संबंधी नवीन शोधकार्यों की विस्तृत समीक्षा भी की गई है । आलोचना का वह लेख प्रकाशन हेतु जा चुका था जब यह किताब छप कर आई। इस किताब के करीब पंद्रह पृष्ठ हरदेवी से सम्बन्धित हैं जिसकी समीक्षा पर हमने अधिक ध्यान केंद्रित किया है। शेष किताब की चर्चा समीक्षा के करीबन आधे हिस्से को घेरती है। सिंह, हरलीन. (2025). द लॉस्ट हीर: विमेन इन कोलोनियल पंजाब. इंडिया: वाइकिंग (पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया).

3 सिंह, निहाल.(1947). “अ लाँग डिस्टेंस इंटेलेक्चुअल कंपेनियन”. सच्चिदानन्द सिन्हा कॉममोरेटिंग वॉल्यूम. संपादक प्रभु नारायण गौड़ . युनाइटेड प्रेस, पटना.

4 आलोचना 78

5 आलोचना 78

6 एनआईए, डेली रिपोर्ट ऑफ़ द डाइरेक्टर ऑफ क्रिमिनल इंटेलिजेंस, न. 119, 4 जून 1907; हरलीन सिंह 256.

7 NIA, Weekly Report of the Director of Criminal Intelligence, 3 अगस्त 1907, हरलीन सिंह उपरोक्त।

8 एनआईए, वीकली रिपोर्ट ऑफ़ द डायरेक्टर ऑफ़ क्रिमिनल इंटेलिजेंस, 31 अगस्त 1907; हरलीन सिंह, पृष्ठ 256

 

 

 


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